Wednesday, December 30, 2015

अलविदा 2015 ! साल के पूरे घटनाक्रम पर एक नज़र ।

 साल 2015 अलविदा होने वाला है और नए साल यानी 2016 के आगाज की तैयारियां जोरों पर हैं ऐसे में आईये एक नज़र डालते हैं साल के पूरे घटनाक्रम पर एक नज़र ।

राजनीति
नीतीश ने टूटे मनोबल को फिर से संजोया और ऐसी राजनीतिक बिसात  बिछाई कि एनडीए चारों खाने चित हो गया। नीतीश ने पुराने साथी लालू यादव और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर एक बार फिर सीएम की बागडोर संभाली। महागठबंधन को 170 से अधिक सीटें मिली। 

भ्रष्टाचार
काली कमाई के धन कुबेर नोएडा के यादव सिंह पूरे साल छाये रहे। सीबीआई जांच शुरू होने के बाद इंजीनियर-इन-चीफ यादव सिंह को सस्पेंड किया गया।

आतंकवाद
अबू बक्र अल-बगदादी दुनिया में दरिंदगी और दहशत का दूसरा नाम बन बन गया। फ्रांस की राजधानी पेरिस में इस्लामिक स्टेट आतंकियों ने नवंबर में सीरियल हमला किया। इसमें करीब डेढ़ सौ लोग मारे गए थे। 

आर्थिक
भारी उतार-चढ़ाव के बीच 2015 दलाल पथ चार साल का सबसे बुरा दौर रहा। विदेशी निवेशकों ने स्थानीय बाजार से अरबों डॉलर की पूंजी की निकासी कर हवा निकाल दी। केन्द्र सरकार ने जहां सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें सौपी गईं, वहीं आरबीआई ने भी ग्राहकों को फायदा पहुंचाने के लिए कई बार नीतिगत दरों में कटौती की।

प्रबंधन 
चुनाव प्रबंधन में यह शख्स बेजोड़ है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और एनडीए के रणनीतिकार बिहार में नीतीश के तारणहार बने। लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी को चाय पर चर्चा का मंत्र देने वाले प्रशांत ने नीतीश को परचे पर चर्चा का सुझाव दिया। 

अपराध
क्या कोई मां अपनी बेटी की हत्या करवा सकती है, क्या कोई औरत अपनी बेटी की बहन भी हो सकती है, कोई मां अपनी बेटी से रिश्ते को भला दुनिया से क्यों छुपाएगी, क्या किसी महिला के अपने सौतेले बेटे से रिश्ते हो सकते हैं, क्या संपत्ति के लिए कोई अपनी औलाद की हत्या करवा सकता है? जब से शीना हत्याकांड सामने आया है। लेकिन शीना की मौत का राज खुलते ही ये साफ होने लगा कि इंद्राणी तो शीना की मां थी यानी इंद्राणी पर अपनी बेटी के कत्ल का आरोप लगा! इस मर्डर मिस्ट्री में हमेशा  सस्पेंश बना रहा। 

कानून
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को लोकायुक्त नियुक्ति में हो रही देरी के लिए जमकर फटकार लगाई। दो दिन का अल्टीमेटम के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेषाधिकार की धारा 142 का प्रयोग करते हुए लोकायुक्त की नियुक्ति कर दी।

वहीं भारतीय संसद ने जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्श ऑफ चिल्ड्रेन) बिल 2014 पास कर दिया। नए विधेयक के तहत 16 वर्ष से अधिक उम्र के किशोर अपराधियों को व्यस्क मानने का प्रावधान है। किशोर अपराधी पर सामान्य कोर्ट में मुकदमा चलाए जाने के बारे में निर्णय लेने का अधिकार जुवेलाइल जस्टिस बोर्ड के पास होगा। सात साल के कठिन परिश्रम और विचार विमर्श के बाद नेपाल की संविधान सभा ने 16 सितंबर 2015 को नए संविधान को मंजूरी दे दी।

मैगी
मैगी के दीवाने इस साल को भूल नहीं पाएंगे। बाराबंकी में एक फूड सिक्युरिटी ऑफिसर ने जांच कराई तो मैगी के टेस्ट मेकर में लेड की मात्रा मानक से अधिक मिली। इसके बाद देश के कई राज्यों ने इसपर प्रतिबंध लगा दिए। मगर अब मैगी एक बार फिर से बाजार में उपलब्ध है।

खेल
ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों ने आईसीसी वर्ल्ड कप 2015 के फाइनल मुकाबले में न्यूजीलैंड को सात विकेट से मात देकर रिकॉर्ड पांचवीं बार विश्व कप अपने नाम कर लिया। ऑस्ट्रेलिया ने न्यूजीलैंड से मिले 184 रनों के आसान लक्ष्य को 101 गेंद शेष रहते तीन विकेट खोकर हासिल कर लिया। वहीं टेनिस स्टार सानिया मिर्जा साल 2015 में कई बार विवादों में रहीं। राजीव गांधी खेल रत्न और प्राइवेट जेट मेकअप इसमे शामिल रहा। 

हादसे
नेपाल के लिए यह साल भूकम्प के हमले का साल रहा। 25 अप्रैल के दिन भूकम्प ने नेपाल को हिला कर रख दिया। इस भूकम्प में कई महत्वपूर्ण प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर और अन्य इमारतें बर्बाद हो गईं थी। 1934 के बाद पहली बार नेपाल में इतना प्रचंड तीव्रता वाला भूकम्प आया था। इस भूकम्प में 8000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। जबकि 2000 हजार से ज्यादा लोग घायल हो गए थे।

अफवाह
देश में असहिष्णुता फैलने और केंद्र सरकार को जनता विरोधी ठहराते हुए जैसे मुद्दे खबरों में छाए रहे। बड़ी संख्या में साहित्यरकारों और फिल्मकारों ने अवॉर्ड लौटाए। दादरी में गौ मांस खाने की अफवाह से देष शर्मसार हुआ। उग्र भीड़ ने द्वारा अखलाक नाकम युवक को गौ मांस खाने और रखने की अफवाह के बाद पीट-पीटकर मार डाला। 

फिल्म
निर्देशक ए.आर. मुरुगदास और आमिर खान की फिल्म गजनी देश में 100 करोड़ की कमाई करने वाली पहली फिल्म बनी। महज 18 दिनों के अंदर गजनी ने बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ की कमाई की। वहीं सलमान खान की फिल्म बजरंगी भाईजान 25 करोड़ की लागत से बनी मगर इस फिल्म ने भारत में 318.14 करोड़ रुपये बटोरे।

मौत 
भारत की अग्नि मिसाइल को उड़ान देने वाले मशहूर वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दुनिया को साल 2015 में अलविदा कहा। कलाम न सिर्फ एक महान वैज्ञानिक, प्रेरणादायक नेता थे बल्कि अद्भुत इंसान भी थे। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम 30 जुलाई 2015 को रामेश्वरम में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। वहीं वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल ने अंतिम सांस ली। उन्होंने अयोध्या में राममंदिर बनाने के लिए अभियान का न केवल नेतृत्व किया। 

भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष जगमोहन डालमिया का दिल का दौरा पड़ने से निधन हुआ।मशहूर अभिनेत्री साधना का मुंबई के हिंदुजा हॉस्पिटल में निधन हुआ। 74 साल की साधना कैंसर से पीडि़त थीं। आरजू, मेरे मेहबूब, लव इन शिमला, मेरा साया, वक्त, आप आए बहार आई, जैसी कई मशहूर हिंदी फिल्मों में उन्होंने काम किया था। साधना का साधना कट हेयरस्टाइल बेहद मशहूर हुआ था।

मौसम
चेन्नई में नवंबर-दिसंबर में हुई बारिश के चलते हालात बिगड़ गए। सड़कें दरिया बन गईं। आशियाने छिन गए। सेना और एनडीआरएफ की टीमों ने दिन-रात एक कर लोगों को बाहर निकाला। 

इस हमाम में सभी नंगे हैं !

कानूनी समानता का मतलब है कानून के सामने समानता और सबके लिए कानून की समान सुरक्षा। अवधारणा यह है कि सभी मनुष्य जन्म से समान होते हैं, इसलिए कानून के सामने समान हैसियत के पात्र हैं। कानून अंधा होता है और इसलिए वह जिस व्यक्ति से निबट रहा है उसके साथ कोई मुरौवत नहीं करेगा। वह बुद्धिमान हो या मूर्ख, तेजस्वी को या बुद्धू, नाटा हो या कद्दावर, गरीब हो या अमीर, उसके साथ कानून वैसा ही व्यवहार करेगा जैसा औरों के साथ करेगा। लेकिन उपवाद भी हैं। किसी बालक या बालिका के साथ किसी वयस्क पुरुष या स्त्री जैसा व्यवहार नहीं किया जाएगा और बालक या बालिका के साथ मुरौवत किया जाएगा। तो फिर ये कानून यहाँ आकर अँधा हो जाता है।




 ऐसे में ये जुमला एक बार फिर सच साबित हुआ। निर्भया अपराध पूरी तरह से सिद्ध था मरने वाली मासूम लड़की ने मरने से पहले अपनी पूरी वेदना को व्यक्त करते हुए कहा था कि जिन्दा जला दो उसे! लेकिन राजनीति की शौक़ीन (गैर)कानूनी व्यवस्था और स्वयं को सबसे लाचार जताने वाली (अ)न्याय व्यवस्था ने जिस तरह एक मुर्दा तंत्र के सामने घुटने टेक दिए उसे महसूस करके स्वयं के भारतीय होने पर शर्मिंदगी का अहसास होता है।








कितनी बड़ी विडंबना है कि विद्वानों और न्यायी राजाओं की एक धरती पर एक भी जज एक भी वकील ऐसा नहीं निकला जो किशोर कानून की व्याख्या कर पाता। एक भी ऐसा राजनीतिक दल इस देश में नहीं दिखा जो ये कह सके की बदल डालो इस बाल अपराध अधिनियम को जो समाज में हैवानियत करने का छूट प्रदान करता है। देश में पहली बार रायसीना हिल्स पर हजारों की संख्या में लोग न्याय मांगने के लिए पहुंचे थे। मगर सत्ता की सिखर से भी लोगों को पानी की बौछारें और लाठियां हीं मिली।




नियमों की लाचारी का रोना रो रही पूरी व्यवस्था ने भारत की बेटी के साथ अन्याय किया है। निर्भया के गुनाहगार सिर्फ वो लोग नहीं हैं जिन्होंने उसे दरिंदगी कर के मार डाला बल्कि इस देश का हर वह जिम्मेदार और अधिकार संपन्न व्यक्ति है जिसे इस देश के लोगों को न्याय देने के लिए पद, पैसा, रुतबा और अधिकार दिए गए हैं। जाहिर है कि दरिन्दे को नाबालिग कहकर छोड़ देने के लिए इस देश का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, पूरी संसद, दिल्ली की विधानसभा, सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, फैसला देने वाला न्यायाधीश, उभयपक्ष के अधिवक्ता, गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी, संरक्षण में रखने वाले केयरटेकर, इत्यादि सारे के सारे लोग बराबर के जिम्मेदार हैं।



इनमे से किसी एक की यदि मंशा सही और न्यायोचित होती तो न्याय मिलता। तो सवाल ये भी खड़ा होता है की क्या इस हमाम में सभी नंगे हैं! अभी भी समय नहीं गया है न्याय मिल सकता है लेकिन इस देश में हर बात को मुद्दा बनाने और हर पीड़ा की मार्केटिंग करने का चलन आम है। मीडिया से ले कर इस देश का विपक्ष मार्केटिंग कर रहा है और बिक रहे हैं इस देश की बेटियों के कफ़न जिनपर बलात्कार के दाग हैं। जिस देश में अधिवक्ता से ले कर महान्यायवादी तक ये समझने में विफल हैं कि कोई कानून किस मंशा के साथ बनाया गया था उस देश में न्याय की कल्पना भी असंभव है।



न्याय की सबसे बड़ी सच्चाई और सबसे बड़ी विडंबना यही है कि न्याय इच्छा शक्ति से होता है अच्छी मंशा और निर्विकार भाव से होता है न कि कानून की किताबों से। किताबे सिर्फ मार्गदर्शक होती हैं उनमे स्वयं को सम्पादित करने की क्षमता नहीं होती। नियम सिर्फ किसी भाषा में लिखी पंक्तियाँ होती हैं जिनका अर्थ न्याय करने वाला उचित तरीके से करेगा ये उसकी शुचिता और मंशा पर निर्भर है।



दुनिया का कोई कानून ऐसा नहीं है जिसकी व्याख्या न्याय को होने से रोके बशर्ते न्याय करने वाला व्यक्ति न्याय देते समय निर्विकार और दृढ-प्रतिज्ञ हो कि वह सिर्फ न्याय करेगा और कानून के अनुसार करेगा| तरस आता है मुझे उन अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों पर जिनके पास कानून के अपर्याप्त होने का रोना तो है लेकिन उपलब्ध कानून की व्याख्या करने की या तो मंशा नहीं या फिर अक्ल या फिर दोनों ही नहीं है बस कुर्सी मिल गई है तो नौकरी बजा रहे हैं।