Sunday, June 29, 2014

हिंदी भाषी छात्रों के साथ भेद-भाव क्यों ?

देश में एक बार फिर से हिंदी बनाम अंग्रेजी कि लड़ाई जोरों पर है। विषय है संघ लोक सेवा आयोग कि परीक्षा में हिंदी भाषा की उपेक्षा का। बात सिर्फ संघ लोक सेवा आयोग तक ही सीमित नहीं है, मैं 29 जून 2014 को खुद विश्व विधालय अनुदान आयोग कि "राष्ट्रीय योग्यता परीक्षा" देकर आया हूँ। प्रश्न पत्र में अग्रेजी के शब्दों का जो हिंदी अनुवाद होना चाहिए वह विल्कुल नहीं था।
भाषा के सवाल को लेकर एक बार फ़िर वही घमासान दिखाई देने लगा है जो कभी साठ के दशक मे दिखाई दिया था। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि अंग्रेजों की गुलामी  से मुक्त होने के बाद जब जब अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को सम्मान व गौरव देने की बात उठाई गई, तब-तब इस देश मे भाषाई राजनीति शुरू हो गई। विरोध के इन स्वरों का केन्द्र हमेशा दक्षिण भारत ही रहा है । आज भी तमिल राजनीति इसके विरोध मे खडी दिखाई दे रही है। इस राज्य की पहल पर फ़िर अन्य भाषाई राज्यों मे भी हिंदी के विरोध की सुगबुगाहट शुरू हो जाती है। तमिल, मलयालम, मराठी, गुजराती व अन्य भाषाओं को लगने लगता है कि उनका वज़ूद खतरे में पड़ रहा है या उन्हें दूसरे दर्जे का स्थान देने का प्रयास किया जा रहा है।
यहां गौरतलब यह भी है कि विरोध का ये शोर कहीं से भी तार्किक प्रतीत नहीं होता। केन्द्र सरकार द्वारा जारी परिपत्र को अगर गंभीरता व ध्यान से, पूर्वाग़ृहों से मुक्त हो कर पढ़ा जाये तो उसमें हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास करने की बात तो कही गई है परन्तु ऐसा कुछ नहीं है कि अन्य भाषाओं को बलपूर्वक पीछे धकेला जा रहा हो। ऐसे मे यह एक अनावश्यक विवाद ही जान पड़ता है। लोकतंत्र में भाषा के नाम पर अपनी क्षेत्रीय राजनीति चमकाने व अपने वोट बैंक को मजबूत करने का इससे अच्छा उदाहरण दूसरा नहीं मिल सकता।
एक तरफ हम देश के विकास की बात करते हैं और प्रत्येक क्षेत्र में अपने स्वयं के साधनों द्वारा और अपने प्रयासों से ही आगे बढ़ने की वकालत करते हैं। अपनी ‘पूरब की संस्कृति‘ धर्म, अध्यात्म व संस्कारों का बखान करते हुए यूरोपीय देशों को कमतर आंकते हैं परन्तु जब बात हिन्दुस्तान में हिंदी की आती है तो सारा राष्ट्रीय प्रेम उड़न छू होता दिखाई देने लगता है। और फिर भाषा को लेकर सभी अपनी-अपनी ढपली बजाने लगते हैं। यह कैसा देश प्रेम है, समझ से परे है।
यहां यह स्मरण करना भी जरूरी है कि यदि हम गांधी के सपनों का भारत बनाने का संकल्प बार-बार दोहराते हैं तो हमे भाषा के सवाल पर भी उनके विचारों को समझना होगा। 29 मार्च 1918 को इंदौर में हिंदी साहित्य सम्मेलन के आठवें अधिवेशन मे गांधी जी ने कहा था "भाषा हमारी मां की तरह है। पर हमारे अंदर मां के लिए जितना प्यार है उतना इसके लिए नहीं। दर-असल इस तरह के सम्मेलनों मे मुझे कुछ खास दिलचस्पी नहीं है। तीन दिन का यह तमाशा कर लेने के बाद हम अपनी-अपनी जगह वापस चले जायेंगे और यहां जो कुछ कहा और सुना गया है, सब भूल जायेंगे। जरूरत तो काम करने की, लगन और निश्चय की है। 
गौर करें यह बातें आज भी उतनी ही प्रांसगिक हैं जितनी उस समय थी। हिंदी के शुभचिंतक कहे जाने वाले कितने ही आज भी सम्मेल्नों व जलसों तक हिंदी को कैद रखे हुए हैं। गांधी जी ने हिंदी की वकालत की तो इसके पीछे उनकी अपनी विचारधारा थी। वे देश की, यहां के नागरिकों की जरूरत समझते थे। आज की तरह नहीं कि हिंदी भाषी इसलिए इसका समर्थन करता है क्योंकि वह हिंदी बोलता है। तमिल या कोई दूसरा इसलिए विरोध करता है क्योंकि वह हिंदी नहीं बोलता। अंग्रेजी बोलने वाला इसलिए विरोध करता है क्योंकि वह अंग्रेजी ही बोलता-लिखता है।
कलकत्ता (कोलकता) में 23 जनवरी,1929 में दिये गए भाषण मे गांधी जी ने कहा था “आपको और मुझको और हममें से किसी को भी, सच्ची शिक्षा नहीं मिलने पाई जो हमें अपने राष्ट्रीय विधायलयों में मिलनी चाहिए थी।  बंगाल के नौजवानों के लिए, गुजरात के नौजवानों के लिए, दक्षिण के नौजवानों के लिए यह संभव ही नहीं है कि वह मध्यप्रदेश में जा सकें, सयुंक्त प्रांत में जा सकें जो सिर्फ हिन्दुस्तानी ही बोलते हैं। इसलिए मैं आपसे कहता हूं कि अपने फुरसत के घंटों में आप हिन्दुस्तानी सीखा करें। अगर आप सीखना शुरू कर दें तो दो महीने में सीख लेगें।  उसके बाद आपको पूरी छूट है अपने गांवों में जाने की, पूरी छूट है सिर्फ एक मद्रास को छोड़ बाकी सारे भारत में खुल कर विचरने की और हर जगह के आम लोगों से अपनी बात कह सकने की।  यह तो एक क्षण के लिए भी आप न समझ बैठें कि आम जनता तक अपनी बात पहुंचाने की आम भाषा के रूप में आप अंग्रेजी का इस्तेमाल कर पाएंगे।
आज हमें यह सोचना है कि हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के पक्ष में दिए गए यह तर्क क्या प्रासंगिक नहीं हैं? क्या यह सच नहीं है कि देश के एक बड़े हिस्से में आज भी हिंदी ही बोली जाती है।  अंग्रेजी की तरह अन्य प्रान्तीय भाषाओं का भी विरोध गांधी जी ने कभी नहीं किया बल्कि वे दक्षिण की सभी भाषाओं को संस्कृत की ही बेटियां मानते थे।  उनका मानना था कि इन्हें भी फलने-फूलने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। परन्तु सभी लोगों की संपर्क भाषा हिंदी हो इसका प्रयास वे हमेशा करते रहे। 
अब इसे इस देश का दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहा जाए कि गांधी के सपनों का भारत बनाने की वकालत करने वाले हिंदी के नाम पर एक अलग ही सुर अलापने लगते हैं।  क्या यह सच नहीं कि राष्ट्रभाषा के रूप मे हिंदी की जो कल्पना गांधी जी ने की थी, उससे अभी हम कोसों दूर हैं बल्कि अंग्रेजी व प्रान्तीय भाषाओं को लेकर आज भी उलझे हुए हैं।
दर-असल अब हिंदी के नाम पर राजनीति की जाने लगी है। मौजूदा विरोध का एकमात्र कारण भी यही है। अन्यथा इस तथ्य से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि एक संपर्क भाषा के रूप में हिंदी ही इस देश में अधिक प्रभावी है।  हमें इस बात को भी स्वीकार करना ही होगा कि यह देश सिर्फ अपनी ही भाषा और संस्कृति के बल पर ही आगे बढ़ सकता है। साथ ही अगर हम गांधी जी के सपनों के भारत की बात करते हैं तो हमें भाषा के सवाल पर भी उनके विचारों को पूरा करना ही होगा। राजनैतिक फायदों के लिए अनावश्यक भाषाई विवाद इस देश के हित में तो कतई नहीं है।