Monday, November 30, 2015

तीसरी शक्ति की परिभाषा !

देश में एक बार फिर से तीसरी शक्ति पारिभाषिक शब्द बन गया है जिसका अर्थ जरूरी नहीं है कि वह तीसरे स्थान का ही कोई राजनितिक मोर्चा हो | यह ऐसे राजनीतिक प्रवृतियों वाले दलों के मोर्चे के रूप में रूढ शब्द हो गया है जो वैकल्पिक धारा का प्रतिनिधित्व करते है | वैकल्पिक से अर्थ है ऐसी राजनीति जिसमे सामाजिक सत्ता से छिटकी हुई जातियों के नेताओं का नेत्रत्व हो , जिसमे सफ़ेद पोश की वजाय मेहनतकश वर्ग से आये नेता अगुआकार हो , जो मजबूत संघ की वजाय राज्यों को अधिकतम स्वायतत्ता की पक्षधर हों | वी पी सिंह ने रामो वामो के रूप में सही मायने में तीसरी शक्ति का जो विम्ब प्रस्तुत किया था आज भी तीसरी शक्ति का नाम आता है तो लोग उसी विम्ब की कल्पना कर लेते है |

लेकिन वी पी सिंह के बाद कोई नेता ऐसा सामने नहीं आया जो तीसरी शक्ति का कुनबा जोड़ सके | जनतादल परिवार की एकता का तराना छेडकर मुलायम सिंह ने तीसरी शक्ति के नेता के नये अवतार को साकार करने की कोशिश की लेकिन अवसरवादी नीतियों की वजह से जनता दल के समय ही यह साबित हो चुका था कि मुलायम सिंह ऐसी किसी संरचना की सामर्थ्य नहीं रखते बल्कि अपने वर्ग द्रोही चरित्र के कारण वे तीसरी शक्ति को विखेर देने का काम करने लग जाते है | फिर भी तीसरी शक्ति इस देश की एक जरूरत है ताकि आधुनिक भारत के निर्माण के लिए देश में वांछित परिवर्तन लाया जा सके |

इस समय जबकि कोंग्रेस के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मडरा रहे है , नरेन्द्र मोदी के प्रति मोहभंग की बजह से भा ज पा के केंद्र में पैर डगमगाने लगे है राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प के रूप में तीसरी शक्ति के सितारे बुलंद होने के आसार देखे जाने लगे है लेकिन बिहार के चुनाव परिणाम आने के पहले तक तीसरी शक्ति में किसी राष्ट्रीय स्तर के नेत्रत्व के अभाव की बजह से किसी संभावना को टटोलना मुश्किल लग रहा था लेकिन बिहार के चुनाव परिणाम ने रातों रात इस मामले में हालात बदल दिए है | तीसरी शक्ति को अब नीतीश कुमार के नेतृत्व के तले सजोए जाने की कल्पना दूर की कौड़ी लाना नहीं माना जा सकता | बिहार का चुनाव राष्ट्रीय स्तर का दंगल बन गया था इसलिए नीतीश कुमार इसे जीत कर एकाएक ऐसे महाबली बन गये है जिन्हें केंद्र बिंदु बनाकर राष्ट्रीय स्तर का धुर्वीकरण होने की पूरी पूरी संभावना है |

तीसरी शक्ति बदलाव की ऐसी ख्वाहिश का नाम है जिसकी तृप्ति न होने से बदलाव की भावना से ओत प्रोत भारतीय जन मानस प्रेत की तरह भटकने को अभिशप्त है | मोटे तौर पर भारतीय समाज को लेकर यह अनुमानित किया जाता है कि भेद भाव और अन्याय पर आधारित वर्ण व्यवस्था में बदलाव होने पर देश में एक साफ़ सुथरी व्यवस्था कायम हो सकेगी | लोहिया जी से लेकर वी पी सिंह तक सवर्ण नेताओं की एक जमात भी साफ़ सुथरी व्यवस्था की कायल होने की वजह से वंचित जातियों का सशक्तिकरण करके इसीलिए वर्ण व्यवस्था को कमजोर करने की रणनीति पर अमल करती रही लेकिन यह विडम्बना है कि इन रणनीतियों के परिणाम उलटे निकले है |

वंचित जातियों के सशक्तिकरण के दौरान जिन नेताओं के हांथो में राजनीतिक सत्ता पहुची उन्होंने जातिगत भावनाओं को चरम पर पहुचा कर वर्ण व्यवस्था को अलग ढंग से पहले से ज्यादा मजबूती तो दी ही उन्होंने अन्याय की पराकाष्ठा भी वंशवाद व् स्वेच्छा चारी शासन के रूप में फलित की | बिहार के चुनाव में लालू को मतदाताओं ने सबसे बड़ा इनाम दिया क्योकि उन्होंने बदलाव की राजनीति में सदैव अपने को पटरी पर रखा लेकिन उक्त बुराइयों और अदालत के निर्णय के कारण सत्ता के गलियारे से बाहर रहने की अपनी मजबूरी के चलते वे खुद किंग नहीं बन सकते | उनकी भूमिका फिलहाल किंग मेकर तक की रह गयी है | अगर वे आगे चलकर अदालत से क्लीन चिट भी पा लेते है तब भी बिवादित हो चुके अपने व्यक्तित्व के कारण वे राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नहीं हो सकते |

ऐसे में इस पूरे घमासान की सफलता का सारा इनाम नीतीश कुमार की झोली में जा गिरा है हालाकि वे एक बार लालू की ही हठधर्मिता की वजह से जार्ज और शरद यादव के बहकावे में भा ज पा नीति गठबंधन में शामिल होकर फिसलन के शिकार बन चुके है लेकिन समय रहते उन्होंने इस कलंक का प्रक्षालन कर लिया है|

तीसरी शक्ति की गुणात्मक विशेषता के अनुरूप झा उनका नेतृत्व सामाजिक बदलाव की कसौटी को पूरा करता है वही वे मूल्यों की राजनीति में भी खरे है और तीसरी शक्ति के संघर्ष को तार्किक परिणति तक पहुचाने के लिए इसकी जरूरत सर्वोपरि है |

Tuesday, November 17, 2015

सेवा निवृति और समय ?

देश में सेवा निवृति को लेकर एक नयी बहस छिड़ी हुयी है. सेवा निवृत्ति  अर्थात जब व्यक्ति अपनी आयु के साठ वर्ष पार करता है तो जिस संस्थान में अपनी सेवा देता है. उसे उस की सेवा से मुक्त कर दिया जाता है. वह स्वयं मुक्त नही होता और न ही होना चाहता है. यह मुक्त होने की प्रणाली कोई नई प्रणाली नही है. पुरातन काल से चली आ रही आश्रम अवस्था का एक विकृत रूप है. आश्र्मावस्था में इसे वानप्रस्थ आश्रम की संज्ञा दी जाती है. इस व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति पारिवारिक जिम्मेवारियों को निभाने के बाद अथवा बेटे का बेटा होने के बाद बेटे को पारिवारिक सामाजिक अधिकार सौप कर स्वेच्छा से वानप्रस्थी बन वानप्रस्थ आश्रम को प्रस्थान कर जाता था. परिवार के संकुचित क्षेत्र से निकल कर समाज के विस्तृत क्षेत्र में सेवा कर समय का सदोपयोग करता था. एक छोटे परिवार से निवृत हो जाता और समाज के बड़े परिवार में प्रवृत हो जाता था धीर-धीरे परिस्थितियों बदल रही हैं. सेवा निवृति के बाद समय का कैसे उपयोग हो एक बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न बनता जा रहा है.

न सेवा निवृति से पूर्व अधिकांश लोग कोई भी योजना नहीं बना पाते हैं. आर्थिक रूप से सम्पन्न क्लबों में व किटटी पार्टियों में ताश व पीने -पिलाने में मस्त रहने का प्रयास करते हैं, जो आर्थिक रूप से सम्पन्न नही हैं वे पार्कों में अथवा चौपालों में या फिर जहाँ भी बैठने को स्थान मिल गया बैठ कर ताश खेल लेते है. कई वरिष्ठ नागरिक पार्कों में अलग-अलग समूह बना कर बैठे मिलते हैं. उन की चर्चा के विषय भी अलग -अलग ही होते हैं -राजनीति से लेकर पारिवारिक उलझनों में उलझे रहते हैं. कई सेवा निवृत जिन की बहुएँ नौकरी करती हैं वे उनके बच्चो की बेबी -सिटिंग करते है. एक वर्ग अपनी संतान से उपेक्षित होकर वृद -आश्रम में शरण लेने को विवश हो कर जीवन की संध्या को वहाँ गुजार लेते हैं, खैर यह तो मेरा विषय नही है, मेरा विषय है कि जब हम सेवा निवृत हों तो ऐसी प्रवृति अपनाएं जिस से  समय का सदोपयोग हो.

सेवा निवृति के पश्चात हम ने समय का सदोपयोग हो, इसी भावना के साथ कुछ बच्चों को पढ़ाना शुरू किया है. ये बच्चे व इन के माता-पिता झुग्गी-झोपडी में रहते हैं. पिता दिहाड़ी करता है. माँ कोठियों में काम करती है और कोठियों में रहने वाले बच्चों के पुराने कपड़े जो मिलते हैं, उन्हें ये बच्चे पहनते हैं. सरकारी स्कूलों में इन बच्चों को प्रवेश करा दिया है. ये बच्चे हैं वहां क्या पढ़ते हैं व क्या इन्हें पढ़ाया जाता है, इन बच्चों को मालूम नहीं है, न ही अनपढ़ माता -पिता जानते हैं. जिस प्रकार के वातावरण में रहते हैं वह शिक्षा का वातावरण नहीं है. बच्चों का बुद्धि-स्तर भी विकसित नहीं है. एक-दो बच्चों को छोड़ बाकी बच्चों को पढाई का भी कोई विशेष शौक नहीं है.

स्कूल का पाठ्यक्रम देख कर मै घबरा गई. प्रथम कक्षा में हिन्दी, गणित व्  इंग्लिश पढाई जाती है. हिंदी तो ठीक ढंग से बोल नहीं पाते तो इंग्लिश कैसे समझेगे व बोलेगे. चलना तो  पाठ्यक्रम के अनुसार है ताकि अपनी परीक्षा पास कर सकें और अपने दैनिक जीवन की आवश्कतायों को सहजता से पूरा कर सकें, स्वयं को सामाजिक एवं राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ सकें, साक्षरता तथा संस्कारों का आपस में  अभिन्न संबंध है. हम इन्हें अक्षर ज्ञान के साथ -साथ नैतिक शिक्षा की बातें बताते हैं. शिष्टाचार सम्बन्धी जैसे सब को नमस्ते से अभिवादन करना व  माता -पिता व बड़ो का आदर करना तथा उनका कहना मानना साथ ही ईश्वर संबंधी चर्चा करते हैं कि ईश्वर सर्व व्यापक, सब जगह पर है. वह हमे देख, सुन और जान रहा है. ईश्वर क्या -क्या करता है? उस के साथ हमारे क्या-क्या संबंध हैं और गलत काम करते हैं तो ईश्वर हमें  सजा भी देता है और. अच्छे काम करने पर इनाम भी देता है. बड़ा अच्छा लगता है जब बच्चे ध्यान से सुनते हैं व सुनाते हैं.

यह क्रियात्मक प्रयोग जो हम कर रहे हैं, इस की उपलबिध केवल बच्चों को ही नहीं हो रही है. अब तक तो स्वाध्याय करते व प्रवचन सुन लेते थे परन्तु अब जीवन में व्यवहार में लाने का अवसर मिला है. इस वर्ग के बच्चों के साथ जो स्वयं सफाई से वंचित रहते हैं, जहाँ रहते हैं वहाँ पानी का अभाव है और जब इन बच्चो के शरीर से विशेष करके ग्रीष्म ऋतु में पसीने की दुर्गन्ध आ रही होती है तो सहजता व धैर्य से लेने का अभ्यास बना रहे हैं. जब कभी इन पर गुस्सा भी आता तो स्वयं पर नियन्त्रण करने का अभ्यास करते हैं. यह सोच कर कि सब पवित्र आत्माएं हैं, इन्हें हमारी सहानुभूति की आवश्यकता है. इन्हें भरपूर प्यार दें जिस से इन की रूचि बनी रहे. हमें इस बात का भी संतोष होता है कि ये बच्चे हमारे पास स्वस्थ वातावरण में अपना समय गुज़ार जाते हैं. ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य समाज के नौवें नियम –”-सब को अपनी उन्नति में ही संतुष्ट नहीं रहना चाहिए सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए” .इस नियम का रहस्य व तथ्य भी समझ में आ रहा है. बच्चे उन्नत हो रहे हैं तो उन के साथ हम भी उन्नत हो रहे हैं.