Thursday, September 24, 2015

जंगल राज के रास्ते पर बिहार..!

बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है, जो पहले दोस्त थे आज दुश्मन बन बैठे हैं और दुश्मन दोस्त। बिहार विधानसभा के लिए होने वाले चुनाव इस बार गजब के वातावरण में हो रहे हैं। वर्तमान में सत्ता पर काबिज पार्टी जनता दल (यू) के नेता इन चुनावों में केन्द्र की डेढ़ साल पुरानी मोदी सरकार से जवाब मांग रहे हैं। चुनावों में किसी भी पार्टी के बदहवास होने का यह पहला लक्षण है क्योंकि चुनाव बिहार में राज्य सरकार गठित करने के लिए हो रहे हैं न कि लोकसभा के लिए। दूसरी तरफ राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा लगातार सत्तारूढ़ पार्टी के गठबन्धन में शामिल दलों के एक-दूसरे के विरोधी होने के प्रमाण प्रस्तुत कर रही है। जो लोग बिहार की राजनीति के तेवर और कलेवर को समझते हैं और जिन्होंने पटना का गांधी मैदान को देखा है, वे भलीभांति अनुमान लगा सकते हैं कि राज्य के मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार के हाथ से सत्ता खिसकती नजर आ रही है और वह एक जमाने के अपने प्रबल प्रतिद्वन्द्वी लालू प्रसाद यादव के समक्ष हथियार डालते नजर आ रहे हैं। गांधी मैदान में जो सभा दो दिन पहले की गई थी, उसमें कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और लालू प्रसाद समेत नीतीश कुमार व शरद यादव चुनावों का एजेंडा तय करने से पूरी तरह चूक गये और भाजपा के दिग्गज प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने इस गफलत का पूरा लाभ उठाते हुए उसे अपनी भागलपुर रैली में बहुत चतुराई के साथ तय कर डाला और चुनौती दी कि राज्य के चुनाव में राज्य के विकास और इसके लोगों की समस्याओं और उनके निवारण की बात होनी चाहिए और सत्ता पर काबिज लोगों से उनकी हुकूमत का 'हिसाब-किताब' लिया जाना चाहिए। अब बिहार के चुनावों में नीतीश एंड पार्टी के पास सिवाय जातिवाद का कार्ड चलाने के अलावा और कुछ नहीं बचा है। बिहारी अस्मिता का मुद्दा नीतीश कुमार बहुत जोश-ओ-खरोश से उठा रहे थे मगर उसकी हवा स्वयं लालू प्रसाद उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर निकाल रहे हैं और सरेआम ऐलान कर रहे हैं कि उनका एकमात्र अजेंडा 'यदुवंश' है। 


बिहार के लोगों के बारे में लालू प्रसाद यह कहते हैं कि 'वे उड़ती चिड़िया को हल्दी लगाने में माहिर होते हैं', यदि ऐसा है तो फिर चुनावों से पहले ही इसके नतीजे आ चुके हैं! भागलपुर की रैली से पूरे बिहार में जो सन्देश गया है वह बिहार की अस्मिता को पुन: राष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने का है और इसे मोदी ने इस रैली में बखूबी लोगों को बताने में काफी हद तक सफल भी रहे हैं। इस तथ्य को नीतीश कुमार जैसा अनुभवी राजनीतिज्ञ न पहचान पाये, इसे कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता मगर अब वह ऐसे भंवर में फंस चुके हैं जिससे निकलना उनके वश में नहीं रहा है क्योंकि लालू यादव ने उनके चारों तरफ जो घेरा बांधा है वह उनके ही जनाधार को निगल जायेगा। बिहार में जंगलराज का उदाहरण लालू यादव के शासनकाल में सबने देखा है। हमें याद है जब शाम के 6 बजते ही घरवाले अपनों के सकुशल घर वापसी के लिए ब्याकुल हो उठते थे। इस बात का डर रहता था की कोई बाज़ार से लौटते समय लूट-पाट न कर ले। कोई अपनी पुरानी दुश्मनी इस जंगलराज के रास्ते से न चुका ले। लोगों में न्याय की उम्मीद भी खत्म हो चुकी थी क्योंकी थानेदार की कुर्सी पर 'यदुवंश' का बोलबाला था। इसी  जंगलराज को ख़त्म करने के नाम पर नीतीश कुमार भाजपा से हाथ मिलाया था और बिहार विकास के रास्ते पर चल पड़ा था। मगर आज नीतीश कुमार अपने राजनीतिक लाभ के लिए जंगलराज के राजदार से हाथ मिलाया है। ऐसे में सवाल वाजिब हो चला है की क्या बिहार एक बार फिर से जंगलराज के रास्ते पर है ? यही नीतीश कुमार सुशासन बाबू के नाम से प्रसिद्ध हुए थे। मगर इस बार बिहार की जनता नीतीश कुमार को किस रुप में पुकारती है ये सब कुछ 8 नवम्बर को साफ हो जायेगा। पटना की रैली में लालू यादव द्वारा केवल अपने जातिगत वोट बैंक को लामबन्द करने की कोशिश ने उनकी हालत अपने ही दरबारियों की कैद में पड़े किसी लुटे नवाब की मानिन्द बना दी है जिसे सत्ता से बाहर होने के बावजूद कहीं अनाम जगह अपने 'खजाने' के गड़े होने पर भरोसा है मगर अफसोस यह खजाना भी अब लुट चुका है क्योंकि स्वयं नीतीश कुमार ने ही उस जगह को तलाश कर वहां 'धान' की खेती बो दी थी। 


क्या ये बताना पड़ेगा कि वर्ष 2000 में किस तरह नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्हें लालू यादव ने अपनी पत्नी राबड़ी देवी के साथ मिलकर किस तरह बेइज्जत किया था और हफ्ते भर बाद ही नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली करनी पड़ी थी। मगर भागलपुर की सभा में प्रधानमन्त्री ने एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया कि जिन लोगों ने जीवन भर कांग्रेस विरोध की राजनीति की और जो डा. राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण व कर्पूरी ठाकुर के खुद को सैद्धान्तिक वारिस बताते हैं वे किस तरह कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। इनमें लालू प्रसाद को मैं अपवाद मानता हूं क्योंकि उनका न तो इन सभी नेताओं से कोई खास लेना-देना था और न सिद्धान्तों से। वह बिहार में स्व. देवीलाल द्वारा भेजे गये ऐसे 'गुमाश्ते' थे जो अपने दबंगई व्यवहार से बिहार की राष्ट्रवादी व समाजवादी सोच को जातिवाद की दलदल में फंसा सकता था। लालू प्रसाद इस अपेक्षा पर खरे उतरे मगर 2005 में नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ मिलकर इस दलदल में कमल खिला दिया और 2010 में तो पूरी दलदल को कमल के फूलों से पाट डाला और 243 सदस्यीय विधानसभा में लालू यादव  की पार्टी राजद के कुल 24 विधायक ही जीत पाये।


एक तरफ लालू यादव और नीतीश कुमार इसे यदुवंश-दलित की लड़ाई बता रहे हैं तो वहीँ दुसरी तरफ प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी इसे बिहार की अस्मिता को पुनस्र्थापित करने का चुनाव बता रहे हैं। कभी डॉ. लोहिया के विचारों की प्रयोगशाला बने इस राज्य के लोगों को विकास से दूर रखने की कोशिशें हो रही हैं और इसी वजह से उन्होंने पटना की सभा को 'तिलांजलि सभा' कहा। क्या गजब है कि जिस गांधी मैदान में कांग्रेसी मुख्यमन्त्री स्व. अब्दुल गफूर ने 'जय प्रकाश नारायण से लेकर साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु पर लाठियां बरसाईं हों आज उसी गांधी मैदान से कांग्रेस को भी वोट देने की अपीलें हो रही हैं? लालू यादव तो अर्से से कांग्रेस के साथ हैं और उन्होंने बीड़ा उठाया हुआ है कि वह इस पार्टी का बिहार में 'जनाजा' उठाने में अपना कन्धा जरूर देंगे। इससे ज्यादा भाजपा को और क्या चाहिए!



जहां तक नीतीश कुमार का सवाल है तो उन्होंने भी अपने गुरुओं को 'तिलांजलि' दे डाली है और अब सब रास्ते बन्द होने पर उन्हें अपने डीएनए का ख्याल आ रहा है। बिना शक यह बिहार का डीएनए नहीं है क्योंकि इस राज्य का डीएनए ठीक वही है जो धनाढ्य समझे जाने वाले पंजाब राज्य का है। ठीक वही भौगोलिक स्थिति, कल-कल करती नदियां, वैविध्यपूर्ण उपजाऊ जमीन, राष्ट्रीय गौरव को महिमामंडित करती ऐतिहासिक धरोहर समेटे महान संस्कृति। और तो और पंजाब के तक्षशिला विश्वविद्यालय से चलकर पाटिलीपुत्र पहुंचे महान दार्शनिक आचार्य चाणक्य, क्या नहीं है बिहार में जो पंजाब में है। खुदा रहमत बख्शे, पंजाब में बस लालू प्रसाद नहीं है! श्री गुरु ग्रन्थ साहब में भी इसी बिहार की मिथिला भूमि के 'राजा जनक' को पहला 'बैरागी' राजा बताया गया है मगर क्या सितम हुआ कि ऐसे राज्य को पूरे भारत में इन्ही राजनीतिज्ञों ने 'जंगलराज' का पर्याय बना कर छोड़ दिया।


बिहार विधानसभा के होने वाले चुनावों को यदि किसी एक नाम से पहचाना जा सकता है तो वह यह है कि यह विरोधाभासों का महासंग्राम है। संभवत: पहली बार बिहार ऐसा तमाशा देख रहा है। यह चुनाव 'विरोधाभासों' का चुनाव है। इसके साथ ही यह चुनाव बिहार के मूल चरित्र के विरुद्ध विषमताओं के जमघट का चुनाव है। यह विकट स्थिति इन चुनावों में बन रही है जिसमें जातिवादी ताकतें राष्ट्रीय चिन्तन की ताकतों को अपने शिकंजे में कस रही हैं। पटना के गांधी मैदान में हुई भाजपा विरोधी दलों के महागठबंधन दलों की रैली को बिहार के लिए सबसे शर्मनाक दिन रहा। कांग्रेस की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी की उपस्थिति में राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव प्रत्यक्ष तौर पर जातिवाद के नाम पर वोट मांगते नजर आए और उन्होंने यादवों की संगठित शक्ति का आह्वान तक कर डाला। बिहार के लिए इससे बड़ी शर्म की बात कोई दूसरी नहीं हो सकती और इससे भी ऊपर कांग्रेस पार्टी के लिए शोचनीय स्थिति कोई दूसरी नहीं हो सकती। इसे बिहार के सम्मान की रैली के नाम पर आयोजित किया गया था मगर वास्तव में यह बिहार के 'अपमान' की रैली ही निकली। इस महागठबंधन रैली के मंच पर अजीब किस्म का नजारा पेश हो रहा था जिसमें शामिल हर दल अपनी ढपली अलग-अलग बजा रहा था और बाद में संगठित होकर भाजपा से मुकाबला करने का दम्भ भर रहा था। जरा सोचिये क्या बिहार का विकास जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी करने से हो सकता है?


क्या सामाजिक समता की लड़ाई जातिवाद के आधार पर लड़ी जाएगी? बेशक समाजवादी नेता स्व. डा. राम मनोहर लोहिया ने अलख जगाई थी कि 'संसोपा ने बांधी गांठ-पिछड़ों को हो सौ में साठ' मगर इसी के साथ डा. लोहिया ने यह भी अलख जगाई थी कि 'जाति तोड़ो-दाम बांधो' अर्थात सामाजिक न्याय की लड़ाई की पहली शर्त जातिवाद दरकिनार करके केवल आर्थिक आधार पर होनी चाहिए तभी पिछड़ों के साथ न्याय हो सकेगा मगर महागठबंधन के लोग अपने ही जाल में बुरी तरह फंस गए हैं क्योंकि आज देश का प्रधानमंत्री स्वयं एक पिछड़ी जाति से है और गरीबी की घनघोर व्यवस्था से संघर्ष करते हुए इस मुकाम तक पहुंचा है। ऐसा कैसे संभव है कि बिहार की राजनीति में शुरू से ही उद्दंडता और शालीनता के दो प्रतीक क्रमश: लालू प्रसाद और नीतीश कुमार एक ही मंच पर बैठ कर दोस्ती की पींगें बढ़ाते हुए लोगों को विश्वास दिला सकें कि दोनों ने अपने रास्ते बदल दिए हैं। लालू यादव ने तो नीतीश कुमार की उपस्थिति में ही स्पष्ट कर दिया कि उनका रास्ता केवल यादववाद ही है। यह तथ्य तो एक औसत आदमी के सामने भी प्रकट हो गया। ऐसी विसंगति और विषमता के साए में बिहार के विकास की जो लोग कल्पना भी करते हैं वे स्वयं को ही छलावे में रखते हैं। 


बिहार की आज की राजनीति के तेवर को देख कर 1971 के लोकसभा चुनावों की याद आ रही है जब देश के सभी प्रमुख विपक्षी दलों ने स्व. इंदिरा गांधी की नई कांग्रेस के खिलाफ 'चौगुटा' मोर्चा बना कर चुनाव लड़ा था और जबर्दस्त तरीके से मुंह की खाई थी। इसकी वजह केवल एक थी कि इस चौगुटे के निशाने पर नई कांग्रेस नहीं बल्कि केवल इंदिरा गांधी थीं। इन्दिरा जी ने उस समय सरकार की नीतियों में क्रांतिकारी बदलाव किया था। विपक्षी दल इन नीतियों की जगह इन्दिरा गांधी की आलोचना करके ही चुनावी चौसर बिछा रहे थे। ठीक यही स्थिति आज बिहार में बनी हुई है। इस महागठबंधन के दलों में नरेन्द्र मोदी सरकार की जनधन योजना या सामाजिक सुरक्षा योजना की आलोचना करने की ताकत नहीं है। इनका लक्ष्य अकेले श्री नरेन्द्र मोदी बने हुए हैं। इस महागठबंधन की चुम्बकीय शक्ति नीतीश कुमार में भाजपा की आलोचना करने की हिम्मत नहीं है क्योंकि स्वयं आठ साल तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वह भाजपा के बूते पर ही बैठे रहे हैं। लालू यादव के लिए भाजपा जब 'भारत जलाओ पार्टी' है तो नीतीश कुमार पिछले 14 साल से इसी पार्टी की छत्रछाया में केन्द्र व राज्य की सत्ता किस तरह भोग रहे थे? 


इस महागठबंधन के बनने से केवल एक व्यक्ति को लाभ होने जा रहा है जिसका नाम लालू प्रसाद है। यह उनके अस्तित्व की लड़ाई का सवाल है। इन चुनावों में यदि लालू प्रसाद अलग-थलग पड़ जाते तो उनकी पार्टी का वजूद ही खत्म हो जाता मगर 'उस्ताद' लालू ने बड़ी ही चतुराई से कांग्रेस पार्टी के बिहार में वजूद को खत्म करने का पुख्ता इंतजाम बांध दिया है। जिस रैली में खुले तौर पर समाज के केवल एक जाति के लोगों के लामबन्द होने की अपील की जा रही हो उसमें कांग्रेस अध्यक्ष के साथ राज्यसभा में इस पार्टी के विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद का शामिल होना क्या यह नहीं बताता कि जिस कांग्रेस के आंदोलन को महात्मा गांधी ने इसी राज्य के चम्पारण जिले से शुरू करके उसे आजादी का आंदोलन बना दिया हो अब उसी से आजादी लेने का इस मुल्क में अभियान शुरू हो गया है? क्या गजब का 'सीन' पटना के गांधी मैदान में पेश हुआ कि बिहार के सम्मान के नाम पर आज उसी बिहार के लोगों का अपमान किया जा रहा है जिन्होंने गरीब और भूखे रह कर भी स्वयं को राष्ट्रीय चेतना के केन्द्र में सदा ही बनाए रख कर संदेश दिया कि राजनीति में सिद्धान्तों से ऊपर कुछ नहीं होता। बिहारी अस्मिता की पहचान तो इसके लोगों की राजनीतिक सजगता है। क्या नीतीश कुमार को 2014 के लोकसभा और 2010 के विधानसभा चुनावों की याद नहीं है। मगर आज तो ऐसा लग रहा कि आज बिहार एक बार फिर से जंगलराज के रास्ते पर है...!

Saturday, September 19, 2015

भारत में बोतल बन्द पानी का गोरख धन्धा !

पानी मनुष्य की बुनियादी ज़रूरतों में से एक है। यह मानव जीवन का आधार है। प्रकृति ने हमें शुद्ध पानी के स्रोतों से नवाज़ा है, पर आज पूरे विश्व में पूँजीपतियों ने इस पर भी अपने मुनाफ़े के लिए क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया है। मगर अब ये पानी एक बड़ा व्यापर का माध्यम बन गया है। पानी आज एक माल बन चुका है और मुनाफ़े का बड़ा स्रोत बनता जा रहा है। विश्व के पैमाने पर बोतलबन्द पानी का 10 बिलियन डॉलर से अधिक का कारोबार है जो लगातार तेज़ी से बढ़ रहा है। आज हर गली-मुहल्ले, रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, स्कूल-कॉलेज व अन्य सार्वजनिक स्थानों पर बोतलों में बिकता पानी दिखायी दे जाता है। इसका उपभोग दिन-ब-दिन बढ़ता ही जा रहा है। पानी का यह निजीकरण पूँजीवाद के बर्बर होते जाने की निशानी है। इस धोखेबाज़ी और लूट का ख़ामियाज़ा भी आम लोगों को ही भुगतना पड़ता है।

                           
                        

बोतलबन्द पानी की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य में लगभग 1845 में अमेरिका में रिक्कर नाम के एक परिवार ने की जो अपने पानी में औषधीय गुण होने का दावा करता था। यही कम्पनी बाद में पोलैण्ड स्प्रिंग नाम से मशहूर हुई। इसी का अनुकरण करते हुए 1905 में ओज़ारक स्प्रिंग वाटर कम्पनी बनी। पर इनका विस्तार उतना नहीं हुआ। विश्व स्तर पर इस उद्योग का तेज़ी से फैलाव 1970 के बाद ही शुरू हुआ जब सचेतन रूप से इसको फैलाने की कोशिशें की गई। नतीजतन, कई कम्पनियाँ इस खेल में उतर आयीं! पोलेण्ड स्प्रिंग व ओज़ारक स्प्रिंग को नेसले द्वारा ख़रीद लिया गया। आज नेसले इस क्षेत्र का सबसे बड़ा खिलाड़ी है। इसके बोतलबन्द पानी के 9 अन्तरराष्ट्रीय और 71 राष्ट्रीय ब्राण्ड हैं। इसके अलावा कुछ और भी बड़े खिलाड़ी हैं – डैनने, कोकाकोला, पेप्सी, फीजी, एवियन, माउण्टेन वैली, वोलविक, पारले, ब्रीवरेज व हिल्डन आदि। छोटी-मोटी कम्पनियों की तो संख्या सैकड़ों में है। अकेले भारत में इस समय 200 से भी ज़्यादा कम्पनियाँ इस क्षेत्र में हैं। पिछले तीन दशकों में नव-उदारवादी नीतियों की शुरुआत के बाद इसमें और ज़्यादा तेज़ी आयी है। पहले-पहले लोग पानी के बिकाऊ होने की बात सुनकर हँसते थे, पर अब इसे लोगों की स्वाभाविक ज़रूरत बना दिया गया है। पूँजीवाद के एक मुख्य स्तम्भ मीडिया का इसमें बड़ा योगदान रहा है। मुट्ठी भर पूँजीपतियों के हाथों में खेलते हुए यह लोगों में आम राय बनाने का काम करता है। लोगों की पसन्द, नापसन्द, शौक़, व्यस्तता आदि तय करने में यह बड़ी भूमिका अदा करता है। यही हमें बताता है कि हमें क्या खाना चाहिए और क्या पीना चाहिए। स्पष्ट ही है कि जो कुछ मीडिया पेश करता है, उसमें इन लोगों के मुनाफ़े का ध्यान रखा जाता है, न कि सच्चाई और वैज्ञानिकता का। हैरानी की बात नहीं है कि यही मीडिया हमें लेज़ चिप्स, कुरकुरे, बर्गर, पिज़्ज़ा, कोल्डड्रिंक जैसी घटिया और नुक़सानदेह चीज़ों को खाने-पीने के लिए प्रेरित करता है। आकर्षक विज्ञापनों, कार्यक्रमों, अख़बारों, पत्रिकाओं और सड़क किनारे लगे बैनरों द्वारा लोगों को डराया और भरमाया जाता है – ‘ख़बरदार! आप अशुद्ध पानी पी कर अपनी सेहत का नुक़सान कर रहे हैं, साफ़ पानी ख़रीदकर पीजिये, हमारे पास झरनों का शुद्ध पानी है या हमारा पानी पूरी तरह शुद्ध किया हुआ है, आदि-आदि’। इस तरह बोतलबन्द पानी को हमारी ज़रूरत बना दिया गया है। इसके लिए विज्ञापनों में अन्धाधुन्ध पैसा बहाया गया। कोकाकोला ने साल 2004 के दौरान डासानी नामक अपने बोतलबन्द पानी के ब्राण्ड पर 1.7 करोड़ डॉलर ख़र्च किये वहीं पेप्सी ने अपने ब्राण्ड एक्वाफिना पर इसी दौरान 2.1 करोड़ डॉलर ख़र्च किये। कुल मिलाकर 2004 में 7 करोड़ डॉलर से ज़्यादा राशि सिर्फ़ बोतलबन्द पानी के विज्ञापनों पर ख़र्च कर दी गयी। उस समय इन ख़र्चों की विस्तार दर 15 प्रतिशत थी। इन विज्ञापनों की बदौलत बोतलबन्द पानी के व्यापार में उस समय 47 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी।




बोतलबन्द पानी का उपभोग साल 2000 में 108.5 बिलियन लीटर था, जो 2002 में 128.8 बिलियन लीटर, 2005 में 164.5 बिलियन लीटर और 2007 में 188.2 बिलियन लीटर हो गया। आज पूरे विश्व में इसका उपभोग 200 बिलियन लीटर से ज़्यादा है। अमेरिका में इसका सबसे अधिक उपभोग है। वहाँ हर साल लगभग 50 बिलियन पानी की बोतलें बिकती हैं। प्रति व्यक्ति उपभोग में इटली का प्रथम स्थान है, जहाँ 2010 में प्रति व्यक्ति बोतलबन्द पानी की खपत 184 लीटर थी। इसके बाद मैक्सिको में यह 169 लीटर प्रति व्यक्ति व संयुक्त अरब अमीरात में 153 लीटर प्रति व्यक्ति है। इसी तरह सर्वोच्च 10 देशों में यह उपभोग प्रति 100 लीटर सालाना से अधिक ही है। भारत में बोतलबन्द पानी का कारोबार लगभग 1,000 करोड़ रुपये का है जो 40 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। भारत में इस क्षेत्र में 200 से अधिक कम्पनियाँ व 1200 के करीब कारख़ाने हैं। इस तरह पूरे विश्व में आज इसका कारोबार 10 बिलियन डॉलर से ऊपर पहुँच गया है। नेस्ले इस कारोबार के 12 प्रतिशत हिस्से पर काबिज़ है, इसका बोतलबन्द पानी का कारोबार 3500 करोड़ डॉलर का है। इसके बाद डैनने 10 प्रतिशत, कोकाकोला 7 प्रतिशत व पेप्सी 5 प्रतिशत हिस्से पर काबिज़ है। इस तरह चार पूँजीपति घराने कुल कारोबार के तीसरे हिस्से के मालिक हैं।

अब किसी को यह लग सकता है कि अगर पैसे देकर शुद्ध पानी मिल रहा है तो क्या बुरा है? परन्तु सच्चाई यह है कि यह पानी भी शुद्ध नहीं होता है, इसमें बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी होती है। पानी की बोतलों और सम्बन्धित विज्ञापनों में कल-कल करते झरने व बर्फ़ के पहाड़ दिखाये जाते हैं, परन्तु इनमें से ज़्यादातर के पानी का स्रोत नगर निगम की तरफ़ से आपूर्ति किये जाने वाले पानी के नल हैं। एक अध्ययन में यह पता लगा कि लगभग आधी बोतलों में यह नल का पानी ही था। इनमें कोका-कोला का डासानी व पेप्सी का ऐक्वाफिना ब्राण्ड भी शामिल था। इसी तरह के एक और अध्ययन से यह बात सामने आयी कि एक तिहाई बोतलों में पानी में घुले तत्वों की मात्रा ज़रूरत से अधिक थी जो बेहद हानिकारक है। इसके अलावा कई बोतलों में ग़ैर-ज़रूरी रसायन, बैक्टीरिया और कृत्रिम यौगिक भी मिले हैं। ज़्यादातर कम्पनियाँ, जिनमें सभी प्रसिद्ध कम्पनियाँ भी शामिल हैं, ये नहीं बतातीं कि उनके पानी का स्रोत क्या है? इसको कैसे शुद्ध किया जाता है और इसमें क्या अशुद्धियाँ मौजूद हैं? बोतलबन्द पानी के इस कारोबार को क़ानूनी घेरे में लाने और बेचे जा रहे पानी की जाँच के लिए कई संस्थाएँ भी बनी हुई हैं, परन्तु इस कारोबार के ज़्यादा फैलाव व कम्पनियों की अधिक संख्या के कारण इन पर अपेक्षित नियन्त्रण नहीं रह पाता। कहा जा सकता है कि आपके नल में आने वाला पानी ज़्यादा भरोसे के लायक़ है क्योंकि वो ज़्यादा जाँच के घेरे में है और वहाँ जवाबदेही भी है। एक ग़ौर करने लायक बात यह भी है कि ये आँकड़े यूरोप और विकसित देशों के हैं। सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर विकसित देशों में हर दूसरी बोतल में नल का पानी है तो भारत समेत अन्य पिछड़े देशों में क्या हाल होगा? यहाँ आप “रेल नीर” और बसों-रेलों में बिकती ऐसे ही अन्य बोतलों पर कितना भरोसा कर सकते हैं? इसके अलावा बोतलबन्द पानी को ख़रीदने के लिए आपको आम पानी से 2000 गुणा ख़र्च करना पड़ता है।




अब ज़रा देखते हैं कि कुछ मुनाफ़ाख़ोरों के मुनाफ़े के लिए पूरी मानवता को क्या क़ीमत चुकानी पड़ रही है? दुनियाभर में इन कम्पनियों द्वारा साफ़ पानी के क़ुदरती स्रोतों पर क़ब्ज़ा किया जा रहा है व उनको दूषित भी किया जा रहा है, जिसका नुक़सान आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। बोतलबन्द पानी तैयार करने के लिए ये कम्पनियाँ कई गुणा पानी बर्बाद कर देती हैं, बहुत सारा पानी प्रदूषित कर दिया जाता है जिसे बाद में पानी के क़ुदरती स्रोतों – झीलों, नदियों आदि में बहा दिया जाता है। जहाँ कहीं भी इन कम्पनियों के बॉटलिंग प्लाण्ट लगे हैं, वहाँ रोज़ाना लाखों लीटर भूमिगत पानी निकाला जाता है जिस कारण इन इलाक़ों में पानी का स्तर काफ़ी नीचे चला गया है। वहाँ के लोगों को पानी मिलने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है व किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पा रहा है। हैरानी की बात है कि ये कम्पनियाँ पानी के इन स्रोतों पर लगभग मुफ़्त में क़ब्ज़ा कर रही हैं और सरकारें इस लूट में कम्पनियों का पूरा साथ दे रही हैं। भारत में इसके कुछ उदाहरण देखते हैं। राजस्थान में जयपुर के निकट अकालग्रस्त काला डेरा में कोकाकोला का बॉटलिंग प्लाण्ट है। यहाँ हर रोज़ 5 लाख लीटर पानी धरती के नीचे से निकाला जाता है। एक लीटर बोतलबन्द पानी के लिए दो या तीन लीटर सादे पानी की ज़रूरत होती है। इस पानी को निकालने का ख़र्च कुछ ही पैसे आता है जिसको ये कम्पनियाँ बोतलों में भरकर 10 से 20 रुपये में बेचकर असीमित लाभ कमा रही हैं। छत्तीसगढ़ में भी ऐसे कई प्रोजेक्ट हैं – राजगढ़ में कीलो और खरिकर नदियों पर, जगजीर में मण्ड पर, रायपुर में खैरों नदी पर, दन्तेवाड़ा में सावरी नदी पर। इसी तरह मध्यप्रदेश सरकार ने सन 2000 में रेडियस वाटर लिमिटेड को शिवनाथ नदी का 23.6 किलोमीटर का हिस्सा 22 सालों के लिए लीज़ पर दे दिया। कम्पनी को पानी आपूर्ति करने का एकाधिकार दिया गया। सरकार द्वारा इस कम्पनी को इस्तेमाल के लिए ज़मीन बिना किसी क़ीमत के सौंपी गयी। इस कम्पनी के साथ समझौते के मुताबिक़ सरकार हर रोज़ कम से कम 40 लाख लीटर पानी इस कम्पनी से ख़रीदेगी। कम पानी ख़रीदने पर भी 40 लाख लीटर के ही पैसे देने होंगे वहीं ज़्यादा पानी लेने पर वास्तविक मूल्य लगाया जायेगा। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही हाल है। कुछ साल पहले ही नेस्ले ने कोलोराडो में अरकानसस नदी का एक हिस्सा कौड़ियों के भाव ख़रीद लिया। 10 साल के लिए हुए इस सौदे के मुताबिक़ कम्पनी हर साल 2.45 बिलियन लीटर पानी निकाल सकती है जिसके लिए सिर्फ़ 1.6 लाख डॉलर सालाना का भुगतान करना होगा। इसी तरह 2003 में अकेले अमेरिका में नेस्ले की तरफ़ से 7 बिलियन लीटर पानी निकाला गया। दुनियाभर में इन कम्पनियों की तरफ़ से प्राकृतिक संसाधनों पर क़ब्ज़ा किया जा रहा है और पानी बर्बाद किया जा रहा है।


बोतलबन्द पानी का यह गोरखधन्धा क़ुदरती स्रोतों को प्रदूषित करने के अलावा और भी कई तरीक़ों से पर्यावरण को नुक़सान पहुँचा रहा है। पहली बड़ी समस्या इससे पैदा होने वाला प्लास्टिक कचरा है। अकेले अमेरिका में एक महीने में 500 मिलियन बोतलें पैदा होती हैं, जिनसे धरती को पाँच बार ढँका जा सकता है। 2001 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ हर साल 89 बिलियन बोतलों के रूप में 15 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। इसका सिर्फ़ 10 से 15 प्रतिशत ही पुनःचक्रित होता है, बाक़ी कचरे में जाता है। लैण्डफिल (कचरा भराव क्षेत्र) ऊपर तक भर चुके हैं और इस कचरे को समाने लायक नहीं बचे। इसलिए बड़े स्तर पर यह कचरा समुद्रों में फेंक दिया जाता है और इसका एक हिस्सा जलाया जाता है जिससे वातावरण में ख़तरनाक गैसें फैल जाती हैं। दूसरी बड़ी समस्या तेल के नुक़सान की है। पानी को धरती में से निकालने, बोतलें बनाने के लिए प्लास्टिक तैयार करने, तैयार बोतलों की ढुलाई व फिर ख़ाली बोतलों के निपटारे पर बहुत ज़्यादा तेल की खपत होती है। एक सर्वे के मुताबिक़ अकेले अमेरिका में बोतलबन्द पानी का उद्योग 1.5 बिलियन बैरल तेल का उपभोग करता है जो कि एक साल में 1 लाख कारों के लिए काफ़ी है। इस तरह सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि दुनियाभर में कितना तेल बर्बाद होता होगा।


प्राकृतिक संसाधनों की इस अन्धाधुन्ध लूट के दम पर ही इन मुनाफ़ाख़ोरों ने अरबों की कमाई की है। बोतलबन्द पानी का कारोबार संसार के सबसे अधिक मुनाफ़े वाले क्षेत्रों में से एक है जिसके कारण यह तेज़ी से बढ़ रहे धन्धों में से भी एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ इस कारोबार में 1 डॉलर निवेश के पीछे 45 डॉलर का लाभ है। पर इस क्षेत्र में लगे मुनाफ़ाख़ोरों के लिए यह भी कम है, ये इस क्षेत्र में और ज़्यादा लूट चाहते हैं और ये इसको बिल्कुल भी ग़लत नहीं मानते। नेस्ले के चेयरमैन पीटर बरबैक लटमेथ का कहना है कि “धरती पर पानी की एक-एक बूँद पर पूँजीपतियों का क़ब्ज़ा होना चाहिए और आपको बिना पैसे दिये एक भी बूँद नहीं मिलनी चाहिए।” पेप्सी के उपाध्यक्ष रॉबर्ट मौरीसन का कहना है – “नल का पानी सबसे बड़ा दुश्मन है।” यहाँ उनका मतलब मुनाफ़े से है कि नल का पानी उनके मुनाफ़े का सबसे बड़ा दुश्मन है। ये लोगों को किसी भी तरह मुफ़्त मिलता पानी बर्दाश्त नहीं कर सकते। इसी तरह अमेरिका की कुआकर ओट्स कम्पनी की प्रधान सूजन वेलिंगटन के मुताबिक़ – “जब हम अपना काम कर चुके होंगे, तब नल का पानी नहाने-धोने के लायक ही रह जायेगा।” कोका कोला ने भी लोगों को होटलों, रेस्तराओं आदि में नल का पानी पीने से “बचाने” की योजना बनायी है जिसके अन्तर्गत लोगों को नल के पानी की जगह बोतलबन्द पानी, कोल्ड-ड्रिंक व अन्य बिकने वाले पेय पदार्थ पीने के लिए प्रेरित किया जायेगा।


जहाँ एक तरफ़ कुछ पूँजीपति घराने पानी के स्रोतों पर क़ब्ज़ा किये बैठे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ करोड़ों लोगों को साफ़ पानी हासिल करना मुश्किल हो रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़ दुनिया की एक तिहाई आबादी पानी की कमी से जूझ रही है। पानी के प्राकृतिक स्रोत ख़राब हो रहे हैं जिसमें उद्योगों का बहुत बड़ा हाथ है और बोतलबन्द पानी का उद्योग भी इन्ही में से एक है। 80 प्रतिशत बीमारियों का कारण ख़राब पानी है। रोज़ाना पूरी दुनिया में 25,000 लोग ख़राब पानी के कारण मर जाते हैं। भारत में 18.2 प्रतिशत लोग पानी के क़ुदरती स्रोतों से पानी हासिल करते हैं और 5.6 प्रतिशत जनसंख्या कुँए के पानी पर निर्भर करती है। 3.77 करोड़ भारतीय पानी सम्बन्धी बीमारियों के शिकार हैं। देश में 12 बड़ी, 46 मँझोली और 55 छोटी नदियों के बेसिन हैं जो गँदले हो चुके हैं।

सरकारें सरेआम इस लूट में भागीदार हैं, उनकी तरफ़ से लोगों को साफ़ पानी उपलब्ध करवाने की जगह पूँजीपतियों के लिए सब्सिडियाँ और करों में छूट दी जा रही है, ताकि वे लोगों को “शुद्ध पानी” पिलाकर “पुण्य” कमा सकें! अमेरिका में 24 बिलियन डॉलर की फ़ण्डिंग सरकार द्वारा दी जाती है, जिससे ये कम्पनियाँ लोगों को “शुद्ध पानी” मुहैया करवायें। एक और बात ध्यान देने योग्य है कि पानी की इस कमी का शिकार आम मेहनतकश जनता ही होती है। दुनियाभर में अमीरजादों के घरों, मुहल्लों, वाटर पार्कों और ऐसी ही मनोरंजन की अन्य जगहों पर पानी के हो रहे दुरुपयोग के बावजूद उनके लिए पानी की कोई कमी नहीं होती है।



आइये, अब जल स्रोतों की कमी और पानी की तंगी के पूँजीवादी प्रचार पर एक नज़र डालें। सिर्फ़ भारत की बात करें तो नदियों के बड़े जाल और लम्बे समुद्री तट के बावजूद अगर कोई कहे कि यहाँ पानी की कमी है तो यह पूँजीवादी लूट और लोगों पर किये जा रहे जुल्मों पर पर्दा डालना होगा। बारिश का पानी और हिमपात भारत में जल के प्रमुख स्रोत हैं। लगभग 4,200 अरब घन मीटर पानी हर वर्ष बरसात से हासिल होता है। औसतन सालाना बरसात 1,170 मिलिमीटर है। ख़राब जल प्रबन्धन के कारण बरसाती पानी का अधिकतर हिस्सा बहकर समुद्र में मिल जाता है। भारत में प्रयोग योग्य पानी की उपलब्धता 1,122 अरब घन मीटर है जिसका केवल 1.9 प्रतिशत हिस्सा ही आज प्रयोग हो पा रहा है। केन्द्रीय जल कमीशन के आँकड़ों के अनुसार नदियों का सालाना बहाव 186.9 घन किलोमीटर है। देश में उपलब्ध भूजल की कुल मात्र 431.88 अरब घन मीटर है जिसमें से 360.80 घन मीटर सिंचाई और 70.93 अरब घन मीटर औद्योगिक कामों में प्रयोग होता है। इण्डियन नेशनल ट्रस्ट फ़ॉर आर्ट एण्ड कल्चर हेरिटेज के अनुसार 980 बिलियन लीटर जल बरसाती पानी का संग्रह करके प्राप्त किया जा सकता है। आज यदि पूरे देश के लोगों को पीने का पानी उपलब्ध करवाना है तो प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 150-200 लीटर पानी की ज़रूरत होगी। यह मात्रा बड़े शहरों के लिए है, छोटे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में यह पैमाना कम है। अब यदि 200 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के अनुसार देश की 121 करोड़ जनसंख्या के लिए एक वर्ष तक पानी की ज़रूरत का आकलन किया जाये तो वह 88.33 अरब घन मीटर होगा। जबकि प्रयोग योग्य उपलब्ध पानी 1,122 अरब घन मीटर है। यह मात्रा तो पूरी दुनिया की ज़रूरतों से भी ज़्यादा है। अगर पूरी दुनिया में पानी के स्रोतों को देखें तो यह मात्रा और भी नगण्य लगेगी।




असल संकट पीने के पानी समेत अन्य ज़रूरतों के लिए पानी की कमी का संकट है ही नहीं। ज़रूरत है पानी के स्रोतों का निजीकरण और इसे मुनाफ़े का उद्योग बनाना बन्द करके सभी लोगों की साझा सम्पत्ति बनाने की, हर व्यक्ति तक पानी पहुँचाने के उत्तम प्रबन्ध करने की। परन्तु मौजूदा लुटेरे ढाँचे व इसकी लुटेरी सरकारों से ऐसा करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसके लिए तो मेहनतकश जनता को ही उठ खड़ा होना होगा।

Sunday, September 13, 2015

क्या इस देश से मुगलों का नामोनिशान मिटाने का वक्त आ गया है ?

भारत की मजबूत बुनियाद और इसकी सांस्कृतिक विरासत को हिलाने के लिए मुगलों के शासनकाल में सबसे बड़ी हिमाकत की गई। सभी मुगल बादशाह यहां के हिन्दुओं के प्रति आक्रामक रहे और धार्मिक स्थानों पर अपना झंडा बुलंद करने ने लगे रहे। अकबर ने तो इस मुल्क को धर्मान्तरण की अग्निकुण्ड में धकेल कर तथाकथिक इश्लाम के झंडाबरदार तैयार करने में लगा रहा। मगर इन सभी को पीछे छोड़ते हुए मुगल बादशाह औरंगजेब ने लगातार भारत पर अपने मजहब हुक्म से हिन्दुओं पर अत्याचार की सारी सीमाएं लाँघ दिया। शाहजहां, जिसे मोहब्बत का पैगाम देने वाला मसीहा माना जाता है, के शासन में भी धर्म परिवर्तन का सिलसिला नहीं रुका। अबोध बालक वीर हकीकत राय खन्ना का कत्ल उसी के काजियों के हुक्म से तब किया गया था जब उसने इस्लाम कबूल करने से इन्कार कर दिया था। 


शाहजहां के बेटे औरंगजेब ने तो सरेआम हिन्दुओं के खिलाफ जंग छेड़ी और पूरे देश में हिन्दू धर्म स्थलों को अपना निशाना बनाया और सरेआम इन्हें काफिर घोषित किया। यह ऐतिहासिक सत्य है कि सभी मुगल बादशाहों में औरंगजेब के शासन में चलने वाले भारत की भौगोलिक सीमाएं सबसे बड़ी थीं और उसके शाही खजाने की राजस्व वसूली भी सबसे ज्यादा थी। औरंगजेब ने ही दक्षिण में पहली बार पूरी फतह पाने में सफलता प्राप्त की थी मगर उसके शाही खजाने में उस जजिया टैक्स का योगदान काफी ज्यादा था जो वह हिन्दू तीर्थ यात्रियों व व्यापारियों आदि पर लगाया करता था। भारत में शाही आतंकवाद का यह पहला नमूना था मगर उसे मराठा महाराज शिवाजी ने खुली चुनौती दी थी और कहा था कि भारत पर विदेशियों को शासन करने का कोई अधिकार नहीं है, उनसे सत्ता छीनना हर भारतवासी का कर्तव्य है। 




औरंगजेब की मृत्यु सन् 1707 में हो गई और उसके बाद मुगलिया सल्तनत ने भारत की बुनियाद में जो चूना लगाना शुरू किया था वह अपना रंग दिखाने लगा। रोजाना सवा मन हिन्दुओं के जनेऊओं को जला कर नमाज अता करने वाले औरंगजेब के औरंग (सिंहासन) के परखचे उड़ने शुरू हो गये। मराठा पेशवाओं और दूसरी हिन्दू रियासतों ने अपने हलके कब्जाने शुरू किये और 1833 आते-आते पूरा उत्तरी भारत आगरा से लेकर काबुल तक पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह की शान में सिर झुकाने लगा लेकिन तब तक अंग्रेजों ने भारत में अपने पैर जमा लिये थे और वे इस मुल्क की बुनियाद में रखे गये चूने से पूरी तरह वाकिफ हो चुके थे। अत: उन्होंने इसी चूने को बारूद बना कर इस मुल्क की बुनियाद हिला डाली और औरंगजेब के काम को आधुनिक तरीके से आगे बढ़ाया तथा 1947 के आते-आते मुगलों की बनाई गई बुनियाद को अमलीजामा पाकिस्तान बनवा कर पूरा कर डाला।     


           


जो सपना औरंगजेब ने हिन्दू रियाया पर जुल्म ढहाते हुए देखा तक नहीं था उसे अंग्रेजों ने पूरा कर डाला। औरंगजेब ने मजहब के आधार पर राष्ट्रीयता तय करने की जो बुनियाद अपने कट्टरपन में डाली थी उसे अंग्रेजों ने बहुत ही आसानी के साथ नये जमाने के फलसफे गढ़ कर लागू कर डाला मगर आजाद भारत का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा कि हमने अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होते हुए भी इस वजह को बरकरार रखा और मुसलमानों के लिए अलग नागरिक आचार संहिता को लागू कर दिया। इसकी सारी जिम्मेदारी भारत के पहले प्रधानमन्त्री पं. जवाहर लाल नेहरू पर ही डालनी होगी क्योंकि भारत का संविधान लिखने वाले बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर इसके हक में नहीं थे मगर संविधान सभा में जिस प्रकार कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं का दबदबा था उन्होंने नेहरू को मुसलमानों को पृथक नागरिकता के दायरे में लाने के लिए प्रेरित किया। बस यहीं से मुस्लिम वोट बैंक की आजाद भारत में नींव पड़ी और मुसलमानों के पिछड़े रहने का फार्मूला सुनिश्चित हो गया। 



नेहरू की यह भूल कश्मीर की भूल से भी बड़ी है क्योंकि पाकिस्तान का निर्माण सिर्फ मुसलमानों के लिए महफूज जगह मुहैया कराने के नाम पर अंग्रेजों ने किया था मगर स्वतंत्र भारत में भी उन्हें अलग से धर्म के नाम पर रियायत देकर नेहरू ने एक ऐसी समस्या पैदा कर डाली जिसका लाभ अगर आज कोई उठाने की सबसे ज्यादा कोशिश करता है तो वह पाकिस्तान ही है। अत: आज हिन्दोस्तान में यदि औरंगजेब के भक्त पैदा हो रहे हैं तो उनका भारतीयता से किसी भी प्रकार से दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं है।



मगर आज इसी औरंगजेब के नाम पर दिल्ली में मौजूद एक सड़क का नाम पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर ए. पी. जे. अब्दुल के नाम पर किया गया तो इस देश में एक बार फिर से औरंगजेब के औलाद सड़क उतर कर कोहराम मचाने लगे क्या ये मिसाइल मैन कलाम का अपमान नहीं है? तो ऐसे सवाल खड़ा होता है की क्यों न इस मुल्क से मुगलिया सल्तनत और औरंगजेब के हर निशान को मिटा दिया जाय ? 

Friday, September 4, 2015

क्या खतरे में है लोकतंत्र का चौथा स्तंभ..?

हर लोकतान्त्रिक देश की तरह भारत भी देश के तमाम पत्रकारों के पूर्ण रूप से आजाद होकर ख़बरें लिखने व छापने का दम्भ भरता है। लेकिन बीते कुछेक हफ़्तों से चल रहे भारतीय खबरनवीसों पर हमलों से इस दम्भ पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं। विगत एक महीनें में कई भारतीय पत्रकारों पर हुए हमले से पूरे विश्व में भारतीय पत्रकारों की आजादी के साथ-साथ सुरक्षा पर भी चर्चाओं के साथ ऊँगली उठने लगी है। इसके साथ ही भारत के तमाम स्वतंत्र रूप से काम करने वाले पत्रकारों की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े किये जाने लगे हैं।


जून माह की पहली तारीख को उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में बतौर स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने वाले जगेंद्र सिंह की जलाकर हत्या कर दी गयी थी। ठीक इसके कुछ दिनों बाद ही ऐसी ही घटना मध्य प्रदेश के स्वतंत्र पत्रकार संदीप कोठारी के साथ भी घटी। स्वतंत्र रूप से पत्रकारिता करने वाले दोनों ही पत्रकारों की हत्याओं में दो समानता पहली ही नज़र में दिखाई पड़ती है। जहाँ एक ओर दोनों ही पत्रकारों की हत्याएं प्रदेश के माफियाओं के खिलाफ खबर लिखने व उससे समबन्धित सच को उजागर करने पर हुई थी तो वहीँ संदीप व जगेंद्र दोनों को जला कर बेहद बेदर्दी से से मार डाला।




बेहद बेदर्दी से की गयी दोनों पत्रकारों की हत्याओं के बाद देश के भीतर कई जगह इसका विरोध भी शुरू हो गया है। पत्रकार समूह के साथ-साथ देश के तमाम नेता, आम जनता आदि पत्रकारों पर हो रहे हमले के खिलाफ कमोबेश खड़े होते हुए दिखाई पड़ रहे हैं। बहरहाल, संदीप की हत्या पर काफी बवाल मचने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जगेंद्र सिंह के परिवार वालों को तीस लाख रुपये, दोनों बेटों को भविष्य में सरकारी नौकरी के साथ साथ जांच को पूर्णतः निष्पक्षता के साथ कराने का आश्वासन देकर अपना पल्ला झाड़ लिया है। दोनों पत्रकारों के परिवारों को सरकारों की तरफ से मिले आश्वासन के बाद अब भी देश के तमाम पत्रकारों की सुरक्षा के लिए किसी भी सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

अगर हम मौजूदा वक़्त में हो रहे पत्रकारों पर हमले की संख्या के बारे में बात करें तो बीते कुछेक वर्षों में पत्रकारों की हत्याओं के मामले में काफी तेज़ी आई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, जगेंद्र सिंह व संदीप कोठारी को मिलाकर बीते 22 सालों में 58 भारतीय खबरनवीसों की जान जा चुकी है। सौम्या विश्वनाथन, जे. डे. आदि जैसे कुछेक नाम हैं जिनकी हत्या के बाद भारतीय पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर नए तरीके से बात शुरू हुई लेकिन कई सालों के बीत जाने के बाद भी अभी तक सुरक्षा से सम्बंधित किसी भी प्रकार का कोई निर्णय केंद्र सरकार के द्वारा नहीं लिया गया है। निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में कई पत्रकारों पर भी हत्याओं के द्वारा रोक लगायी जा चुकी है। पूरे विश्व में हाल ही में हुए पत्रकारों की हत्यों पर एक नज़र डाले


तो पाएंगे कि पिछले दो वर्ष में लगभग 150 खबरनवीसों की आजादी पर हत्या के जरिये रोक लगाई गयी है। इस आंकड़े में एक दिलचस्प व् अचंभित करने वाला सच यह है कि मारे गए इन लगभग 150 पत्रकारों में से लगभग 60 के आस पास ऐसे खबरनवीस हैं जिनकी हत्या आतंकी गढ़ में रिपोर्टिंग करते हुए की गयी है। सच को उजागर करने व जनता से सीधे सरोकार की भावना की ही वजह से अब कहीं न कहीं देश, विदेश के तमाम पत्रकारों के ऊपर अपनी जान से हाथ धोने का संकट मंडराता हुआ प्रतीत हो रहा है। मौजूदा वक़्त में महज सीरिया, इराक, अफगानिस्तान जैसे पश्चिम एशियाई देशों के साथ-साथ सूडान, सोमालिया जैसे अफ्रीकी देश भी युद्ध के दौर से गुजर रहे हैं। इसी कारणवश वहां पत्रकारिता करने गए खबरनवीसों की कई बार हत्या की जा चुकी है। इसके अतिरिक्त एशिया के प्रमुख देशों में आने वाले पाकिस्तान में भी पत्रकारों के लिए हालात बदतर हैं। ऐसे में मौजूदा दौर में निष्पक्ष एवं विश्वसनीय पत्रकारिता के मूल्यों का निर्वहन करने वाले खबरनवीसों के लिए खतरे पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गए हैं।



निष्पक्षता पत्रकारिता का पहला नियम होने की वजह से तमाम पत्रकारों को न सिर्फ खबरों के प्रति निष्पक्षता बनाए रखनी होती है बल्कि जनता के समक्ष सच को उजागर करने की नीति भी कई बार उनकी जान जोखिम में डाल देती है। इसी कारणवश यह आवश्यक हो गया है कि सभी देशों की सरकारें मिलकर पत्रकारों के हित में ऐसे नियम व् कानून बनाये जिससे खबरनवीसों की जान को किसी प्रकार का कोई जोखिम न हो और वे खुलकर पाठकों तथा जनता के प्रति अपने कर्तव्य का सही रूप से निर्वहन कर सकें। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या खतरे में है लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ?