Sunday, September 29, 2013

अमेरिका के सामने मनमोहन सिंह शरणागत क्यों है ?

भारत और अमेरिका के बीच हुआ ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौता एक बार फिर से सुर्खियों में है। ये परमाणु करार परमाणु दायित्व कानून के कारण अवरुद्ध हो गया था। मगर आज एक बार फिर से ये जिन्न बाहर निकला है। भारतीय परमाणु विद्युत निगम लिमिटेड और वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक कंपनी ने प्रारंभिक व्यावसायिक करार पर हस्ताक्षर किए हैं। इस करार के बाद सवाल खड़ा होता है कि जिसे अमेरिका खुद नहीं करना चाहता है उसे वह भारत पर क्यों थोपना चाहता है। साथ ही हमारे प्रधानमंत्री खुद को अमेरिका के आगे अपने आप को क्यों षरणागत हो रहे है। परमाणु दायित्व कानून हमेशा से ही बिवादों  में रहा है। इसके अंदर जो प्रावधन किए गए है उसमे कई ऐसी खामियां है जहां पर जवाबदेही नगण्य है। अगर कभी भी कोई दुघर्टना होती है तो देष को एक बार फिर से भोपाल गैस कांड से भी बड़ा त्रासदी झेलना पड़ा सकता है। 

अनुच्छेद 17 के मुताबिक परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के लिए मशीनें, ईंधन अथवा तकनीक की आपूर्ति्त करने वाले ’सप्लायर’ द्वारा दिये जाने वाले मुआवजे का तभी प्रावधान है, जब ’ऑपरेटर’ और ’सप्लायर’ के बीच उस खास संयंत्र को लेकर हुए इकरारनामे में इस बात का जिक्र हो। जाहिर है, ऐसे में सभी विदेशी ’सप्लायर’ इस बिल की जद से बाहर हैं और ’ऑपरेटर’ से अपने अनुबंधों में वे मुआवजे से मुक्त रहना पसंद करेंगे। साथ ही, ’सप्लायर’ की मुआवजा राशि ’ऑपरेटर’ से कम ही होगी। इस प्रकार, विदेशी या देशी ’सप्लायर’ उस 500 करोड़ रुपये के प्रति भी जवाबदेह नहीं हैं, जिस पर पूरी बहस चल रही है।

नियमों कि अनदेखी कर अमेरिका के दबाव में किए जा रहे ये करार भोपाल गैस कांड से कई गुना बड़े विध्वंसों को न्यौता दे सकता है। सिर्फ अमेरिकी कंपनियों को नहीं बल्कि हाल में भारत से परमाणु समझौता करने वाली फ्रांसीसी, कनैडियन और रूसी कंपनियों और देषी औद्योगिक घरानों को भी इस बिल में संयंत्रों की सुरक्षा व्यवस्था की अनदेखी करने की पूरी छूट है और दुर्घटना की स्थिति में यह गारंटी है कि मुआवजा कंपनियां नहीं बल्कि सरकार के पैसे से दिया जाएगा, यानी कि खुद जनता का पैसा से जनता को मुआवजा और विदेशी कंपनियों कि बल्ले बल्ले। 

परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा उत्पादन का अकेला ऐसा तरीका है जिसमें विकिरण के जरिए व्यापक स्तर पर विनाश पैदा करने की क्षमता होती है। इसका घातक असर लंबे समय तक वातावरण में बना रहता है। दिल्ली के एक कबाड़ बाजार में हुए कोबाल्ट-60 विकिरण हादसे से यह बात उजागर भी हो चुकी है कि इससे होने वाले हादसा कितना घातक है। 1986 में युक्रेन में हुए चेर्नोबिल हादसे को याद कर पूरी दुनिया सहम जाती है। जहां परमाणु संयंत्र में हुए रेडियोएक्टिव रिसाव में 65,000 लोग विकिरणजनित कैंसर की भेंट चढ़ गए थे और 350 अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान हुआ था।

सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में कहा था एक बार कोई गतिविधि, जिससे जोखिम जुड़ा हो, शुरू होने के बाद इसे शुरू करने वाला व्यक्ति ही इसके अच्छे या बुरे के लिए जिम्मेदार होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने जरूरी उपाय कर रखे थे या नहीं। मगर आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को न तो इस देश कि सर्वोच अदालत कि चींता है और न ही उनके सरकार द्वारा बनाए गए परमाणु दायित्व कानून कि। अमेरिका जो कभी दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा देश हुआ करता था उसने अपने यहां 1973 के बाद से एक भी नए संयंत्र की इजाजत नहीं दी है। मगर आज मनमोहन सिह खुद अमेरिका के दबाव में भारत के उपर ये बिनाशकारी करार थोप रहे है। तो सवाल खड़ा होता है कि अमेरिका के सामने मनमोहन सिंह शरणागत क्यों है ?

मजा के लिए गाँधी और सज़ा के लिए मनमोहन कितना सही ?

गीत राहुल का गाता हूं... जी हां, इस वक्त कांग्रेस में हर कोई राहुल गांधी के गीत गा रहा है। पार्टी का छोटा कार्यकर्ता हो या बड़ा नेता, हर कोई बस कांग्रेस उपाध्यक्ष का गुणगान कर रहा है। आज बात चाहे दागी सांसदों और विधायकों पर यूपीए सरकार के अध्यादेश को बकवास बताकर फाड़ कर फेक देने की हो, या फिर हाल ही में हुए कर्नाटक में जीत का जष्न। अगर कही जयजयकार सुनाई दी तो सिर्फ राहुल और सोनिया गांधी कि। हर बार मौके पे चैका मारने का श्रेय सिर्फ गाधी परिवार के सदस्यों को ही दिया जाता है। जीत चाहे बड़ी हो या छोटी हर बार के्रडीट लेने और बधाई देने के हकदार सोनिया और राहुल गांधी को ही बनाय जाता है। तो सवाल भी खड़ा होता है कि सज़ा के लिए मनमोहन और मजा के राहुल गांधी कि वाह वाही क्या वाकई उचित है?

भले ही कांग्रेस ने सबसे बड़े सियासी ओहदे पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बिठाया हो मगर वो भी राहुल के नाम के आगे नतमस्तक होते नज़र आ रहे है। कांग्रेज के नेताओं में गांधी परिवार के प्रति कितनी भक्ति है इसे इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब कर्नाटक में कांग्रेस को जीत मिली थी, तो सिद्दारमैया ने मनमोहन सिह को थैंक्स टू सोनिया गांधी, राहुल गांधी, के साथ मनमोहन गांधी कह कर धन्यवाद दिया था। यानी गलती से अगर मनमोहन सिंह के नाम जुबां पे आ गया तो उन्हें भी गांधी बता दिया गया।

जब संसद में कोई बिल पास होता है तो उसका श्रेय पूरे सदन को जाता है मगर यहा पर सिधे सिधे राहुल गांधी को पूरा श्रेय दिया जाता है। राहुल गांध यूपी के भट्टा पारसौल में नाटकीय ढंग से किसानों के बिच जाते है उसके कुछ समय बाद भूमी अधिग्रहण बिल पर कैबिनेट कि मंजूरी मिल जाती है। जब ये बिल संसद में पास हो जाता है तो इसका भी श्रेय भी राहुल गाँधी को ही दिया जाता है।  एक ओर देश में राहुल न्याय और सुशासन के जरिये जिस अलोकतांत्रिक व्यवस्था का सवाल उठा रहे हैं, वह मनमोहन की राजनीति का ही किया-धरा है। कह सकते है, पैसे से पैसा बनाने के मनमोहन कि एकोनोमिक्स के सामानांतर राहुल की रोजी रोटी की इमानदारी को कुछ इस तरीके से खड़ा किया गया है, जो बीस साल के फार्मूले को तोड़ सकती है। जहा पर मनमोहन बिलेन हो जाएंगे और राहुल गांधी हिरों। तो सवाल यहा भी खड़ा कि क्या इस बार कांग्रेस पार्टी कि चुनावी रणनीति बिलेन बनाम हिरों कि होगी या फिर मोदी बनाम राहुल कि।

जिस वक्त छत्तीसगढ़ में नक्सली हमला हुआ था उस वक्त राहुल गांधी ने बीके हरिप्रसाद से यह बयान दिलाया कि छत्तीसगढ़ का नक्सली हमला राजीव गांधी की हत्या जैसी घटना है। यानी अगर कोई बड़ा नेता भी मरे तो उसका नाम किसी अन्य कांग्रेसी नेता के साथ न जोड़ कर उसे भी गांधी नेहरू के नाम के साथ ही जोड़ दिया जाता है। तो सवाल यहा भी खड़ा होता है कि क्या लोकतंत्र है या कांग्रेस का राजतंत्र? जहां जीत पर भी जयजयकार और मौत पर भी जयजयकार।

मगर पीछले कुछ महिने से राहुल गांधी को ऐसे खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा है जो स्वयं गेंद डालता है फिर भाग कर उसी बॉल को खेलता है और वापस आकर आउट होने की अपील भी करता है। मगर यहा पर मनमोहन सिंह को बिकेट के रूप में खड़ा कर के उस मौके का इंतजार किया जा रहा जब तक कि खुद जनता रेफरी कि भूमिका में आकर इस खिलाड़ी को विजेता न घोसित कर दे। या फिर इस सह मात के सियासी खले में मैच में अंत ड्रा न हो जाय। जहां पे मनमाहेन को बिलेन और राहुल को हिरो घोसित किया जाएगा। तो सवाल खड़ा होता है कि सज़ा के लिए मनमोहन और मजा के लिए गांधी कितना सही?

परमाणु दायित्व कानून से खिलवाड़ !

केंद्र की यूपीए सरकार देश की सुरक्षा के साथ किस तरह खिलवाड़ करती है परमाणु दायित्व कानून पर उसके लचर रुख से स्वत: स्पष्ट हो जाता है। अगर यह सच है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अमेरिकी दौरे में अमेरिका के साथ परमाणु करार तय भारतीय कानून के अनुरुप नहीं होगा तो यह देश की सुरक्षा और गरिमा के साथ खिलवाड़ होगा। हालांकि सरकार भरोसा दे रही है कि वह संसद में पारित परमाणु दायित्व कानून से इतर कोर्इ समझौता नहीं करेगी। लेकिन परमाणु दायित्व कानून की धारा 17 पर जिस तरह अटार्नी जनरल जीर्इ वाहनवती ने अपना एकांगी दृष्टिकोण पेश कर सरकार की मंशा जाहिर की है उससे साफ हो जाता है कि सरकार परमाणु तकनीकी प्रदान करने वाली अमेरिकी कंपनियों को रियायत देने का मन बना ली है। अगर सरकार इस दिशा में आगे बढ़ती है तो फिर ये अमेरिकी कंपनियां परमाणु जिम्मेदारी वाले उस कानून के दायरे मुक्त होंगी जो उन्हें दुर्घटना की स्थिति में दंड का भागीदार बनाता है और मुआवजा देने को बाध्य करता है। 

परमाणु दायित्व कानून की धारा 17 में स्पष्ट उल्लेख है कि परमाणु बिजली घरों में लगाए गए रिएक्टरों में अगर खराबी के कारण दुर्घटना होती है तो इसके लिए सप्लायर कंपनियां जिम्मेदार होंगी। वेसिटंगहाउस और जीइ जैसी अमेरिकी कंपनियां इस कानून के खिलाफ मोर्चा खोल रखी हैं। दरअसल उन्हें लग रहा है कि इस कानून के चलते उनके उत्पादों के बीमा का खर्चा बढ़ जाएगा और वे मनमाफिक मुनाफा हासिल नहीं कर सकेंगी। वेसिटंगहाउस कंपनी जो गुजरात के मिठीविर्दी में 1000 मेगावाट के 6 परमाणु बिजलीघर लगाने की योजना पर काम कर रही है वह चाहती है कि अंतिम समझौता से पहले भारतीय संसद में पारित परमाणु दायित्व कानून उस पर न थोपा जाए। गौरतलब है कि इस नाभिकीय संयंत्र के लिए भारत को 1 करोड़ 51 लाख 60 हजार डालर खर्च करने होंगे। चूंकि सितंबर के अंतिम सप्ताह में वॉशिंगटन में मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की मुलाकात तय है इससे पहले अमेरिका चाहता है कि भारत परमाणु दायित्व कानून की धारा 17 पर ढिलार्इ बरते। 

वह अपनी कंपनियों के हितों को ध्यान में रख पहले भी राग अलाप चुका है कि परमाणु रिएक्टर बेचने की दिशा में सिविल न्यूकिलयर लायबिलिटी कानून अवरोध है। गौरतलब है कि 2008 में हुए भारत-अमेरिका नाभिकीय सहयोग समझौते के बाद अभी तक दोनों देशो के बीच खरीद का सौदा नहीं हो सका है। दरअसल अमेरिकी कंपनियां 2010 में भारत की संसद में पारित नाभिकीय उत्तरदायित्व कानून से डर रही हैं। यह कानून विदेशी आपूर्तिकर्ता की जवाबदेही तय करता है। अमेरिका से परमाणु करार के दौरान यूपीए सरकार ने दावा किया था कि इस समझौते से भारत की उर्जा जरुरतें पूरी होंगी। लेकिन सच्चार्इ है कि पांच साल बाद भी भारत के कर्इ परमाणु आवश्यक उर्जा तथा नवीन टेक्नालाजी की अनुपलब्धता के चलते बंद पड़े हैं। अब जब सरकार के कार्यकाल के गिने-चुने दिन रह गए हैं ऐसे में परमाणु करार पर उसकी हड़बड़ी कर्इ तरह का सवाल खड़ा करती है। समझ से परे है कि वे कौन से कारण हैं जिसकी वजह से वह अमेरिका के आगे बिछी जा रही है। सरकार को देश को बताना चाहिए कि वह अमेरिकी कंपनियों को उन्हीं की शर्तो पर नाभिकीय रिएक्टर लगाने की छूट क्यों देना चाहती है?

 देश को इससे क्या लाभ होगा? अगर सरकार की मंशा साफ है तो फिर वेसिटंगहाउस कंपनी को भारतीय कानून के दायरे से बाहर रखने के लिए कैबिनेट मसौदा तैयार क्यों किया गया? इस मसौदे में यह प्रावधान क्यों रखा गया कि परमाणु बिजलीघर चलाने वाली भारतीय कंपनी नाभिकीय उर्जा निगम (एनपीसीआइएल) की इच्छा पर निर्भर करेगा कि वह दुर्घटना की हालत में रिएक्टर सप्लार्इ करने वाली कंपनी पर जिम्मेदारी डाले या नहीं? सवाल यह भी कि इस मसौदे को परमाणु उर्जा आयोग की सलाह के बिना ही तैयार क्यों किया गया? सरकार के पास इन सवालों का कोर्इ स्पष्ट जवाब नहीं है। ऐसे में विपक्ष सरकार पर आरोप मढ़ता है कि वह अमेरिका और उसकी कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए हड़बड़ी दिखा रही है तो यह गलत नहीं है। सवाल सिर्फ अमेरिकी कंपनियों को लाभ पहुंचाने तक ही सीमित नहीं है। सच यह भी है कि इस परियोजना पर अधिक लागत आएगी और बिजली महंगी होगी। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इस महंगी बिजली का खरीददार कौन होगा? यह तथ्य है कि मिठीविर्दी में लगने वाले रिएक्टर पर 1 मेगावाट बिजली के उत्पादन पर तकरीबन 40 करोड़ रुपए खर्च आएगा। 

यानी रिएक्टर की प्रतिवाट कीमत 12 रुपए से अधिक होगी। जबकि दूसरी ओर कुडनकुलम में लगने वाले तीसरे और चौथे रिएक्टरों पर 1 मेगावाट बिजली के उत्पादन पर तकरीबन 22 करोड़ रुपए खर्च आएगा। परमाणु उर्जा विभाग की दलील है कि इसकी लागत और बिजली पैदा करने की कीमत का दूसरे उर्जा स्रोतों से तुलनात्मक अध्ययन होगा और फिर रुस, फ्रांस और अमेरिका के सहयोग से लगने वाले सभी प्रोजेक्टों पर समान रुप से लागू होगा। लेकिन यह दलील संतोषजनक नहीं है। सरकार के रवैए से ऐसा लगता है कि वह मान बैठी है कि इन कंपनियों को रियायत नहीं दी गयी तो वे भारत से मुंह मोड़ लेंगी। लेकिन ऐसा नहीं है। सच यह है कि भारत परमाणु बिजली घरों का विशाल बाजार बन चुका है और कोर्इ भी विदेशी कंपनी खुद को इस बाजार से अलग नहीं रख सकती। रुस और फ्रांस के मैदान में होने से प्रतिद्वंदिता बढ़नी तय है। बेहतर होता कि सरकार इसका अधिकाधिक लाभ उठाती? लेकिन वह आश्चर्यजनक रुप से भारतीय हितों को किनारे रख विदेशी कंपनियों पर मेहरबान दिख रही है। सरकार को समझना होगा कि परमाणु दायित्व कानून की धारा 17 पर झुककर समझौता करने से देश की सुरक्षा प्रभावित होगी। जानमाल के खतरे बढ़ेंगे। दशकों पहले  भोपाल गैस कांड की त्रासदी देश भुगत चुका है। 

हादसे में जान गंवा चुके लोगों के परिजन आज भी मुआवजे से वंचित हैं। 25 साल पहले यूक्रेन में हुए चेरनोबिल न्यूकिलयर विघटन से भी सरकार को सबक लेने की जरुरत है। इस दुर्घटना के बाद यूरोप में एक भी नया परमाणु रिएक्टर नहीं लगा है। पुराने रिएक्टर ही मुसीबत बने हुए हैं। जापान का फुकुशिमा रिएक्टर तबाही के कगार पर है। यह रिएक्टर अमेरिकी डिजायन का है। भारत खुद भी परमाणु दुर्घटना का शिकार हुआ है। 1987 में तमिलनाडु के कलपक्कम रिएक्टर का हादसा, 1989 में तारापुर में रेडियोधर्मी आयोडीन का रिसाव, 1993 के नरौरा के रिएक्टर में आग, 1994 में कैगा रिएक्टर से विकिरण किसी से छिपा नहीं है। उचित होगा कि सरकार परमाणु दायित्व पर हड़बड़ी दिखाने के बजाए स्वदेशी और विदेशी परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा और जवाबदेही पर ध्यान टिकाए। अगर वह विदेशी कंपनियों की जवाबदेही घटाने की दिशा में कदम बढ़ाती है तो इससे देश की सुरक्षा प्रभावित होगी। यह सच है कि भारत के कर्इ परमाणु रिएक्टर आवश्यक उर्जा और नवीन टेक्नालाजी की अनुपलब्धता के चलते बंद पड़े हैं और धीमी गति से काम कर रहे हैं।

 यह भी सही है कि उर्जा जरुरतों की पूर्ति तथा आधुनिक तकनीकी के इस्तेमाल के लिए भारत को अमेरिका तथा अन्य परमाणु आपूर्तिकर्ता देशो के साथ तालमेल रखना जरुरी है। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि सरकार परमाणु रिएक्टर हासिल करने के लिए राश्ट्रीय हितों को ही ताक पर रख दे। परमाणु रिएक्टर उर्जा के एकमात्र स्रोत नहीं हैं। अन्य स्रोतों से भी उर्जा हासिल की जा सकती है। पवन उर्जा में अपार संभावनाएं हैं। मसलन अकेले पवन उर्जा से ही 48500 मेगावाट बिजली बनायी जा सकती है। 

उर्जा मंत्रालय की मानें तो देश में तकरीबन 6000 स्थानों पर लघु पनबिजली परियोजनाएं स्थापित की जा सकती हैं। इसी तरह सौर उर्जा से 5000 खरब यूनिट बिजली पैदा की जा सकती है। लेकिन विडंबना है कि केंद्र की यूपीए सरकार इस दिशा में ठोस पहल करने के बजाए परमाणु रिएक्टरों को ही उर्जा का एकमात्र स्रोत मान इसे हासिल करने के लिए राश्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने और विदेशी कंपनियों को लाभ पहुंचाने से हिचक नहीं रही है। उचित होगा कि सरकार कोर्इ भी समझौता करने से पहले देश की सुरक्षा और असिमता का ख्याल रखे।

भारत-अमेरिका परमाणु करार से जुड़ी कुछ बुनियादी बातें

परमाणु अप्रसार संधि- एनपीटी क्या है?
 
एनपीटी को परमाणु अप्रसार संधि के नाम से जाना जाता है। इसका मकसद दुनिया भर में परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने के साथ-साथ परमाणु परीक्षण पर अंकुश लगाना है। पहली जुलाई 1968 से इस समझौते पर हस्ताक्षर होना शुरू हुआ। अभी इस संधि पह हस्ताक्षर कर चुके देशों की संख्या 189 है। जिसमें पांच के पास आणविक हथियार हैं। ये देश हैं- अमेरिका, ब्रिटेन, प्रफांस, रूस और चीन। सिर्फ चार संप्रभुता संपन्न देश इसके सदस्य नहीं हैं। ये हैं- भारत, इजरायल, पाकिस्तान और उत्तरी कोरिया। एनपीटी के तहत भारत को परमाणु संपन्न देश की मान्यता नहीं दी गई है। जो इसके दोहरे मापदंड को प्रदर्शित करती है। इस संधि का प्रस्ताव आयरलैंड ने रखा था और सबसे पहले हस्ताक्षर करने वाला राष्ट्र है फिनलैंड। इस संधि के तहत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र उसे ही माना गया है जिसने पहली जनवरी 1967 से पहले परमाणु हथियारों का निर्माण और परीक्षण कर लिया हो। इस आधार पर ही भारत को यह दर्जा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं प्राप्त है। क्योंकि भारत ने पहला परमाणु परीक्षण 1974 में किया था।

सीटीबीटी क्या है?

सीटीबीटी को ही व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि कहा जाता है। यह एक ऐसा समझौता है जिसके जरिए परमाणु परीक्षणों को प्रतिबंधित किया गया है। यह संधि 24 सितंबर 1996 को अस्तित्व में आयी। उस वक्त इस पर 71 देशों ने हस्ताक्षर किया था। अब तक इस पर 178 देशों ने दस्तखत कर दिए हैं। भारत और पाकिस्तान ने सीटीबीटी पर अब तक हस्ताक्षर नहीं किया है। इसके तहत परमाणु परीक्षणों को प्रतिबंधित करने के साथ यह प्रावधान भी किया गया है कि सदस्य देश अपने नियंत्रण में आने वाले क्षेत्रें में भी परमाणु परीक्षण को नियंत्रित करेंगे।

123 समझौता क्या है?

यह समझौता अमेरिका के परमाणु ऊर्जा अधिनियम 1954 की धारा 123 के तहत किया गया है। इसलिए इसे 123 समझौता कहते हैं। सत्रह अनुच्छेदों के इस समझौते का पूरा नाम है- भारत सरकार और संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार के बीय नाभिकीय ऊर्जा के शांतिपूर्ण प्रयोग के लिए सहयोग का समझौता। इसके स्वरूप पर भारत और अमेरिका के बीच एक अगस्त 2007 को सहमति हुई। अमेरिका अब तक तकरीबन पच्चीस देशों के साथ यह समझौता कर चुका है। इस समझौते के दस्तावेज में अमेरिका ने भारत को आणविक हथियार संपन्न देश नहीं माना है, बल्कि इसमें यह कहा गया है कि आणविक अप्रसार संधि के लिए अमेरिका ने भारत को विशेष महत्व दिया है।

हाइड एक्ट क्या है?

हाइड एक्ट का पूरा नाम हेनरी जे हाइड संयुक्त राज्य-भारत शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा सहयोग अधिनियम 2006 है। यह अमेरिकी कांग्रेस में एक निजी सदस्य बिल के रूप में पास हुआ है। इसमें भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित परमाणु समझौते से जुड़े नियम एवं शर्तों को समाहित किया गया है। इस समझौते के लिए जब अमेरिका के परमाणु ऊर्जा अधिनियम 1954 की धारा 123 में संशोधन किया गया तब इसका नाम हाइड एक्ट रख दिया गया।

आईएईए क्या है?

इस संस्था का पूरा नाम इंटरनेशनल एटोमिक एनर्जी एजेंसी है। यह नाभिकीय क्षेत्र में सहयोग का अंतरराष्ट्रीय केंद्र है। इसका गठन 1957 में हुआ था। यह संस्था शांतिपूर्ण और सुरक्षित नाभिकीय प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए काम करती है। इस संस्था का मुख्यालय आस्ट्रिया के विएना में है। अभी इसके महानिदेशक मोहम्मद अलबरदेई हैं। इस संस्था के तीन मुख्य काम हैं- सुरक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं सुरक्षा व संपुष्टि।

45 देशों की एनएसजी क्या है?

एनएसजी का पूरा नाम न्यूक्लियर सर्विस ग्रुप है। इसे ही न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप भी कहा जाता है। इस समय इसके सदस्य देशों की संख्या 45 है। यह ऐसा समूह है जो नाभिकीय सामग्री के निर्यात पर दिशानिर्देश लागू करके नाभिकीय हथियारों के अप्रसार में मदद देता है। इसका गठन 1974 में किया गया था। शुरूआत में इसके सदस्यों की संख्या महज सात थी। उस वक्त भारत ने परमाणु परीक्षण किया था। जिसे उस समय नाभिकीय हथियार वाला देश नहीं कहा जाता था। इसका पहला दिशानिर्देश 1978 में आईएईए के दस्तावेज के रूप में तैयार किया गया था। करार के आगे बढ़ने की स्थिति में नाभिकीय सामग्री प्राप्त करने के लिए भारत को इस समूह के पास जाना पडेग़ा।

ईंधन आपूर्ति की शर्तें क्या हैं?

हाइड एक्ट की धारा 104 और 123 समझौते की धारा 2 देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि हाइड एक्ट भारत को नाभिकीय ईंधन मिलने की राह में रोडे अटकाता है। हाइड एक्ट की धारा 104 के मुताबिक परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत हुए भारत के सहयोग के बाबत किसी समझौते और इस शीर्षक के उद्देश्य के तहत किसी करार को लागू होने की स्थिति के बावजूद भारत की नाभिकीय या नाभिकीय ऊर्जा से संबध्द सामग्री, उपकरण्ा या प्रौद्योगिकी का भारत को निर्यात रद्द किया जा सकता है। हमें यूरेनियम की आपूर्ति बाजार भाव पर की जाएगी और इसका दाम भी बाजार की ताकतें ही तय करेंगी। बीते कुछ सालों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरेनियम की कीमत में चार गुना से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है और इसके दाम थमते नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में यूरेनियम की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बना रहना तय है।

परमाणु बिजली घरों से कितनी बिजली बनेगी?

करार समर्थकों का यह दावा कोरा ख्वाब सरीखा ही है कि 2020 तक भारत की नाभिकीय ऊर्जा उत्पादन की क्षमता बीस हजार मेगावाट हो जाएगी। अभी देश में पंद्रह रिएक्टर काम कर रहे हैं। जिनसे 3300 मेगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। देश में कुल ऊर्जा उत्पादन अभी एक लाख चालीस हजार मेगावाट है। जाहिर है कि इसमें परमाणु ऊर्जा का योगदान बहुत कम है। वैसे, 1400 मेगावाट बिजली के उत्पादन के लिए नए रिएक्टर अभी बन रहे हैं। कुडुनकुलम और चेन्नई के रिएक्टर तैयार होने पर परमाणु ऊर्जा से बनने वाली बिजली सात हजार मेगावाट पर पहुंच जाएगी। भारत सरकार के तहत ही काम करने वाला आणविक ऊर्जा विभाग कहता आया है कि देश के पास इतना यूरेनियम है कि अगले तीस साल तक दस हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सके। ऐसे में पहले तो हमें अपनी क्षमता बढ़ानी होगी। ऐसा होते ही परमाणु ऊर्जा के लक्ष्य को पाने के करीब हम पहुंच जाएंगे। इसके लिए न तो हमें अमेरिका की दादागीरी को झेलना होगा और न ही परमाणु ईंधन आपूर्तिकर्ता देशों की खुशामद करनी होगी।

अगर 2020 तक बीस हजार मेगावाट के लक्ष्य को पाना है तो 13000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली की व्यवस्था करनी होगी। ऐसा तब ही संभव है जब अगले बारह सालों में हम चार पफास्ट ब्रीडर रिएक्टर, आठ रिएक्टर 700 मेगावाट के और आयातित रिएक्टरों से छह हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन करें। व्यवहारिक तौर पर ऐसा संभव ही नहीं है, चाहे हम कैसा भी करार कर लें। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी 1990 के मध्य से आणविक ऊर्जा की हिस्सेदारी 16 प्रतिशत पर अटकी हुई है। दूसरी तरफ यह बात भी महत्वपूर्ण है कि नाभिकीय बिजलीघरों से बनने वाली बिजली में लागत दुगनी होती है। जिस वजह से यह बेहद महंगी भी है।

क्या अमेरिकी कंपनी को ही ठेका मिलेगा?

अमेरिका का नाभिकीय उद्योग विदेशी आर्डरों के भरोसे ही कायम है। क्योंकि पिछले तीस साल में अमेरिका में कोई भी परमाणु रिएक्टर नहीं लगाया गया है। इसलिए अमेरिका की नजर अब भारत से आने वाले अरबों डालर के आर्डरों की ओर लगी हुई है। 150 अरब डालर के इस समझौते से अमेरिकी कंपनियों का मालामाल होना तय है। अमेरिकी कंपनियों के लिए यह समझौता अपने आर्थिक गतिरोध को तोड़ने के लिए सुनहरा अवसर साबित होने जा रहा है। 16 नवंबर 2006 को अमेरिकी सीनेट ने समझौते को मंजूरी दी। उसी महीने के आखिरी हफ्ते में 250 सदस्यों वाला व्यापारियों का प्रतिनिधिमंडल भारत आया। उसमें जीई एनर्जी, थोरियम पावर, बीएसएक्स टेक्नोलोजिज और कान्वर डायन जैसी कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल थे। 

अमेरिकी थैलीशाहों के मकसद का खुलासा उनके पूर्व रक्षा सचिव विलियम कोहेन के बयान से हो जाता है। उन्होंने कहा है, ‘अमेरिकी रक्षा उद्योग ने कांग्रेस के कानून निर्माताओं के पास भारत को परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता दिलाने के लिए लाबिंग की है। अब उसे मालदार सैन्य ठेके चाहिए।इन ठेकों को पाने के लिए लाकहीड मार्टिन, बोईंग, राथेयन, नार्थरोप गु्रमन, हानीवेल और जनरल इलेक्ट्रिक जैसी पचास से ज्यादा कंपनियां भारत में अपना कार्यालय चला रही हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडलिजा राइस ने कांग्रेस में सापफ-साफ कह भी दिया है कि यह समझौता निजी क्षेत्र को पूरी तरह से दिमाग में रखकर तैयार किया गया है।

परमाणु परीक्षण के बारे में करार में क्या स्थिति हैं?

कोई भी परमाणु परीक्षण बगैर यूरेनियम संवर्धन के हो ही नहीं सकता है। इस समझौते के जरिए भारत के यूरेनियम संवर्धन को प्रतिबंधित किया गया है। हाइड एक्ट के अनुच्छेद 103 में यह स्पष्ट लिखा हुआ है कि इस समझौते का मकसद नाभिकीय अप्रसार संधि में शामिल या उससे बाहर के किसी गैर परमाणु शस्त्र संपन्न राज्य द्वारा परमाणु हथियार बनाने की क्षमता विकसित करने का विरोध करना है। इसके अलावा लिखा गया है कि जब तक बहुपक्षीय प्रतिबंध या संधि लागू न हो तब तक भारत को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाए कि वह असुरक्षित नाभिकीय स्थानों पर विखंडनीय पदार्थों का उत्पादन न बढ़ाए। हाइड एक्ट में ही इस बात का उल्लेख किया गया है कि अगर भारत कोई परमाणु परीक्षण करता है तो यह समझौता रद्द हो जाएगा और हमें इस करार के तहत प्राप्त सामग्री और प्रौद्योगिकी वापस करनी पड़ेगी।

करार से अमेरिका का हित कैसे सधेगा?

अमेरिका का मकसद अपने हितों को ध्यान में रखते हुए सैन्य प्रभुत्व जमाना है। इसके लिए वह कई सहयोगियों को जोड़कर हर दिशा में सैन्य गतिविधियों की पूर्ण स्वतंत्रता चाहता है। इस दिशा में वह भारत को प्रमुख रणनीतिक सहयोगी के तौर पर देखता है। ताईवान, उत्तर कोरिया, मानवाधिकार, लोकतंत्र और एटमी प्रसार के मसले पर अमेरिका और चीन में मतभेद है। इसलिए वह चीन को रोकने के लिए इस इलाके में एक शक्ति संतुलन चाहता है। वह एशिया में नाटो जैसा एक नया संगठन चाहता है। जिसके लिए भारत एक उपयुक्त सैन्य सहयोगी दिखाई पड़ता है। ईरान से युध्द होने की स्थिति में अमेरिका उस पर सैन्य कार्रवाई करने के लिए हिंदुस्तानी सरजमीं का इस्तेमाल करना चाहता है। अमेरिकी कांग्रेस में रखी गई एक रिपोर्ट के मुताबिक आने वाले पंद्रह साल के अंदर चीन से उसका एक युध्द संभव है। ऐसा होने पर भारत अमेरिका के लिए चीन पर हमला करने के लिए बेहद उपयुक्त स्थान है।

इस करार के तहत हाइड एक्ट की धारा 109 के जरिए अमेरिका ने यह सुनिश्चित किया है कि परमाणु नि:शस्त्रीकरण के अमेरिकी अभियान में भारत साथ चलने को बाध्य होगा। इस बारे में हर साल अमेरिकी राष्ट्रपति वहां के कांग्रेस में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा, जिसके आधार पर यह तय किया जाएगा कि भारत अमेरिका के मुताबिक काम कर रहा है या नहीं। जाहिर है इससे भारत के निर्णय लेने की क्षमता पर आंच आना तय है।

प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का क्या इंतजाम है?

हाइड एक्ट प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगाता है। साथ ही यह भारत को दोहरे प्रयोग की प्रौद्योगिकी तक पहुंचने से रोकता है। यानी भारत नाभिकीय ईंधन के संपूर्ण चक्र का हकदार नहीं हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति हर साल जो रिपोर्ट वहां की कांग्रेस में रखेंगे, अगर उसमें यह पाया जाता है कि भारत इसका पालन नहीं कर रहा तो वह समझौते को रद्द कर देगा। साथ ही वह अन्य देशों पर भी यह दबाव डालेगा कि वे भारत को एटमी ईंधन और प्रौद्योगिकी की सप्लाई बंद कर दें। हम इस सौदे में पफायदे से ज्याद नुकसान में रहेंगे। भारत को न तो आणविक ईंधन और न ही रिएक्टर कम दाम या मुफ्त में मिलेगा। इसे हमें प्रचलित बाजार मूल्य पर ही खरीदना होगा। जो निश्चय ही स्वदेशी परमाणु शक्ति के दाम को बढ़ा देगा। नाभिकीय तकनीक मिलने का दावा भी खोखला है। एक तो यह बहुत देर से आएगा और दूसरी बात यह कि इसकी मात्र बहुत कम होगी।

करार टूटने पर क्या होगा?

अगर करार टूटता है तो भारत को वो सारी मशीनें, औजार और प्रौद्योगिकी वापस करनी होगी जो इस डील के तहत मिलेगा। इसके अलावा हमारे चौदह परमाणु रिएक्टर पर निगरानी जारी रहेगी। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका द्वारा करार में किए गए किसी वायदे को तोड़ा जाता है तो ऐसी हालत में क्या होगा, इसका उल्लेख इस समझौते में नहीं किया गया है।