Tuesday, March 17, 2015

राजनीति या राष्ट्रनीति ?

यह कहना कहीं से भी अनुचित नही है कि स्वंतत्र के होने के बाद पिछले सढ़सठ वर्षों में देश ने केवल राजनीति को ही प्रभावी होते देखा है क्योंकि सभी राजनीतिज्ञों का मन, मस्तिष्क और ह्रदय देश के आर्थिक बौद्धिक एवं सामाजिक विकास की ओर केंद्रित न होकर बल्कि येन केन प्रकारेण सत्ता पर अपना आधिपत्य जमाये रखने पर ही केंद्रित था और इस सत्ता अधिग्रहण के लिए उन्होंने सबसे पहले देश को जाति संप्रदाय धर्म में बाँटना शुरू किया और उसके बाद कभी रूस तो कभी अमेरिका के आगे देश को समर्पित कर दिया। जवाहरलाल नेहरू से शुरू हुई यह भ्रष्ट ओछी घृणित राजनीतिक यात्रा मन मोहन सिंह पर आकर थमी और 26 मई 2914 को राजनीति को राष्ट्रनीति में बदलने का विधिवत कार्यक्रम शुरू हुआ। राष्ट्र किसी भूखंड का नाम नही बल्कि राष्ट्र की भूमि सतह ,नभ और भूगर्भ ये तीनों मिलकर राष्ट्र की भौगोलिक स्थिति को प्रदर्शित करते हैं लेकिन राष्ट्र की संस्कृति सभ्यता और मर्यादा स्थापित करने का दायित्व राष्ट्र में रह रहे प्रत्येक जीवधारी का कर्त्तव्य है। पशु ,पक्षी,बनस्पति और वनसंपदा के साथ साथ मानवदेह धारी भी राष्ट्र की पहचान बनते हैं।

भारत ही विश्व का एक मात्र ऐसा देश है जहाँ सारे मौसम ,सारी ऋतुएँ और सभी प्रकार के कटिबन्ध मिलते हैं। यहाँ रेगिस्तान भी है तो तराई क्षेत्र भी है ,यहाँ किसी स्थान पर सबसे कम वर्षा होती है तो कोई स्थान सबसे अधिक वर्षा होने के लिए इतिहास में दर्ज है। भारत भाषा में भी अपने आप में एक ऐसा अनूठा देश है जहाँ से संस्कृत भाषा का उदय हुआ और इसको वेदवाणी भी कहा जाता है और जितनी ही भाषाएँ विश्व में प्रचलित हैं उन सबका जन्म संस्कृत से ही हुआ है। मक्का में पवित्र काबा के पास भी दो शिलाओं पर संस्कृत भाषा में लिखी कुछ लिपियाँ मिलीं लेकिन देश का दुर्भाग्य यही रहा कि देश के स्वतंत्र होने के बाद प्रथम प्रधानमंत्री से लेकर मन मोहन सिंह तक सारे ही प्रधानमंत्रियों ने कभी भी अपने राष्ट्र की सांस्कृति और बौद्धिक सम्पदा के बारे में विश्व को बताया ही नही। 

इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक देश तक में भगवान लक्ष्मी गणेश के चित्र इंडोनेशियाई मुद्रा पर अंकित हैं लेकिन कांग्रेस सरकार ने वेदों के मन्त्र ” सत्यमेव जयते ” तक को मुद्रा से हटा दिया ,यहाँ तक कि इंडोनेशिया में हवाई सेवाओं को गरुड़ नाम दिया गया और आज जिओग्राफिक और डिस्कवरी चैनलों पर दिखाया जाता है कि समुद्र के भीतर भी चार पांच हजार वर्ष पुराने मंदिर निकले हैं जिनमें स्थापित भगवान शंकर और गणेश की प्रतिमाएं अभी तक सुरक्षित हैं।  विश्व की सबसे पुरानी अंग प्रत्यारोपण सर्जरी का उदाहरण तो स्वयं भगवान गणेश हैं यानि मनुष्य के सिर पर हाथी के सिर का सफल प्रत्यारोपण लेकिन दुर्भाग्य देखिये कि कुछ स्वयंभू बुद्धिजीवी इस उपलब्धि को कोरी कल्पना मानते हैं।  पूरा देश रामनवमी मनाता है लेकिन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भगवान राम के ही अस्तित्व को न केवल झुठलाया बल्कि रामसेतु तोड़ने के लिए दुनिया भर के प्रपंच रचे। 

गुजरात में सोमनाथ और ओडिशा में कोणार्क सूर्य मंदिर चुंबकीय शक्ति का अनूठा प्रयोग था लेकिन किसी भी सरकार ने इन मंदिरों की भव्यता के बारे में विश्व को अवगत ही नही कराया ? यूपी के मथुरा जिले में पवित्र गोवर्धन पर्वत की शिलाओं को तोड़कर पीसकर बेचा जा रहा है और धीरे धीरे गिरिराजजी के अस्तित्व पर ही ग्रहण लगाने की साजिश रची जा रही ताकि देश से आध्यात्मिक इतिहास मिटाया जा सके। यूपी के एक स्थान ओरछा में भगवान राम का मंदिर है जहाँ पाषाण विग्रह में ही बाल बढ़ते हैं लेकिन मंदिर तोड़कर बनायीं गयी कब्रगाह ताजमहल को तो विश्व का आठवां अजूबा मान लिया लेकिन जीते जागते प्रत्यक्ष प्रमाण ओरछा मंदिर को कोई स्थान नही। देश को जातियों में इतना बाँट दिया कि अब इनका समन्वय आसान नही क्योंकि आरक्षण देकर इनको तो सुरक्षित किया गया लेकिन इनके आरक्षण के पीछे उचित सुपात्रों और सुयोग्यों का अधिकार वंचित कर दिया गया जबकि आरक्षण के बजाय उनको समान स्तर पर लाने के अन्य विकल्प भी आजमाये जा सकते थे लेकिन इससे वोट बैंक प्रगाढ़ जो करना था और अब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी कि कोई भी राजनीतिक पार्टी इसमें रत्ती भर भी फेरबदल नही कर सकती और पूर्ववर्ती सरकारों ने देश में एक धर्मसंगत आरक्षण की नयी प्रथा शुरू कर दी ताकि अब देश में कभी भी सांप्रदायिक और धार्मिक सोहार्द्य स्थापित ही नही हो सकता।

 राजनीति अब एक व्यवसाय हो चुकी है जहाँ बाप दादा पोता सभी एक साथ मिलकर राजनीति को अपना पैतृक व्यवसाय बनाकर चल रहे हैं ताकि परिवार का एक न एक सदस्य किसी न किसी राजनीतिक दल का सदस्य बनकर सत्ता सुख भोगता रहे। लालू यादव बड़ी चतुराई से अपनी पुत्रियों का विवाह अन्य प्रदेशों के राजनीतिक घरानों में तय कर रहे हैं ताकि इनकी पुत्री को किसी भी प्रकार का संकट भविष्य में झेलना न पड़े। बड़े बड़े राजनीतिज्ञ अपनी संतानों के विवाह प्रशासनिक अधिकारीयों से करने में लालायित रहते हैं ताकि इससे दो फायदे रहें पहला तो सरकार बदलने के बाद भी अपराधिक इतिहास पर पर्दा पड़ा रहता है और दुसरे संतान भी सरकारी सुविधा मौजमस्ती का आजीवन लाभ लेती रहे।

 भारत में केवल हिन्दू ही नही बल्कि बौद्ध और जैन धर्म के भी अनुयायी रहते हैं जिनको अल्पसंख्यक होने का आरक्षण लाभ दिया गया है लेकिन इन दोनों के अहिंसा और सत्य मूलोपर्मोधर्म है उसके बाबजूद भारत आज विश्व का सबसे बड़ा पशुमांस निर्यातक देश का गौरव प्राप्त देश हो गया है ,अब पशुमांस निर्यातक देश होने का यह गौरव है या शर्म कि जिस राष्ट्र में कभी दूध घी तेल की नदियां बहती थीं वहां देश के हर शहर के हर मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में नालियों में दुधारू पशुओं का रक्त बह रहा है और उनका मांस निर्यात हो रहा है यानि घर घर में खुले ये वैध या अवैध कमेले भारत राष्ट्र की संस्कृति है या संस्कृति का अपमान यह विचारणीय प्रश्न है? पूर्णतः व्यवसायिक आर्थिक लाभ के उद्देश्य से व्यापक निर्मम पशु हत्या को मांस उत्पादन का नाम देना क्या भारत की संस्कृति और मर्यादा का पर्याय है ? और निर्मम पशु हत्या को न केवल मांस उत्पादन कहा जा रहा है अपितु इसको कृषि कोष्ठ में रखकर पशुहत्या से होने वाली आय को आयकर मुक्त करके मांस ट्रांसपोर्ट पर सब्सिडी अलग से दी जा रही है लेकिन भारत का बुद्धिजीवी वर्ग उदासीन होकर सत्ता सुख भोगने वाले राजनेताओं के षड्यंत्र को सहन कर रहा है और देश में स्थिति यह हो गयी है कि भारत अब नकली दूध, नकली घी, और नकली मावा की सबसे बड़ी मंडी बन चूका है। 

कोई भी सामान खरीदते समय हर क्रेता को यह संशय बना रहता है कि खरीदा हुआ सामान असली भी है कि नही ? बौद्धिक दिवालियेपन का शिकार होता आज हर भारतीय ग्राहक यह भली भांति जानता है कि दवाईयों से लेकर खाने पीने और इलेक्ट्रॉनिक सभी सामान चीन से आ रहे हैं लेकिन फिर भी इनके मेनुफेक्चरर होने का दावा किया जाता है। भारत में बाजार में बिकने वाली सारी एलोपेथिक और अन्य पैथियों की दवाईयां के रॉ यानि कच्चा माल चीन से ही आयात होता है यहाँ कि मैनुफैक्चरिंग यूनिटें केवल उनको टेबलेट कैप्सूल या सिरप का आकर देती हैं। सुई से लेकर बड़े बड़े कलपुर्जे तक चीन से आयात होते हैं, घरों में लगे बिजली के मीटर भी चायनीज हैं और कम्प्यूटर मोबाईल आदि तो क्या कहें यानि देश की भ्रष्ट राजनीति ही इन सबके लिए जिम्मेदार है और यह सब कोई एक दिन में नही हुआ बल्कि पिछले सढ़सठ वर्षों की भ्रष्ट मौकापरस्त अवसरवादी राजनीति का प्रसाद है और अगर इस भ्रष्ट राजनीतिक को राष्ट्रनीति में बदलना है तो राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तर पर में राजनीतिज्ञों के चयन में आमचूल् परिवर्तन नितांत आवश्यक है वर्ना देश कभी भी पुनः परतंत्र हो सकता है क्योंकि आज भारत के विकास हेतु विदेशी निवेश और विदेशी तकनीकी के साथ साथ विदेशी तकनीकि विशेषज्ञों की मजबूरी है और जो भारत की प्रतिभा योग्यता दक्षता भ्रष्ट राजतन्त्र और भ्रष्ट आरक्षण व्यवस्था से तंग होकर विदेश पलायन कर गयी वह किसी भी सूरत में घरवापसी को तैयार नही क्योंकि उनकी दृष्टी में अपना देश भारत अब एक गन्दा बीमार पिछड़ा अशिक्षिक गरीब राष्ट्र है और एक प्रश्न यह भी है कि वे यहाँ आकर करेंगे भी क्या क्योंकि भारत के किसी भी सरकारी कार्यालय में कोई भी काम बिना रिश्वत के होता ही नही है। उदाहरण के तौर पर यदि पासपोर्ट भी बनवाना हो तो भले ही नियम कानून कुछ भी हों लेकिन एलआईयू और सम्बंधित थाने की जाँच आंख्या तब तक पासपोर्ट कार्यालय तक नही पहुंचेगी जब तक दोनों कार्यालयों के प्रतिनिधियों को न्यूनतम पांच सौ रूपया सुविधा शुल्क न मिल जाय। 

कहने को तो देश के हर शहर के व्यस्ततम चौराहों पर यातायात पुलिस वाले वाहन स्वामियों और वाहनों की चेकिंग अभियान चलाते देखे सकते हैं लेकिन कभी इन्ही पुलिस कर्मियों की जेब की चेकिंग की जाय तो इनकी जेब से ही उस समय उतना पैसा निकलेगा जितना कि इनका मासिक वेतन भी नही होता अब यही सब भ्रष्ट राजनीतिक प्रसाद भारतीय मिलजुलकर खा रहे हैं और जब तक निस्वार्थ राष्ट्रवाद सत्ता पर आसीन नही होगा तब तक राजनीति राष्ट्रनीति में परिवर्तित नही हो सकता और यह परिवर्तन फ़िलहाल तो होता दिखता नही क्योंकि सरकारें बदलती हैं सिस्टम नही बदलता। खादी पहनने वाले कुर्सियां कुर्सियां और दल तो बदल लेते हैं लेकिन इनकी मानसिकता नही बदलती ?