Thursday, September 25, 2014

प्लास्टिक प्रदूषण !

प्लास्टिक एक विदेशी दिमाग की उपज है जिसे सन् 1862 मे अलेक्जेंडर पार्कीस ने लंदन मे एक महान अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया था। प्लास्टिक से बनी हुयी वस्तुएं आज हमारे जीवन के लिए इतनी घातक हो जाएँगी ये किसी ने नहीं सोचा होगा। हमारे देश में पहले लोग सोने चाँदी के वर्तनों मे खाना खाते थे। मगर जैसे-जैसे समय बदला वैसे-वैसे हमारी जरूरतें बदलती गई। मगर आज प्लास्टिक ने हमारे जीवन में ऐसा आतंक मचाया है की इसके प्रभाव से पूरा मानव जीवन तहस-नहस हो गया है। आज प्लास्टिक के वर्तनों में खाने से सैकड़ों प्रकार के हानिकारक है विमारियां हो रही हैं। इन विमारियां का इलाज भी संभव नहीं है। डिस्पोजल प्लास्टिक के बस्तुओं में प्रमुख रूप से चम्मच, कप, प्लेट ,गिलास, कटोरी, शराब और पानी की बोतलें आदि शामिल हैं जो सबसे खतरनाक है।

प्लास्टिक कैरी बैग मानव जीवन के लिए बड़ा खतरा बन गया है। इसके बढ़ते प्रयोग की कोई ठोस व्यवस्था नहीं होने से यह पर्यावरण के लिए खतरे की घंटी है। एक छोटे से छोटे शहर में पांच से सात क्विंटल कैरी बैगों की बिक्री होती है। प्रदूषण का सिलसिला तब आरंभ होता है जब काम में आने के बाद इन कैरी बैगों को कचरे के रूप में जहां-तहां फेक दिया जाता है। बायोडिग्रेडेवल नहीं होने के कारण प्लास्टिक कैरी बैग कभी सड़ता या गलता नहीं है और पर्यावरण के लिए खतरा बन जाता है।

क्या कहते हैं पर्यावरणविद्

पर्यावरणविद् और वनस्पति शास्त्र के वरिष्ठ शिक्षक अरविंद ठाकुर के अनुसार खेत-खलिहानों में लगे फसलों के प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में भी कैरी बैग बाधा उत्पन्न करते हैं। अधिकतर प्लास्टिक दिल्ली एवं पश्चिम बंगाल से मंगाये जाते हैं जहां इसका व्यवहार पूरी तरह निषिद्ध है। हालांकि इन बैगों पर 40 माइक्रान अंकित रहते हैं लेकिन वे 20 या इससे भी कम माइक्रान के होते हैं। जिनका रिसाइक्लीन आर्थिक रूप से फायदेमंद नहीं होने के कारण ये सड़क नदी नाले एवं खेत खलिहानों में यूं ही पड़े रहकर पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। ऐसे गैर मानक प्लास्टिक बैगों के व्यवहार पर अंकुश लगाने हेतु प्रशासन की ओर से कोई पहल नहीं की जाती है। ना ही कोई गैर सरकारी संगठन इस दिशा में जागरूकता लाने के लिए प्रयासरत है।

प्लास्टिक उपयोग की वैश्विक स्थिति

वैश्विक रूप से प्रत्येक वर्ष लगभग 500 अरब प्लास्टिक बैगों का उपयोग होता है। वल्र्ड वाच इंस्टीट्यूट के अनुमान के अनुसार इसमें से लगभग 100 अरब प्लास्टिक बैग अकेले अमेरिका में उपयोग होते है। भारत में औसतन प्रत्येक व्यक्ति 3 कि.ग्रा. प्लास्टिक का उपयोग करता है। यूरोपीयन व्यक्ति इस सन्दर्भ में 60 कि.ग्रा. तथा अमेरिकन व्यक्ति 80 कि.ग्रा. प्रत्येक वर्ष प्लास्टिक का उपयोग  करता है। भारत में प्रति व्यक्ति उपयोग की मात्रा कम है परन्तु भारत की अधिक जनसंख्या तथा डिस्पोज करने की आदतों के फलस्वरूप यह स्वास्थ्य संबंधी समस्या बना हुआ है। भारत में बैगलुरू में अकेले लगभग 40 टन प्लास्टिक प्रति दिन अपशिष्ठ होता है। वर्षा के समय देष में नालियों के अवरूद्व होने का यह भी एक प्रमुख कारण है। वर्ष 1975 में किये गये एक अध्ययन में पाया गया था कि सागरों की ओर जाने वाली नदियों द्वारा लगभग 8 लाख पाउण्ड का प्लास्टिक वार्षिक रूप से फेंक दिया जाता है इसीलिये यह विश्व में भूमि पर अतिरिक्त रूप में नहीं दिखता है ।

प्लास्टिक का पर्यावरण पर प्रभाव

एक अनुमान के मुताबिक हर साल धरती पर 500 बिलियन से ज्यादा पालीथिन बैग्स इस्तेमाल में लाए जाते हैं। बांग्लादेश में वर्ष 2002 में पाॅलीथिन बैग्स को इसलिए प्रतिबंधित करना पड़ा था क्योंकि 1988 और 1998 में वहां कई इलाकों में बाढ़ आने की वजह तक बन गया था। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी निदेशक एसएस नेगी के मुताबिक पालीथिन बैग्स शहरों और कस्बों की नालियों के अलावा नदी-नालों में फंस जाते हैं और इससे लोगों के लिए पेयजल आपूर्ति भी प्रदूषित हो जाती है जोकि कई गंभीर बीमारियों की वजह बनती है। प्लास्टिक के लिफाफों से फैली गंदगी से पीलिया, डायरिया, हैजा, आंत्रशोथ जैसी बीमारियां फैलने की आशंका बनी रहती है। कुछ लोग पालीथिन को जला देते हैं, ऐसा करने से वायु प्रदूषण होता है और विषैली गैसें वायुमंडल में मिल जाती हैं।

बड़ी-बड़ी कंपनियों के 85 फीसदी से अधिक उत्पाद प्लास्टिक पैकिंग में ही आ रहे हैं। इन कंपनियों के मालिकों का सरकार और सरकारी अधिकारियों से मीली भगत की वजह से इस पर रोक नहीं लग पा रही है। प्लास्टिसाइजर अल्प अस्थिर प्रकृति का जैविक कार्बनिक एस्सटर (अम्ल और अल्कोहल से बना घोल) होता है। वे द्रवों की भांति निथार कर खाद्य पदार्थों में घुस सकते हैं। ये कैंसर पैदा करने की संभावना से युक्त होते हैं। एंटी आक्सीडेंट और स्टैबिलाइजर अकार्बनिक और कार्बनिक रसायन होते हैं जो निर्माण प्रक्रिया के दौरान तापीय विघटन से रक्षा करते हैं। कैडमियम और जस्ता जैसी विषैली धातुओं का इस्तेमाल जब प्लास्टिक थैलों के निर्माण में किया जाता है, वे निथार कर खाद्य पदार्थों को विषाक्त बना देती हैं। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में कैडमियम के इस्तेमाल से उल्टियां हो सकती हैं और हृदय का आकार बढ सकता है। लम्बे समय तक जस्ता के इस्तेमाल से मस्तिष्क के ऊतकों का क्षरण होकर नुकसान पहुंचता है।

शराब को जहरीला बनाता है प्लास्टिक

गोवा में बनने वाली विशिष्ट किस्म की शराब फेनी को यदि प्लास्टिक जार में भंडार कर रखा जाता है, तो इससे यह स्प्रिट धीरे-धीरे ‘कैंसरजनक’ हो जाती है जिससे कैंसर हो सकता है। विशेषज्ञों ने यह चेतावनी दी है। काजू व नारियल के स्वाद में उत्पादित फेनी गोवा में काफी लोकप्रिय है। फेनी के भंडारण के लिए प्लास्टिक के कंटेनरों का इस्तेमाल किया जाता है और यह शराब प्लास्टिक की बोतल या जार में बेची जाती है। आनकोलोजिस्ट डॉ सुरेश शेयते के अनुसार, पीवीसी जार में रखी फेनी को पीने से मुख या रक्त कैंसर होने का खतरा है।

नन्हें मुन्नों को प्लास्टिक की बोतल में दूध पिलाने से कैंसर


अगर आप अपने नन्हें मुन्नों को प्लास्टिक की बोतल से दूध पिलाते हैं तो सावधान हो जाएं। प्लास्टिक की बोतल में रासायनिक द्रव्य की कोटिंग होती है। बोतल में गर्म दूध डालने पर यह रसायन दूध में मिलकर बच्चे के शरीर में पहुंचकर नुकसान पहुंचाता है। दूध की बोतल के अलावा शराब, कोल्ड ड्रिंक्स, और पैक्ड फूड को नमी से बचाने के लिए कई कंपनियां प्लास्टिक में इसी की खतरनाक रासायनिक कोटिंग करती हैं। रासायन शरीर में पहुंचने पर हार्ट, गुर्दे, लीवर और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है। हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज के  फिजियोलाजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ जयंती पंत ने ये जानकारी दी।

देशी कुड़े में दश फिसदी सिर्फ प्लास्टिक

हमारे देश के शहरों के कूड़े में 10 प्रतिशत प्लास्टिक की वस्तुएं पाई जाती है। पूरे  विश्व के 10 प्रतिशत डिस्पोजेबल प्लास्टिक का उपयोग भारत में होता है। 2001-02 में भारत में प्लास्टिक की मांग 4.3 मिलटन थी जो अब ये बढ़ कर 6.94 हो गया है। दिल्ली प्लास्टिक थैलियां (विनिर्माण, बिक्री एवं प्रयोग) तथा गैर-जैव अवक्रमित कचरा-करकट (नियंत्र) अधिनियम 2001 लागू है। 20 माइक्रान से कम मोटाई की प्लास्टिक या पालीथिन की थैलियों का उत्पादन दिल्ली में नहीं किया जा सकता। उपरोक्त अधिनियमों का उल्लंघन करने पर 3 महीने से एक वर्ष की कैद अथवा 25,000 रूपये तक का जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है।

प्लास्टिक के बर्तन में गर्म खाना पुरुषत्व के लिए खतरा


प्लास्टिक के बर्तन में गर्म खाना रखने से पीएफओए ज्यादा खतरनाक असर छोड़ता है। इससे खाद्य पदार्थों में लेड नामक रसायन का जहर फैल सकता है। फार्मेलडिहाइड रसायन का शरीर के भीतर जाने से ये किडनी में स्टोन, उलटी और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकते हैं। नेवा सेंटर में मेडिसिन डिपार्टमेंट के डॉ. डी. के. अनुसार प्लास्टिक के गिलास में चाय या कॉफ़ी का स्वाद लेना पुरुषत्व के लिए खतरनाक है, क्योंकि इस संबंध में किए गए रिसर्च बताते हैं कि इनसेफर्टिलिटी यानी मेल्स की जनन की क्षमता कम हो जाती है।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि प्लास्टिक के कप और बोतल में बिस्फिनाल-ए और डाईइथाइल हेक्सिल फैलेट जैसे केमिकल्स पाए जाते हैं जो कैंसर, अल्सर और स्किन रोगों का कारण बन रहे हैं। अब तो यह भी खुलासा हुआ है कि प्लास्टिक के बोतल में दवा भी सेफ नहीं है। गर्म खाने से प्लास्टिक या कॉफ़ी  के जरिए बॉडी में आकर बीमारियां फैलाते हैं। उन्होंने बताया कि  बिस्फिनाल-एडाउनसिंड्रोम और मानसिक विकलांगता को जन्म देताहै। एक हफ्ते प्लास्टिक की बोतल का यूज से उस सेटाक्सिक एलिमेंट आने लगता है, वहीं धूप में गर्म होने से भी ऐसा तुरंत होने लगता के कपया थाली में मौजूद केमिकल्स टूटते हैं और चाय है। इस लिए बेहतर तो यह होगा कि प्लास्टिक की बोतल का यूज ही नकरें।

प्लास्टिक के खिलौनों में जहर


बच्चों को प्लास्टिक के खिलौना देने वाले मां बाप हो जाएं सावधान। रिसर्च में जो तथ्य निकल कर सामने आएं हैं वह बेहद हीं चैकाने वाले हैं। खिलौनों में जिन रंगों का इस्तेमाल किया जाता है वे बच्चों के लिए बेहद हानिकारिक हैं। खिलौनों में आर्सेनिक और सीसे का भी इस्तेमाल होता है जिसमे जहरीले तत्व मिले होते हैं। इन्हें मुंह में डालने पर बच्चों को गंभिर बीमारियां हो रही है। साथ हीं खुशबू के लिए डाले जाने वाले पदार्थों और जस्ते से से एलर्जी भी हो रही है। रंगों में कई ऐसे रासायन मौजूद होते हैं जिनसे कैंसर का खतरा हो सकता है। साथ ही भविष्य में प्रजनन में भी परेशानी आ सकता है।

स्वास्थ्य के लिए घातक है पॉलिथीन


पॉलिथीन कचरे से देश में प्रतिवर्ष लाखों पशु-पक्षी मौत का कारण बन रहे हैं। लोगों में तरह-तरह की बीमारियां फैल रही हैं, जमीन की उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही है तथा भूगर्भीय जलस्रोत दूषित हो रहे हैं। प्लास्टिक के ज्यादा संपर्क में रहने से लोगों के खून में थेलेट्स की मात्रा बढ़ जाती है। इससे गर्भवती महिलाओं के गर्भ में पल रहे शिशु का विकास रुक जाता है और प्रजनन अंगों को नुकसान पहुंचता है। महाराजा अग्रसेन अस्पताल के सीईओ डॉ  एमएस गुप्ता ने कहा है कि प्लास्टिक उत्पादों में प्रयोग होने वाला बिस्फेनाल रसायन शरीर में डायबिटीज व लिवर एंजाइम को असामान्य कर देता है। महाराजा अग्रसेन अस्पताल के सीईओ डॉएमएस गुप्ता का कहना है कि पालीथीन कचरा जलाने से कार्बन डाईआक्साइड, कार्बन मोनोआक्साइड एवं डाईआक्सीन्स जैसी विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं। इनसे सांस, त्वचा आदि की बीमारियां होने की आशंका बढ़ जाती है।

सीवर जाम का सबसे बड़ा कारण पॉलिथीन

सीवर जाम का सबसे बड़ा कारण प्लास्टक है। दिल्ली नगर नीगम में अधिशासी अभियंता अनिल त्यागी कहते हैं कि पालीथीन सीवर जाम का सबसे बड़ा कारण है। यह नालियों से होता हुआ सीवर में जाकर जमा हो जाता है, जिससे गंदे पानी का बहाव बाधित होता है। पिछले वर्ष रोहिणी और सिविल लाइंस जोन में नगर निगम को सीवर जाम की 278 शिकायतें मिलीं। इनकी सफाई के दौरान ज्यादातर सीवर में भारी मात्रा में प्लास्टिक कचरा फंसा हुआ पाया गया। गौरतलब है कि दिल्ली के सिर्फ एक डिवीजन में सीवर की सफाई पर 20 से 25 लाख प्रतिवर्ष का खर्च आता है।

पर्यावरण चक्र को अवरुद्ध करता है प्लास्टिक

नेशनल फिजिकल लैबोरेट्री के वैज्ञानिक विक्रम सोनी के अनुसार प्लास्टिक पर्यावरण चक्र को रोक देता है। प्लास्टिक कचरे के जमीन में दबने की वजह से वर्षा जल का भूमि में संचरण नहीं हो पाता। परिणाम स्वरूप भूजल स्तर गिरने लगता है। प्लास्टिक कचरा प्राकृतिक चक्र में नहीं जा पाता, जिससे पूरा पर्यावरण चक्र अवरुद्ध हो जाता है। पालीथीन पेट्रो-केमिकल उत्पाद है, जिसमें हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल होता है।