Saturday, August 31, 2013

रूपये को बचाने के लिए मंदिरों का सोना गिरवी रखना कितना सही ?

सरकार के लाख दावों और उपायों के बावजूद रूपये में लगातार गिरावट जारी है। रूपये के अवमूल्यन से देश की आर्थिक साख इस वक्त कटी पतंग कि तरह हवा में झूल रही है। मगर सरकार इसके उपर पकड़ बनाने के बजाय सोना गिरवी रखने कि योजना बना रही है। ऐसे में इस सरकारी प्रयास को लेकर अर्थ जगत में हाहाकार मची हुई है। मीलों सफर तय करने और आगे बढ़ने कि बात करने वाली सरकार आज खुद ढाई कदम भी आगे नहीं बढ़ पारही है। ऐसे में सरकार की आर्थिक और नीतिगत फैसलों को लेकर कई अहम सवाल खडे़ हो रहे है।

देश के वाणीज्य मंत्री आनन्द शर्मा संकट से लोहा लेने के बजाय सोना गिरवी रखने के उपाय सुझा रहे है। तो देश के प्रधान मंत्री इसे विपक्ष के उपर सहयोग न करने के आरोप मढ़ कर आर्थिक संकट से उबारने के बजाय खुद को अलग कर ले रहे है। साथ ही सरकार के सिपाहसलार खाद्य सुरक्षा कानून के सहारे सत्ता की तलाश कर रहे है। गिरते हुए रूपये कि चिंता आज किसे है आप खुद अंदाजा लगा सकते है। आज देश एक बार फिर से 1991 कि जगह आकर खड़ा हो गया है। सरकार फिर से सोना के सहारे सरकारी साख और व्यापारी आस को जीवित रखने के लिए देश भर के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों कि सोने के खजाने को हथियाने, और देश की बिगड़ते हालात को सुधारने के नाम पर देशी विरासत को विदेशी हाथों में सौपने के लिए तैयार है।

देश भर के सरकारी नियंत्रण वाले मंदरों में लाखों टन सोना मौजूद है जिसे सरकार समय समय पर इसके उपर नियंत्रण और इसके रख रखाव को लेकर नीति बनाती रही है। साथ ही मंदरों के संपत्ती और खजाने कि खुलील लूट हमेशा से होती रही है। ऐसे में सवाल इस बात को लेकर भी खड़ा हो रहा है कि अगर सरकार मंदिरों के सोना का आर्थिक उपयोग करती है तो, क्या ये देश कि सांस्कृति और और आर्थिक गुलामी नहीं होगी? जिन मंदरों के सोना चांदी को लूटने के लिए अंग्रेजों ने इस देश को गुलाम बनाया आज उन्हीं के हाथों में धरोहरों की शान को निलाम करने के लिए सरकार अमादा है। सरकार जिन सांस्कृतिक बिरासत और धरोहरों कि रक्षा के लिए हमारे देश की शहीदों ने इसे अपने लहू से सिंचा आज उसी की उपज को विदेशों में गिरवी रख कर सरकार कौन सी आर्थिक सुधार लाना चाहती है? 

मंदिर निर्माण के नाम पर अपने आप को धर्म निरपेक्ष बताने वाली सरकार आज क्यों चुप है। अगर सरकार मंदिर बना नहीं सकती तो फिर इसकी संपत्ती को विदेशी हाथों में सौपने के लिए सोच भी कैसे सकती है। सरकार आज गुड़ खाए और गुलगुल्ले से परहेज वाला ढोंग क्यों रच रही है? सरकार वक्फ वोर्ड और चर्च कि संपत्तीयों को कभी निलाम करने कि बात क्यों नहीं करती है। क्या ये हिन्दुओं की बिरासत का बयापार और देश के साथ खिलवाड़ नहीं है? सरकार कि इस सोच को लेकर सवाल खड़ा होता है की रूपये को बचाने के लिए मंदिरों का सोना गिरवी रखना क्या राष्ट्रहीत में सही है?

Friday, August 30, 2013

क्या आज सुदर्शनधारी श्री कृष्ण की जरुरत है ?

                                               बिना शक्ति के भक्ति भावना पंगु अधूरी है।
                                               आज बांसुरी नहीं सुदर्शन चक्र जरुरी है।।

सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का एक अमोघ अस्त्र है। इस चक्र ने देवताओं की रक्षा तथा राक्षसों के संहार में अतुलनीय भूमिका का निर्वाह किया है। सुदर्शन चक्र एक ऐसा अस्त्र है जो चलाने के बाद अपने लक्ष्य पर पहुँचकर वापस आ जाता है। यह चक्र भगवान विष्णु को शंकर भगवान से प्राप्त हुआ था। सुदर्शन चक्र को विष्णु ने उनके कृष्ण के अवतार में धारण किया था। श्रीकृष्ण ने इस चक्र से अनेक राक्षसों का वध किया था। आज सामाज के अंदर जिस रूप में कुरीतियों को बढ़ावा मिल रहा है और भय-भूख, भ्रष्टाचार हर ओर ब्याप्त है। ऐसे समय में आज एक बार फिर से सुदर्शनधारी कृष्ण कि जरूरत हर ओर महसूस होने लगा है।

प्राचीन काल में श्रीदामा नाम से विख्यात एक महान असुर राजा ने सारे संसार को अपने अधीन करके लक्ष्मी को भी अपने वश में कर लिया। उसके यश और प्रताप से तीनों लोक श्रीहीन हो गये। उसका मान इतना बढ़ गया था कि वह भगवान विष्णु के श्रीवत्स को ही छीन लेने की योजना बनाने लगा। इसका सामना करने के लिए भगवान विष्णु जगन्नाथ के पास जाकर एक हजार वर्ष तक पैर के अंगूठे पर खड़े रह कर परब्रह्म की उपासना की। भगवान विष्णु की इस प्रकार कठोर साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने तब उन्हें सुदर्शन चक्र प्रदान किया। ऐसे में आज लोगों के अंदर भी सब्र का बांध टूट रहा है, क्योंकि आज हर कोई धैर्य और सहनशीलता के आगे अपने आप को ठगा और हारा हुआ समझ रहा है। तो सवाल भी खड़ा होता है की लोगों के इस धैर्य और सहनछमता को बनाए रखने के लिए क्या  सुदर्शनधारी कृष्ण कि पूजा और चक्र की पराक्रम आज सामाज को नहीं है?   

सुदर्शनचक्र बारह अरों, छह नाभियों एवं दो युगों से युक्त, तीव्र गतिशील और समस्त आयुधों का नाश करने वाला है। सज्जनों की रक्षा करने के लिए इसके अरों में देवता, राशियाँ, ऋतुएँ, अग्नि, सोम, मित्र, वरुण, शचीपति इन्द्र, विश्वेदेव, प्रजापति, हनुमान, धन्वन्तरि, तप तथा चैत्र से लेकर फाल्गुन तक के बारह महीने प्रतिष्ठित हैं। भगवान श्री कृष्ण के पास यह देवी की कृपा से प्राप्त हुआ था। आज के संसार में भगवान कृष्ण और मुरली कि बासुड़ी कि जगह सुदर्शन चक्र की जरूरत है। यही कारण है कि आज हर कोई कह रहा है,,,,,,,,,

                                                हरी मंडप में जब तक हाहाकार नहीं होगा
                                               शत्रु पक्ष में जब तक भला पार नहीं होगा
                                               गद्दारों का जब तक खुला शिकार नहीं होगा
                                           तब तक भारत माता का सपना साकार नहीं होगा।
                                                   कौवों को नहीं दी जाती कभी अंगूरी है
                                                  आज बांसुरी नहीं सुदर्शन चक्र है जरुरी
                                                           सुदर्शन चक्र है जरूरी।।

Thursday, August 29, 2013

वृंदावन की गलियों में कान्हा की गूंज !

                                                काहे को तूने मेरा माखन चुराया !
                                                काहे को तूने मेरी गगरी गिराई !!

वृंदावन की गलियों में आज भी कन्हैया हर दिल में बसा है। लोगों की दिलों में कान्हा की प्रेमे हमने आखों से देखा है। सुबह से ही सड़को पर भक्तों की हुजूम लग जाती है और पूरा मथुरा- वृंदावन कान्हामय हो उठता है ।  नटखट कान्हा का बाल रूप हर किसी को पसंद है। कन्हैयाए कान्हाए मुरली मनोहर माखनचोर जैसे नामों से सुशोभित कृष्ण का बाल रूप हर किसी के मन को हरने वाला है। जीवन भर अपनी जन्मदात्री माता से अधिक यशोदा माता को मान देने वाले कृष्ण ने दुनिया के सामने यह उदाहरण पेश किया कि कर्म हमेशा ज्यादा उपासक होता है।

जन्माष्टमी पर्व कृष्ण की उपासना का पर्व है। इस अवसर पर हम कृष्ण के बाल रूप की वंदना करते हुए उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं। कृष्ण के बाल रूप से लेकर उनका पूरा जीवन कर्म की प्रधानता को ही लक्षित करता है। अपने मामा कंस का वध कर कृष्ण ने यह उदाहरण पेश किया कि रिश्तों से बड़ा कर्तव्य होता है। कर्तव्य परायणता की यही सीख कृष्ण ने रणभूमि में अर्जुन को भी दी जो अपनों के निर्बाध वध से आहत होकर अपने कर्तव्य से विमुख हो चले थे।
 
गीता आज भी हमारे धर्मग्रंथों में सर्वोत्तम ग्रंथ है जो जीवन के झंझावात में आपके हर सवाल का जवाब देती है। कृष्ण हमारी तमाम अन्य धार्मिक उपासनाओं से इस प्रकार अलग हैं कि कृष्ण के उपदेश आज के व्यावहारिक जीवन के अनुरूप और व्यावहारिक लगते हैं।

84 कोसी परिक्रमा पर राजनीतिक दलों की सियासी उहापोह !

विश्व हिंदू परिषद द्वारा प्रस्तावित 84 कोसी परिक्रमा यात्रा को उत्तर प्रदेश सरकार ने यह कहकर प्रतिबंधित कर दिया कि राम जन्मभूमि में होने वाली यात्रा सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने वाली है जिसकी वजह से क्षेत्र की शांति और व्यवस्था चरमरा सकती है। विभिन्न हिंदू धार्मिक संगठन समाजवादी पार्टी सरकार के इस कदम का कड़ा विरोध कर रहे हैं वहीं सरकार अपने निर्णय पर अटल है। यूं तो भारत में राजनीति और धर्म साथ-साथ चलते हैं लेकिन इस बार धर्म की आड़ में राजनीति खेली जा रही है या राजनीति को धर्म के आगे कमजोर किया जा रहा है यह बात एक बड़े विवाद का विषय बन गई है।

संघ परिवार समेत अन्य कई धार्मिक संगठनों का यह कहना है कि भगवान राम की नगरी में परिक्रमा रोकने का निर्णय सरासर गलत है। विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल ने तो सरकार के इस कदम को जेहादी मानसिकता का प्रतीक तक कह दिया है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने भी इस यात्रा को धार्मिक और सांस्कृतिक मसला बताया है। उनका कहना है कि क्षेत्र में इस तरह के हालात पैदा करना और धर्म को राजनीति का नाम देना किसी भी रूप में सही नहीं है। संत-महात्माओं का भी यही कहना है कि परिक्रमा रोकने के लिए क्षेत्र को छावनी बनाने से अच्छा था कि शांतिपूर्वक यात्रा करने दी जाती और सुरक्षा की दृष्टि से जितनी पुलिस की जरूरत थी उतनी ही तैनात की जाती। 

वहीं दूसरी ओर सरकार का कहना कुछ और है। उत्तर प्रदेश सरकार और इस यात्रा के विरोध में खड़े अन्य राजनैतिक दलों का पक्ष यह है कि जो गलती वर्ष 1990 में हुई थी उसे दोहराना समझदारी नहीं है। सपा की ओर से यह भी कहा गया कि सरकार ऐसा कोई भी काम नहीं करेगी जिससे राज्य में सांप्रदायिक तनाव बढ़े। इस परिक्रमा का कड़ा विरोध करते हुए सपा का कहना है कि विहिप, आरएसएस और भाजपा जिस परिक्रमा के बहाने सियासी साजिश रच रही हैं, उसके होने का कोई पूर्व प्रमाण नहीं है। अगस्त-सितंबर में अयोध्या में कोई परिक्रमा नहीं होती, 1992 में भाजपा, संघ और विहिप ने ऐसे ही भाषा प्रयोग की थी, जिससे बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ। 

सरकार का कहना है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के जख्म अभी तक भरे नहीं हैं और ऐसे में एक और जोखिम नहीं उठाया जा सकता। प्रदेश की सत्तासीन सरकार का यह भी कहना है कि अयोध्या को किसी भी रूप में गुजरात नहीं बनने दिया जाएगा। धार्मिक संगठनों पर निशाना साधते हुए उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि उन्हें हमारी सामाजिक विवशताओं और परिस्थितियों के बारे में समझना चाहिए।

Thursday, August 22, 2013

शारिरिक संपर्क और अवसरों के उपभोग में बिलीन आधुनिक समाज की वर्जना !

लाइफ़-स्टाइल में बदलाव से ज़िंदगियों में सबसे पहले आधार-भूत परिवर्तन की आहट के साथ कुछ ऐसे बदलावों की आहट सुनाई दे रही है जिससे सामाजिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन अवश्यंभावी है. कभी लगता था मुझे भी कि सामाजिक-तानेबाने के परम्परागत स्वरूप को आसानी से बदल न सकेगा. किंतु पिछले दस बरसों में जिस तेजी से सामाजिक सोच में बदलाव आ रहे हैं उससे तो लग रहा कि बदलाव बेहद निकट हैं शायद अगले पांच बरस में.. कदाचित उससे भी पहले .कारण यह कि अब “जीवन को कैसे जियें ?”  सवाल नहीं हैं अब तो सवाल यह है कि जीवन का प्रबंधन कैसे किया जाए. कैसे जियें के सवाल का हल सामाजिक-वर्जनाओं को ध्यान रखते हुए खोजा जाता है जबकि जीवन के प्रबंधन के लिये वर्जनाओं का ध्यान रखा जाना तार्किक नज़रिये से आवश्यक नहीं की श्रेणी में रखा जाता है. जीवन के जीने के तौर तरीके में आ रहे बदलाव का सबसे पहला असर पारिवारिक व्यवस्थापर खास कर यौन संबंधों पड़ता नज़र आ रहा है. बेशक विवाह नर-मादा के व्यक्तिगत अधिकार का विषय है पर अब पुरुष अथवा महिला के जीवन की व्यस्तताओं के चलते उभरतीं दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन का अधिकार भी मांगा जावेगा कहना कोई बड़ी बात नहीं.

 वास्तव में ऐसी स्थिति को मज़बूरी का नाम दिया जा रहा है.फ़िलहाल तो लव-स्टोरी को वियोग हेट स्टोरी में बदलते देर नहीं लगती पर अब मुझे जहां तक आने वाले कल का आभास हो रहा है वो ऐसा समय होगा जो ” दैहिक (अनाधिकृत?) आकांक्षाओं के प्रबंधन” को एक अधिकार के रूप में स्वीकारेगा. दूसरा पक्ष ऐसे अधिकार की मांग के प्रति सकारात्मक रुख अपनाएगा. उसका मूल कारण “सर्वथा दूरियां एवम व्यस्तता जो अर्थोपार्जक कारण जनित होगी” यह कोई भविष्यवक़्तव्य नहीं है न ही मैं भविष्य वक्ता हूं.. वरन तेजी से आ रहे बदलाव से परिलक्षित हो रही स्थिति का अनुमान है. जिसे कोई बल-पूर्वक नहीं रोक सकता. सामाजिक व्यवस्था द्वारा जनित परम्परागत वर्जनाओं के विरुद्ध सोच और शरीर का खड़ा होना भारतीय परिवेश में महानगरों, के बाद नगरों से ग्राम्य जीवन तक असर डाल सकता है.

आप हम भौंचक इस विकास को देखते रह जाएंगें. सेक्स एक बायोलाजिकल ज़रूरत है उसी तरह अपने पारिवारिक “समुच्चय में रहना” सामाजिक ज़रूरत है. आर्थिक कार्य का दबाव सबसे पहले इन्ही बातों को प्रभावित करेगा. तब दम्पत्ति बायोलाजिकल ज़रूरत को पूरा करते हुए पारिवारिक समुच्चय को भी बनाए रखने के लिये एक समझौता वादी नीति अपनाएंगें. हमारा समाज संस्कृति की बलात रक्षा करते हुए भी असफ़ल हो सकता है ऐसा नहीं है कि इसके उदाहरण अभी मौज़ूद नहीं हैं.बस लोग इस से मुंह फ़ेर रहे हैं. पाश्चात्य व्यवस्था इस क़दर हावी होती नज़र आ रही है कि किसी को भी इस आसन्न ब्लैक होल से बचा पाना सम्भव नज़र नहीं आ रहा. हो सकता है मैं चाहता हूं कि मेरा पूरा आलेख झूठा साबित हो जाए जी हां परंतु ऐसा तब होगा जबकि जीवनों में स्थायित्व का प्रवेश हो .. ट्रक ड्रायवरों सा यायावर जीवन जीते लोग (महिला-पुरुष) फ़्रायड को तभी झुठलाएंगे जबकि उनका आत्म-बल सामाजिक-आध्यात्मिक चिंतन से परिपक्व हो पर ऐसा है ही नहीं. 

लोग न तो आध्यात्मिक सूत्रों को छू ही पाते हैं और न ही सामाजिक व्यवस्था में सन्निहित वर्जनाओं को आध्यात्म एवम सामाजिक व्यवस्था के तहत बहुल सेक्स अवसरों के उपभोग को रोकने नैतिकता का ज्ञान कराते हुए संयम का पाठ पढ़ाया जाता है ताकि एक और सामाजिक नैतिकता बनी रहे दूसरी ओर यौन जनित बीमारियों का संकट भी जीवनों से दूर रहे, जबकि विज्ञान कंडोम के प्रयोग से एस.टी.डी.(सेक्सुअली-ट्रांसमीटेड-डिसीज़) को रोकने का परामर्श मात्र देता है. आपको अंदाज़ा भी नहीं होगा कि दो दशक पहले बच्चे ये न जानते थे कि माता-पिता नामक युग्म उनकी उत्पत्ति का कारण है. किंतु अब सात-आठ बरस की उम्र का बच्चा सब कुछ जान चुका है. यह भी कि नर क्या है..? मादा किसे कहते हैं..? जब वे प्यार करते हैं तब “जन्म”-की घटना होती है. दूसरे शब्दों में कहें तो वे शारिरिक संपर्क को प्यार मानते हैं. सामाजिक व्यवस्था पाप-पुण्य की स्थितियों का खुलासा करतीं हैं तथा भय का दर्शन कराते हुए संयम का आदेश देतीं हैं वहीं दूसरी ओर अत्यधिक अधिकाराकांक्षा तर्क के आधार पर जीवन जीने वाले इस आदेश को पिछड़ेपन का सिंबाल मानते हुए नकार रहे हैं .

Tuesday, August 20, 2013

रक्षाबन्धन- मानवीय रिश्तों को एक धागे में बांधने वाला पर्व !

रक्षाबन्धन भारतीय सभ्यता का एक प्रमुख त्यौहार है जो कि श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहन अपनी रक्षा के लिए भाई को राखी बाँधती है। भारतीय परम्परा में विश्वास का बन्धन ही मूल है और रक्षाबन्धन इसी विश्वास का बन्धन है। यह पर्व मात्र रक्षा-सूत्र के रूप में राखी बाँधकर रक्षा का वचन ही नहीं देता वरन् प्रेम, समर्पण, निष्ठा व संकल्प के जरिए हृदयों को बाँधने का भी वचन देता है। पहले रक्षा बन्धन बहन-भाई तक ही सीमित नहीं था, अपितु आपत्ति आने पर अपनी रक्षा के लिए अथवा किसी की आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिये किसी को भी रक्षा-सूत्र (राखी) बांधा या भेजा जाता था। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है कि- ‘मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव’- अर्थात ‘सूत्र’ अविच्छिन्नता का प्रतीक है, क्योंकि सूत्र (धागा) बिखरे हुए मोतियों को अपने में पिरोकर एक माला के रूप में एकाकार बनाता है। माला के सूत्र की तरह रक्षा-सूत्र (राखी) भी लोगों को जोड़ता है। 

गीता में ही लिखा गया है कि जब संसार में नैतिक मूल्यों में कमी आने लगती है, तब ज्योर्तिलिंगम भगवान शिव प्रजापति ब्रह्मा द्वारा धरती पर पवित्र धागे भेजते हैं, जिन्हें बहनें मंगलकामना करते हुए भाइयों को बाँधती हैं और भगवान शिव उन्हें नकारात्मक विचारों से दूर रखते हुए दुख और पीड़ा से निजात दिलाते हैं। राखी का सर्वप्रथम उल्लेख पुराणों में प्राप्त होता है जिसके अनुसार असुरों के हाथ देवताओं की पराजय पश्चात अपनी रक्षा के निमित्त सभी देवता इंद्र के नेतृत्व में गुरू वृहस्पति के पास पहुँचे तो इन्द्र ने दुखी होकर कहा- ‘‘अच्छा होगा कि अब मैं अपना जीवन समाप्त कर दूँ।’’ इन्द्र के इस नैराश्य भाव को सुनकर गुरू वृहस्पति के दिशा-निर्देश पर रक्षा-विधान हेतु इंद्राणी ने श्रावण पूर्णिमा के दिन इन्द्र सहित समस्त देवताओं की कलाई पर रक्षा-सूत्र बाँधा और अंततः इंद्र ने युद्ध में विजय पाई। एक अन्य कथानुसार राजा बालि को दिये गये वचनानुसार भगवान विष्णु बैकुण्ठ छोड़कर बालि के राज्य की रक्षा के लिये चले गये । तब देवी लक्ष्मी ने ब्राह्मणी का रूप धर श्रावण पूर्णिमा के दिन राजा बालि की कलाई पर पवित्र धागा बाँधा और उसके लिए मंगलकामना की। इससे प्रभावित हो बालि ने देवी को अपनी बहन मानते हुए उसकी रक्षा की कसम खायी। तत्पश्चात देवी लक्ष्मी अपने असली रूप में प्रकट हो गयीं और उनके कहने से बालि ने भगवान इन्द्र से बैकुण्ठ वापस लौटने की विनती की।

त्रेता युग में रावण की बहन शूर्पणखा लक्ष्मण द्वारा नाक कटने के पश्चात रावण के पास पहुँची और रक्त से सनी साड़ी का एक छोर फाड़कर रावण की कलाई में बाँध दिया और कहा कि- ‘‘भैया! जब-जब तुम अपनी कलाई को देखोगे तुम्हें अपनी बहन का अपमान याद आएगा और मेरी नाक काटनेवालों से तुम बदला ले सकोगे।’’ इसी प्रकार महाभारत काल में भगवान कृष्ण के हाथ में एक बार चोट लगने व फिर खून की धारा फूट पड़ने पर द्रौपदी ने तत्काल अपनी कंचुकी का किनारा फाड़कर भगवान कृष्ण के घाव पर बाँध दिया। कालांतर में दुःशासन द्वारा द्रौपदी-हरण के प्रयास को विफल कर उन्होंने इस रक्षा-सूत्र की लाज बचायी। द्वापर युग में ही एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा कि वह महाभारत के युद्ध में कैसे बचेंगे तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया- ‘‘राखी का धागा ही तुम्हारी रक्षा करेगा।’’

ऐतिहासिक युग में भी सिंकदर व पोरस ने युद्ध से पूर्व रक्षा-सूत्र की अदला-बदली की थी। युद्ध के दौरान पोरस ने जब सिकंदर पर घातक प्रहार हेतु अपना हाथ उठाया तो रक्षा-सूत्र को देखकर उसके हाथ रूक गए और वह बंदी बना लिया गया। सिकंदर ने भी पोरस के रक्षा-सूत्र की लाज रखते हुए और एक योद्धा की तरह व्यवहार करते हुए उसका राज्य वापस लौटा दिया। मुगल काल के दौर में जब मुगल समा्रट हुमायूँ चितौड़ पर आक्रमण करने बढ़ा तो राणा सांगा की विधवा कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजकर अपनी रक्षा का वचन लिया। हुमायूँ ने इसे स्वीकार करके चितौड़ पर आक्रमण का ख़्याल दिल से निकाल दिया और कालांतर में राखी की लाज निभाने के लिए चितौड़ की रक्षा हेतु गुजरात के बादशाह से भी युद्ध किया। इसी प्रकार न जाने कितनी मान्यतायें रक्षा बन्धन से जुड़ी हुयी हैं।

लोक परम्परा में रक्षाबन्धन के दिन परिवार के पुरोहित द्वारा राजाओं और अपने यजमानों के घर जाकर सभी सदस्यों की कलाई पर मौली बाँधकर तिलक लगाने की परम्परा रही है। पुरोहित द्वारा दरवाजों, खिड़कियों, तथा नये बर्तनों पर भी पवित्र धागा बाँधा जाता है और तिलक लगाया जाता है। यही नहीं बहन-भानजों द्वारा एवं गुरूओं द्वारा शिष्यों को रक्षा सूत्र बाँधने की भी परम्परा रही है। राखी ने स्वतंत्रता-आन्दोलन में भी प्रमुख भूमिका निभाई। कई बहनों ने अपने भाईयों की कलाई पर राखी बाँधकर देश की लाज रखने का वचन लिया। 1905 में बंग-भंग आंदोलन की शुरूआत लोगों द्वारा एक-दूसरे को रक्षा-सूत्र बाँधकर हुयी।

राखी से जुड़ी एक मार्मिक घटना क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद के जीवन की है। आजाद एक बार तूफानी रात में शरण लेने हेतु एक विधवा के घर पहुँचे। पहले तो उसने डाकू समझकर शरण देने से मना कर दिया पर यह पता चलने पर कि वह क्रांतिकारी आजाद है, ससम्मान उन्हें घर के अंदर ले गई। बातचीत के दौरान आजाद को पता चला कि उस विधवा को गरीबी के कारण जवान बेटी की शादी हेतु काफी परेशानियाँ उठानी पड़ रही हैं तो उन्होंने द्रवित होकर उससे कहा- श्मेरी गिरफ्तारी पर 5000 रूपये का इनाम है, तुम मुझे अंग्रेजों को पकड़वा दो और उस इनाम से बेटी की शादी कर लो।श् यह सुन विधवा रो पड़ी व कहा- भैया! तुम देश की आजादी हेतु अपनी जान हथेली पर रखकर चल रहे हो और न जाने कितनी बहू-बेटियों की इज्जत तुम्हारे भरोसे है। अतः मै ऐसा हरगिज नहीं कर सकती.'' यह कहते हुए उसने एक रक्षा-सूत्र आजाद के हाथों में बाँधकर देश-सेवा का वचन लिया। सुबह जब विधवा की आँखं खुली तो आजाद जा चुके थे और तकिए के नीचे 5000 रूपये पड़े थे। उसके साथ एक पर्ची पर लिखा था- श्अपनी प्यारी बहन हेतु एक छोटी सी भेंट- आजाद।''

देश के विभिन्न अंचलों में राखी पर्व को भाई-बहन के त्यौहार के अलावा भी भिन्न-भिन्न तरीकों से मनाया जाता है। मुम्बई के कई समुद्री इलाकों में इसे नारियल-पूर्णिमा या कोकोनट-फुलमून के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन विशेष रूप से समुद्र देवता पर नारियल चढ़ाकर उपासना की जाती है और नारियल की तीन आँखों को शिव के तीन नेत्रों की उपमा दी जाती है। बुन्देलखण्ड में राखी को कजरी-पूर्णिमा या कजरी-नवमी भी कहा जाता है। इस दिन कटोरे में जौ व धान बोया जाता है तथा सात दिन तक पानी देते हुए माँ भगवती की वन्दना की जाती है। उत्तरांचल के चम्पावत जिले के देवीधूरा में राखी-पर्व पर बाराही देवी को प्रसन्न करने के लिए पाषाणकाल से ही पत्थर युद्ध का आयोजन किया जाता रहा है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘बग्वाल’ कहते हैं। सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि इस युद्ध में आज तक कोई भी गम्भीर रूप से घायल नहीं हुआ और न ही किसी की मृत्यु हुई। इस युद्ध में घायल होने वाला योद्धा सर्वाधिक भाग्यवान माना जाता है एवं युद्ध समाप्ति पश्चात पुरोहित पीले वस्त्र धारण कर रणक्षेत्र में आकर योद्धाओं पर पुष्प व अक्षत् की वर्षा कर आर्शीवाद देते हैं। इसके बाद युद्ध बन्द हो जाता है और योद्धाओं का मिलन समारोह होता है।

एक रोचक घटनाक्रम में हरियाणा राज्य में अवस्थित कैथल जनपद के फतेहपुर गाँव में सन् 1857 में एक युवक गिरधर लाल को रक्षाबन्धन के दिन अंग्रेजों ने तोप से बाँधकर उड़ा दिया, इसके बाद से गाँव के लोगों ने गिरधर लाल को शहीद का दर्जा देते हुए रक्षाबन्धन पर्व मनाना ही बंद कर दिया। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 150 वर्ष पूरे होने पर सन् 2006 में जाकर इस गाँव के लोगों ने इस पर्व को पुनः मनाने का संकल्प लिया। रक्षाबन्धन हमारे सामाजिक परिवेश एवं मानवीय रिश्तों का अंग है। आज जरुरत है कि आडम्बरता की बजाय इस त्यौहार के पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण सम्भव होगा।

Sunday, August 18, 2013

भारत में इस्लामिक बैंकिंग कितना सही ?

भारत में इस्लामिक बैंक खोलने कि मांग एक बार फिर से जोरों पर है। हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने राज्य में पहला इस्लामी बैंक खोले जाने की अनुमति दी है। इस्लामी बैंक को केरल स्टेट इंडस्ट्रीयल डेवेलपमेंट कॉरपोरेशन की मदद से खोला जाना है। केरल में इस्लामीकरण की आँधी तेजी से बढ़ रही है। इस इस्लामीकरण की आंधी में वामपंथी और कांग्रेस दोनों दल अल्पसंख्यक वोट के लिये कुछ भी करने को तैयार हैं। यही कारण है कि केरल में इसकी सुरूआत सबसे पहले हुआ है। आने वाले समय में इसे पूरे देश भर में लागू करने कि योजना बनाई गई है।

“इस्लामिक बैंकिंग” शरीयत के कानूनों के अनुसार गठित किया गया एक बैंक है, जिसके नियमों के अनुसार यह बगैर ब्याज पर काम करने वाली वित्तीय संस्था है, यानी इनके अनुसार इस्लामिक बैंक शून्य ब्याज दर पर लोन देता है और बचत राशि पर भी कोई ब्याज नहीं देता। जानकारों का मानना है कि इससे आतंकवादियों को “वैध” तरीके से फण्डिंग उपलब्ध करवाने में आसानी होगी। साथ ही दुबई के हवाला ऑपरेटरों को इससे बढ़ावा मिलेगा। तो सवाल उठता है कि भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में इस्लामीक बैंक को लागू करना किसी साजि़स का हिस्सा है या फिर वोट बैंक की राजनीति?

भारत में खोली जाने वाली इस्लामिक बैंक कई प्रकार की कानूनों और संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन करती है। फिर भी इसे खोलने के लिए सरकार जी जान से लगी हुई है। शरीयत के मुताबिक इस्लामिक बैंक सिनेमा, होटल, अन्य मनोरंजन उद्योग आदि के व्यापार के लिये भी ऋण  नहीं दे सकती, जो कि संविधान की धारा 14 का भी उल्लंघन करती है। ये धारा प्रत्येक नागरिक को बराबरी का अधिकार प्रदान करती है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी. सुब्बाराव पहले ही कह चुके है कि इस्लामिक बैंक भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देष में लागू करना संभव नहीं है। 

ऐसे में सवाल सरकार की आर्थिक नीति को लेकर खड़ा होता है कि आखिर सरकार किस नियम कानून के तहद इसे लागू करने कि बात कर रही है। इस्लामी कट्टरता ने बहुत से लोगों की नींद पहले से ही उड़ा रखी है, तो यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या इस्लामी बैंकिंग किसी खतरे को जन्म देगी? इस्लामिक बैंक का ज्यादातर कारोबार अचल सम्पत्ति पर ही निर्भर है। यदि भारत में इस्लामिक बैंक शुरू होते हैं तो यहां भी वे दुकान, मकान और अन्य भूखंडों को खरीदकर अपने पास रखेंगे। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की भारत में इस्लामिक बैंक कितना सही ?
 
इस्लामिक बैंक गैरकानूनी ?

पार्टनरशिप एक्ट 1932 का उल्लंघन। इसके अनुसार अधिकतम 20 पार्टनर हो सकते हैं। भारतीय संविदा कानून 1872 की धारा 30, इसके अनुसार “शर्तों” का उल्लंघन। बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट 1949 के सेक्शन 5 (इ), (ब), 9 और 21 का उल्लंघन। इसके अनुसार किसी भी लाभ-हानि के सौदे, खरीद-बिक्री अथवा सम्पत्ति के विक्रय पर ब्याज लेने पर प्रतिबन्ध। आरबीआई कानून 1934 का उल्लंघन। नेगोशियेबल इंस्ट्रूमेण्ट एक्ट 1881 का उल्लंघन। को-ऑपरेटिव सोसायटी एक्ट 1961 का उल्लंघन। संविधान की धारा 14 का उल्लंघन।

क्या है इस्लामिक बैंकिंग ?

यह शरीयत के कानूनों के अनुसार गठित किया गया एक बैंक होता है, जो अपने ग्राहकों के जमा पैसे पर न तो ब्याज देता है और न ही ग्राहकों को दिए गए किसी कर्ज पर ब्याज लेता है, इस्लामिक बैंक पिछले दरवाजे से सूद लेते हैं। इस्लामिक बैंक अपने यहां जमा धन से अचल सम्पत्ति खरीदते हैं। मकान, दुकान, घर बनाने वाले भूखंडों आदि पर निवेश करते हैं। इस निवेश से मुनाफा है।

भारत में कैसे उठी मांग ?

भारत में इस्लामिक बैंक की सुगबुगाहट रघुराम राजन समिति की एक सिफारिश से हुई। इस समिति ने अगस्त 2008 में सिफारिश की थी कि वित्तीय क्षेत्र में सुधार के लिए ब्याज मुक्त बैंकिंग व्यवस्था लागू की जाए। इसके बाद तो अनेक मुस्लिम नेता इस्लामिक बैंक की पैरवी करने लगे।

Saturday, August 17, 2013

पाकिस्तानी हिन्दुओं का दर्द भरी दास्तान उन्हीं की जुबानी !

घोषित इस्लामी देश पाकिस्तान से अल्पसंख्यक हिन्दूओं द्वारा अपनी जान और इज्जत बचाकर भारत आने की घटनायें नई नहीं हैं। कहने को पाकिस्तान में ‘अल्पसंख्यकों को पूरा संरक्षण’ दिया जाता है, लेकिन वास्तविकता सबको मालूम है। हर महीने अनेक हिन्दू लड़कियों के बलात्कार, अपहरण और उनको जबर्दस्ती कलमा पढ़वाकर निकाह कराने के समाचार आते रहते हैं। ऐसी प्रत्येक घटना पर थोड़े दिन शोर मचता है, फिर सब चुप हो जाते हैं और यह सिलसिला चलता रहता है। ऐसी हालत में यह आश्चर्यजनक नहीं है कि कुछ माह पहले सैकड़ों पाकिस्तानी हिन्दू परिवारों के 480 सदस्य वैध तरीके से तीर्थ यात्रा के बहाने भारत आये और अब यहाँ से वापस जाना ही नहीं चाहते। वे भारत में ही शरण चाहते हैं क्योंकि पाकिस्तान में उनकी जान-माल और इज्जत को भारी खतरा है। उनके लिए भारत के अलावा और कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं है, क्योंकि भारत में ईश्वर की दया से अभी भी हिन्दू बहुसंख्या में हैं।

सामान्य अवस्था में ऐसे पीडि़त परिवारों को उस देश की सरकार द्वारा तत्काल शरण दे दी जाती है, जिसमें वे शरण लेना चाहते हैं। लेकिन हमारे महान भारत की महान सेकूलर सरकार ऐसा नहीं कर रही है और उन परिवारों को जबर्दस्ती पाकिस्तान में धकेल देना चाहती है, चाहे वहाँ उनका कुछ भी किया जाए। इन निरीह परिवारों का अपराध बस इतना है कि वे हिन्दू हैं और अपना धर्म-ईमान छोड़ने को तैयार नहीं हैं। हिन्दू होना ही उनका सबसे बड़ा दोष है। यदि वे पाकिस्तानी हिन्दू न होकर बंगलादेशी होते, तो यहाँ उनके लिए तमाम सेकूलर लोग पलक पाँवड़े बिछाये होते। उनको न केवल अघोषित शरण दी जाती, बल्कि खुले रूप में मस्जिदों में निवास का प्रबंध भी कर दिया जाता। बाद में यथा समय उनको राशन कार्ड, आधार कार्ड और वोटर कार्ड ही नहीं पासपोर्ट तक बनवा दिया जाता।

इन परिवारों की गलती यह है कि वे पूरे वैध तरीके से पासपोर्ट बनवाकर और वीजा लेकर भारत आये हैं और गायब नहीं हुए हैं। अगर वे क्रिकेट मैंच देखने के बहाने आये होते और गायब हो गये होते, तो देश के किसी भी हिस्से में मजे में रह रहे होते। अगर वे बंगलादेशी घुसपैठियों की तरह ‘गर्दनिया पासपोर्ट’ लेकर रात के अँधेरे में चुपके से घूसे होते तो, देश की राजधानी तक में  रह रहे होते। उनके तमाम भाईबन्द उनके लिए रहने, खाने और काम करने तक का इंतजाम कर देते। मतदाता बनकर वे चुनाव तक लड़ सकते थे और एमएलए एमपी भी बन सकते थे। लेकिन फिर बात वही कि उनका सबसे बड़ा दोष हिन्दू होना और वैध तरीके से आना है।

इन निरीह हिन्दुओं की सहायता करने के लिए कोई भी संगठन आगे नहीं आ रहा है। वे भी नहीं जो हर बात पर बयान दागते रहते हैं और मोमबत्तियाँ जलाते रहते हैं। हिन्दुओं के स्वयंभू रहनुमा विश्व हिन्दू परिषद भी उनकी दयनीय दशा पर कान में रुई ठूँसे बैठे हैं। ऐसे में सरकार को क्या पड़ी है कि वह इनको शरण देकर अपनी सेकूलरिटी पर दाग लगाये? यहाँ तथाकथित मानवाधिकार संगठनों के शर्मनाक रवैये पर भी बोलना आवश्यक है। सभी आतंकवादियों, हत्यारों, नक्सलवादियों और बलात्कारियों तक के मानवाधिकारों के ये स्वयंभू प्रवक्ता इन हिन्दुओं की दयनीय दशा पर होठ सिले बैठे हैं।

पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की ओर से वर्ष 2010 की रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुत से मामलों में हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर उनके साथ रेप किया जाता है और बाद में उन्हें धर्म परिवर्तन पर मजबूर किया जाता है। सिंध प्रान्त विशेष कर देश की व्यापारिक राजधानी कराची में जबर्दस्ती परिवर्तन की घटनाएं हो रही हैं। पाकिस्तान की सीनेट की अल्पसंख्यक मामलों की स्थाई समिति ने अक्टूबर 2010 में ऐसी घटनाएं रोकने के लिए ठोस उपाए करने का आग्रह किया था।

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जबर्दस्ती धर्म परिवर्तन की घटनाएं केवल सिंध तक सीमित नहीं है बल्कि देश के अन्य भागों में भी ऐसा हो रहा है। अल्पसंख्यक समुदाय की लड़कियों का अपहरण होता है, उनके साथ रेप किया जाता है और बाद में यह दलील दी जाती है कि लड़की ने इस्लाम धर्म कबूल कर लिया है। उसकी मुस्लिम व्यक्ति से शादी हो गई है और वह अपने पुराने धर्म में लौटना नहीं चाहती।

पाकिस्तान छोड़कर भारत आए सोना दास के मुताबिक वहां हिंदू परिवारों पर बेइंतहा जुल्म ढहाए जाते हैं। हिंदू अपने धर्म को नहीं मान सकते। उन्हें अपनों बच्चों को पढ़ाने की भी आजादी नहीं है। मजबूरी में हिंदू बच्चों को अपने मदरसे में ही पढ़ाना होता है। अंतिम संस्कार शव को जलाकर नहीं बल्कि दफना कर करना होता है। औरतें मांग में सिंदूर नहीं लगा सकतीं। जवान बहू-बेटियों पर बुरी नजर रखी जाती है।

धर्म परिवर्तन के लिए बेडि़यों में कैद किया जाता है। लड़कियों की जबरन मुस्लिमों से शादी कराई जाती है। अकेले कराची में हिंदू लड़कियों की जबरन शादी के हर महीने 15 से 20 मामले सामने आते हैं। पाकिस्तान से आए इन हिंदुओं का कहना है कि पड़ोसी मुल्क में उनके साथ सौतेला बर्ताव किया जाता है। लूटपाट और डकैती तो आम बात है। दबंग उनकी बहन-बेटियों की इज्जत उनके आंखों के सामने लूटते है। यही वजह है कि ये लोग अपना घर-बार, जमीन-जायदाद छोड़कर भारत में स्थायी तौर पर शरण मांग रहे हैं। लेकिन सवाल ये कि आखिर इन लोगों का भविष्य क्या होगा?

पाकिस्तान में हिंदू परिवारों पर हो रहे जुल्म से परेशान 480 लोग तीर्थ यात्रा के लिए वीजा के जरिए एक महीने पहले भारत आए थे और अब स्थायी तौर पर यहीं रहने की इजाजत मांग रहे हैं। इन लोगों का कहना है कि वहां जाने से अच्छा है कि हम यहीं पर मर जाएं। इनमें से हर एक शख्स के पास सुनाने को दर्द भरी दास्तान है। यशोदा का कहना है कि हमें हिंदी नहीं बल्कि उर्दू में कलमा पढ़ने को बोलते थे। माला का कहना है कि वहां रहने का माहौल नहीं है। धार्मिक वीजा पर भारत आए ये 480 लोग दक्षिणी दिल्ली के बिजवासन इलाके के एक स्कूल में पनाह लिए हुए हैं। पाकिस्तान में अपना घर बार छोड़ ये लोग यहां भले खानाबदोश की तरह जीने को मजबूर हैं, लेकिन खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।

पाकिस्तान और बांग्लादेश में रह रहे हिंदू अल्पसंख्यकों की परेशानी के बारे में भारत सरकार भलि भांति अवगत है। आये दिन वहां हिंदू कारोबारियों को अगवा किया जाता है। किसी से रंगदारी मांगी जाती है तो किसी को सिर कलम कर दिया जाता है। किसी की बेटी को जबरन उठाकर ले जाया जाता है और धर्म परिवर्तन कराकर शादी करा दी जाती है और इसके खिलाफ अगर कोई आवाज उठाता है तो पूरे परिवार की जान पर बन आती है। ऐसे कई मामले पाकिस्तान की अदालतों में चल रहे हैं, लेकिन भारत सरकार ने कभी इस मसले को ठोस तरीके से पाकिस्तान के सामने नहीं उठाया। ये पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान से आए हिंदू लौटना नहीं चाहते हैं बल्कि इससे पहले भी हजारों लोग वहां से आ चुके हैं, लेकिन सवाल ये है कि वो लोग जो वहां रह रहे हैं, उनकी सुरक्षा के लिए भारत सरकार क्या कोई कदम उठा रही है?

पाकिस्तान में आतंकवाद और भेदभाव के शिकार हिंदू परिवार भारत में शरण चाहते हैं। इनके टूरिस्ट वीजा एक्सपायर हो चुके हैं पर ये सब वापसी के नाम से भी बहुत डरते हैं। विदेश मंत्रालय ने इनकी वीजा अवधि को एक महीने का विस्तार तो दिया है पर इसे नाकाफी बताया जा रहा है। वीजा डेडलाईन खत्म कर चुकी 20 साल की जमुना ने बताया कि उनके लिए पकिस्तान लौटना मौत की सजा की तरह है। उनका कहना है कि वह पाकिस्तान जाने के बजाय भारत में मर जाना पसंद करेंगी। ऐसा कहने वाली जमुना अकेली नहीं है। अपने वतन की याद के बारे में बात करते हुए यहां के केयरटेकर नाहर सिंह ने बताया कि वह इस बारे में भारत के राष्ट्रपति, विदेश मंत्रालय और संयुक्त राष्ट्र संघ को लिख चुके हैं, पर अबतक कोई जवाब नहीं मिल पाया है।

पाकिस्तान में 1951 की जनगणना में 22 फीसदी हिंदू आबादी थी, जो आज घटकर दो फीसदी से भी नीचे हो गई है। वहां के अधिकतर हिंदू परिवार सिंध क्षेत्र में रहते आए हैं। पाकिस्तान में दुनिया की पांचवी बड़ी हिंदू आबादी रहती है, लेकिन चिंताजनक तरीके से घटती इनकी आबादी और शरण के लिए भारत की ओर बढ़ते इनके कदम, पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की हालातों को बयान करने के लिए काफी हैं। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या पाकिस्तान में हिंन्दुओं के प्रति मानवता मर चुकी है ?

पाक में घटते हिन्दू !

सिंध असेम्बली में इस समय सिर्फ 9 हिन्दू विधायक है। पंजाब असेम्बली में 8 हिन्दू विधायक है। बलूचिस्तान और पख्तूनख्वा में सिर्फ 3-3 हिन्दू विधायक है। पाकिस्तान में विभाजन के समय हिन्दुओं की जनसंख्या 28 प्रतिशत थी। पाकिस्तान में आज 2 प्रतिशत से भी कम हिन्दू हैं। विभाजन के समय भारत में 8 प्रतिशत मुस्लिम थे। आज भारत की मुस्लिम आबादी 14 प्रतिशत है !
 

क्या कश्मीर से हिन्दुओं को पलायन कराया जा रहा है ?

कश्मीर एक बार फिर से जल रहा है। इस बार भी एक खास समुदाय के लोगों को निशाना बनाया गया है। इन सभी तथ्यों के उप रज़र डालने से पहले हमे 1990 के दशक को टटोलना होगा। ये बात इसलिए भी महत्वपूण हो चली है कि आज के भारत और 1990 के भारत दोनों में कोई समानता नहीं है या फिर बदलते कश्मीर को आज के दौर में 1990 कि तरह बदलने कि साजि़ष हो रही है? 1990 में सारे कश्मीरी पंडितो के घर के दरवाजों पर एक खास प्रकार के नोट लगा दिया गया था। जिसमे लिखा था “या तो मुस्लिम बन जाओ या कश्मीर छोड़ कर भाग जाओ या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ”। पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने टीवी पर कश्मीरी मुस्लिमो को भारत से आजादी के लिए भड़काना शुरू कर दिया। सारे कश्मीर के मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमे मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओ को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद सारे कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये। उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घरो को जला दिया। इस घटना के चलते 3 लाख 50 हजार कश्मीरी पंडित अपनी जान बचा कर कश्मीर से भाग गए।

आज एक बार फिर से इस इतिहास को दुहराया जा रहा है। वहां सब कुछ पूर्व नियोजित तरीके से हो रहा है। आज भी वहां के घरों में चिराग की रौशनी बुझी हुई है। ऐसे में सवाल मानवाधिकार, केन्द्र सरकार और जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री को लेकर खड़ा होता है कि क्या कश्मीर से पलायन कराया जा रहा है, या फिर सरकार जान बूझकर अनजान बनी हुई है ? हिंसा प्रभावित किश्तवाड़ जिले में आज भी लोग अपने घरों में डरे सहमे हुए है। केन्द्र और राज्य सरकार आरोप प्रत्यारोप के महासागर में डूबी हुई है। 9 अगस्त की सुबह 10: 30 बजे जब लोगों ने ईद के दौरान जुलूस निकाला और भारत विरोधी नारे लगाए। इसके बाद यहां हिंसा भड़क उठी जो धीरे-धीरे पूरे शहर में फैल गई।

किश्तवाड़ में एक खास समुदाय के लोगों को चुन चुनकर निशाना बनाया गया। उनको मारा गया पीटा गया। उनकी दुकानों और घरों को जलाया गया। मगर यहा सबसे अहम बात ये है कि प्रशासन की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया गया। गृह राज्य मंत्री सज्जाद किचालू खुद वहा मौजूद थे। आगजनी, लूटपाट, हिंसा होती रही लेकिन वे बाहर नहीं निकले। अगर गृह राज्य मंत्री सज्जाद अहमद किचलू चाहते तो कानून व्यवस्था की स्थिति को संभाल सकता थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

किश्तवाड हिंसा पर गृह मंत्री की अनुपस्थिति में पी.चिदम्बरम नें सदन को जानकारी दी कि किश्तवाड में हिंसा भारत विरोधी नारों के कारण ही भड़की थी। कश्मीर में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे आम बात है। इसके बाद वहाँ के मुख्यमंत्री का हैरान कर देने बयान मीडिया में आया जिसमें उन्होंने कहा कि इसमें नया क्या है ये तो वहाँ 20 -22 सालों से चल रहा है। जब किसी राज्य के मुख्यमंत्री के लिए देशविरोधी हरकतें और नारे सामान्य बात हो तो सवाल खड़ा होता है कि क्या कश्मीर से पलायन कराया जा रहा है ?

Tuesday, August 13, 2013

अकबर महान कैसे हो सकता है ?

अकबर की महिमामंडन हमारे देश में हमेशा से ही होता रहा है, मगर हम आपको कुछ अकबर की अनछूए पहलूओं को बता रहे है जिसे आप पढ़ कर दंग रहा जाएंगें। मेरा पहला सवाल ये है कि अकबर महान कैसे हो सकता है ?  

1. विन्सेंट स्मिथ ने किताब यहाँ से शुरू की है कि “अकबर भारत में एक विदेशी था. उसकी नसों में एक बूँद खून भी भारतीय नहीं था. अकबर मुगल से ज्यादा एक तुर्क था” पर देखिये! हमारे इतिहासकारों और कहानीकारों ने अकबर को एक भारतीय के रूप में पेश किया है. जबकि हकीकत यह है कि अकबर के सभी पूर्वज बाबर, हुमायूं, से लेकर तैमूर तक सब भारत में लूट, बलात्कार, धर्म परिवर्तन, मंदिर विध्वंस, आदि कामों में लगे रहे. वे कभी एक भारतीय नहीं थे और इसी तरह अकबर भी नहीं था. और इस पर भी हमारी हिंदू जाति अकबर को हिन्दुस्तान की शान समझती रही!

2. अकबर का दरबारी लिखता है कि अकबर ने इतनी ज्यादा पीनी शुरू कर दी थी कि वह मेहमानों से बात करता करता भी नींद में गिर पड़ता था. वह अक्सर ताड़ी पीता था. वह जब ज्यादा पी लेता था तो आपे से बाहर हो जाता था और पागलो के जैसे हरकत करने लगता.

3. जहाँगीर ने लिखा है कि अकबर कुछ भी लिखना पढ़ना नहीं जानता था पर यह दिखाता था कि वह बड़ा भारी विद्वान है.

4. अबुल फजल ने अकबर के हरम को इस तरह वर्णित किया है- “अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं और हर एक का अपना अलग घर था.” ये पांच हजार औरतें उसकी 36 पत्नियों से अलग थीं.
5. आइन ए अकबरी में अबुल फजल ने लिखा है- “शहंशाह के महल के पास ही एक शराबखाना बनाया गया था. वहाँ इतनी वेश्याएं इकट्ठी हो गयीं कि उनकी गिनती करनी भी मुश्किल हो गयी. दरबारी नर्तकियों को अपने घर ले जाते थे. अगर कोई दरबारी किसी नयी लड़की को घर ले जाना चाहे तो उसको अकबर से आज्ञा लेनी पड़ती थी. कई बार जवान लोगों में लड़ाई झगडा भी हो जाता था. एक बार अकबर ने खुद कुछ वेश्याओं को बुलाया और उनसे पूछा कि उनसे सबसे पहले भोग किसने किया”.

6. अब यहाँ सवाल पैदा होता है कि ये वेश्याएं इतनी बड़ी संख्या में कहाँ से आयीं और कौन थीं? आप सब जानते ही होंगे कि इस्लाम में स्त्रियाँ परदे में रहती हैं, बाहर नहीं. और फिर अकबर जैसे नेक मुसलमान को इतना तो ख्याल होगा ही कि मुसलमान औरतों से वेश्यावृत्ति कराना गलत है. तो अब यह सोचना कठिन नहीं है कि ये स्त्रियां कौन थीं. ये वो स्त्रियाँ थीं जो लूट के माल में अल्लाह द्वारा मोमिनों के भोगने के लिए दी जाती हैं, अर्थात काफिरों की हत्या करके उनकी लड़कियां, पत्नियाँ आदि. अकबर की सेनाओं के हाथ युद्ध में जो भी हिंदू स्त्रियाँ लगती थीं, ये उसी की भीड़ मदिरालय में लगती थी.

7. अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है- “जब भी कभी कोई रानी, दरबारियों की पत्नियाँ, या नयी लडकियां शहंशाह की सेवा (यह साधारण सेवा नहीं है) में जाना चाहती थी तो पहले उसे अपना आवेदन पत्र हरम प्रबंधक के पास भेजना पड़ता था. फिर यह पत्र महल के अधिकारियों तक पहुँचता था और फिर जाकर उन्हें हरम के अंदर जाने दिया जाता जहां वे एक महीने तक रखी जाती थीं.”

8. अब यहाँ देखना चाहिए कि चाटुकार अबुल फजल भी इस बात को छुपा नहीं सका कि अकबर अपने हरम में दरबारियों, राजाओं और लड़कियों तक को भी महीने के लिए रख लेता था. पूरी प्रक्रिया को संवैधानिक बनाने के लिए इस धूर्त चाटुकार ने चाल चली है कि स्त्रियाँ खुद अकबर की सेवा में पत्र भेज कर जाती थीं! इस मूर्ख को इतनी बुद्धि भी नहीं थी कि ऐसी कौन सी स्त्री होगी जो पति के सामने ही खुल्लम खुल्ला किसी और पुरुष की सेवा में जाने का आवेदन पत्र दे दे? मतलब यह है कि वास्तव में अकबर महान खुद ही आदेश देकर जबरदस्ती किसी को भी अपने हरम में रख लेता था और उनका सतीत्व नष्ट करता था.
9. रणथंभोर की संधि में अकबर महान की पहली शर्त यह थी कि राजपूत अपनी स्त्रियों की डोलियों को अकबर के शाही हरम के लिए रवाना कर दें यदि वे अपने सिपाही वापस चाहते हैं.

10. बैरम खान जो अकबर के पिता तुल्य और संरक्षक था, उसकी हत्या करके इसने उसकी पत्नी अर्थात अपनी माता के तुल्य स्त्री से शादी की.

11. ग्रीमन के अनुसार अकबर अपनी रखैलों को अपने दरबारियों में बाँट देता था. औरतों को एक वस्तु की तरह बांटना और खरीदना अकबर महान बखूबी करता था.

12. मीना बाजार जो हर नए साल की पहली शाम को लगता था, इसमें सब स्त्रियों को सज धज कर आने के आदेश दिए जाते थे और फिर अकबर महान उनमें से किसी को चुन लेते थे.
नेक दिल अकबर महान

13. 6 नवम्बर 1556  को 14 साल की आयु में अकबर महान पानीपत की लड़ाई में भाग ले रहा था. हिंदू राजा हेमू की सेना मुगल सेना को खदेड़ रही थी कि अचानक हेमू को आँख में तीर लगा और वह बेहोश हो गया. उसे मरा सोचकर उसकी सेना में भगदड़ मच गयी. तब हेमू को बेहोशी की हालत में अकबर महान के सामने लाया गया और इसने बहादुरी से हेमू का सिर काट लिया और तब इसे गाजी के खिताब से नवाजा गया. (गाजी की पदवी इस्लाम में उसे मिलती है जिसने किसी काफिर को कतल किया हो. ऐसे गाजी को जन्नत नसीब होती है और वहाँ सबसे सुन्दर हूरें इनके लिए बुक होती हैं). हेमू के सिर को काबुल भिजा दिया गया एवं उसके धड को दिल्ली के दरवाजे से लटका दिया गया ताकि नए आतंकवादी बादशाह की रहमदिली सब को पता चल सके.

14. इसके तुरंत बाद जब अकबर महान की सेना दिल्ली आई तो कटे हुए काफिरों के सिरों से मीनार बनायी गयीजो जीत के जश्न का प्रतीक है और यह तरीका अकबर महान के पूर्वजों से ही चला आ रहा है.

15. हेमू के बूढ़े पिता को भी अकबर महान ने कटवा डाला. और औरतों को उनकी सही जगह अर्थात शाही हरम में भिजवा दिया गया.

16. अबुल फजल लिखता है कि खान जमन के विद्रोह को दबाने के लिए उसके साथी मोहम्मद मिराक को हथकडियां लगा कर हाथी के सामने छोड़ दिया गया. हाथी ने उसे सूंड से उठाकर फैंक दिया. ऐसा पांच दिनों तक चला और उसके बाद उसको मार डाला गया.

17. चित्तौड़ पर कब्जा करने के बाद अकबर महान ने तीस हजार नागरिकों का कत्ल करवाया.

18. अकबर ने मुजफ्फर शाह को हाथी से कुचलवाया. हमजबान की जबान ही कटवा डाली. मसूद हुसैन मिर्ज़ा की आँखें सीकर बंद कर दी गयीं. उसके 300 साथी उसके सामने लाये गए और उनके चेहरे पर गधों, भेड़ों और कुत्तों की खालें डाल कर काट डाला गया. विन्सेंट स्मिथ ने यह लिखा है कि अकबर महान फांसी देना, सिर कटवाना, शरीर के अंग कटवाना, आदि सजाएं भी देते थे.

19. 2 सितम्बर 1593 के दिन अहमदाबाद में उसने 200 दुश्मनों के सिर काटकर अब तक की सबसे ऊंची सिरों की मीनार बनायी. वैसे इसके पहले सबसे ऊंची मीनार बनाने का सौभाग्य भी अकबर महान के दादा बाबर का ही था. अर्थात कीर्तिमान घर के घर में ही रहा!

20. अकबरनामा के अनुसार जब बंगाल का दाउद खान हारा, तो कटे सिरों के आठ मीनार बनाए गए थे. यह फिर से एक नया कीर्तिमान था. जब दाउद खान ने मरते समय पानी माँगा तो उसे जूतों में पानी पीने को दिया गया.

21. थानेश्वर में दो संप्रदायों कुरु और पुरी के बीच पूजा की जगह को लेकर विवाद चल रहा था. अकबर ने आदेश दिया कि दोनों आपस में लड़ें और जीतने वाला जगह पर कब्जा कर ले. उन मूर्ख आत्मघाती लोगों ने आपस में ही अस्त्र शस्त्रों से लड़ाई शुरू कर दी. जब पुरी पक्ष जीतने लगा तो अकबर ने अपने सैनकों को कुरु पक्ष की तरफ से लड़ने का आदेश दिया. और अंत में इसने दोनों तरफ के लोगों को ही अपने सैनिकों से मरवा डाला. और फिर अकबर महान जोर से हंसा.

22. हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर की नीति यही थी कि राजपूत ही राजपूतों के विरोध में लड़ें. बादायुनी ने अकबर के सेनापति से बीच युद्ध में पूछा कि प्रताप के राजपूतों को हमारी तरफ से लड़ रहे राजपूतों से कैसे अलग पहचानेंगे? तब उसने कहा कि इसकी जरूरत नहीं है क्योंकि किसी भी हालत में मरेंगे तो राजपूत ही और फायदा इस्लाम का होगा.

23. कर्नल टोड लिखते हैं कि अकबर ने एकलिंग की मूर्ति तोड़ी और उस स्थान पर नमाज पढ़ी.

24. एक बार अकबर शाम के समय जल्दी सोकर उठ गया तो उसने देखा कि एक नौकर उसके बिस्तर के पास सो रहा है. इससे उसको इतना गुस्सा आया कि नौकर को इस बात के लिए एक मीनार से नीचे फिंकवा दिया.

25. अगस्त 1600 में अकबर की सेना ने असीरगढ़ का किला घेर लिया पर मामला बराबरी का था. न तो वह किला टोड पाया और न ही किले की सेना अकबर को हरा सकी. विन्सेंट स्मिथ ने लिखा है कि अकबर ने एक अद्भुत तरीका सोचा. उसने किले के राजा मीरां बहादुर को आमंत्रित किया और अपने सिर की कसम खाई कि उसे सुरक्षित वापस जाने देगा. तब मीरां शान्ति के नाम पर बाहर आया और अकबर के सामने सम्मान दिखाने के लिए तीन बार झुका. पर अचानक उसे जमीन पर धक्का दिया गया ताकि वह पूरा सजदा कर सके क्योंकि अकबर महान को यही पसंद था.

उसको अब पकड़ लिया गया और आज्ञा दी गयी कि अपने सेनापति को कहकर आत्मसमर्पण करवा दे. सेनापति ने मानने से मना कर दिया और अपने लड़के को अकबर के पास यह पूछने भेजा कि उसने अपनी प्रतिज्ञा क्यों तोड़ी? अकबर ने बच्चे से पूछा कि क्या तेरा पिता आत्मसमर्पण के लिए तैयार है? तब बालक ने कहा कि उसका पिता समर्पण नहीं करेगा चाहे राजा को मार ही क्यों न डाला जाए. यह सुनकर अकबर महान ने उस बालक को मार डालने का आदेश दिया. इस तरह झूठ के बल पर अकबर महान ने यह किला जीता.

यहाँ ध्यान देना चाहिए कि यह घटना अकबर की मृत्यु से पांच साल पहले की ही है. अतः कई लोगों का यह कहना कि अकबर बाद में बदल गया था, एक झूठ बात है.

26. इसी तरह अपने ताकत के नशे में चूर अकबर ने बुंदेलखंड की प्रतिष्ठित रानी दुर्गावती से लड़ाई की और लोगों का कत्ल किया.

27. ऐसे इतिहासकार जिनका अकबर दुलारा और चहेता है, एक बात नहीं बताते कि कैसे एक ही समय पर राणा प्रताप और अकबर महान हो सकते थे जबकि दोनों एक दूसरे के घोर विरोधी थे?

28. यहाँ तक कि विन्सेंट स्मिथ जैसे अकबर प्रेमी को भी यह बात माननी पड़ी कि चित्तौड़ पर हमले के पीछे केवल उसकी सब कुछ जीतने की हवस ही काम कर रही थी. वहीँ दूसरी तरफ महाराणा प्रताप अपने देश के लिए लड़ रहे थे और कोशिश की कि राजपूतों की इज्जत उनकी स्त्रियां मुगलों के हरम में न जा सकें. शायद इसी लिए अकबर प्रेमी इतिहासकारों ने राणा को लड़ाकू और अकबर को देश निर्माता के खिताब से नवाजा है!

29. हिन्दुस्तानी मुसलमानों को यह कह कर बेवकूफ बनाया जाता है कि अकबर ने इस्लाम की अच्छाइयों को पेश किया. असलियत यह है कि कुरआन के खिलाफ जाकर 36 शादियाँ करना, शराब पीना, नशा करना, दूसरों से अपने आगे सजदा करवाना आदि करके भी इस्लाम को अपने दामन से बाँधे रखा ताकि राजनैतिक फायदा मिल सके. और सबसे मजेदार बात यह है कि वंदे मातरम में शिर्क दिखाने वाले मुल्ला मौलवी अकबर की शराब, अफीम, 36 बीवियों, और अपने लिए करवाए सजदों में भी इस्लाम को महफूज पाते हैं! किसी मौलवी ने आज तक यह फतवा नहीं दिया कि अकबर या बाबर जैसे शराबी और समलैंगिक मुसलमान नहीं हैं और इनके नाम की मस्जिद हराम है.
30. अकबर ने खुद को दिव्य आदमी के रूप में पेश किया. उसने लोगों को आदेश दिए कि आपस में “अल्लाह ओ अकबर” कह कर अभिवादन किया जाए. भोले भाले मुसलमान सोचते हैं कि वे यह कह कर अल्लाह को बड़ा बता रहे हैं पर अकबर ने अल्लाह के साथ अपना नाम जोड़कर अपनी दिव्यता फैलानी चाही. अबुल फजल के अनुसार अकबर खुद को सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) की तरह पेश करता था. ऐसा ही इसके लड़के जहांगीर ने लिखा है.

31. अकबर ने अपना नया पंथ दीन ए इलाही चलाया जिसका केवल एक मकसद खुद की बडाई करवाना था. उसके चाटुकारों ने इस धूर्तता को भी उसकी उदारता की तरह पेश किया!

32. अकबर को इतना महान बताए जाने का एक कारण ईसाई इतिहासकारों का यह था कि क्योंकि इसने हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों का ही जम कर अपमान किया और इस तरह भारत में अंग्रेजों के इसाईयत फैलाने के उद्देश्य में बड़ा कारण बना. विन्सेंट स्मिथ ने भी इस विषय पर अपनी राय दी है.

33. अकबर भाषा बोलने में बड़ा चतुर था. विन्सेंट स्मिथ लिखता है कि मीठी भाषा के अलावा उसकी सबसे बड़ी खूबी अपने जीवन में दिखाई बर्बरता है!

34. अकबर ने अपने को रूहानी ताकतों से भरपूर साबित करने के लिए कितने ही झूठ बोले. जैसे कि उसके पैरों की धुलाई करने से निकले गंदे पानी में अद्भुत ताकत है जो रोगों का इलाज कर सकता है. ये वैसे ही दावे हैं जैसे मुहम्मद साहब के बारे में हदीसों में किये गए हैं. अकबर के पैरों का पानी लेने के लिए लोगों की भीड़ लगवाई जाती थी. उसके दरबारियों को तो यह अकबर के नापाक पैर का चरणामृत पीना पड़ता था ताकि वह नाराज न हो जाए.

35. इस्लामिक शरीयत के अनुसार किसी भी इस्लामी राज्य में रहने वाले गैर मुस्लिमों को अगर अपनी संपत्ति और स्त्रियों को छिनने से सुरक्षित रखना होता था तो उनको इसकी कीमत देनी पड़ती थी जिसे जजिया कहते थे. यानी इसे देकर फिर कोई अल्लाह व रसूल का गाजी आपकी संपत्ति, बेटी, बहन, पत्नी आदि को नहीं उठाएगा. कुछ अकबर प्रेमी कहते हैं कि अकबर ने जजिया खत्म कर दिया था. लेकिन इस बात का इतिहास में एक जगह भी उल्लेख नहीं! केवल इतना है कि यह जजिया रणथम्भौर के लिए माफ करने की शर्त राखी गयी थी जिसके बदले वहाँ के हिंदुओं को अपनी स्त्रियों को अकबर के हरम में भिजवाना था! यही कारण बना की इन मुस्लिम सुल्तानों के काल में हिन्दू स्त्रियाँ जौहर में जलना अधिक पसंद करती थी.

36. यह एक सफेद झूठ है कि उसने जजिया खत्म कर दिया. आखिरकार अकबर जैसा सच्चा मुसलमान जजिया जैसे कुरआन के आदेश को कैसे हटा सकता था? इतिहास में कोई प्रमाण नहीं की उसने अपने राज्य में कभी जजिया बंद करवाया हो.

37. भारत में महान इस्लामिक शासन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि बादशाह के अपने बच्चे ही उसके खिलाफ बगावत कर बैठते थे! हुमायूं बाबर से दुखी था और जहांगीर अकबर से, शाहजहां जहांगीर से दुखी था तो औरंगजेब शाहजहाँ से. जहांगीर (सलीम) ने 1602 में खुद को बादशाह घोषित कर दिया और अपना दरबार इलाहबाद में लगाया. कुछ इतिहासकार कहते हैं की जोधा अकबर की पत्नी थी या जहाँगीर की, इस पर विवाद है. संभवतः यही इनकी दुश्मनी का कारण बना, क्योंकि सल्तनत के तख्त के लिए तो जहाँगीर के आलावा कोई और दावेदार था ही नहीं!

38. ध्यान रहे कि इतिहासकारों के लाडले और सबसे उदारवादी राजा अकबर ने ही सबसे पहले “प्रयागराज” जैसे काफिर शब्द को बदल कर इलाहबाद कर दिया था.

39. जहांगीर अपने अब्बूजान अकबर महान की मौत की ही दुआएं करने लगा. स्मिथ लिखता है कि अगर जहांगीर का विद्रोह कामयाब हो जाता तो वह अकबर को मार डालता. बाप को मारने की यह कोशिश यहाँ तो परवान न चढी लेकिन आगे जाकर आखिरकार यह सफलता औरंगजेब को मिली जिसने अपने अब्बू को कष्ट दे दे कर मारा. वैसे कई इतिहासकार यह कहते हैं कि अकबर को जहांगीर ने ही जहर देकर मारा.
अकबर महान और उसका शक्की दिमाग

40. अकबर ने एक आदमी को केवल इसी काम पर रखा था कि वह उनको जहर दे सके जो लोग अकबर को पसंद नहीं!

41. अकबर महान ने न केवल कम भरोसेमंद लोगों का कतल कराया बल्कि उनका भी कराया जो उसके भरोसे के आदमी थे जैसे- बैरम खान (अकबर का गुरु जिसे मारकर अकबर ने उसकी बीवी से निकाह कर लिया), जमन, असफ खान (इसका वित्त मंत्री), शाह मंसूर, मानसिंह, कामरान का बेटा, शेख अब्दुरनबी, मुइजुल मुल्क, हाजी इब्राहिम और बाकी सब मुल्ला जो इसे नापसंद थे. पूरी सूची स्मिथ की किताब में दी हुई है. और फिर जयमल जिसे मारने के बाद उसकी पत्नी को अपने हरम के लिए खींच लाया और लोगों से कहा कि उसने इसे सती होने से बचा लिया!


42. अकबर के शासन में मरने वाले की संपत्ति बादशाह के नाम पर जब्त कर ली जाती थी और मृतक के घर वालों का उस पर कोई अधिकार नहीं होता था.

43. अपनी माँ के मरने पर उसकी भी संपत्ति अपने कब्जे में ले ली जबकि उसकी माँ उसे सब परिवार में बांटना चाहती थी.

44. अकबर के चाटुकारों ने राजा विक्रमादित्य के दरबार की कहानियों के आधार पर उसके दरबार और नौ रत्नों की कहानी घड़ी है. असलियत यह है कि अकबर अपने सब दरबारियों को मूर्ख समझता था. उसने कहा था कि वह अल्लाह का शुक्रगुजार है कि इसको योग्य दरबारी नहीं मिले वरना लोग सोचते कि अकबर का राज उसके दरबारी चलाते हैं वह खुद नहीं.

45. प्रसिद्ध नवरत्न टोडरमल अकबर की लूट का हिसाब करता था. इसका काम था जजिया न देने वालों की औरतों को हरम का रास्ता दिखाना.

46. एक और नवरत्न अबुल फजल अकबर का अव्वल दर्जे का चाटुकार था. बाद में जहाँगीर ने इसे मार डाला.

47. फैजी नामक रत्न असल में एक साधारण सा कवि था जिसकी कलम अपने शहंशाह को प्रसन्न करने के लिए ही चलती थी. कुछ इतिहासकार कहते हैं कि वह अपने समय का भारत का सबसे बड़ा कवि था. आश्चर्य इस बात का है कि यह सर्वश्रेष्ठ कवि एक अनपढ़ और जाहिल शहंशाह की प्रशंसा का पात्र था! यह ऐसी ही बात है जैसे कोई अरब का मनुष्य किसी संस्कृत के कवि के भाषा सौंदर्य का गुणगान करता हो!

48. बुद्धिमान बीरबल शर्मनाक तरीके से एक लड़ाई में मारा गया. बीरबल अकबर के किस्से असल में मन बहलाव की बातें हैं जिनका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं. ध्यान रहे कि ऐसी कहानियाँ दक्षिण भारत में तेनालीराम के नाम से भी प्रचलित हैं.

49. अगले रत्न शाह मंसूर दूसरे रत्न अबुल फजल के हाथों सबसे बड़े रत्न अकबर के आदेश पर मार डाले गए!

50. मान सिंह जो देश में पैदा हुआ सबसे नीच गद्दार था, ने अपनी बहन जहांगीर को दी. और बाद में इसी जहांगीर ने मान सिंह की पोती को भी अपने हरम में खींच लिया. यही मानसिंह अकबर के आदेश पर जहर देकर मार डाला गया और इसके पिता भगवान दास ने आत्महत्या कर ली.

51. इन नवरत्नों को अपनी बीवियां, लडकियां, बहनें तो अकबर की खिदमत में भेजनी पड़ती ही थीं ताकि बादशाह सलामत उनको भी सलामत रखें. और साथ ही अकबर महान के पैरों पर डाला गया पानी भी इनको पीना पड़ता था जैसा कि ऊपर बताया गया है.

52. रत्न टोडरमल अकबर का वफादार था तो भी उसकी पूजा की मूर्तियां अकबर ने तुडवा दीं. इससे टोडरमल को दुःख हुआ और इसने इस्तीफा दे दिया और वाराणसी चला गया.
अकबर और उसके गुलाम

53. अकबर ने एक ईसाई पुजारी को एक रूसी गुलाम का पूरा परिवार भेंट में दिया. इससे पता चलता है किअकबर गुलाम रखता था और उन्हें वस्तु की तरह भेंट में दिया और लिया करता था.

54. कंधार में एक बार अकबर ने बहुत से लोगों को गुलाम बनाया क्योंकि उन्होंने 1581- 82 में इसकी किसी नीति का विरोध किया था. बाद में इन गुलामों को मंडी में बेच कर घोड़े खरीदे गए.

55. जब शाही दस्ते शहर से बाहर जाते थे तो अकबर के हरम की औरतें जानवरों की तरह सोने के पिंजरों में बंद कर दी जाती थीं.

56. वैसे भी इस्लाम के नियमों के अनुसार युद्ध में पकडे गए लोग और उनके बीवी बच्चे गुलाम समझे जाते हैं जिनको अपनी हवस मिटाने के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है. अल्लाह ने कुरान में यह व्यवस्था दे रखी है.

57. अकबर बहुत नए तरीकों से गुलाम बनाता था. उसके आदमी किसी भी घोड़े के सिर पर एक फूल रख देते थे. फिर बादशाह की आज्ञा से उस घोड़े के मालिक के सामने दो विकल्प रखे जाते थे, या तो वह अपने घोड़े को भूल जाये, या अकबर की वित्तीय गुलामी कुबूल करे.
कुछ और तथ्य

58. जब अकबर मरा था तो उसके पास दो करोड़ से ज्यादा अशर्फियाँ केवल आगरे के किले में थीं. इसी तरह के और खजाने छह और जगह पर भी थे. इसके बावजूद भी उसने 1595-1599 की भयानक भुखमरी के समय एक सिक्का भी देश की सहायता में खर्च नहीं किया.

59. अकबर ने प्रयागराज (जिसे बाद में इसी धर्म निरपेक्ष महात्मा ने इलाहबाद नाम दिया था) में गंगा के तटों पर रहने वाली सारी आबादी का कत्ल करवा दिया और सब इमारतें गिरा दीं क्योंकि जब उसने इस शहर को जीता तो लोग उसके इस्तकबाल करने की जगह घरों में छिप गए. यही कारण है कि प्रयागराज के तटों पर कोई पुरानी इमारत नहीं है.

60. एक बहुत बड़ा झूठ यह है कि फतेहपुर सीकरी अकबर ने बनवाया था. इसका कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है. बाकी दरिंदे लुटेरों की तरह इसने भी पहले सीकरी पर आक्रमण किया और फिर प्रचारित कर दिया कि यह मेरा है. इसी तरह इसके पोते और इसी की तरह दरिंदे शाहजहाँ ने यह ढोल पिटवाया था कि ताज महल इसने बनवाया है वह भी अपनी चैथी पत्नी की याद में जो इसके और अपने सत्रहवें बच्चे को पैदा करने के समय चल बसी थी!

तो ये कुछ उदाहरण थे अकबर “महान” के जीवन से ताकि आपको पता चले कि हमारे नपुंसक इतिहासकारों की नजरों में महान बनना क्यों हर किसी के बस की बात नहीं. क्या इतिहासकार और क्या फिल्मकार और क्या कलाकार, सब एक से एक मक्कार, देशद्रोही, कुल कलंक, हैं जिन्हें फिल्म बनाते हुए अकबर तो दीखता है पर महाराणा प्रताप कहीं नहीं दीखता. अब देखिये कि अकबर पर बनी फिल्मों में इस शराबी, नशाखोर, बलात्कारी, और लाखों हिंदुओं के हत्यारे अकबर के बारे में क्या दिखाया गया है और क्या छुपाया. बैरम खान की पत्नी, जो इसकी माता के सामान थी, से इसकी शादी का जिक्र किसी ने नहीं किया. इस जानवर को इस तरह पेश किया गया है कि जैसे फरिश्ता! 
जोधाबाई से इसकी शादी की कहानी दिखा दी पर यह नहीं बताया कि जोधा असल में जहांगीर की पत्नी थी और शायद दोनों उसका उपभोग कर रहे थे. दिखाया यह गया कि इसने हिंदू लड़की से शादी करके उसका धर्म नहीं बदला, यहाँ तक कि उसके लिए उसके महल में मंदिर बनवाया! असलियत यह है कि बरसों पुराने वफादार टोडरमल की पूजा की मूर्ति भी जिस अकबर से सहन न हो सकी और उसे झट तोड़ दिया, ऐसे अकबर ने लाचार लड़की के लिए मंदिर बनवाया, यह दिखाना धूर्तता की पराकाष्ठा है. 
पूरी की पूरी कहानियाँ जैसे मुगलों ने हिन्दुस्तान को अपना घर समझा और इसे प्यार दिया, हेमू का सिर काटने से अकबर का इनकार, देश की शान्ति और सलामती के लिए जोधा से शादी, उसका धर्म परिवर्तन न करना, हिंदू रीति से शादी में आग के चारों तरफ फेरे लेना, राज महल में जोधा का कृष्ण मंदिर और अकबर का उसके साथ पूजा में खड़े होकर तिलक लगवाना, अकबर को हिंदुओं को जबरन इस्लाम कुबूल करवाने का विरोधी बताना, हिंदुओं पर से कर हटाना, उसके राज्य में हिंदुओं को भी उसका प्रशंसक बताना, आदि ऐसी हैं जो असलियत से कोसों दूर हैं जैसा कि अब आपको पता चल गयी होंगी. “हिन्दुस्तान मेरी जान तू जान ए हिन्दोस्तां” जैसे गाने अकबर जैसे बलात्कारी, और हत्यारे के लिए लिखने वालों और उन्हें दिखाने वालों को उसी के सामान झूठा और दरिंदा समझा जाना चाहिए.

चित्तौड़ में तीस हजार लोगों का कत्लेआम करने वाला, हिंदू स्त्रियों को एक के बाद एक अपनी पत्नी या रखैल बनने पर विवश करने वाला, नगरों और गाँवों में जाकर नरसंहार कराकर लोगों के कटे सिरों से मीनार बनाने वाला, जिस देश के इतिहास में महान, सम्राट, “शान ए हिन्दोस्तां” लिखा जाए और उसे देश का निर्माता कहा जाए कि भारत को एक छत्र के नीचे उसने खड़ा कर दिया, उस देश का विनाश ही होना चाहिए. वहीं दूसरी तरफ जो ऐसे दरिंदे, नपुंसक के विरुद्ध धर्म और देश की रक्षा करता हुआ अपने से कई गुना अधिक सेनाओं से लड़ा, जंगल जंगल मारा मारा फिरता रहा, अपना राज्य छोड़ा, सब साथियों को छोड़ा, पत्तल पर घास की रोटी खाकर भी जिसने वैदिक धर्म की अग्नि को तुर्की आंधी से कभी बुझने नहीं दिया, वह महाराणा प्रताप इन इतिहासकारों और फिल्मकारों की दृष्टि में “जान ए हिन्दुस्तान” तो दूर “जान ए राजस्थान” भी नहीं था! उसे सदा अपने राज्य मेवाड़ की सत्ता के लिए लड़ने वाला एक लड़ाका ही बताया गया जिसके लिए इतिहास की किताबों में चार पंक्तियाँ ही पर्याप्त हैं. 
ऐसी मानसिकता और विचारधारा, जिसने हमें अपने असली गौरवशाली इतिहास को आज तक नहीं पढ़ने दिया, हमारे कातिलों और लुटेरों को महापुरुष बताया और शिवाजी और राणा प्रताप जैसे धर्म रक्षकों को लुटेरा और स्वार्थी बताया. संकल्प कीजिये कि अब आपके घर में अकबर की जगह राणा प्रताप की चर्चा होगी. क्योंकि इतना सब पता होने पर यदि अब भी कोई अकबर के गीत गाना चाहता है तो उस देशद्रोही और धर्मद्रोही को कम से कम इस देश में रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए.

जोधा अकबर का झूठ आखिर और कब तक ?

भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा झूठ एक बार फिर लोगों के उपर थोपने का दुश्चक्र रचा गया है। जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता है। इस देश की सभ्यता, संस्कृति को हमेशा से ही मीटाने कि कोशिश होती रही है। मगर आज जिसे वो मिटा न सके उसे अब गलत तरीके से तोड़ मरोड़ कर भ्रामक रूप से टीवी और फिल्मों में पेश करने कि कोशिश कर रहे है। इस दुश्चक्र को रचने का दुसाहस किया है बालाजी टेलिफिल्म्स ने। जी टीवी पर दिखाए जा रहे एकता कपूर के सीरियल जोधा अकबर को लेकर हिन्दू सामाज में गुस्से का माहौल है। हर तरफ आज इस सीरियल को बंद करने के लिए लोग सड़को पर उतर कर अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे है।

इस सीरियल का विरोध जम्मू कश्मीर से लेकर कन्यकुमारी तक हो रहा है। लोग सड़क से लेकर संसद तक अपना विरोध दर्ज करा रहे है। मगर सरकार क्षत्रियों कि भावनाओं को लगातार नज़र अंदाज कर रही है। इस झूठी कहानी पर रोक लगाने के लिए माननीय राजस्थान उच्च न्यायलय, जोधपुर के समक्ष पूर्व कुलपति डॉ. एल. एस. राठौर द्वारा सीरियल जोधा अकबर की झूठी कहानी के विरुद्ध एक याचिका दायर की गई है। उच्च न्यालय इस मामले में संज्ञान लेते हुए केन्द्र सरकार, राजस्थान सरकार, बालाजी टेलीफिल्म्स, एकता कपूर, जी एंटरटेनमेंट एंटरप्राइजेस लिमिटेड, इंडियन ब्रोडकास्टिंग फेडरेशन, ब्रोडकास्टिंग कंटेंट कम्प्लेट कमेटी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया किया है।

सीरियल भारत सरकार द्वारा स्वयं बनाए गए प्रोग्राम कोड का उल्लंघन है, प्रोग्राम कोड के अनुसार किसी भी सीरियल में किसी भी जाति की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाया जा सकता, अर्धसत्य नहीं हो सकता और महिलाओं को अपमानजनक स्थिति में नहीं दिखाया जा सकता है। जोधा अकबर सीरियल के विरुद्ध देश भर के अलग अलग शहरों में राजपूतो द्वारा विरोध प्रदर्शन किये जा रहें हैं लेकिन सरकार ने अभी तक कोई भी कदम नहीं उठाया है। केबल टेलीविजन एक्ट 1995 की धाराओं के अनुसार सरकार को किसी भी प्रसारण को रोकने के सम्पूर्ण अधिकार हैं। फिर भी सरकार तमाशबीन बनी हुई है। ऐसे में सवाल सरकार और प्रशासन  दोनों को लेकर खड़ा होता है कि क्या किसी बड़े सांप्रदायिक हिंसा होने का इंतजार किया जा रहा है।

केबल टीवी नेटवर्क एक्ट की धारा 16 के तहत कलेक्टर, एस डी एम या कमिश्नर के पास अधिकार है की कोई भी कार्यक्रम यदि प्रोग्राम कोड का उलंघन करता है तो वह उसे खिलाफ क्रिमिनल कमप्लेंट दायर कर सकता है। साथ ही केबल टीवी नेटवर्क एक्ट की धारा 20 के तहद भारत सरकार को सम्पूर्ण भारत में प्रोग्राम को रोकने का अधिकार है, यदि प्रोग्राम कोड का उल्लंघन होता है।

क्षत्रिय संगठन और इतिहासकारों का अस्पस्ट तौर पे मानना है कि जोधा ने अकबर से कभी शादी की ही नहीं थी। ये राजपूतों के जज्बात, षौर्य और वीरता के इतिहास के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। क्षत्रिय संगठनों ने सरकार और प्रसारक को अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि अगर इसे नहीं रोका गया तो, वे 18 अगस्त से दिल्ली के जंतर मंतर सहित देश भर में आंदोलन करेंगे।
अगर अकबरी इतिहास कि पुस्तक “अकबर ए महुरियत” आईने अकबरी, जहाँगीर नामा को देखे तो कही भी जोघा अकबर की शादी के बारे में कोई भी जिक्र नहीं है। इसके अलावे तजुक ए जहांगीरी जिसमें जहांगीर की आत्मकथा है उसमें जोधा बाई का कही भी उल्लेख नहीं है। तो ऐसे में फिर आज के तथाकथित इतिहासकार और फिल्मकार स्वयं का नया इतिहास सृजित करने में क्यों लगे हुए है?

1960 के दशक में निर्देषित पृथ्वीराज कपूर का बेमिसाल अभिनय तमाम ऐतिहासिकताओं पर भारी कैसे हो सकता है? जिस फिल्म में कही भी मुगलों से हिन्दू राजकुमारीयों की शादी का जिक्र तक नहीं है, और ना ही जोधा कि कोई चर्चा। अबुल फज्ल के अकबरनामा तक में अकबर की 34 रानियों में से किसी का भी नाम जोधाबाई नहीं था, तो के. आसिफ और आशुतोष गोवरिकर और एकता कपूर कौनसा नया अकबरनामा लिखने की कोशिश कर रहे हैं? इन सभी तथ्यों का अध्ययन करने के बाद सवाल खड़ा होता है की जोधा अकबर का झूठ आखिर और कब तक ?

जोधा अकबर विवाह की हक़ीकत !

अकबर का विवाह जोधाबाई के नाम पर दीवान वीरमल की बेटी पानबाई के साथ रचाया गया था. दीवान वीरमल का पिता खाजूखाँ अकबर की सेना का मुखिया था. किसी बड़ी गलती के कारण अकबर ने खाजूखाँ को जेल में डालकर खोड़ाबेड़ी पहना दी और फाँसी का हुक्म दिया. मौका पाकर खाजूखाँ खोड़ाबेड़ी तोड़ जेल से भाग गया और सपरिवार जयपुर आ पगड़ी धारणकर शाह बन गया. खाजूखाँ का बेटा वीरमल बड़ा ही तेज और होनहार था, सो दीवान बना लिया गया. यह भेद बहुत कम लोगों को ही ज्ञात था.! दीवान वीरमल का विवाह दीवालबाई के साथ हुआ था. पानबाई वीरमल और दीवालबाई की पुत्री थी. पानबाई और जोधाबाई हम उम्र व दिखने में दोनों एक जैसी थी. इस प्रकरण में मेड़ता के राव दूदा राजा मानसिंह के पूरे सहयोगी और परामर्शक रहे. राव दूदा के परामर्श से जोधाबाई को जोधपुर भेज दिया गया. इसके साथ हिम्मत सिंह और उसकी पत्नी मूलीबाई को जोधाबाई के धर्म के पिता-माता बनाकर भेजा गया, परन्तु भेद खुल जाने के डर से दूदा इन्हें मेड़ता ले गया, और वहाँ से ठिकानापति बनाकर कुड़की भेज दिया. जोधाबाई का नाम जगत कुंवर कर दिया गया और राव दूदा ने उससे अपने पुत्र का विवाह रचा दिया. इस प्रकार जयपुर के राजा भारमल की बेटी जोधाबाई उर्फ जगत कुंवर का विवाह तो मेड़ता के राव दूदा के बेटे रतन सिंह के साथ हुआ था. विवाह के एक वर्ष बाद जगत कुंवर ने एक बालिका को जन्म दिया. यही बालिका मीराबाई थी. इधर विवाह के बाद अकबर ने कई बार जोधाबाई (पानबाई) को कहा कि वह मानसिंह को शीघ्र दिल्ली बुला ले. पहले तो पानबाई सुनी अनसुनी करती रही परन्तु जब अकबर बहुत परेशान करने लगा तो पानबाई ने मानसिंह के पास समाचार भेजा कि वें शीघ्र दिल्ली चले आये नहीं तो वह सारा भेद खोल देगी. ऐसी स्थिति में मानसिंह क्या करते, उन्हें न चाहते हुए भी मजबूर होकर दिल्ली जाना पड़ा. अकबर व पानबाई उर्फ जोधाबाई दम्पति की संतान सलीम हुए, जिसे इतिहास जहाँगीर के नाम से जानता है !

अकबर का घमंड !

ज्वालामुखी मंदिर के संबंध में एक कथा काफी प्रचलित है। यह 1542 से 1605 के मध्य का ही होगा तभी अकबर दिल्ली का राजा था। ध्यानुभक्त माता जोतावाली का परम भक्त था। एक बार देवी के दर्शन के लिए वह अपने गांववासियो के साथ ज्वालाजी के लिए निकला। जब उसका काफिला दिल्ली से गुजरा तो मुगल बादशाह अकबर के सिपाहियों ने उसे रोक लिया और राजा अकबर के दरबार में पेश किया। अकबर ने जब ध्यानु से पूछा कि वह अपने गांववासियों के साथ कहां जा रहा है तो उत्तर में ध्यानु ने कहा वह जोतावाली के दर्शनो के लिए जा रहे है। अकबर ने कहा तेरी मां में क्या शक्ति है ? और वह क्या-क्या कर सकती है ? तब ध्यानु ने कहा वह तो पूरे संसार की रक्षा करने वाली हैं। ऐसा कोई भी कार्य नही है जो वह नहीं कर सकती है। अकबर ने ध्यानु के घोड़े का सर कटवा दिया और कहा कि अगर तेरी मां में शक्ति है तो घोड़े के सर को जोड़कर उसे जीवित कर दें। यह वचन सुनकर ध्यानु देवी की स्तुति करने लगा और अपना सिर काट कर माता को भेट के रूप में प्रदान किया। माता की शक्ति से घोड़े का सर जुड गया। इस प्रकार अकबर को देवी की शक्ति का एहसास हुआ। बादशाह अकबर ने देवी के मंदिर में सोने का छत्र भी चढाया। किन्तु उसके मन मे अभिमान हो गया कि वो सोने का छत्र चढाने लाया है, तो माता ने उसके हाथ से छत्र को गिरवा दिया और उसे एक अजीब (नई) धातु का बना दिया जो आज तक एक रहस्य है। यह छत्र आज भी मंदिर में मौजूद है।

अकबर के लिए आक्रोश की हद एक घटना से पता चलती है। हिन्दू किसानों के एक नेता राजा राम ने अकबर के मकबरे, सिकंदरा, आगरा को लूटने का प्रयास किया, जिसे स्थानीय फौजदार, मीर अबुल फजल ने असफल कर दिया। इसके कुछ ही समय बाद 1688 में राजा राम सिकंदरा में दोबारा प्रकट हुआ और शाइस्ता खां के आने में विलंब का फायदा उठाते हुए, उसने मकबरे पर दोबारा सेंध लगाई, और बहुत से बहुमूल्य सामान, जैसे सोने, चाँदी, बहुमूल्य कालीन, चिराग, इत्यादि लूट लिए, तथा जो ले जा नहीं सका, उन्हें बर्बाद कर गया। राजा राम और उसके आदमियों ने अकबर की अस्थियों को खोद कर निकाल लिया एवं जला कर भस्म कर दिया, जो कि मुस्लिमों के लिए घोर अपमान का विषय था।

मरियम के मकबरे का हक़ीकत !

आगरा के निकट सिकन्दरा में अकबर के मकबरे के सामने सड़क के दूसरी ओर कुछ आगे एक मकबरा और है जिसे मरियम का मकबरा कहा जाता है. इस मकबरे के प्रवेश द्वार के निकट भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा एक बोर्ड लगाया हुआ है जिसमें बताया गया है कि मरियम अकबर की पत्नी जोधाबाई की ही उपाधि थी और इस प्रकार इस मकबरे को जोधाबाई का मकबरा सिद्ध किया गया है. भारत के अकबर कालीन इतिहास का पूरा लेखा-जोखा उपलब्ध है किन्तु उसमें ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि जोधाबाई को कबी मरियम भी कहा गया था. यदि ऐसा कोई प्रमाणित सूत्र उपलब्ध हो तो मेरा भारत के प्रतिष्ठित इतिहासकारों से निवेदन है कि वे उसे प्रकाश में लायें. पुरातत्व सर्वेक्षण जैसा छल अकबर के मकबरे के बारे में हो रहा है, मरियम के मकबरे में उससे कहीं अधिक घिनोना छल कर रहा है. भारत के तथाकथित इतिहासकार जीसस तथा मरियम को भारत के इतिहास के पात्र नहीं मानते, इसलिए सदा-सदा से जाने गए मरियम के मकबरे को जोधाबाई का मकबरा कहा जा रहा है.

अकबर के मकबरे के सामने सड़क के दूसरी ओर का विशाल क्षेत्र इसाई समुदाय की संपत्ति है, जिसपर एक चर्च, एक स्कूल तथा अनेक आवास बने हैं. इन्ही के मध्य उक्त मरियम का मकबरा है. भारत में जहाँ कहीं भी प्राचीन भवनों एवं स्थलों पर मुगल शासन काल में इस्लामी तख्तियां लगाई गयीं, उन सब को मुस्लिमों के अधिकार में दे दिया गया था, फलस्वरूप, तःमहल प्रांगण के अनेक भवन, फतहपुर सीकरी के भवन, तथा आगरा के अनेक ऐतिहासिक भवनों पर मुसलामानों का अधिकार है. अकबर के तथाकथित मकबरे पर भी मुस्लिम अधिकार बना हुआ है. इस सबके रहते हुए भी मरियम के मकबरे पर कोई मुस्लिम अधिकार नहीं है और इसके ईसाई संपत्ति होने से सिद्ध होता है कि यह मकबरा किसी ऐसी स्त्री का है जिसका सम्बन्ध ईसाई धर्म से है. इस कारण से मुगल साम्राज्य काल में भी इसे इस्लाम से सम्बंधित नहीं कहा गया और इस पर अधिकार नहीं किया गया. इससे स्पष्ट है कि यह मकबरा जोधाबाई का न होकर जीसस की बहिन मरियम का है.

मरियम के मकबरे का आतंरिक अभिकल्प (ऊपर का चित्र) अन्य किसी भी मकबरे से भिन्न है और यह पशिमी बंगाल में स्थित विष्णुपुर में बने प्राचीन कालीन महलों (नीचे का चित्र) से मेल खाता है. मेरे द्वारा भारत के शोधित इतिहास में महाभारत युद्ध के पश्चात जब देवों की संख्या क्षीण हो गयी थी तब विष्णु (लक्ष्मण) ने मरियम से विवाह किया था जिसने चन्द्रगुप्त को जन्म दिया था. इस युद्ध में पांडव पक्ष का  नीतिकार कृष्ण था और कौरव पक्ष के नीतिकार शकुनी के छद्म रूप में स्वयं विष्णु थे. महाभारत युद्ध के बाद कृष्ण और सिकंदर के आग्रह पर महा पद्मानंद को भारत का सम्राट बनाया गया था.

महाभारत की पराजय का बदला लेने के लिए विष्णु ने अपना नाम विष्णुगुप्त चाणक्य रखा और जीसस ने अपना नाम चित्रगुप्त रखा और भारत को महा पद्मानंद के शासन से मुक्त कराने का बीड़ा उठाया जिसमें वे सफल रहे और चन्द्रगुप्त को भारत का सम्राट बनाया गया. यहीं से गुप्त वंश के शासन का आरम्भ हुआ और भारत विश्व प्रसिद्द सोने की चिडिया कहलाया. अतः उक्त मकबरा वास्तविक मरियम का ही मकबरा है, जो जीसस की बहिन, विष्णु की पत्नी, एवं चन्द्र गुप्त की माँ थीं !

अकबर की हक़ीकत !

अकबर के शासनकाल में वेश्यावृति को सम्राट का संरक्षण प्रदान था। अकबर अपने हरम में स्त्रियों को बलपूर्वक अपहृत करवा कर रखाता था। अकबर अपने हरम में सती होने वाली महिलाओं को बलपूर्वक उठवा कर रखता था अकबर सामूहिक रूप से स्त्रियों का नग्न प्रदर्शन आयोजित करने के लिए अपने प्रजा को बाध्य करता था। अकबर इसे खुदारोज (प्रमोद दिवस) नाम दिया हुआ था। इस आयोजन से अकबर सुन्दरियों को अपने हरम के लिए चुनना था। गोंडवाना की रानी दुर्गावती पर भी अकबर की कुदृष्टि थी। अकबर रानी दुर्गावती को प्राप्त करने के लिए उसके राज्य पर आक्रमण किया था। अकबर द्वारा बंदी बनाए जाने से पहले ही रानी दुर्गावती ने आत्महत्या कर ली थी अकबर ने रानी दुर्गावती की बहन और पुत्रबधू को बलपूर्वक अपने हरम में डाल दिया था। अकबर ने यह प्रथा भी चलाई थी कि उसके पराजित शत्रु अपने परिवार एवं परिचारिका वर्ग में से चुनी हुई महिलायें उसके हरम में भेजे। 

 हिन्दुओं का इस्लामीकरण !

अकबर ने हिन्दुओं पर लगे जजिया कर लगाया था। अकबर ने गरीब हिन्दुओं को गरीबी से विवश होकर इस्लाम की शरण लेने के लिए जजिया कर लगाया था। गरीब हिन्दू विवश हो कर इस्लाम कबूल कर लिया करते थे। जजिया कर इस्लाम को बढ़ावा देने के लिए लगाया गया था। अकबर ने बहुत से हिन्दुओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध भी इस्लाम ग्रहण करवाया था। अकबर ने बहुत से हिन्दू तीर्थ स्थानों के नाम भी इस्लामी किया था। अकबर ने प्रयाग का नाम इलाहाबाद रखा था। हिन्दुओं को बलपूर्वक भेदभाव दर्शक बिल्ले उनके कंधों और बांहों पर लगाने को विवश किया था।

सरकार पाकिस्तान को क्यों बचा रही है?

आजादी के बाद अंग्रेजी हुकूमत द्वारा चली गयी भारत-पाक विभाजन की अंतिम चाल आज दोनों मुल्कों के लिए नासूर बन चुकी है। भारत और पाकिस्तान के बीच शांति और समझौतों की सारी संभावनाएं थकी-हारी-सी लाचार नजर आ रही हैं, और हमारी सरकार अपनी लाचारी पाकिस्तान के आगे सर झुकाए खड़ी है। पाकिस्तान आज कायरता कि शारी हदें पार कर चुका है। मगर भारत सरकार इसका मुहतोड़ जवाब देने बजाय पाकिस्तान को क्लीन चीट देने में लगी है।

अपनी आत्मघाती चरित्र के लिए हमेशा से कुख्यात पाकिस्तान ने एक बार फिर भारत-पाक सीमा पर ऐसी घिनौनी हरकतों को अंजाम दे रहा है जिसे देख कर आज देष आक्रोष से उबल रहा है। मगर इससे कही  जयादा भारत सरकार के रक्षामंत्री का बयान दुख और आक्रोश को बढ़ा देने वाला है। सरकार पाकिस्तान पर सख्त नीति अख्तियार कर ईंट का जवाब पत्थर से देने के बजाय उसे ये कह कर क्लीन चीट देने में देर नहीं कि और कहा कि पाकिस्तानी सेना के लिबास में आये कुछ लोगों ने भारतीय सेना पर गोलीबारी की ये एक आतंकवादी घटना थी।

आज हमारे जांबाज सैनिक बिना किसी वजह के जान गवां रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हमारे सियासी रहनुमा अपने बयानों से देश और सेना का हौसला बढ़ाने के बजाय पस्त करने में लगे हैं। रक्षा मंत्री के बयान से तो ऐसा लगता है कि वे भारत के रक्षा मंत्री नहीं बल्कि पाकिस्तान के रक्षामंत्री का बयान हो। क्या यही है सरकार की विदेश नीति? हमेशा से ही भारत सरकार कि ओर से पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने कि पहल होती रही है मगर पाकिस्तान हर बार पीठ पीछे हमला करता रहा है। बात चाहे जनवरी 1966 में किया गया ताशकंद समझौता हो या फिर जुलाई 1972 का शिमला समझौता या फिर, 2001 में आगरा शिखर वार्ता हर प्रयास असफल ही रहा है।

हर बार पाक ने अपना नापाक चेहरा दिखाया है, ऐसे में भारत सरकार किस उमिद के साथ ये ख्याल पाल रही है कि पाकिस्तान को क्लीन चिट देने से वह रीस्तों में सुधार लाएगा, या फिर अपनी करतूतों को भूल कर अमेरीका में भारत के प्रधानमंत्री से मुलाकरत कर दोस्ती का कोई नया इतिहास बना पाएगा। ऐसे में सवाल इस बात को लेकर उठ रहा है कि सरकार पाकिस्तान को लेकर लेकर इतनी लापरवाह क्यों होती जा रही हैं?

भारतीय सीमा सुरक्षा के मामले में हमारी नीतियां ढाक के तीन पात क्यों बन रही है? सवाल ये भी है कि आखिर भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान के साथ दोस्ती कायम करने के लिए और कितनी कुर्बानियों को यों ही चुप रहकर स्वीकार किया जाता रहेगा? सरकार और कितने सैनिकों का सर काटवाऐगी? कितने जाबांजों की जान झोंकने के बाद हमारी सरकार को यह एहसास होगा कि वाकई पाकिस्तान के साथ नरम रुख रखना राष्ट्रहित में नहीं है? पाकिस्तान को सख्त और मुंहतोड़ जवाब देने का वक्त हाथ से निकल रहा है। मगर एैसे में भारत सरकार के रवैये को देखते हुए सवाल खड़ा होता है कि सरकार पाकिस्तान को क्यों बचा रही है?

Tuesday, August 6, 2013

भारत में गौ हत्या की हक़ीकत और ऐतिहासिक परिदृश्य !

भारत में गौ हत्या को लेकर कई आंदोलन हुए हैं और कई आज भी जारी हैंए लेकिन किसी में भी कोई ख़ास कामयाबी हासिल नहीं हो सकी. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्हें जनांदोलन का रूप नहीं दिया गया यह कहना क़तई ग़लत न होगा कि ज़्यादातर आंदोलन स़िर्फ अपनी सियासत चमकाने या चंदा उगाही तक सीमित रहे. अल कबीर स्लास्टर हाउस में रोज़ हज़ारों गाय काटी जाती हैं. कुछ साल पहले हिंदुत्ववादी संगठनों ने इसके ख़िलाफ़ मुहिम भी छेड़ी थीए लेकिन जैसे ही यह बात सामने आई कि इसका मालिक ग़ैर मुसलमान है तो अभियान को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. जगज़ाहिर है, गौ हत्या से सबसे बड़ा फ़ायदा तस्करों एवं गाय के चमड़े का कारोबार करने वालों को होता है. इनके दबाव के कारण ही सरकार गौ हत्या पर पाबंदी लगाने से गुरेज़ करती है. वरना क्या वजह है कि जिस देश में गाय को माता के रूप में पूजा जाता हो, वहां सरकार गौ हत्या रोकने में नाकाम है.

हैरत की बात यह है कि गौ हत्या पर पाबंदी लगाने की मांग लंबे समय से चली आ रही है, इसके बावजूद अभी तक इस पर कोई विशेष अमल नहीं किया गयाए जबकि मुस्लिम शासनकाल में गौ हत्या पर सख्त पाबंदी थी. क़ाबिले ग़ौर है कि भारत में मुस्लिम शासन के दौरान कहीं भी गौकशी को लेकर हिंदू और मुसलमानों में टकराव देखने को नहीं मिलता.

ग़ौरतलब है कि देश में बड़े पैमाने पर गौकशी होती है. यह सब गौ मांस और उसके अवशेषों के लिए किया जाता है, जिससे भारी मुनाफ़ा होता है. मांस के लिए गायों को तस्करी के ज़रिए पड़ोसी देशों में भेजा जाता है. इस सबकी वजह से सवा अरब से ज़्यादा की आबादी वाले इस देश में दुधारू पशुओं की तादाद महज़ 16 करोड़ है. केंद्र सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ़ एनिमल हसबेंडरी के मुताबिक़ए 1951 में 40 करोड़ की आबादी पर 15 करोड़ 53 लाख पशु थे. इसी तरह 1962 में 93 करोड़ की आबादी पर 20 करोड़ 45 लाखए 1977 में 19 करोड़ 47 लाखए 2003 में 18 करोड़ 51 लाख 80 हज़ार पशु बचे और 2009 में यह तादाद घटकर महज़ 16 करोड़ रह गई. पशुधन विभाग के मुताबिक़ए उत्तर प्रदेश में 314 वधशालाएं हैं. इनकी वजह से हर साल लाखों पशु कम हो रहे हैं. केरल में 2002 में एक लाख 11 हज़ार 665 दुधारू पशु थे, जो 2003 में घटकर 64 हज़ार 618 रह गए. राजधानी दिल्ली में 19.13 फ़ीसदी दुधारू पशु कम हुए हैं. जबकि गायों की दर 38.63 फ़ीसदी घटी है. यहां महज़ छह हज़ार 539 गाय हैं, जबकि दो लाख तीन हज़ार भैंसें हैं. मिज़ोरम में 34 हज़ार 988 गाय एवं सांड हैं, जो पिछले साल के मुक़ाबले 1.60 फ़ीसदी कम हैं. तमिलनाडु में 55 लाख 93 हज़ार 485 भैंसें और 16 लाख 58 हज़ार 415 गाय हैं.

हैरत की बात यह है कि गौ हत्या पर पाबंदी लगाने की मांग लंबे समय से चली आ रही है. इसके बावजूद अभी तक इस पर कोई विशेष अमल नहीं किया गयाए जबकि मुस्लिम शासनकाल में गौ हत्या पर सख्त पाबंदी थी. क़ाबिले ग़ौर है कि भारत में मुस्लिम शासन के दौरान कहीं भी गौकशी को लेकर हिंदू और मुसलमानों में टकराव देखने को नहीं मिलता. अपने शासनकाल के आख़िरी साल में जब मुगल बादशाह बाबर बीमार हो गया तो उसके प्रधान ख़ली़फा निज़ामुद्दीन के हुक्म पर सिपहसालार मीर बाक़ी ने अवाम को परेशान करना शुरू कर दिया. जब इसकी ख़बर बाबर तक पहुंची तो उन्होंने क़ाबुल में रह रहे अपने बेटे हुमायूं को एक पत्र लिखा, बाबरनामे में दर्ज इस पत्र के मुताबिक़ए बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को नसीहत करते हुए लिखा.हमारी बीमारी के दौरान मंत्रियों ने शासन व्यवस्था बिगाड़ दी है, जिसे बयान नहीं किया जा सकता. हमारे चेहरे पर कालिख पोत दी गई हैए जिसे पत्र में नहीं लिखा जा सकता. तुम यहां आओगे और अल्लाह को मंजूर होगाए तब रूबरू होकर कुछ बता पाऊंगा. अगर हमारी मुलाक़ात अल्लाह को मंजूर न हुई तो कुछ तजुर्बे लिख देता हूंए जो हमें शासन व्यवस्था की बदहाली से हासिल हुए हैं, जो तुम्हारे काम आएंगे. 1,  तुम्हारी ज़िंदगी में धार्मिक भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए. तुम्हें निष्पक्ष होकर इंसाफ़ करना चाहिए. जनता के सभी वर्गों की धार्मिक भावना का हमेशा ख्याल रखना चाहिए.

2. तुम्हें गौ हत्या से दूर रहना चाहिएण् ऐसा करने से तुम हिंदुस्तान की जनता में प्रिय रहोगे. इस देश के लोग तुम्हारे आभारी रहेंगे और तुम्हारे साथ उनका रिश्ता भी मज़बूत हो जाएगा.

3. तुम किसी समुदाय के धार्मिक स्थल को न गिराना. हमेशा इंसाफ़ करनाए जिससे बादशाह और प्रजा का संबंध बेहतर बना रहे और देश में भी चैन.अमन क़ायम रहे.

क़ुरआन में दूध और ऊन देने वाले पशुओं का ज़िक्र.

भारत में गौ हत्या को बढ़ावा देने में अंग्रेज़ों ने अहम भूमिका निभाई. जब 1700 ई, में अंग्रेज़ भारत आए थे. उस वक़्त यहां गाय और सुअर का वध नहीं किया जाता था. हिंदू गाय को पूजनीय मानते थे और मुसलमान सुअर का नाम तक लेना पसंद नहीं करते थे, लेकिन अंग्रेजों को इन दोनों ही पशुओं के मांस की ज़रूरत थी. इसके अलावा वे भारत पर क़ब्ज़ा करना चाहते थे. उन्होंने मुसलमानों को भड़काया कि क़ुरआन में कहीं भी नहीं लिखा है कि गाय की क़ुर्बानी हराम है. इसलिए उन्हें गाय की क़ुर्बानी करनी चाहिए. उन्होंने मुसलमानों को लालच भी दिया और कुछ लोग उनके झांसे में आ गए. इसी तरह उन्होंने दलित हिंदुओं को सुअर के मांस की बिक्री कर मोटी रकम कमाने का झांसा दिया. ग़ौरतलब है कि यूरोप दो हज़ार बरसों से गाय के मांस का प्रमुख उपभोक्ता रहा है. भारत में अपने आगमन के साथ ही अंग्रेज़ों ने यहां गौ हत्या शुरू करा दी, 18वीं सदी के आख़िर तक बड़े पैमाने पर गौ हत्या होने लगी. अंग्रेज़ों की बंगालए मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी सेना के रसद विभागों ने देश भर में कसाईखाने बनवाए. जैसे.जैसे यहां अंग्रेज़ी सेना और अधिकारियों की तादाद बढ़ने लगी, वैसे. वैसे गौ हत्या में भी बढ़ोत्तरी होती गई.

गौ हत्या और सुअर हत्या की आड़ में अंग्रेज़ों को हिंदू और मुसलमानों में फूट डालने का भी मौक़ा मिल गया. इस दौरान हिंदू संगठनों ने गौ हत्या के ख़िला़फ मुहिम छेड़ दी. आख़िरकार महारानी विक्टोरिया ने वायसराय लैंस डाउन को पत्र लिखा. महारानी ने कहाए हालांकि मुसलमानों द्वारा की जा रही गौ हत्या आंदोलन का कारण बनी है, लेकिन हक़ीक़त में यह हमारे ख़िलाफ़ है, क्योंकि मुसलमानों से कहीं ज़्यादा गौ वध हम कराते हैंण् इसके ज़रिए ही हमारे सैनिकों को गौ मांस मुहैया हो पाता हैण् आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने भी 28 जुलाईए 1857 को बकरीद के मौक़े पर गाय की क़ुर्बानी न करने का फ़रमान जारी किया था. साथ ही चेतावनी दी थी कि जो भी गौ वध करने या कराने का दोषी पाया जाएगा. उसे मौत की सज़ा दी जाएगी. इसके बाद 1892 में देश के विभिन्न हिस्सों से सरकार को हस्ताक्षरयुक्त पत्र भेजकर गौ वध पर रोक लगाने की मांग की जाने लगी. इन पत्रों पर हिंदुओं के साथ मुसलमानों के भी हस्ताक्षर होते थे. इस समय भी देशव्यापी अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें केंद्र सरकार से गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और भारतीय गौवंश की रक्षा के लिए कठोर क़ानून बनाए जाने की मांग की जा रही है.

गाय की रक्षा के लिए अपनी जान देने में भारतीय मुसलमान किसी से पीछे नहीं हैं. उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले के गांव नंगला झंडा निवासी डॉ. राशिद अली ने गौ तस्करों के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी थी, जिसके चलते 20 अक्टूबरए 2003 को उन पर जानलेवा हमला किया गया और उनकी मौत हो गई, उन्होंने 1998 में गौ रक्षा का संकल्प लिया था और तभी से डॉक्टरी का पेशा छोड़कर वह अपनी मुहिम में जुट गए थे. गौ वध को रोकने के लिए विभिन्न मुस्लिम संगठन भी सामने आए हैं. दारूल उलूम देवबंद ने एक फ़तवा जारी करके मुसलमानों से गौ वध न करने की अपील की है. दारूल उलूम देवबंद के फतवा विभाग के अध्यक्ष मुती हबीबुर्रहमान का कहना है कि भारत में गाय को माता के रूप में पूजा जाता है. इसलिए मुसलमानों को उनकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए गौ वध से ख़ुद को दूर रखना चाहिए. उन्होंने कहा कि शरीयत किसी देश के क़ानून को तोड़ने का समर्थन नहीं करती. क़ाबिले ग़ौर है कि इस फ़तवे की पाकिस्तान में कड़ी आलोचना की गई थी. इसके बाद भारत में भी इस फ़तवे को लेकर ख़ामोशी अख्तियार कर ली गई.

गाय भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा है. यहां गाय की पूजा की जाती है. यह भारतीय संस्कृति से जुड़ी है. महात्मा गांधी कहते थे कि अगर निस्वार्थ भाव से सेवा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहीं देखने को मिलता है तो वह गौ माता है. गाय का ज़िक्र करते हुए वह लिखते हैं, गौ माता जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ है. हमारी माता हमें दो वर्ष दुग्धपान कराती है और यह आशा करती है कि हम बड़े होकर उसकी सेवा करेंगे. गाय हमसे चारे और दाने के अलावा किसी और चीज़ की आशा नहीं करती. हमारी मां प्रायरू रूग्ण हो जाती है और हमसे सेवा की अपेक्षा करती है. गौ माता शायद ही कभी बीमार पड़ती है. वह हमारी सेवा आजीवन ही नहीं करतीए अपितु मृत्यु के बाद भी करती है. अपनी मां की मृत्यु होने पर हमें उसका दाह संस्कार करने पर भी धनराशि व्यय करनी पड़ती है. गौ माता मर जाने पर भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होती है, जितनी अपने जीवनकाल में थी. हम उसके शरीर के हर अंग.मांस, अस्थियांए आंतों, सींग और चर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह बात जन्म देने वाली मां की निंदा के विचार से नहीं कह रहा हूंए बल्कि यह दिखाने के लिए कह रहा हूं कि मैं गाय की पूजा क्यों करता हूं.

ग़ौरतलब है कि उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य है, जहां सरकार ने गौ हत्या एक्ट में संशोधन कर सज़ा को दस साल करने का प्रावधान किया है. पिछले साल पंजाब में गौ सेवा बोर्ड ने गौ हत्या रोकने के लिए दस साल की सज़ा का प्रस्ताव बनाकर मुख्यमंत्री के पास भेजा था, जिसे विधानसभा से मंज़ूरी मिलने के बाद राष्ट्रपति को भेजा जा चुका है. इसके अलावा गौ सेवा बोर्ड के प्रस्ताव में राजाओं द्वारा गौधन की सेवा के लिए दान दी गई ज़मीनों को भू.माफ़ियाओं के क़ब्ज़े से छुड़ाने, सुप्रीमकोर्ट एवं हाईकोर्ट के गौधन संबंधी आदेश लागू करना भी शामिल है. जम्मू.कश्मीर सरकार ने भी गौ हत्या और गौ तस्करी रोकने के लिए कड़े क़दम उठाए थे. दरअसल भारत में गौ वध रोकने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए जाने की ज़रूरत है. मुसलमान तो गाय का गोश्त खाना छोड़ देंगे. लेकिन गाय के चमड़े का कारोबार करने वाले क्या इससे हो रही मोटी कमाई छोड़ने के लिए तैयार हैं. इस बात में कोई दो राय नहीं कि गौ हत्या से सबसे ज़्यादा फ़ायदा ग़ैर मुसलमानों को है और उन्हीं के दबाव में सरकार गौ हत्या पर पाबंदी नहीं लगाना चाहती.

हदीस में गाय के दूध फ़ायदेमंद और मांस नुक़सानदेह.

1. उम्मुल मोमिनीन ;हजरत मुहम्मद साहब की पत्नीद्ध फरमाती हैं कि नबी, करीम हज़रत मुहम्मद सल फ़रमाते हैं कि गाय का दूध व घी फ़ायदेमंद है और गोश्त बीमारी पैदा करता है.

2.  नबी.ए.करीम हज़रत मुहम्मद सल फ़रमाते हैं कि गाय का दूध फ़ायदेमंद हैए घी इलाज है और गोश्त से बीमारी बढ़ती है.

3. नबी.ए.करीम हजरत मुहम्मद सलण् फ़रमाते हैं कि तुम गाय के दूध और घी का सेवन किया करो और गोश्त से बचोए क्योंकि इसका दूध और घी फ़ायदेमंद है और इसके गोश्त से बीमारी पैदा होती है.

4.  नबी.ए.करीम हज़रत मुहम्मद सल, फ़रमाते हैं कि अल्लाह ने दुनिया में जो भी बीमारियां उतारी हैंए उनमें से हर एक का इलाज भी दिया है. जो इससे अंजान है वह अंजान ही रहेगा. जो जानता है, वह जानता ही रहेगा. गाय के घी से ज़्यादा स्वास्थ्यवर्द्धक कोई चीज़ नहीं है.

क्या दोस्ती के मायने बदल गए है ?

आज पूरा एशिया महादेश फ्रेंडशिप डे मना रहा है, मगर पीछले कुछ सालों में जिस प्रकार से दोस्ती के रिस्तों में गिरावट आई है, उसको इस रिस्ते पर सवालिया निशान लग गया है। इस लिए आज हम आपके बिच इस विषय को लेकर कर आए है। जिसकी सुरूआत हम इस दोहे के साथ कर रहे है। 

                                                    मथत मथत माखन रही, दही मही बिलगाव।
                                                    रहिमन सोई मीत हैं, भीर परे ठहराय।।

रहीम कहते हैं कि जब दही को लगातार माथा जाता है तो उसमें से मक्खन अलग हो जाता है और दही मट्ठे में विलीन होकर मक्खन को अपने ऊपर आश्रय देती है, इसी प्रकार सच्चा मित्र वही होता है जो विपत्ति आने पर भी साथ नहीं छोड़ता।

मगर आज के दौर में दोस्ती के मायने बदल गये है। आज दोस्ती सिर्फ नाफे नुकसान के लिए हो रही है। जब मन किया दोस्त बना लिए और, जब नीजि हीत पूरा हो गया तो तोस्ती तोड़ लिया। इसी लिए रहीम ने कहा है कि,,,,,

                                                  रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
                                                  टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय।।

ऐसे तो दोस्ती का इतिहास सदियों पुराना है। मगर उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही दोस्ती के रिश्ते को पर्व के रूप में मनाने की पहल होने लगी थी। सबसे पहले वर्ष 1930 में हॉलमार्क कार्ड के संस्थापक जोएस हॉल ने फ्रेंडशिप को प्रमोट किया। 27 अप्रैल 2011 को जनरल असेम्बली ऑफ यूनाइटेड नेशन्स ने फ्रेंडशिप डे घोषित कर दिया। जिसे भरतीय उपमहाद्वीप में अगस्त महीने के पहले सप्ताह के रविवार को फ्रेंडशिप डे के तौर पर मनाया जाता है।

मगर आज के बदलते दौर में जितनी तेजी से दोस्ती के मायने बदल रहे है उसको लेकर कई अहम सवाल खड़े होने लगे है। ऐसे में ये सवाल उठता है कि दोस्त कहे किसे? और दोस्ती करें किससे। 

जिंदगी की ऐसी कोई राह नहीं है जहां आपको दोस्त ना मिलें मगर क्या इसे दोस्ती का नाम दे दिया जाय फिर इनमे से किसी को दोस्त बना लिया जाय ये भी एक बड़ा सवाल है।  

                                                           जीने का ढंग तूने सिखलाया,
                                                           तू है मेरा हमराज, हमसाया।
                                                           तूने पढ़ लिए सारे राज,
                                                           मैं बना एक खुली किताब।

हमारी जिंदगी में बहुत से ऐसे राज होते हैं जिन्हें हम हर किसी को नहीं बता सकते। ऐसे में हम उन्हें अपने दोस्तों को बताते हैं। एक खुली किताब की तरह हम अपनी जिंदगी के सभी पन्ने उसके सामने खोल देते हैं और वह हमें भटकाव से सही राह की ओर ले जाता है।

कई बार परेशानियों के समय हमारा अपना पीछे हट जाता है तब दोस्त ही होता है जो हमें हिम्मत देकर हमारा साथ निभाता है। ऐसे ही वक्त में हमें अपने-पराए की पहचान होती है। ऐसे में रहीम को एक बार फिर से याद करना होगा। रहीम कहते है,,,

                                                 कही रहिमन संपती सगे, बनता बहुत बहु रीत । 
                                                 बिपती कसौटी जे कसे, तेइ सांचे मीत ।।

जो बिपती में साथ देता है वही सच्चे मित्र है। जो रिश्ता जीवन भर इमानदारी, वफादारी से निभाया गया हो वही सही मायने में मित्रता कहलाता है। आज हम चाहे कितना भी दोस्ती यारी कि बात कर ले मगर कृष्ण और सुदामा के दोस्ती कि मिषाल आज भी लागों के लिए एक प्रेरणा का विषय है।  

जब कृष्ण को सुदामा को आने कि जानकारी मिली तो कृष्ण दौड़ते हुए सुदामा से मिलने पहुंचे और सुदामा को गले लगा लिया। उनकी हालत देखकर कृष्ण रोने लगे और उन्हें अपने महल में ले जाकर उनकी सेवा की। जब कृष्ण को उनकी हालत का अंदेशा हुआ तो उन्होंने अपनी दोस्ती निभाते हुए सुदामा को सुदामा नगरी का राजा बना दिया।

दोस्ती का रिश्ता किसी भी सरहद को नहीं मानता। वह चाहे देशों की सरहद हो, उम्र की सरहद हो या धर्म के नाम पर बनाई गई वो शरहद हो जिसे पार करने से अक्सर लोग डरते हैं। दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है जिसमें लोग एक दूसरे के प्रति पूरे ईमानदार होते हैं। मगर आज ये दोस्ती प्यार, मोहब्त, शरारत, धोखा और, मौकापरस्ती में तबदील हो गई है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या दोस्ती के मायने बदल गए है ?

पाठ्य पुस्तक में राहुल गांधी को जगह देना कितना सही ?

इस देश को अपनी सत्ता की जागीर समझने वाला गांधी नेहरू परिवार हमेशा से ही पाठ्य पुस्तकों की सुर्खियां रहा है। मगर अब इसी कड़ी में अब एक और नया नाम जुड़ गया है। जी हां, अब राहुल गांधी कर्नाटक कि पांचवी के पाठ्य पुस्तक में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू, के साथ नज़र आएंगे। राहुल गांधी को अब छोटे छोटे बच्चों को पढ़ाया जाएगा। कांगे्रस के पप्पू अब पुस्तको में अपनी पहचान बनाने के लिए तैयार है। भले ही इस देश में राहुल गांधी को कोई नई पहचान नहीं मिली हो मगर, मगर अब पुस्तकों में उनकी महानता बच्चों पर थोपने कि कोशिश जरूर की गई है। 5 वीं क्लास में पढ़ाई जानेवाली किताब गाइडबुक ’टुगेदर विद इंग्लिश’  के एक चैप्टर में राहुल गांधी को भी जगह दी गई है। मैसूर का प्रमाति स्कूल सी.बी.एस.ई. से मान्यता प्राप्त है और इसी स्कूल में 5 वीं क्लास की अंग्रेजी की किताब में यह चैप्टर रखा गया है। इस पुस्तक को रचना सागर पब्लिशर्स ने प्रकाशित कि है। 

आज इस देश के पाठ्य पुस्तक में औरंगजेब, अकबर, बाबर और अलकायदा के नेताओं की कबिताओं को जगह जरूर मिल रही है, मगर शिवाजी-महाराणा प्रताप को भगोड़ा और भगत सिंह को आतंकवादी बताने से बिल्कुल परहेज नहीं किया जा रहा है। ऐसे में इस देश युवा पीढ़ी को ऐसे सेलेबस के माध्यमों से कौन सी सिक्षा देने कि कोशिश कि जा रही है। इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते है।  

झारखंड का गठन भले ही आदिवासी सभ्यता, संस्कृति को संरक्षण व बढ़ावा देने के लिए हुआ, पर यहा कि स्कूल की किताबों में झारखंड के इतिहास और यहां के महापुरुषों की पढ़ाई नहीं होती है। आज झारखंड जैसे कई ऐसे राज्य है जहा पर एैसी घटनाएं आम हो चली है। 

शिक्षा से नैतिक मूल्य हटाने से आज बच्चे स्कूल-कॉलेजों से स्वार्थी, और शरारती बनते जा रहे है। मगर इन्हें आदर्शवादी  महापुरुषों के बारे में बढ़ाने के बजाय आधुनिक राजनेताओं का महिमामंडन किया जा रहा है। ऐसे में आज ये  देश कैसे हमारे महापुरुषों की राह पर चलेगा ये एक बड़ा सवाल है। 

देश के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले क्रांतिकारियों की गाथा स्कूली किताबों से लगातार गायब होती जा रही है। स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी कि (एनसीईआरटी) की किताबों में ऐसे कई क्रांतिकारियों की जीवनी हटा दी गई है। जो सरकार कि शिक्षा व्यवस्था कि पोल खोलती है। 

एनसीईआरटी में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में वर्ष 2007 से पहले 8वीं की इतिहास की किताब में क्रांतिकारियों के बारे में 500 शब्द और 12वीं की इतिहास की किताब में 1250 शब्दों में जानकारी दी गई थी। 2012 के पाठ्यक्रम में 12वीं की किताब ‘हमारा अतीत भाग-3’ में सिर्फ 87 शब्दों में क्रांतिकारियों से संबंधित जानकारी रखी गई। यही नहीं, 8वीं की किताब में क्रांतिकारियों का इतिहास हटा दिया गया है। आठवीं कक्षा से लेकर 12वीं तक की किताबों में चंद्रशेखर आजाद और सुखदेव सहित करीब 3 दर्जन क्रांतिकारियों और महापुरुषों का इतिहास गायब है। स्वामी विवेकानंद के बारे में सिर्फ 26 शब्द हैं। इन क्रांतिकारियों की जगह क्रिकेट और कपड़ों के इतिहास पर ज्यादा स्थान दिया गया है। ये सारे तथ्य इस बात कि ओर इशारा करते है कि आज हमारी वर्तमान इशारा किस दिशा में जा रही है, और सरकार हमारे युवाओं को कैसा भविष्य देना चाहती है। एैसे में सवाल खड़ा होता है कि महापुरूशों को हटा कर पाठ्य पुस्तक में राहुल गांधी को जगह देना कितना सही?

गौ, गोपाल पर मीडिया और सरकार गंभिर क्यों नहीं है।

देश में एक बार फिर से गौ रक्षा आंदोलन जोरो पर है। मगर हर बार कि तरह सरकार और मीडिया दोनों ने चुप्पी साध ली है। इस देश में बात चाहे, 1966 का गौरक्षा आन्दोलन को कुचलने की बात हो या फिर संत गोपालदास को धोखे से अनशन तोड़वाने की, हर बार सरकार इसे लेकर दमनकारी नीति अपनाती रही है। 7 नवम्बर 1966 को संसद पर हुये ऐतिहासिक प्रदर्शन में देशभर के लाखों गौ भक्तों ने भाग लिया था। मगर उस भी कांग्रेस पार्टी की सरकार ने प्रदर्शनकारीयों पर गोली चलवाई थी, जिसमे सैकड़ों लोग शहीद हुए थे। 

मगर आज संत गोपाल एक बार फिर से लगातार 85 दिन से अनशन पर है, लेकिन सरकार और मीडिया दोनों ने अपनी उदासीनता से ये साबित कर किया है कि ये गौ भक्तों और समाज के प्रति कितने गंभिर है। संत गोपालदास का शरीर कंकाल की भांति नजर आने लगा है। उनकी एक किडनी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई है। लेकिन इन सब के बावजूद उनमें दृढ़ इच्छा शक्ति अब भी कायम है। उन्होने अपने संघर्ष को बिल्कुल कम नहीं होने दिया है। गोपाल दास गोचर भूमि को मुक्त कराने, गौ हत्या को पूर्ण रूप से बंद कराने और गौ हत्या प्रतिबंध कानून पास कराने के लिए अपने मांगों पर कायम है। गोपाल दास का वनज पहले 54 किलो था जो अब घटकर 32 किलो रह गया है। मगर फिर भी इस गौ भक्त का मनोबल अब भी कायम है। केजरीवाल के 15 दिन के अनशन को सिर पर उठा लेने वाली मीडिया संत गोपालदास के अनशन का पूरी तरह नजर अंदाज कर रहा है। ऐसे में मीडिया को लेकर भी तरह तरह के सवाल भी खड़े होने लगे है। खब़र छापना और दिखाना तो दूर कि बात है, इस आंदोलन को खत्म करने के लिए भ्रामक और झूठी खबरें छापी और दिखाई जा रही है। 

गौ सेवा के नाम पर गौशाला चलाने वाले लोग सिर्फ तमाशाबीन बने हुए है जो बड़े बड़े आंदोलन और कार्यक्रम चलाने कि बात करते है। तो वही दुसरी ओर हरियाणा सरकार लगातार इस गौ भक्त को नज़र अंदाज कर रही है। जिसको लेकर गौ भक्तों में काफी रोष का माहौल बना हुआ है। संविधान के अनुच्छेद 48 में निहित राज्य के नीति निर्देशक सिध्दांत गौवंस की हत्या को पूरी तरह प्रतिबन्धित करते हैं। साथ ही अनेक न्यायालयों व सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों में गैवंश की हत्या व गौमांस निर्यात पर रोक लगाई जा चुकी है। आजदेश में गोचर भूमी लूट का धंधा बन गया है, हर राज्य में गोचर भूमी पर लगातार अवैध अतिक्रमण किया जा रहा। मगर सरकार अपने आप को सेकुलर वोट बैंक को बनाने के लिए इसे लगातार रोकने के बजाय बढ़ावा दे रही है।  जहा पर मीडिया और सरकार दोनों कि संवेदनहीनता साफ नज़र आती है। एैसे में सवाल खड़ा होता है की गौ, गोपाल पर मीडिया और सरकार गंभिर क्यों नहीं है। 

देश में गोचर भूमी की लूट

1968 में 3 करोड़ 32 लाख 50 हजार एकड़ गोचर भूमि थी। इंग्लैंड हरेक पशु के लिए औसतन 3.5 एकड़ जमीन चरने के लिए अलग रखता है। जर्मनी 8 एकड़, जापान 6.7 एकड़ और अमेरिका हर पशु के लिए औसतन 12 एकड़ जमीन चरनी के लिए अलग रखता है। इसकी तुलना में भारत में एक पशु के लिए चराऊ जमीन 1920 में 0.78 एकड़ अर्थात अंदाजन पौने एकड़ थी। अब यह संख्या घटकर प्रति पशु 0.09 एकड़ हो गई है। अर्थात अमेरिका में 12 एकड़ पर 1 पशु चरता है, जबकि अपने यहां एक एकड़ पर 11 पशु चरते हैं। सिर्फ एक ही साल में अपने यहां साढे सात लाख एकड़ जमीन पर के चरागाहों का नाश कर दिया गया। 1968 में चराऊ जमीने 3 करोड़ 32 लाख 50 हजार एकड़ जमीन पर थी, जो 1969 में घटकर 3 करोड़ 25 लाख एकड़ हो गई। अर्थात 1974 में वे और अढ़ाई लाख एकड़ कम होकर 3 करोड़ 22 लाख 50 हजार एकड़ हो गई। इस तरह सिर्फ छह सालों में 10 लाख एकड़ चराऊ जमीनों का नाश किया गया। फिर भी किसानों का विकास करने की बढ़ाई हांकने वाले, गरीबों को रोजी दिलाने का वादा करने वाले, विशेषकर किसानों, पशुपालकों व गांव के कारीगरों के वोट से चुनाव जीतने वाले किसी भी विधानसभा या लोकसभा के सदस्य ने उसका न तो विरोध किया है, न ही उसके प्रति चिन्ता व्यक्त की है।

देश में घटते गौवंस

उत्तर प्रदेश में 314 वधशालाएं हैं। इनकी वजह से हर साल लाखों गौ वंष कम हो रहे हैं। केरल में 2002 में एक लाख 11 हजार 665 गौवंस थे, 2003 में घटकर 64 हजार 618 रह गया है। राजधानी दिल्ली में 19.13 फीसदी गौवंस कम हुए हैं, यहा गायों की दर 38.63 फीसदी घटी है। मिजोरम में 34 हजार 988 गौवंस हैं, जो पिछले साल के मुकाबले 1.60 फीसदी कम हैं। तमिलनाडु में 16 लाख 58 हजार 415 गाय हैं।