Sunday, July 28, 2013

हुड़दंगियों पर कार्रवाई धार्मिक आधार पर कितना सही ?

दिल्ली के वीवीआईपी इलाके अशोक रोड पर देर रात सड़क पर 35 से 40 बाइकर्स स्टंट कर थे। स्टंट कर रहे बाइकर्स पर पुलिस द्वारा चलाई गई गोली से करण नामक युवक की मौत हो गई है। पुलिस की इस कार्रवाई को लेकर कई अहम सवाल खड़े हो रहे है। सवाल यहा इसलिए खड़े हो रहे है क्योंकि इससे पहले इंडिया गेट से लेकर विजय चैक, जनपथ, गुरूद्वारा रोड जैसे महत्पूर्ण स्थानों पर बाइकर्स उत्पाद मचाते रहे है मगर कभी भी पुलिस न तो इनके उपर फायरिंग कि और न ही गोली मारी। मगर इस बार पुलिस इस कार्रवाई को लेकर सवालों के घेरे में है। 

बिते एक हप्ता पहले आधी रात को मुस्लिम बाइकर्स गैंग के हुड़दंगियों ने इंडिया गेट और उसके आसपास हंगामे, हूटिंग, स्टंट बाजी और पुलिस बल पर पथराव करते रहे। पूरे इलाके में अफरातफरी का माहौल बना रहा। मगर पुलिस ने इसको लेकर क्या कार्रवाई किया जरा आप भी जान लिजिए। अल्पसंख्यक हुड़ंदंगियों की संख्या- 5000 कारनामा- बाइक स्टंटबाजी, महिलाओं के साथ छेड़ छाड़ और सड़क जाम। घायल पुलिस वालों की संख्या- 10 पुलिस कार्रवाई- अतिरिक्त पुलिस बल को बुला कर हुड़दंगियों को काबू में किया। 

अब जरा आप इसी दिल्ली पुलिस का दुसरा चेहरा भी आप देख लिजिए-हिन्दू हुड़दंगियों की संख्या- 35 से 40। कारनाम- सिर्फ बाइक स्टंटबाजी। घायल पुलिस वालों की संख्या- 2, पुलिस कार्रवाई- फायरिंग में एक की मौत दुसरा बुरी तरह से जख्मी

अब आप ये खुद समझ गये होंगे की आखिर हम ये सवाल क्यों खड़ा कर रहे है कि क्या हुड़दंगियों पर धार्मिक आधार पर कार्रवाई ये कार्रवाई की जा रही है।  

इसके अलावे राजधानी की सड़कों पर शबे-ए-बारात के दिन अल्पसंख्यक हुड़दंगियों ने जम कर बवाल काटा। सैकड़ों बाइकर्स ने ट्रैफिक नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाईं। पुलिस के साथ बदतमीजी करते हुए तमाम स्टंट किए। मगर यहा भी पुलिस मूकदर्शक बनी रही। 

ऐसे में सवाल अल्पसंख्यक रहनुमाओं को लेकर भी उठ रहा है कि इन मुस्लिम बाइकर्स के आचरण के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत किसी ने क्यों नहीं जुटाई। सबने मौन क्यों साधे रखा। मानो कुछ ही नहीं हुआ हो। क्या उन्हें अपने समाज से जुड़े नौजवानों के कानून की धज्जियां उड़ाने पर चुप रहना चाहिए था ? जाहिर है, उन्हें इस सवाल का जवाब देर-सवेर देना होगा। जो बटला हाउस और जेल में बंद आतंकवादियों तक को निर्दोश बताने से नहीं चुकते है। 

लफंगई और टुच्ची हरकत को मशारे के रहनुमाओं ने नजरअंदाज कर ये साबित कर दिया है कि ये समाज और देष के प्रति कितने गंभिर है। 

अब हम आपको इन मुस्लिम हुड़दंगियों का एक और चेहरा दिखाते है ये भी आप देख लिजिए। मुस्लिम बाइकर्स की संख्या- 300। स्थान- दिलशाद गार्डन मेट्रो स्टेशन। समय- रात को 11 बजे। पुलिस कर्रवाई- मुकदर्षक बनी रही।

इन सब के अलावे कुछ दिन पहले कनाट प्लेस में मुस्लिम बाइकर्स स्टंटबाज जाम में फंसी एक महिला कि कार पर अचानक ये स्टंटबाज बोनट पर चढ़कर कूदने लगे। उन्हें जब पुलिस ने रोका तो उनके उपर पत्थर बरसाये गये, जिससे एक सिपाही का सिर फट गया। एक अन्य पुलिस कर्मी ने रोकने की कोशिश की तो उसके ऊपर मोटर साइकिल चढ़ा दी गयी। मगर फिर भी दिल्ल पुलिस मूकदर्शक बनी रही। ऐसे में आज ये सवाल हर कोई पूछ रहा है की क्या हुड़दंगियों पर कार्रवाई धार्मिक आधार पर कितना सही ?

राजनीति के लिए सुरक्षा एजेंसियों का दुरूपयोग करना सही है ?

आज देश में आए दिन जिस प्रकार से सुरक्षा एजेंसियों का दुरूपयोग हो रहा है उसको लेकर कई अहम सवाल खड़े हो रहे है। आपातकाल से लेकर वर्तमान सत्ता तक किस कदर सुरक्षा एजेंसियां राजनेताओं की सत्ता की जागिर बन गई है, इसके तमाम उदाहरण हम सब के सामने है। ऐसे में ये जाहिर होता है कि लोकतंत्र के प्रति कांग्रेस की निष्ठा कितनी खोखली है। फोन टेपिंग, सीबीआई और गुप्तचर एजेंसियों का दुरूपयोग सांसदों और राजनीतिक दलों के विरूध्द करके सरकार गिरने से बचाने सम्बन्धी घटनाक्रमों तक हर जहग लगातार दुरूपयों कि सरकारी कुहुक सुनाई देती है। 

बात चाहे आपातकात के समय जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चन्द्रशेखर और अटल बिहारी वाजपेयी सरिखे नेताओं को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानकर बगैर मुकदमा चलाए महीनों तक जेल में रखने की हो। या फिर माया मुलायम से लेकर लालू और जगन रेड्डी तक को सीबीआई की भय दिखा कर सत्ता में बने रहने की। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, असीमानंद, प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहीत को कानून की जाल में फंसाने कि कोशिश ये सभी घटनाक्रम इस बात कि ओर इशारा करती है की आज ये एजेंसियां सत्ता की गोद में बैठ कर किस कदर कठपूतलियों की तहर नांच रही है।  

बात सिर्फ यही तक ही सीमित नहीं है आज बिना किसी खतरे के पुलिस सुरक्षा और लालबतीधारी गाडि़यों का दुरूपयोग भी आम हो चली है। जो आम आदमी पर रौब झाड़कर है और ठाट-बाट के साथ धौंस दिखा कर अपने आप को उंचा साबित करने से खाए, पिए, अघाए हमारे राजनेता नहीं चुक रहे है। 

एनआईए हो या सीबीआई या फिर अन्य कोई सुरक्षा जांच एजेंसियां, ये सभी सरकार के इशारे पर ही चलती हैं और सत्ता के एजेंडे को आगे करने में इनकी अहम भूमिका होती है। सीबीआई के स्वायत्त संस्था होने के बावजूद सत्ता ने जब चाहा अपने अनुकुल हथियार बना कर सीबीआई को पैनी धार भी दी और भोथरा भी बनाया। यानी सत्ता के तौर-तरीके अगर देश के बदले सत्ता में बने रहने या निजी लाभ के लिये काम करने लगे तो फिर कोई भी स्वायत्त सस्था भी कैसे सरकार के विरोध की राजनीति करने वाले को सत्ताधारियों के लिये दबा सकती है, यह सीबीआई के जरिए हर मौके पर सामने आया है। 

सत्ता के लिये कैसे सुरक्षा ऐजेंसियां सत्ता के निर्देश पर काम करता है, यह कांग्रेस हो या भाजपा दोनों ने इसके दुरूपयोग किये हैं। सुरक्षा एजेंसियां देश में जांच एजेंसी से ज्यादा कभी पिंजरे में बंद शेर की तरह तो कभी रट्टू तोता की तरह काम करता रहा है। जिसे कभी पिंजरे से खोलने का डर दिखा कर सत्ताधारी अपनी सत्ता बचाती है। तो कभी रट्टू तोता बना कर अपनी ही भाषा में अपनी बात बोलवाती है। जिसका लाभ उठा कर सत्ता और पैसे वाले रसूखदार मलाई खाते है और आम आदमी ठगा हुआ महसूस कारता है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है की राजनीति के लिए सुरक्षा एजेंसियों का दुरूपयोग करना सही है ?

Saturday, July 20, 2013

मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण कितना सही ?

आसमान से लेकर पाताल तक घोटाला करने और जल, हवा, जमीन जंगल, और पहाड़ों पर कब्जा करने के बाद अब सरकार हिन्दू मंदिरों पर सरकारी नियंत्र करने की योजना बनाई है। ऐसे एक बार फिर से सरकार की नीति और नीयत को लेकर कई अहम सवाल खड़े हो रहे है। इस सरकारी रणनीति को लेकर देश भर में लोगों के अंदर काभी आक्रोश का माहौल बन रहा है। धार्मिक संस्थानों पर ट्रस्ट के रूप में सरकार के प्रशासनिक हस्तक्षेप के खिलाफ हिंदू धर्म आचार्य सभा ने कानूनी संघर्ष के लिए मजबूती के साथ रास्ते तलाशने की कोशिशें तेज कर दी है। मंदिरों की दान पर सरकारी नियंत्रण के खिलाफ हिंदू धर्म आचार्य सभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की है। ऐसे में यहा सवाल खड़ा होता है की संविधान में दिए गए धार्मिक समानता का अधिकारों का उलंघन ये नहीं है। 

मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में लेने की कोशिश केन्द्र और राज्य सरकारें अपने अपने स्तर से कर रही है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश सरकार ने हिन्दू सार्वजनिक धार्मिक संस्थान एवं धर्मार्थ दान अधिनियम, 1984 के अन्तर्गत गगरेट कस्बा के ऐतिहासिक द्रोण महाशिव मंदिर, को सरकारी नियंत्रण में लेने को स्वीकृति दी है। इसके अलावे कई राज्य सरकारों की इस फैसले पर अभी न्यायालयों में सुनवाई चल रही है, तो कई जगहों पर कोर्ट द्वारा ऐसे फैसलों पर स्टे लगा दिया गया है। 

मंदिरों को लगातार हो रहे सरकारी नियंत्र में करने की प्रयासों को देखते हुए विश्व हिंदू परिषद ने कहा है कि यदि सरकार मंदिरों पर अपना नियंत्रण जमाने की कोशिश सरकार ने की तो इसके परिणाम बहुत गंभीर होंगे। महाराष्ट्र सरकार पहले ही दो बडे़ मंदिर सिद्धि विनायक और शिर्रडी का सांई मंदिर का संचालन करके भारी संख्या में मंदिर में चढ़ाए गए धन दौलत को इकट्ठा करने के बाद, अब अन्य मंदिरों को सरकारी नियंत्र में करने की योजना बना रही है। महाराष्ट्र में इस वक्त दो लाख हिन्दू मंदिर है। महाराष्ट्र सरकार ने एक प्रस्ताव तैयार किया है इस प्रस्ताव के मुताबिक पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के तहत जिन दो लाख मंदिरों का संचालन हो रहा है उन्हें सरकारी नियंत्र में किया जाएगा। 

इस समय देश में दक्षिण भारत के तमिलनाड़ु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटर राज्यों के कई मंदिर सरकारी ट्रस्टों के कब्जे में हैं। चार साल पहले राजस्थान में भी तत्कालीन भाजपा सरकार ने ऐसा ही एक कमाऊ प्रस्ताव तैयार करके मंदिरों पर सरकारी कब्जा करने की कोशिश की थी। लेकिन जनता के जोरदार विरोध के सामने वसुंधरा राजे को झुकना पड़ा था। 

भारत सरकार द्वारा 1951 में बनाए गए रिलिजस एंड चैरिटेबल एन्डउन्मेंट एक्ट बनने के बाद राज्य सरकारों को मंदिरों की परिसंपत्तियों का पूर्ण नियंत्रण करने के अधिकार दिए गए है। आज देश भर के मंदिर से लगभग 9 हजार तीन सौ करोड रुपये आते है जिसमें से 85 प्रतिशत सीधे राज्य सरकार के खाते में चले जाता है। यही कारण है की राज्य और केन्द्र सरकार मंदिरों से आ रहे खरबों की संपत्तीयों पर अपना हक जमाना चाहती है। जिसे भक्त भगवान की सेवा और मंदिरों की देख रेख के लिए चढ़ाते है। ऐसे में सवाल खड़ा होता की मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण कितना सही ?   

क्या देश भर के डांस बार पर प्रतिबंध लगना चाहिए ?

ठुमके लगाती हसीन डांसर जिसे कोई होंठों से अपनी बत्तीसी दबाये हसीना के हर ठुमके को निहारता है, तो कोई ताल मिलाने की कोशिश करता है। किसी की इन हसीनाओं के लिए कुछ ज्यादा ही दिलदारी है, तो कई इनके लिए अपने घर के जरूरी खर्चे को रोक कर इनके हुस्न पर लुटाता है। जी हां आज के दौर में यही हकीकत है डांस बार की। ये डांस उस वक्त हिन्दुस्तान की सरजमीं पर कदम रखा जब इस देश में मुगलों का शासन था। मुगलों द्वारा ही पहली बार मुगल दरबार में लड़कियों से अस्लील डांस करवाया गया और उनके हाथों से शराब भी परोशवाया गया। बाद में यही डांस धिरे धिरे मुजरे का रूप ले लिया और अब ये बार डांस बन हमारे सांस्कृतिक और समाजिक पतन का करण बन रहा है । 

मुंबई में सबसे पहला डांस बार 60 के दशक में मुंबई के नरीमन पॉइंट इलाके में एक सिंधी रईस ने शुरू किया था। मगर ऐसे अनेक बार मुंबई भर में पसर गये। इसे रोकने के लिए अगस्त 2005 में महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे पोलिस एक्ट में तब्दीली कर डांस बार पर बैन लगा दिया था। राज्य के गृह मंत्री आरआर पाटिल ने कहा था कि इससे कई घर बर्बाद हो रहे हैं और राज्य भर में अश्लीलता फैल रही है। मगर एक बार फिर ये गुलजार होने जा रहे है सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर। अप्रैल 2005 में मुंबई के डांस बार पर पहली बार प्रतिबंध लगा था। उस समय शहर में 700 से ज्यादा डांस बार चल रहे थे। इनमें से आधे से ज्यादा बिना लाइसेंस के चल रहे थे। 150 से जयादा डांस बार सेक्स रैकेट के धंधे में सामिल थे। 

बार डांस  देश में हमेशा से ही सेक्स रैकेट का अड्डा रहा है जहां पर अपने मन पसंद बार बालाओं को गा्रहक पैसे देकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाते है। ग्राहकों की पसंद और हुस्न की ये रंगीन दुनिया हमेशा से लेकर विदेशों तक फैले हुए है। जहा पर अंडरवल्ड से लेकर सेक्स माफीयाओं का राज चलता है। हाल ही में मुंबई पुलिस द्वारा डांस बारों पर मारे गए छापे में 55 बार बालाओं सहित 66 ग्राहकों को गिरफ्तार किया गया। चैम्बूर स्थित कमांडर डांस बार पर छापे के दौरान 36 बार बालाओं के साथ 31 लोगों को गिरफ्तार किया गया। वही घाटकोपर स्थित नटराज बार पर छापे के दौरान 19 बार बालाओं सहित 35 ग्राहकों को गिरफ्तार किया। 

ये आकडे़ बताते है की आज डांस बार किस कदर बार की आड़ में सेक्स रैकेट चला रहे है। अस्सी के दशक में हर तीसरी-चैथी हिंदी फिल्म में डांस बारों का बोलबाला सुरू हो गया। फिल्म इनकार का गीत मुंबई के डांस बारों का थीम सॉंग बन गया। मुंबई के डांस बारों में कइयों ने अपनी अलग पहचान बनाई। ग्रांट रोड का तोपाज बार खूबसूरत बार डांसरों के लिए मशहूर था।  फर्जी स्टांप पेपर घोटाल के आरोपी अब्दुल करीम तेलगी ने एक रात में 93 लाख रूपये एक बार डांसर पर लुटा दिए। तो वही छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने राज्य के स्थापना दिवस समारोह में बॉलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर के सिर्फ 8 मिनट के डांस पर जनता के टैक्स अदायगी के 1 करोड़ 40 लाख 71 हजार रुपए लुटा दिए। 

कोलाबा का ब्लू नाईल नाम का बार स्ट्रिप टीज के लिए सबसे ज्यादा बदनाम था जहां डांस फ्लोर पर नाचने वाली लड़कियाँ एक एक कर अपने शरीर से सारे कपड़े निकाल कर फैंक देतीं और और आखिर में पूरी तरह से नग्न होकर डांस करतीं थी। साल 2005 में तरन्नुम खान नाम की एक बार डांसर खूब चर्चा में रही। तरन्नुम ने इतनी कमाई कर ली थी कि उसके घर आयकर विभाग ने छापा मारा और बड़ी तादाद में नकदी बरामद की बाद में पता चला की तरन्नुम के संबंध कई बुकियों के साथ थे।  हर बार डांसर अपनी कमाई का 40 से 60 फीसदी हिस्सा बार मालिक को देती है। एक बार डांसर एक रात में एक से डेढ लाख रूपये की औसत कमाई करती है।  

अंडरवर्लड का डांस बारों पर भी कब्जा है कई गैंगस्टर अपनी काली कमाई ऐसे डांस बारों में बतौर पार्टनर पैसे लगाते है। साथ ही राजनेताओं ने भी तमाम डांस बारों में अपने पैसे लगा रखे है। एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या देश भर के डांस बार पर प्रतिबंध लगना चाहिए ? 

Sunday, July 7, 2013

उत्तराखंड त्रासदी के पीछे चीन तो नहीं ?

केदारनाथ में बादल फटा, उत्तराखंड में तबाही, हजारों लोगों की मौत, हजारों लापता और भी न जाने क्या-क्या। इस बीच, ईश्वरीय प्रकोप, पर्यावरण असंतुलन, ग्लोबल वार्मिंग, अवैध खनन से लेकर कई अन्य कारणों को भी जिम्मेदार ठहराया गया। लेकिन इन सब के बिच एक अहम कड़ी और भी है जिसे सुन कर आप भी दंग रह जाऐगें। जी हां चीन का वेदर बम। 5 अगस्त, 2010 में भारत के हिमालयी क्षेत्र, लेह में भीषण बाढ़ आई थी, जिसमें 130 लोगों की मौत हो गई थी और 600 से ज्यादा गायब हो गए थे। तब भी ये आशंका जताई जा रही थी की इसके पीछे चीन का ही हाथ हो सकता है। इस ठंडे रेगिस्तानी इलाके में औसत बारिश बहुत कम होती है। लेह में वर्ष 1933 में चैबीस घंटे के दौरान केवल 96.5 मिमी बारिश हुई थी, लेकिन इस बादल फटने ने तो यहां एक घंटे में ही 250 मिमी बारिश करा दी। जिसे लेकर कई अहम सवाल उस वक्त भी खडें हुए थे। अगर इसे सच मान ली जाए तो लेह पर बरसे तबाही के बादल दरअसल चीन की कठपुतली थे। जिसे भारत में मोड़ कर कहर बरपाया गया। 

दरअसल लेह लद्दाख को कोल्ड डेजर्ट रीजन कहा जाता है। मतलब ज्यादातर वक्त यहां तेज धूप खिली होती है और बारिश बेहद सामान्य होती है। लेह में तबाही वाली रात भी बेहद हल्की बारिश हुई थी जबकि बादल फटने से पहले अच्छी खासी बारिश जरूरी होती है। तो फिर अचानक यहां बादल फटने की वजह क्या हो सकती है? इसका अंदाज आप खुद लगा सकते है। चीन के 90 फीसदी सूबों में क्लाउड सीडिंग की जाती है। इसे लेकर समय समय पर चीन खुद ये दावा करता रहा है। ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है की उत्तराखंड में आए तबाही के पीछे भी चीन का हाथ नहीं हो सकता है।  

क्लाउड सीडिंग कराने के लिए सिल्वर आयोडाइड या ठोस कार्बन डाईऑक्साइड का इस्तेमाल किया जाता है। रॉकेटों के जरिए बादलों में सिल्वर आयोडाइड की बमबारी की जाती है और उसके बाद जिस इलाके में चाहें बारिश हो जाती है। सिल्वर आयोडाइड क्रिस्टल की बनावट बर्फ जैसी होती है जो बादलों में जाकर पिघलने के बाद बारिश की शक्ल में आसमान से बरसता है। तो एसे में विज्ञान के इस तकनीक से इंकार नहीं किया जा सकता है की ये संभव नहीं है या ऐसा नहीं हो सकता है। मौसम नियंत्रण को लेकर चीनी शोध 1958 से लेकर अब तक जारी हैं। अमेरिका में वेदर कंट्रोल रिसर्च 1946 से चल रही है। और वहा पर राज्यों के अपने क्लाउड-सीडिंग प्रोग्राम चलाए जाते हैं। रूस, इजराइल, थाईलैंड, दक्षिण अफ्रीका और कैरिबियाई देशों में भी इस तकनीक का उपयोग लगातार हो रहा है। 

चीन की राजधानी बीजिंग में ओलंपिक खेलों के उदघाटन समारोह पर बारिश का खतरा मंडरा रहा था। उस वक्त भी चीनी वैज्ञानिकों ने बादलों का रूख बंद कर दिया। बारिश रोकने के लिए सिल्वर आयोडाइड से भरे 1000 से ज्यादा रॉकेट छोड़े गए और एक तरह से कुदरत से जंग लड़कर बारिश समारोह की जगह पर न कराके बीजिंग के दूसरे दूरदराज के इलाकों में कराई गई और उसका दायरा कुछ जगहों तक समेट दिया गया। कुछ इसी तरह के प्रयोग लेह और उत्तराखंड में होनी की संभावना जताई जा रही है। जो इस त्रासदी के कारण बन सकते है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की उत्तराखंड त्रासदी के पीछे चीन तो नहीं ? 

Saturday, July 6, 2013

खाद्य सुरक्षा कानून आम आदमी के साथ हमदर्दी है या राजनीति ?

देश में एक बार फिर से यूपीए सरकार को 9 साल बाद खाद्य सुरक्षा के नाम पर आम आदमी की याद आई है। सरकार चाहती है कि किसी तरह ये बिल संसद में पास हो जाए, और वह गंगा नहा ले। यानी की चुनावी बैतरनी पार हो जाए। सरकार ये जल्दबाजी इसलिए भी दिखा रही है ताकी 3 महीने बाद 5 राज्यों में विधान सभा चुनाव और 2014 में लोकसभा चुनाव होने वाले है। साथ ही राज्यों में लागू होने वाले चुनाव आचार संहिता से पहले इसे निपटा लिया जाए, ताकी इसे चुनावी लॉलीपॉप के रूप में लोगों के सामने पेश किया जा सके साथ ही भोजन के बहाने वोट को अपनी झोली में लाया जा सके।  इस कानून को कांग्रेस का चुनावी बेड़ा पार कराने में सबसे मजबूत पतवार माना जा रहा है। सरकार का कहना है की देश की करीब 67 फीसदी आबादी को भोजन की गारंटी मिलेगी, इसमें से 75 फीसदी आबादी ग्रामीण और 50 फीसदी शहरी होगी।

मगर सरकार के इस दावे को लेकर कई अहम सवाल खडें हो रहे है। सवाल ये कि सामान्य और प्राथमिक कैटगरी के परिवारों को  कैसे चिन्हित किए जाएंगे। जबकि अभी एपीएल और बीपीएल की सरकारी परिभाषाएं ही विवादों में हैं। ये कौन देखेगा कि कौन अत्यंत गरीब है और कौन कुछ हद तक गरीब है। सामान्य और प्राथमिक परिवारों का चुनाव या वितरण की प्रक्रिया को लेकर कुछ राज्य बिल के विरोध में हैं, जिनमे प्रमुख रूप से तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश है। एक या दो रुपए किलो के हिसाब से सब्सिडी वाला योजना इन राज्यों में पहले से ही लागू है। ऐसे में यहा सरकार खाद्य सुरक्षा कानून कैसे लागू करेगी। सवाल यहा ये भी है की खाद्य सुरक्षा बिल के जगह पर, उतनी ही राशि खर्च कर सरकार रोजगार गारंटी कानून क्यों नहीं बनाती ताकी हर इन्सान को यह कहने का मौका मिले कि इस देश कि तरक्की में मेरा भी योगदान है।

आम आदमी के हीत में देश के लिए नीति क्या हो, ये संसद तय करती है। मगर इस नीति का श्रेय हम कैसे लूटे इसे लेकर सरकार और विपक्ष दोनों में होड़ मची हुई है। यही कारण है की सरकार अध्यादेश का रास्ता अपना रही है। क्योंकी अगर इसे संसद में चर्चा कराने के बाद पास कराने की मंशा सरकार को होती तो जाहीर सी बात है की विपक्ष की ओर से कुछ संसोधन करने की मांग भी उठाई जाती। जिसका थोड़ा बहुत श्रेय विपक्ष को भी मिल जाती है। मगर अध्यादेश में ऐसे किसी भी प्रकार के संसोधन करना संभव नहीं होगा, सिर्फ इसे संसद में हा या ना के लिए पेश किया जाएगा। सपा के लाख विरोध करने और सरकार को समर्थन देने के बावजूद सरकार इसे असानी से पास भी करा लेगी क्योकि जदयू पहले ही इसे लेकर अपनी सहमती जता चुका है। ऐसे में सरकार द्वारा अपनाई गई ये विधी संसद की मूल भावना प्रभावित करती है साथ ही सरकार की नियत और नीति दोनों को उजागर करती है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या खाद्य सुरक्षा कानून आम आदमी के साथ हमदर्दी है या फिर सिर्फ कोरी राजनीति ?

Friday, July 5, 2013

किराये की कोख से शाहरुख क्या संदेश देना चाहते है ?

हिंग लगी ना फिटकरी और रंग चोखा हो गया, जी हां कुछ ऐसे ही वाक्या है बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख का। शाहरुन खान और उनकी पत्नी गौरी सरॉगसी की मदद से तीसरे बच्चे के माँ बाप-बनने जा रहें है। मगर यहा अब खुद अपने ही बच्चे की खबर से शाहरुख एक बार फिर से बिवादों में घिर गए है। हाल ही में शाहरुख ने दावा किया था कि सेरोगेसी के जरिए वे तीसरी बार पिता बनने वाले हैं। इसके बाद शाहरुख ने ये भी दावा किया था कि यह बच्चा जुलाई में जन्म लेगा और यह बेबी ब्वॉय है। यह बात सामने आते ही  शाहरुख पर प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण के आरोप लगे। और खुद अपने ही बयान में अब फंस गए है शाहरुख।

इस पूरे मामाले को देखते हुए महाराष्ट्र रेडियोलॉजिस्ट एसोसिएशन ने महाराष्ट्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय से जांच कराने का आदेश दिया है। ऐसे में अब ये सवाल भी उठने लगे है की आखिर शाहरुख ने खुलासा क्यों किया। क्या ये लिंग परिक्षण कानून को ठेंगा दिखाना चाहते है। या फिर अपने अपने आप को कानून से उपर समझते है। या इन्हें सेलिब्रेटी होने की छुट मिली हुई है। 

शाहरुख के इस जूर्म पर कानून अपना डंडा चलाए की इससे पहले खुद मरकजी दारुल इफ्ता दरगाह के आला हजरत ने फतवा जारी कर शाहरुख को शरीयत का गुनहगार ठहरा दिया है। साथ ही दारुल इफ्ता ने सरॉगसी से बच्चा पैदा करने को भी हराम करार दिया है। इस फतवे के अनुसार न सिर्फ शाहरुख खान बल्कि बच्चा पैदा करने वाली औरत को तौबा की सलाह दी गई है। ऐसे में यहा शाहरुख पर एक और सवाल यहा खड़ा हो रहा है की क्या शाहरुख इस्लाम को नहीं मानते? 

वहीं दुसरी ओर बॉलीवुड के सबसे परफेक्ट मैन आमिर खान भी मुंबई के एक प्राइवेट अस्पताल में सेरोगेसी की जरिये पिता बने। आमिर को अपनी पहली शादी से दो बच्चे हैं। मगर 2002 में इनकी तालक हो गई थी। ये सारी घटनाए इस ओर इशारा करती है की लोगों को हम दो हमारे दो की सलाह देने वाले अपने निजी जिंदगी में कितना जयादा संकीर्ण मानसिकता रखते है। 

हमारे देश इस तरह के कार्य कानूनी जूर्म है। गर्भधारण पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 के तहत गर्भाधारण पूर्व या बाद लिंग चयन और जन्म से पहले लिंग परीक्षण करना गुनाह है। इसके तहत 3 से 5 साल तक की जेल व 10 हजार से 1 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इसके अलावे आईपीसी की धारा 315 के तहत शिशु को जीवित पैदा होने से पहले किसी भी प्रकार प्रकार के गैर कानूनी कार्य वाले को दस साल की सजा या जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है। मगर अब तक शाहरुख की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई ये एक बेहद खंभिर सवाल करता है। ऐसे में ये पूछना गलत नहीं होगा की किराये की कोख से शाहरुख क्या संदेश देना चाहते है ?

Thursday, July 4, 2013

पढ़िए पाकिस्तानी क्रिकेटरों के काले कारनामे ?

जिस दक्षिण एशिया में क्रिकेट को धर्म और क्रिकेटरों को आराध्य की तरह पूजा जाता हो वहां जब सट्टेबाजी और भ्रष्टाचार का नाम आता है तो कहीं न कहीं यह विश्वास डगमगाने लगता है कि क्रिकेट और उससे जुड़े खिलाड़ियों को इतना मान.सम्मान देना क्या सही है. पहले स्पॉट फिक्सिंग की बात से इंकार करने वाले पूर्व पाकिस्तानी कप्तान सलमान बट ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया है कि वह इंग्लैंड के खिलाफ 2010 की टेस्ट श्रृंखला में एक मैच के दौरान स्पॉट फिक्सिंग में लिप्त थे. उन्होंने अपने इस कृत्य के लिए प्रशंसकों से माफी मांगी है. लाहौर के एक प्रेस कांफ्रेस में सलमान ने तमाम देशवासियों और पूरी दुनिया में मौजूद क्रिकेट प्रेमियों से अपनी गलती पर माफी मांगी.

गौरतलब है कि साल 2010 में पाकिस्तान की टीम जब इंग्लैंड दौरे पर गई थी. उस दौरान न्यूज ऑफ द वर्ल्ड अखबार ने स्टिंग ऑपरेशन के जरिए स्पॉट फिक्सिंग का सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किया था. इस खुलासे में सलमान बट, मोहम्मद आमिर और मोहम्मद आसिफ के नाम सामने आए थे. इसके बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने तीन पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगा दिया था. जांच में इनका नाम आने के बाद इन्हें जेल की सजा सुनाई गई.

3 नवंबर 2011 को इंग्लैंड के लंदन स्थित साउथवर्क क्राउन न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेरेमी कुक ने सलमान बट को ढाई साल और मुहम्मद आसिफ को एक साल की सजा सुनाई, जबकि 19 वर्षीय मुहम्मद आमेर को छह महीने की सजा के आदेश दिए पूरी दुनिया की अपेक्षा क्रिकेट की सबसे ज्यादा बदनामी दक्षिण एशिया में हुई है और इसका आरंभ पाकिस्तान से माना जाता है. अब तक की घटनाओं को देखते हुए उसकी टीम और बोर्ड पर लगे आरोप इस बात को सही ठहराते हैं.

1- 1994 में श्रीलंका दौरे के दौरान ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों ने पाकिस्तान के पूर्व कप्तान सलीम मलिक पर आरोप लगाया कि उन्हें मैदान पर अच्छा प्रदर्शन नहीं करने के लिए घूस देने की पेशकश की जांच के बाद सलीम मलिक पर ज़िंदगी भर के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया.

2- गेंदबाज शोएब अख्तर को 2006 में प्रतिबंधित दवा नांड्रोलोन लेने का दोषी पाया गया था. जिसके बाद उनके चैंपियंस ट्रॉफी खेलने पर बैन लगाया गया था.

3- 2007 विश्व कप के दौरान पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कोच बॉब वूल्मर की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी. उस समय विशेषज्ञ ने दावा किया है कि वूल्मर की हत्या की गई है.
4- श्रीलंकाई क्रिकेट टीम पर 2009 पाकिस्तान के एक स्टेडियम के पास अज्ञात बंदूकधारियों ने हमला किया था जिसमें कम से कम छह क्रिकेटर घायल हो गए और पांच पुलिसकर्मी मारे गए.

5- 31 जनवरीए 2010 को पाकिस्तानी ऑलराउंडर शाहिद अफरीदी पर बॉल से छेड़छाड़ करने के लिए दो ट्वेंटी.20 इंटरनैशनल मैच का बैन लगा दिया गया.

6- पाकिस्तान के अंपायर असद रऊफ के रंगीन मिजाज को कौन भूल सकता है. अपने इसी व्यवहार की वजह से वह कई बार विवाद में फंसे है. हाल ही में रऊफ को आईसीसी ने आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग मामले में शामिल होने के आरोपों के तहत इलीट पैनल से बाहर कर दिया था. आपको बता दें स्पॉट फिक्सिंग के मामले के तहत मुम्बई पुलिस रऊफ के खिलाफ जांच कर रही है.

7- हाल ही में मुल्तान की रहने वाली पाकिस्तान की पांच महिला क्रिकेट खिलाड़ियों ने पाकिस्तान के सीनियर खिलाड़ियों और अधिकारियों पर यौन शोषण करने का आरोप लगाया.

क्या लड़कियां लड़कों जैसा नहीं होती है ?

आजकल युवाओं के बीच प्रेम संबंध स्थापित करना बड़ी सामान्य सी बात हो गई है. वह एक.दूसरे के प्रति आकर्षित होकर लव अफेयर के लिए हामी तो भर देते हैं लेकिन विडंबना बस यही होती है कि जहां बात प्यार की होती है वहां हमारी युवा पीढ़ी थोड़ी असहज और कंफ्यूज नजर आने लगती है. उनकी इस कंफ्यूजन के पीछे दो कारण साफ.साफ प्रदर्शित होते हैं, एक तो यह हो सकता है कि हमारी फास्ट और एक्साइटेड जनरेशन किसी एक व्यक्ति के साथ जीवन बिताने में भरोसा ही नहीं कर सकती और दूसरा कारण यह हो सकता है कि वह समझ ही नहीं पाती कि आखिर जिस व्यक्ति के प्रति हमारी भावनाएं विकसित हो रही हैं वह हमसे क्या.क्या उम्मीदें लगाए बैठा है. ऐसी उम्मीदें जिनके पूरी ना हो पाने पर प्रेम संबंध का भविष्य तक खतरे में पड़ सकता है.

पहला कारण तो बड़ा ही सामान्य है और शायद बहुत हद तक उस पर ध्यान देना भी जरूरी नहीं है लेकिन अगर आप वाकई किसी से प्रेम करने लगे हैं और यह नहीं समझ पा रहे कि उसकी उम्मीदों को कैसे पूरा किया जाए तो हम आपकी थोड़ी मदद कर सकते हैं. उल्लेखनीय बात यह है कि पुरुष अपने दिल की बात बताने में बहुत हद तक कामयाब हो जाते थे लेकिन लड़कियों के मामले में थोड़ी दिक्कत तब होती है जब वह अपने साथी से अपेक्षाएं करने लगती हैं पर उसे कुछ समझा नहीं पातीं. चलिए कोई बात नहीं हम आपको बताते हैं कि लड़कियां अपने साथी के मुंह से कौन से गोल्डन वर्ड्स सुनना चाहती हैं!

1- तुम बहुत खूबसूरत हो, देखिएए अब आप मानें या ना मानें लेकिन आपकी गर्लफ्रेंड इस बात से हमेशा असुरक्षित महसूस करती है कि कहीं आपका दिल किसी और पर ना फिसल जाए. यकीन मानिए उन्हें यह डर हमेशा सताता है कि कहीं आपकी दिलचस्पी किसी और लड़की में ना हो जाए. सीलिए अगर आप उन्हें यह एहसास करवाते रहेंगे कि आपके दिल में उनकी जगह कोई नहीं ले सकता तो बात बन सकती है. इसीलिए जरूरी है आप उन्हें हमेशा दूसरी लड़कियों के मुकाबले खूबसूरत और आकर्षक ट्रीट करें! 

2ण् तुमसे ज्यादा मेरा ध्यान और कोई नहीं रख सकतारू एक लड़की हमेशा यही चाहती है कि वह अपने साथी का ध्यान अच्छे से रख पाएण् अगर वह ऐसा कर लेती है तो ठीक और अगर नहीं कर पाती तो उसे यही लगने लगता है कि कहीं वह उसकी इस कमी के कारण साथी उसे छोड़कर ना चला जाएण् इसीलिए आप उन्हें यह बताने का मौका कभी ना छोड़ें कि वह आपका ध्यान अच्छे से रखती हैं और आपको उनसे कोई शिकायत नहीं हैण्

3- क्या तुम अपनी पूरी जिंदगी मेरे साथ बिताओगीरू इससे बेहतर और क्या हो सकता है कि आप उन्हें सीधे.सीधे शादी के लिए प्रपोज कर दें वह आपसे प्यार करती हैं और थोड़ा बहुत असुरक्षित महसूस करती हैं ऐसे में अगर आप उन्हें अपने दिल का हाल बता देंगे तो इससे आपका संबंध और भी बेहतर होने लगेगा.

4- उनकी राय और सुझावों को महत्ता देंर! आप कोई गाड़ी खरीदने जा रहे हैं या फिर अपने कपड़ों की शॉपिंग करने अपनी गर्लफ्रेंड से उनकी पसंद सुझाव और राय जरूर पूछें इससे उन्हें आपके जीवन में अपनी अहमियत का एहसास हो जाएगा.

5- तुम मेरी सबसे अच्छी दोस्त होरू दोस्तों से आप अपनी सारी बात शेयर करते हैंए उन्हें अपने दिल की हर बात बताते हैं. अगर आप अपनी गर्लफ्रेंड के साथ भी ऐसा ही संबंध रखते हैं और वह आपकी फीलिंग्स को समझ भी जाती हैं तो उन्हें यह जरूर बताएं कि वह आपकी सबसे अच्छी दोस्त हैं और उनके होते हुए आपको किसी और की कोई जरूरत नहीं है.

दादा- दादी की लोरी से लेकर चाँद तारे तक का सफ़र !

चांद की लोरियां लगभग सारे बच्चे अपनी मम्मियों से सुनते हैं पर किसने सोचा था कि लोरियां सुनाते.सुनाते ये महिलाएं एक दिन चांद पर पहुंच भी जाएंगी. घरेलू महिला की श्रेणी से बड़ी मुश्किल से निकल पाई महिलाएं आज भी काम करने के लिए पुरुषों की तरह सम्मानित नहीं होती हैं. ज्यादातर लोगों की धारणा होती है कि चलो ठीक है, शौक था कर लिया. न सिर्फ भारत वरन विश्व के लगभग हर देश में अमूमन यही धारणा होती है. हालांकि गुजरते वक्त के साथ यह धारणा टूट रही है पर यह भी सच है कि यह इतनी आसानी से नहीं टूटने वाली देश.विदेश राष्ट्रीय.अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिलाएं आज हर क्षेत्र में आगे आ रही हैं. विज्ञान भी उनमें से प्रमुख है. कभी महिलाएं इस क्षेत्र में न के बराबर संख्या में थीं और नासा जैसे अंतरिक्ष विज्ञान में शोध के प्रमुख संस्थानों में भी अपनी सक्रिय भागीदारी दिखा रही हैं.

भारत की कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स आज देश ही नहीं, विदेशों में भी पहचानी जाती हैं. कल्पना चावला तो पहली भारतीय थीं जो नासा की तरफ से अंतरिक्ष अभियान के लिए चुनी गई थीं. यह दुख की बात जरूर है कि उस अभियान में कल्पना चावला की दुर्घटना में मौत हो गई, पर भारतीय महिलाओं के लिए यह हमेशा गर्व और प्रेरणा का एहसास कराता रहेगा. खुशी की बात यह है कि कल्पना चावला भारतीय महिलाओं में अपवाद नहीं बनीं, वरन उनके बाद सुनीता विलियम्स भी नासा के अंतरिक्ष अभियान के लिए चुनी गईं. यही नहीं सुनीता विलियम्स अंतरिक्ष में सबसे लंबे समय तक रहने वाली पहली महिला हैं. इसके अलावे अनीता सेनगुप्ता नासा में रॉकेट वैज्ञानिक हैं. नासा जैसे प्रतिष्ठित विज्ञान संस्थान में भारतीय महिलाओं का यह प्रतिनिधित्व महिलाओं की बदलती तस्वीर का समर्थक और साक्ष्य है. धीरे.धीरे ही सही लेकिन महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले न केवल अच्छा कर रही हैंए बल्कि भविष्य में समाज के लिए एक मिसाल भी कायम कर रही हैं.

महिलाओं के रुझान और दशा में यह परिवर्तन सिर्फ भारत नहीं बल्कि अन्य देशों में भी साफ देखा जा सकता है. नासा ने इस वर्ष अपने भावी अंतरिक्ष अभियान के लिए चुने गए समूह में आधी महिलाओं का चयन किया है. दुनियाभर के 6, 100 आवेदनों में केवल चार पुरुष और इतनी ही महिलाओं को अपने भावी मंगल अभियान के लिए चुनना महिलाओं की विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में कुशलता का प्रमाण है. महिलाएं अब पहले की तरह दबी.कुचलीए निरीह प्राणी नहीं हैं. इसलिए पहले की तरह महिलाओं के लिए दया और सहानुभूति की भावनाएं हास्यास्पद लगती हैं.

हां, यह एक बात गौर करने वाली जरूर है कि महिलाएंए महिलाओं के लिए कितनी सहयोगी हैं क्योंकि आखिरकार एक महिला ही अपने बच्चों को प्रेरणा और शिक्षा देकर जीने की दिशा तय करती है, इसलिए महिलाओं की महिलाओं के कमजोर होने कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सीमित होने जैसी धारणाएं बदलनी बहुत जरूरी है. इसके लिए जरूरी है कि इन कुछ उदाहरणों को अपवाद के रूप में न मानकर महिलाओं की विशेषता और कार्यक्षमता के तौर पर प्रसारित किया जाय. वरना ये उदाहरण प्रेरणा बनने की बजाय कटाक्ष बनकर रह जाएंगे कि हर कोई कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स नहीं होतीं. जबकि सच्चाई इसके ठीक उलट है. हर किसी में एक विशेषता होती है. वह महिला हो या पुरुष इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. यह सही है कि हर लड़की सुनीता विलियम्स और कल्पना चावला नहीं बन सकती पर यह भी तो सच है कि उन आम लड़कियों में ही कोई खास सुनीता या कल्पना या कोई और होगा. इसके लिए जरूरी है कि इस प्रेरणा को प्रेरणा के तौर पर पेश किया जाए.

क्या आधुनिक समाज मर्यादाओं को ताक़ पर रख दिया है ?

समाज के कायदे बदल रहे हैं. पहले से बने बनाए सामाजिक नियम सिर्फ आधुनिकता की आंच में ही नहीं जल रहेए बल्कि अब उन पर कानूनी मुहर भी लग रही है. समाज के ये कायदे हालांकि हमने ही बनाए हैं पर कुछ वर्जनाएं टूटते हुए सवाल भी खड़ी कर रही हैं. सामाजिक कायदे.कानूनों के नाम पर किसी का शोषण सही नहीं है पर क्या यूं ही किसी सामाजिक व्यवस्था को आधुनिकता की जरूरत मानते हुए बदल देना सही है. मद्रास हाई कोर्ट ने एक केस का फैसला सुनाते हुए कहा कि अगर दो वयस्क युवक.युवती अपनी मर्जी से शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाते हैं तो उन्हें शादीशुदा जोड़े की तरह ही माना जाएगा. अगर शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाना साबित हो जाता है तो वह जोड़ा बिना तलाक के दूसरी शादी नहीं कर सकता. यह तब और भी ज्यादा लागू होता है अगर इस संबंध में युवती गर्भवती हो जाती है. एक युवक के साथ संबंधों में बिना शादी के दो बच्चों की मां की अपील की सुनवाई पर मद्रास हाई कोर्ट ने यह फैसला दिया है. इस फैसले पर युवा रोष जाहिर कर रहे हैं. सोशल मीडिया में फैसले के खिलाफ बड़ी संख्या में कमेंट्स देखने को मिल रहे हैं. 

गौरतलब है कि मद्रास हाई कोर्ट का यह फैसला भारतीय सामाजिक व्यवस्था और विचारधारा में अपनी तरह का एकदम अलग है. पर नया नहीं है अभी कुछ समय पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने भी बड़ी संख्या में युवाओं के बिना शादी लीव इन रिलेशन में रहने को देखते हुए इसे कानूनन पति.पत्नी की तरह माने जाने का फैसला सुनाया था. मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले पर भी बहुत कुछ उसी फैसले की परछाई दिख रही है. पर सवाल यह उठता है कि क्या हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था का यह फैसला सही है.

युवाओं में आधुनिकता को अपनाने के जोश ने लड़के.लड़कियों के संबंधों में आज बहुत बदलाव आया है. पहले सेक्स जैसे मामलों में लड़कों की पहल दिख जाती थी पर लड़कियां हमेशा लाज.शरम के पहरे में रहती थीं. प्रेम संबंध पहले भी थे पर आज की तरह सेक्स का खुलापन तब नहीं था. खासकर पिछले 5 सालों में लड़के.लड़कियों के बीच सेक्स का यह खुलापन बहुत अधिक नजर आने लगा है. आज लड़कियां भी लड़कों के साथ घूमनेए दोस्ती करने यहां तक कि शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने में भी नहीं हिचकतीं आर्थिक सक्षमता ने भी लड़के और लड़की के बीच की कुछ अनकही वर्जनाओं को तोड़ा है. यही कारण है कि आज कम उम्र के लड़के.लड़कियां भी प्रेम संबंधों में पड़ रहे हैं और सेक्स की सीमाएं भी टूट रही हैं. 

लिव इन रिलेशन भी बढ रहे हैं. पर इस संबंध में एक जो नई कमजोर कड़ी सामने आती है, वह है सामाजिक सोच. आज यह जरूर है कि लड़कियां आर्थिक रूप से सक्षम होकर अपनी मर्जी से ऐसी आजाद जिंदगी चुन रही हैं, लड़कों को भी ऐसी लड़कियों का साथ अच्छा लगता है पर बात उस जगह अटकती है जब समाज के सामने ये जोड़े आते हैं, समाज आज भी ऐसे संबंधों को स्वीकार नहीं करता यहां पर लड़कों को शायद कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि भारतीय समाज में लड़कों को खुलेपन की आजादी है, पर लड़कियों को अपनी इज्जत बचाकर रखने की सलाह दी जाती है. लड़की आधुनिकता की सोच में शादी बिना इन संबंधों में पड़ तो जाती है, पर क्योंकि सामाजिक मान्यता इसे स्वीकार नहीं करती तो कोई भी परेशानी आने पर वह इसे सुलझाने की स्थिति में नहीं होती. 

लड़के भी ऐसे मसलों को सुलझा नहीं पाते. फिर दोनों ही इस संबंध से उबरना चाहते हैं पर लड़कियों की सामाजिक सोच उनके लिए बंधन फिर भी बन जाता है कई बार लड़कियां गर्भवती हो जाती हैं. ऐसे में वे सामाजिक सपोर्ट के लिए शादी करना चाहती हैं, पर तब तक अनचाहे हो चुके इस संबंध से लड़के मुक्त होना चाहते हैं. इसलिए शादी से इनकार करते हैं. हालांकि यह दोनों ही पक्षों का स्वतंत्र फैसला होता है. पर आखिर में लड़कियों के लिए यह पूरी उम्र बोझ की तरह बन जाता है, जबकि लड़के इससे आसानी से निकल सकते हैं. शायद कोर्ट के ये फैसले लड़कियों की इस दशा को देखते हुए ही आए हैं. पर इसका एक पहलू और भी है जिससे हम मुंह नहीं मोड़ सकते.

इसमें कोई दो राय नहीं कि युवाओं का लिव इन में रहनाए शादी से पहले सेक्स के मामले बढ़ना परिपक्व युवाओं का अपना फैसला होता है. इतना ही नहीं इसमें दोनों पक्षों की रजामंदी होती है. पर यह भी सच है आज कम उम्र में युवा आर्थिक सक्षमता हासिल कर रहे हैं. लड़के.लड़कियां दोनों में यह अनुपात लगभग समान है. हमारे देश में कानूनन 18 के बाद युवती और 21 के बाद युवा परिपक्व माने गए हैं. इस उम्र के बाद उन्हें माता.पिता से अलग अपने फैसले लेने की आजादी मिल जाती है. पर यह भी एक बड़ा सच है कि इस उम्र में उनमें परिपक्वता कम और हर चीज के प्रति आकर्षण ज्यादा होता है. विपरीत सेक्स के प्रति खासकर यह आकर्षण कुछ ज्यादा ही होता है. पहले क्योंकि 26.28 से पहले युवा आर्थिक रूप से सक्षम नहीं होते थे. पर आज वोकेशनल पढ़ाई उन्हें 20.22 की उम्र में ही स्वच्छंद आर्थिक मजबूती दे देती है

ऐसे में आज पहले की तरह वे मां.बाप की बंदिशें मानने को भी मजबूर नहीं हैं और अपनी मरजी का करते हैं पर आखिरकार वे इन संबंधों को लंबे समय तक चला पाने में अक्षम होते हैं. बात समझ में आती है तो वे मां.बाप की शरण में वापस आते हैं या आपसी सहमति से इसे तोड़ भी देते हैं. लिव इन रिलेशन तो पॉपुलर ही इसीलिए हुआ क्योंकि शादी के बाद किसी संबंध को निभाने की बाध्यता इसमें नहीं थी. युवा इसे खुलकर अपना रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि किसी के साथ पूरी उम्र मजबूरी में नाखुश रहकर साथ रहने से अच्छा है कि कुछ दिनों तक साथ रहकर इसे परख लिया जाए. शादी से सेक्स भी विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण का ही नतीजा होता है. ज्यादातर कपल इसे ढोना नहीं चाहतेए पर कोर्ट के ये फैसले इसे भी ढोने को मजबूर कर रहे हैं जाहिर है न युवाओं के लिएए न शादी जैसी संस्था के लिए यह सही है.

हो सकता है कि कोर्ट ने अपने इस फैसले से आधुनिकता की आड़ में लड़कियों के साथ नाइंसाफी या शोषण को बढ़ने से रोकना चाहा हो. पर शादी जैसी संस्था को किसी 2.4, 10 महीनों के आकर्षण भरे रिलेशनशिप से तुलना करना और यह बाध्यता लाना युवा तो क्याए शायद परिपक्व समाज भी स्वीकार न करे हालांकि हर नियम.कानून के कुछ फायदे.नुकसान होते हैं इसके फायदों के साथ इसके नुकसान पर भी एक बार गहराई से सोचना होगा. हो सकता है यह फैसला ऐसे मामलों में कमी ला दे यह भी हो सकता है कि इसका कोई और ही नकारात्मक पहलू उभरकर सामने आए.

क्या आज एक बार फिर से महात्मा बुद्ध की जरुरत है ?


असभ्य होना, कहलाना अलग-अलग दो चीजें हैं। अमर्यादित, अनियंत्रित हम आदिकाल से हैं। व्यभिचार, अनाचार, दुष्कर्म, समलैंगिक, अनैतिक ससंर्ग की परिभाषा पूर्व से बनते, गढ़ते, लिखते रहे हैं। बस, व्यवहार, उसपर अमल उसे आत्मसात करना अब हमने शुरु किया है। हमारी जरुरत, मंशा, सोच उस जानवरों से भी बदतर, बदसूरत हालात, शक्ल में है जहां संपूर्ण मानवतावाद का स्तर स्वयं खतरे में, हताश, पराजित सामने है। एक जानवर कभी सेक्स की मादकता, उसकी भूख, जरुरत बलात्कार से नहीं उतारता, भरता, मिटाता। बल्कि, उसकी असली तह तक पहुंचता, टटोलता स्त्री विमर्श के लिए अपने ही पुरुषिया वर्ग से जूझता, लड़ता, थकता दिखता है। विजयी होने पर ही उस स्पर्श, शरीर को संपूर्णता देता, भोगता उसका वरण करता है। हमारी तरह हर वक्त, हर हमेशा महिलाओं को निहारता, सूंघता नहीं। हम बलात्कार भी करते हैं और पूरी मर्दानगी दिखाते संसद से लेकर सड़क तक। भरी सभा में उस देह चरित्र की उघार भी करते। तमाम अनर्गल नसीहत देते उस संपूर्ण नारी जाति की मानसिकता को कटघरे में खड़ा कर उसपर चोट करने की मजा भी उठाते, लेने से बाज नहीं आते। अरे, जानवरों के भी सेक्स करने का कोई मौजू, कोई मौसम होता है। मगर, पुरुष जाति हमेशा उसी गर्मी की ताक में कभी बस पर चढ़ते, ट्रेनों में, घर लौटती स्त्रीत्ववाद पर एक खतरा, झाग फेंकने की ताक में हर हमेशा।

बौद्ध युग यानी महात्मा बुद्ध का वो दौर हो चाहे आज के हालात। हम बेलगाम, बेशर्मों की कतार में उस युग, काल से सीना उघारे, बांहें फैलाए खड़े हैं वो भी बिना रुके बिना थके। जहां, मां-बेटी का फर्क भी उस जानवरों की तरह खत्म, बेअसर है जो सेक्स के लिए संबंध नहीं टटोलते। देखते, जोड़ते, तलाशते हैं सिर्फ एक देह। जो संपूर्ण नारी की स्वतंत्रता के लिए शुरु से ही एक बड़ा खतरा रहा है। एक जानवर, भले सार्वजनिक हिस्से में कहीं, किसी नुक्कड़ पर सेक्स करता आसानी से दिखता, मिलता है…और हम। वहीं उसी मोड़ उसी चौक-चौराहे, नुक्कड़ पर खड़े, निहारते उसे घंटों चटकारे लेकर देखते, मजा, लुत्फ, सनसनी से लसलसा उठते हैं। बाद में उसी लसलसाहट को सड़क किनारे, झुग्गी झोपडिय़ों में, बाहर खेलते, खेतों में काम करती बच्चियों, महिलाओं पर उतारते। किसी भी मुहाने पर उसे निर्वस्त्र करने से बाज नहीं आते। नतीजा, बुद्ध के बौद्ध युग की उन्मत्त कामुकता की लास्यलीला से लेकर आज तक शारीरिक जरुरत, स्त्री-पुरुष संबंध उसी दहलीज को लांघती रिश्ते को महज सेक्स से जोड़कर देखती, मिल, दिख रही है। आज भी उसी मादकता का फुलडोज लेने के लिए महानगर हो या गांव की पगडंडी, कोई सार्वजनिक जगह या फिर कोई स्कूल कहीं कोई जगह आज महफूज, सुरक्षित नहीं। तय है, हम फिर से महात्मा बुद्ध के काल, उस युग, समय में लौट, वापस जा चुके हैं। जहां मां-बेटे का शारीरिक समर्पण भी निर्वस्त्र दिखता है।

बिल्कुल आधुनिक कलयुगी बाप की तरह जो अपनी बेटी का सौदा, उसकी शरीर से खेलना उसे भोग्या बनाना भी नहीं भूलता। क्या हम उसी नफस को जी, महसूस नहीं रहे जो घुटन, संड़ांध बदबू कभी बुद्ध ने महसूसा था। निसंदेह, बुद्ध का वो काल जीवित हो उठा है। उस जन्मकाल का ही यह आभास है जिन दिनों सारा देश, संपूर्ण भारत वर्ष धन-वैभव की प्रचुरता, भोग-विलास की उन्मत्त, तरंगित आवेग से अनाचार में आकंठ था। उस दौर के चित्रकार हों या कवि कोई शास्त्रवेता सभी कामकला को पारदर्शी बनाते, जनमानस को उससे जोड़ते, स्त्री-पुरुष सम्मिलन का नग्न वर्णन करते, परोसते नहीं अधाते थे। स्त्रियां यही शिक्षा पाती, कैसे सच्जा, श्रृंगार, हाव-भाव से पु़रुष को मुग्ध करें या वे होते हैं। बिल्कुल, स्पष्ट आज की आधुनिक बालाओं की तरह फेविकॉल लगाए एकदम हलकट जवानी की तरह। चहुंओर भोग-विलास का बाहुल्य उसी की चर्चा। इसमें वेश्याएं ही नहीं बड़ी-बड़ी रानियां व सेठानियों के व्यभिचार के किस्से भी शामिल। यहां तक कि आधुनिक नायिकाओं के मानिंद उनके सुशोभित, सुंदर, चटकदार वस्त्र, स्वर्णलंकार ऐसे क्षीने होते कि उनके भीतर से शरीर का पूरा मांसल सौंदर्य प्राय: नग्न रुप में सामने होता। इसके काम रस से या यूं कहें कि प्रथम यौवन में गौतम बुद्ध भी भोग की उसी तह तक पहुंच चुके थे। बाद में भर्तृहरि की तरह भोग उसके लालस्य से बुद्ध उकता जाते हैं। उनके भीतर घोर वैराग्य का भाव छा जाता है। और वही बुद्ध ज्ञान प्राप्त करने के बाद स्त्रियों के फंदे से बचने का उपाय, उपदेश पुरुषिया समाज को देते थकते चले जाते हैं। उनके मरने के बाद वही अनाचार द्विगुण वेग से फिर फूटा जो आज हमारे बीच, सामने विकराल रूप में मौजूद है। नतीजा, आज यौन कुंठा में समाज का हर तबका शामिल हो चुका है। ठीक वैसे ही जैसे, बुद्ध काल में अम्बापाली की असाधारण सौंदर्य देखकर बुद्ध भी चकित थे। उसी के आमंत्रण पर पुष्पोद्यान में वेश्याओं के परिचारकत्व में शयन भी करते हैं। हालात, हरियाणा के चांद की फिजा के घर जैसा। जहां कौन आता था कंडोम का इस्तेमाल करने। कामुक मेल वो एसएमएस कौन भेजता था किसी को मालूम नहीं। 

भंवरी की सीडी का फलसफा क्या था? शायद काशी में अद्र्धकाशी के नाम से विख्यात उस वेश्या की तरह जिसकी फीस प्रति रात्रि के लिए उतनी ही तय थी जितनी काशी नरेश के एक दिन की आय। उपालम्भना प्रेमी से धोखा मिलने पर भिक्षुणी तो बनती है मगर उसका बलात्कार कौन करता है उसी का चचेरा भाई जो छुप के उसके शयन कक्ष में खाट के नीचे से रात को निकलता है। मानो, आज के देहरादून के गुलरभोज इलाके के वो दो दुराचारी भाई रमेश सिंह व इंदर सिंह हों जिसे उम्र कैद की सजा मिली है। वह दोनों भी घर में चुपचाप घुसकर बहन को भोग्या बना लेता है जो बाद में आग में खुद को जला बैठती है। उस काल की उपगुप्ता हो या वासवदत्ता सब यूं ही हैं जैसे आज की गीतिका, अनुष्का या मधुमिता। उस काल में भी कई भिक्षु ऐसे थे जो भिक्षुणियों के आगे वस्त्रहीन बिल्कुल नग्न खड़े हो जाते थे। बिल्कुल, आज का वो तीन नारियों के देह से खेलता बुजुर्ग नारायण दत्त तिवारी या भाजपा का विधायक रुपम की मांस नोंच-नोंचकर खाते। उन दिनों की भिक्षुणियां भी आधुनिक नारीवाद का स्वरूप लिए, निर्लज्जता को त्यागे, वासना को भड़काते, आइटम परोसती यूं ही मिल जाती हैं। पति के बाहर रहने पर कामकला आपने पुत्र अश्वदण्ड के साथ न सिर्फ अनुचित प्रेमालिंग्न में लिपट जाती हैं बल्कि अश्वदण्ड अपने पिता चंदनदत्त की हत्या कर खुल्लम-खुल्ला अपनी माता के साथ अमानुषिक संबंध में रहने भी लगता है। वही आज की लिव इन रिलेशन यानी भूपेन हजारिका और कल्पना लाजिमी की तरह। मगर कहानी यही खत्म नहीं होती।

कुछ समय बाद, कामकला यानी अपनी मां को एक सुंदर नामक वणिक पुत्र के प्रति आसक्त होने और उससे प्रेम का नाता जोड़ता देख उसका वही पुत्र अश्वदण्ड उसकी हत्या तक कर देता है। लगता है, आज का कोई फैशनेवल युवक जो पहले अपनी प्रेयसी को भोगता है और बाद में उसकी हत्या कर टुकड़े-टुकड़े कर रहा हो। यूं ही, अशोक के पुत्र कुणाल पर उसकी विमाता तिप्यरक्षिता मोहित हो उठती हैं। कल्याणी के राजा की पत्नी अपने देवर से संबंध जोड़ती दिखती है। वहीं अनुला जैसी रानी पहले बढ़ई फिर लकड़हारे उसके बाद राज पुरोहित के साथ पहले भोग लगाती है बाद में उसकी हत्या भी तलाश लेती है। पच्चपापा दो राजाओं की रानी तो बन ही गई थी मगर नाव में सवारी करते लगड़े और उस नाविक से भी अपना शरीर बांटने में संकोच करती नहीं दिखती। साफ है, बुद्ध काल में व्यभिचार की हद और स्त्रियों के प्रति अत्याचार जितने बढ़ते गए उतनी ही महिलाएं उच्चश्रृंखल होती चली गयीं। आधुनिक परिवेश के मुताबिक जितनी स्वतंत्र वो हुई पुरुषों का अत्याचार भी वैसे ही बदस्तूर बढ़ता चला गया।

हालात यही, आज देश में महिलाओं के बूते बाजारवाद का भोग हो रहा है। रातों-रात दामिनी को समर्पित वीडियो हिट हो जाते हैं। सुरक्षा के नाम पर लड़कियों के लिए सैनिक स्कूल खोलने की मांग होती है। प्रस्ताव का समर्थन संसद की एक स्थायी समिति भी करती है। वहीं, तत्काल सैन्य बलों में महिलाओं की भूमिका पर संशय की लकीर खींच दी जाती है। दलील यह कि, जंग के मैदान में उतरी महिला अगर दुश्मन के हाथों पकड़ी गयी तो क्या होगा? यानी, फिर उसी देह का मोचन। पुरुषों ने ऊंची हील के जूते पहनने 70 के ही दौर, दशक में छोड़ दिए। मगर कई पीढिय़ों से महिलाएं इसे आज भी आजमा रही हैं। कमोवेश कारण, इसी जूती से होती है उनकी कामुकता की पहचान, उसे बाजार के हिस्से में करने की साजिश। क्या, हमारी महिलाओं को मौका मिले तो वे कमाई में भी पुरुषों को पीछे न धकेल दे जैसे ब्रिटेन में। लेकिन यहां तो बीपीओ में नाइट ड्यूटी को लेकर लेबर डिपार्टमेंट में ही एका नहीं है। वैसे भी, ब्रिटेन की वाटक्लेज वेल्थ एंड इनक्टरमेंट मैंनेजमेंट की यह बात हजम नहीं होती कि वहां महिलाएं 16.5 फीसदी सैलरी अधिक लेती हैं। अरे यहां तो हेलीकॉप्टर सौदा भी होता है तो परोसी कौन जाती है वही लड़कियां। ऐसे में, मानवाधिकार निगरानी की 2013 में जारी वल्र्ड रिपोर्ट जिसमें भारत पर महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा कम करने में विफल रहने का आरोप लगा है सरासर गलत नहीं।

देश में भले महिला अपराध कानून को मजबूत करने उसमें संशोधन की बात हो रही हो। संसद से जल्द इसे मंजूरी मिलेगी यही उम्मीद भी। मगर, ठीक 14 फरवरी को तिरुवनंतपुरम में जो हुआ, वह कानून व उसके रखवालों के लिए एक तमंचा से कम नहीं। हुआ क्या, तिरुवनंतपुरम कॉलेज की अंतिम वर्ष की छात्रा अमृता शंघगुघम तट पर मनचलों से घिर जाती है। बहादुरी से वो उन लफंगों से निबटती है। मीडिया में वाह-वाह होता है। आम लोग खूब शाबाशी, बधाई देते हैं। लेकिन, अदालत के आदेश पर पुलिस उसी छात्रा को गिरफ्तार करती है और आरोप यह कि उस लड़की ने मनचलों को पीटा, उसकी कार रोक दी। वाह रे व्यवस्था…। वैसे, यह देश वही है पैसे देकर संबंध बनाने पर सरकारी रोक के खिलाफ समाजसेवी व सेक्स वर्कर उठ खड़े हुए हैं। जैसे, बुद्ध काल में बहुत सी वेश्याएं या अच्छे परिवारों की कलंकिता, समाज से बहिष्कृत स्त्रियां भिक्षुणी तो बन जाती हैं लेकिन अपने संस्कारों का निराकरण, उसे छोड़ नहीं पाती। फलसफा, वे अधिक समय तक तापस व्रत का पालन नहीं कर पापाचार, कामोत्तेजना का सहारा लेती वहीं अपने चरित्र को उघार देती है।
देश में आज महिला चिंतन पर भले जोर हो। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन दुष्कर्म के मामले में मेल-फीमेल ऑर्गन शब्द का इस्तेमाल करने व पीडि़ता की एचआइवी व हेपेटाइटिस की जांच को अनिवार्य करने की मांग जस्टिस जे.एस. वर्मा कमेटी से करता दिखे भी लेकिन उद्देश्य यही कि कांग्रेसी सांसद सुधाकरन भस्कर को कोई रेप पीडि़ता वेश्या न लगे। ठीक वैसे ही जैसे करीब पांच हजार साल पुरानी सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा से राजस्थान के अलवर व टोंक की सौ महिलाओं को इससे निकालकर उन्हें कुंभ स्नान करवाया गया। काश ! कांग्रेस भी उपसभापति पीजे कोरियन को संस्कारित स्नान करवा पाती। जैसे, बुद्ध काल में बनारस की एक रानी ने अपने पति से वचन लिया कि वह किसी पर-स्त्री को कभी बुरी निगाह से नहीं देखेगा। पर स्वयं, पति की अनुपस्थिति में राजा द्वारा उसकी कुशल पूछने के लिए भेजे गए 64 दूतों के साथ वह व्यभिचार में लिप्त रहीं। मानों, आज का गोपाल कांडा हो जो पहले बेटी को निर्वस्त्र करता है। बाद में उसकी मां को खुदकुशी पर उकसाता, फंदे भी तलाश देता है। अनाचार की इसी ज्यादती से बौद्ध धर्म की भिति यहां स्थापित न हो सकी। वह दीर्घ काल तक इस देश में ठहर न सका और विनाश को गले लगा बैठा। लगा, पश्चिम बंगाल में किसी ने कोजाल मालसात फिल्म को रिलीज करने की कोशिश कर रहा हो।

क्या इन हालात में हम महात्मा बुद्ध से कहें, कहने की स्थिति में हैं कि आओ, फिर से लौटों इस धरा पर। हे बुद्ध, तुम्हारे काल में भी तो जातकों ने माना, नारी स्वभाव का वही कुत्सित चित्र दिखाया कि स्त्री कभी विश्वास योग्य नहीं। दस बच्चों वाली भी साधारण प्रलोभन से फिसल सकती है। स्वयं तुमने भी तो स्त्रियों को पुरुषों से बहुत नीचे रखा। आज भी चिकनी कमर पर पुरुषों का ईमान डोल जा रहा है। क्या अब समय नहीं आ गया है। पूरे देश के पुरुषों की कतार की तुम अगुवाई करो। हे बुद्ध आओ और लौटा दो महिलाओं की रूठी किस्मत। लौट आओ…लौट आओ ए महात्मा बुद्ध।

क्या बढ़ते चुनाव खर्च लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है ?

गोपीनाथ मुंडे के लोकसभा खर्च सम्बन्धी बयान ने राजनैतिक हलकों में एक तरह का बवंडर खड़ा कर दिया है. इससे चुनाव में प्रत्याशियों द्वारा अंधाधुंध खर्च करने की मानसिकता की वर्तमान स्थिति ही उजागर हुई है. चुनाव आयोग पिछले कई वर्षों से चुनाव में काले धन के उपयोग को लेकरए एक निश्चित सीमा से अधिक खर्च करने को लेकर चिंतित सा दिखता रहा है. अपनी चिंता को मिटाने और प्रत्याशियों को चुनाव खर्च से राहत देने के लिए उसके द्वारा लोकसभा चुनाव खर्च की सीमा को चालीस लाख रुपये तक कर दिया गया. इसके बाद भी एकाध प्रत्याशी ही ऐसे होंगे जो इस सीमा में ही खर्च करते होंगे अन्यथा की स्थिति में खर्च इससे कहीं अधिक का कर दिया जाता हैए ये बात और है कि चुनाव आयोग के भेजे गए खर्च का ब्यौरा इसी चालीस लाख में समेट दिया जाता है. चुनाव आयोग भी इस बात को भली.भांति जानताए समझता है और इसी कारण से उसके द्वारा हाल ही में चुनाव खर्च सीमा और बढ़ाये जाने के संकेत मिले थे. लोकसभा का चुनाव और खर्च सीमा चालीस लाख रुपये सोचा जा सकता है कि चुनाव में धन को स्वयं आयोग ने किस तरह से प्राथमिकता प्रदान की हुई है. इसके बाद भी इसके बढ़ाने की बात राजनीतिक दलों की तरफ से. राजनीतिज्ञों की तरफ से की जाती रही है. आज के हालातों में क्या वाकई चालीस लाख रुपये में लोकसभा का चुनाव लड़ना मुश्किल हो गया है.

क्या आज के समय में चुनाव लड़ना धनबल-बहुबल के लिए ही संभव रह गया है? आखिर इतनी बड़ी राशि को चुनाव में किस तरह और कहाँ खर्च किया जाता है? कहीं इतनी बड़ी धनराशि ने ही तो चुनाव के समय दारू-मुर्गा-धन के चलन को तो शुरू नहीं किया? क्या अंधाधुंध प्रचार सामग्री, गाड़ियों की भरमार, अवैध असलहों का प्रदर्शन आदि के लिए ही आयोग इतनी बड़ी राशि खर्चने की छूट प्रत्याशियों को देता है? क्या ये आम जन का चुनावों में उसकी प्रत्याशिता को रोकने का कोई षडयंत्र तो नहीं है? ये सवाल और इन जैसे अनगिनत सवाल ऐसे हैं जो लोकतंत्र में चुनाव की, राजनीतिज्ञों की, राजनैतिक दलों की, आयोग की भूमिका को संदेहास्पद बनाते हैं. इसी संदेह के बीच लाखों रुपये की धनराशि का होना मतदाताओं को भी संदिग्ध बनाता है.

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देश में जहाँ एक तरफ चुनाव सुधारों की बात की जा रही है; घटते मतदान प्रतिशत पर चिंता जताई जा रही है; राईट तो वोट, राईट तो रिकॉल, राईट तो रिजेक्ट जैसी शब्दावली पर चिंतन-मनन किया जा रहा है; स्वच्छ, निर्भय, निष्पक्ष मतदान के प्रयास किये जा रहे हैं; चुनाव को राष्ट्रीय महत्त्व के समान बताते हुए लोगों को जागरूक करने के कदम उठाये जा रहे हों; चुनावों में काले धन को रोकने की कवायद की जा रही हो; हर आम-ओ-खास को चुनावी प्रक्रिया में सहभागिता करने के अवसर प्रदान किये जाने की राह बनाई जा रही हो तब आयोग का चुनावी खर्च सीमा को (लोकसभा-विधानसभा चुनावों में) बढ़ाये जाने की बात करना उक्त सारे प्रयासों पर पानी फेरने के समान लगता है. 

आज उच्च तकनीक के कारण, परिवहन के उन्नत साधन के कारण, संचार प्रणाली के सशक्त होने के कारण जब एक-एक मतदाता तक पहुंचना पहले से कहीं आसान हो गया है, तब चुनाव खर्च की सीमा का इतना अधिक होना (इसको और बढ़ाने की बात करना) लोकतान्त्रिक मूल्यों को, निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया को खतरे में डालने जैसा ही है. इस तरह के क़दमों से उन धनबलियों-बाहुबलियों को प्रोत्साहन मिलेगा जो येन-केन-प्रकरेण समूची चुनावी प्रक्रिया को, समूचे लोकतंत्र को अपनी गिरफ्त में करने की विकृत मानसिकता पाले बैठे हैं.

क्या तीर्थस्थल मौज मस्ती का अड्डा बन गया है ?

उत्तराखंड की त्रासदी ने दो प्रमुख प्रश्न हमारे सामने खड़े किये हैं| पहला प्रश्न है कि विकास का वही माडल क्या पहाड़ों, रेगिस्तानों और समुद्र के किनारों पर लागू किया जा सकता है, जिसे मैदानी इलाकों पर लागू किया जा रहा है? दूसरा प्रश्न है कि क्या तीर्थस्थान माने जाने वाले स्थानों को पर्यटन स्थलों या सैरगाहों के समान विकसित करना और पर्यटकों को मौज मजे के लिए वहां जाने को प्रेरित करना उचित है? यह सच है की मानव सभ्यता का पूरा विकास प्रकृति पर मनुष्य के विजय का इतिहास ही है| पर, आज विकास के जिस माडल पर चला जा रहा है, उसकी प्रेरक शक्ति मानव सभ्यता के विकास के लिए प्रकृति पर विजय प्राप्त करना न होकर, प्रकृति से अधिक से अधिक धन पैदा करना है और ये हवस प्रकृति का विनाश कर रही है| पर, यहाँ जिस बात को मैं पाठकों के संज्ञान में लाना चाहता हूँ, वह है कि तीर्थ स्थानों पर सैलानियों की तरह लोग क्यों घूमने जा रहे हैं?

ये स्थान तपस्या करने के लिए थे, अब मौज मजे के लिए लोग इसका उपयोग कर रहे हैं और सरकारें भी पर्यटन के जरिये पैसा कमाने के चक्कर में इसे प्रोत्साहित कर रही हैं| सैलानियों के बढ़ने के कारण सभी तरह के नार्म्स , जिनका पालन पहाड़ों पर मकान बनाने के लिए होना चाहिए था, को धता बताकर अवैध निर्माण हुए हैं| पहाड़ मैदान नहीं हैं , जहां आप आगे बढ़कर निर्माण करते रह सकते हैं| पहाड़ों पर पक्के निर्माण की सीमा होती है| फिर लोग जायेंगे तीर्थ स्थान और उन्हें चाहिए वहां पांच सितारा होटल की सुविधाएं|

दरअसल, पिछले दो दशक में एक ऐसा धनाड्य वर्ग तैयार हो गया है, जिसके लिए ईश्वर और ईश्वर भक्ति भी विलासिता है| उसका परिणाम भी भुगतना होगा| दूर क्यों जाते हैं, हमारे पड़ोस में अमरकंटक है, मैं वहां प्राय: जाता हूँ| आज से दो दशक पहले धर्मशाला में ठहरते थे, कच्चे होटल में खाना खाते थे, कच्ची सड़कों पर चलते थे , ठंडा स्थान था| आज बड़ी बड़ी होटले हैं, पक्के रास्ते हैं , आवश्यकता से अधिक यातायात है और गन्दगी , उसकी बात ही नहीं पूछिए और युवाओं के लिए वो तीर्थस्थान नहीं , घूमने की जगह है|

दरअसल, आजादी के बाद स्वराज के लिए समाज को जिस शिक्षा की आवश्यकता थी, वो हमारे देश के सत्ता संभालने वाले नहीं दे पाए और एक अराजक समाज का निर्माण हुआ है, जो शासक वर्ग को सूट करता है| जिसे निहित स्वार्थियों से लेकर फिरकापरस्त तक, सभी अपनी थोथी धारणाओं और इच्छाओं से नचा रहे हैं| राजिम कुम्भ को ही ले लीजिये , हर साल कुम्भ. ये क्या अवधारणा है| सारे शास्त्र किनारे हो गए, रह गया, हर साल सड़क बनाना, अस्थायी निर्माण करना और समाज के पैसे को अनुपयोगी कामों में खर्च करना| पहले लोग तीर्थ यात्रा करने कष्ट उठाकर जाते थे, अब ईश्वर को कष्ट देने जाते हैं|

मेरी पूरी सुहानुभूति वहां घूमने गए लोगों के साथ है| जिन्हें भी असामयिक मृत्यु मिली है, उनके लिए भी गहन दुःख है, पर, ईश्वर को ईश्वर रहने दो और ईश्वर के निवास स्थान को पवित्र रहने दो| वहां सांसारिक सुखों से परे होकर कष्ट उठा के जाओ| मैं जानता हूँ , अनेक लोगों को ये बातें पसंद नहीं आयेंगी, पर मुझे यही ठीक प्रतीत होता है| जो पूजा-पाठ, ईश-भजन तो दूर, कभी मंदिर के पास से नहीं गुजरते| जिनकी शाम की आरती मंदिर में नहीं मदिरालय में होती है, लेकिन, अमरनाथ दस बार हो आये| ये क्या बात हुई? पूछो तो कहते हैं कि घूमने जाते है|

क्या रोकी जा सकती थी उत्तराखंड में तबाही ?


उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा है कि उनके प्रदेश में भीषण बाढ़ का शिकार हुए लोगों की सही संख्या का कभी पता नहीं चल पाएगा। उनका अंदाजा है कि इस त्रासदी में मरने वालों की संख्या सैकड़ों से लेकर हजारों में हो सकती है।बहुगुणा ने कहा, हम उन लोगों की संख्या का सही-सही पता कभी नहीं लगा पाएंगे, जो मारे गए, जो लोग मलबे में दबे रह गए या बाढ़ के पानी में बह गए। विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने शनिवार को कहा था कि मारे गए लोगों की संख्या 10 हजार तक हो सकती है, लेकिन मुख्यमंत्री ने कहा था कि यह आंकड़ा गलत है। उत्तराखंड में कुदरत के कहर से बच निकलने वाला हर शख्श सिर्फ सेना या आइटीबीपी के जांबाजों के गुणगान कर रहा है। राज्य सरकार या स्थानीय प्रशासन नाम की कोई चीज ही किसी मुसीबत के मारे को महसूस नहीं हुई। राज्य शासन-प्रशासन की अक्षमता और लचरता पर सैलानियों से लेकर स्थानीय लोगों का आक्रोश भी बार-बार फट रहा है। यह संदेश जा रहा है कि राहत कार्यो में शुरुआती देरी से तमाम जानें चली गईं। उत्तराखंड आने वालों में दक्षिण भारत से लेकर पूरब-पश्चिम और उत्तर सभी क्षेत्रों के लोग हैं। सभी राज्यों में उत्तराखंड शासन-प्रशासन की लचरता का संदेश जा रहा है। केंद्रीय सुरक्षा दलों को भी राज्य सरकार से समन्वय में शुरुआती दिक्कत आई। जो भी राहत काम हुआ, पूरी तरह से केंद्रीय आपदा राहत बलों के कमान संभालने के बाद ही हुआ।


उत्तराखंड में आपदा के बाद देश के कोने-कोने से राहत सामग्री पहुंच रही है। रसद के भंडार लगे हैं, पर कई गांव अब भी भूखे-प्यासे हैं। इन गांवों तक अब तक रसद न पहुंचने की वजहें चाहे जो गिनाई जा रही हों, पर यह भी सच है कि कहीं न कहीं इस नाकामी के पीछे वितरण की कमजोर व्यवस्था भी जिम्मेदार है।हाल यह है कि कई जगह राहत सामग्री कूड़े के ढेर की तरह पड़ी है और खराब हो रही है। कई जगह रसद के दुरुपयोग की बातें भी सामने आई हैं। जहां एक ओर, कोटद्वार में राहत सामग्री बांटने वालों के मिनरल वाटर से नहाने की बात सामने आई, वहीं श्रीनगर से श्रीकोट के बीच लोगों के दिए कपड़ों को नाले में गिराने का भी पता चला। कुछ जगह ग्रामीणों ने राहत सामग्री के गलत वितरण की भी शिकायत की है। साफ है कि कहीं न कहीं राहत पहुंचाने में भी हीलाहवाली की जा रही है। ऐसा न होता तो शायद अब तक आपदा के मारे हजारों लोग और सैकड़ों गांव भूखे प्यासे रहने को मजबूर न होते।गुप्तकाशी में जहां स्टोर में राशन और राहत सामग्री की बर्बाद हो रही है, वहीं कालीमठ घाटी के गांवों में भुखमरी की स्थिति पैदा होने लग गई है। हालांकि प्रशासन द्वारा घाटी के गांवों में एयर ड्रॉपिंग के माध्यम से राशन पहुंचाया गया, लेकिन मात्रा कम होने से लोगों के सामने भुखमरी की स्थिति पैदा हो गई है।

उत्तराखंड में आपदा प्रभावितों तक राहत सामग्री पंहुचाने के बजाय कांग्रेस मिशन 2014 के लिए अपनी प्रचार सामग्री पंहुचा रही है। आपदा प्रभावितों के लिए भेजे जा रहे राहत सामग्रियों के पैकेट में राहुल और सोनिया गांधी के पंपलेट निकल रहे हैं।उत्तराखंड में बाढ़ आपदा राहत के लिए आए करीब 150 ट्रक सामान राहत से अधिक प्रचार सामग्री बन गई है। श्रीनगर बेस कैंप से हर रोज उत्तराखंड के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को भेजी जा रही राहत सामग्री के अंदर भारतीय युवा कांग्रेस के पंपलेट भी डाले जा रहे हैं।पंपलेट में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तथा राहुल गांधी के चित्रों के साथ ही कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ भी छपा हुआ है।कुछ दिन पूर्व श्रीनगर में युवा कांग्रेस के स्वयंसेवियों के साथ केंद्र सरकार ने राहत सामग्री भेजी थी। युवा कांग्रेस के स्वयंसेवी राहत सामग्री को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में भेजने के लिए दिन-रात जुटे हुए हैं और बड़े-बड़े बोरों में भरकर आई राहत सामग्री के छोटे पैकेट बनाकर प्रभावितों को बांट रहे हैं।पैकेट में राहत सामग्री से जुड़ी विभिन्न 25 वस्तुओं में एक रंगीन पंपलेट भी शामिल है। इस पंपलेट को सबसे ऊपर रखा जा रहा है। ताकि राहत लेने वाले व्यक्ति को यह मालूम हो सके कि राहत कहां से आई और किसने भेजी।ऐसे में राहत सामग्री, प्रचार सामग्री बनकर उभर रही है। अब इसे बेशर्मी कहें या फिर डिजास्टर कम इलेक्‍शन मैनेजमेंट कि कांग्रेस को आपदा प्रभावितों के बुझे हुए चेहरों में भी वोट नजर आ रहे हैं।

देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड में त्रासदी के बाद चार-पांच दिन बाद से ही श्रद्धालुओं के शवों की दुर्गति हो रही है। देवभूमि पर ससम्मान अंतिम संस्कार न हो पाने का हिंदू समाज का दर्द सिर्फ परिवार तक नहीं रुकेगा। लापता लोगों की संख्या और प्रत्यक्षदर्शियों की मृतक संख्या की आशंका दिल दहलाने वाली है। आपदा के 16 दिन बाद भी जो लोग नहीं लौटे हैं और उनकी कोई सूचना नहीं है, उनके परिजन भी अब भारी मन से उन्हें हादसे का शिकार मानने को विवश हैं। देहरादून के राहत शिविरों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटकर थक चुके लोग अब अपने लापता परिजनों के नीयति की शिकार होने की बात स्वीकार करने लगे हैं। वे अब केदारनाथ में अंतिम संस्कार से पहले लाशों के खींचे जा रहे फोटो और पहचान स्पष्ट करने वाली वस्तुओं को देखने के इच्छुक हैं, जिससे उन्हें अपने परिजनों की सही स्थिति का पता तो लग सके।

आंकड़ों की बाजीगरी दिखा रहे राज्य के मुख्यमंत्री उन लोगों का दर्द नहीं समझ पा रहे जो अब भी अपनों का इंतजार कर रहे हैं। तबाही के 16वें दिन राज्य सरकार केदारनाथ में सिर्फ 36 लोगों के शवों का अंतिम संस्कार कर पाई। सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए थे कि 200 लोगों की टीम केदारनाथ भेजी गई है। डॉक्टरों की ये टीम डीएनए सैंपल लेगी और अंतिम संस्कार में मदद करेगी लेकिन एजेंसियों की मानें तो इस टीम के कई सदस्य केदारनाथ में बीमार पड़ने के बाद वापस लौट आए हैं। इसी से अंदाजा लग सकता है कि 16 दिन बाद भी हालात कितने बेकाबू हैं।

राज्य सरकार के लचर रवैये से खुद देश की सबसे बड़ी आपदा प्रबंधन अथॉरिटी परेशान है। मजबूर होकर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी के उपाध्यक्ष शशिधर रेड्डी को कैमरे पर कहना पड़ा कि सरकार के आंकड़े भ्रम फैला रहे हैं। पहले राज्य सरकार ने दो रिपोर्ट भेजीं। दोनों में बचाए गए लोगों के अलग-अलग आंकड़े दिए गए हैं। इससे भ्रम हो रहा है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अथॉरिटी के ये आरोप बेहद गंभीर हैं। जिस अथॉरिटी का मुखिया खुद प्रधानमंत्री होता है, वो संस्था उत्तराखंड सरकार के आंकड़ों को कठघरे में खड़ा कर रही है। NDMA ने लापता लोगों के उत्तराखंड सरकार के महज 3000 के आंकड़े पर भी सवाल उठा दिया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट का हवाला देते हुए NDMA ने कहा कि जलप्रलय के बाद मची तबाही में 11 हजार 600 लोग लापता हुए हैं।

उत्तराखंड जैसी त्रासदी इस देश ने पहले कभी नहीं देखी लेकिन कोई भी सरकार आपदा के 16 दिन बाद ऐसे तर्क का सहारा नहीं ले सकती। तबाही बड़ी है तो उससे निपटने की तैयारी भी वैसी ही होनी चाहिए थी। तबाही का अंदाजा लगाने में सरकार ने तीन दिन लगा दिए। आपदा और राहत को लेकर सरकार एक कंट्रोल रूम तक नहीं बना पाई। एक एजेंसी ऐसी नहीं रही जो सारे काम पर नजर रखे। आंकड़े को लेकर भी सरकार की तरफ से अलग-अलग बयान दिए गए। कभी राज्य विधानसभा के स्पीकर ने 10 हजार लोगों के मरने की आशंका जताई तो कभी कैबिनेट मंत्री 5 हजार के आंकड़े तक पहुंच गए।ऐसी संवेदनहीनता ने राज्य सरकार से लोगों का भरोसा तोड़ दिया है। उत्तराखंड में जलप्रलय के 16 दिन बाद सरकार ने अब जाकर आपदा प्रबंधन अथॉरिटी तो बना दी है लेकिन इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि सरकार लापता लोगों के बारे में पुख्ता जानकारी कब तक जुटा पाएगी? आखिर कब वेबसाइट पर पूरी जानकारी अपलोड की जाएगी? जिन लोगों की मौत हुई है उनकी शिनाख्त के लिए क्या सिस्टम बनाया गया है? लोगों के अंतिम संस्कार के लिए सरकार के पास क्या इंतजाम हैं?

उत्तराखंड में बाढ़ की विभीषिका की खबरें आना जारी हैं। इस आपदा की तीव्रता का अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2 हफ्ते बाद भी यह पता नहीं चल पा रहा है कि विभीषिका में कितनी जानें गयी। लेकिन हद की बात यह है कि उत्तराखंड की इस आपदा को लेकर कुछ लोग राजनीतिक नफा-नुकसान का हिसाब लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं। राजनीति के अलावा मीडिया का रुख और रवैया दूसरा पहलू है। इस आपदा को लेकर टीवी चैनलों और अखबारों में खूब बहस और नोंक-झोंक हो रहीं हैं। उत्तराखंड में अब तक की भीषणतम आपदा ने राज्य के आपदा प्रबंधन और इससे निबटने की तैयारियों की पोल तो खोल कर रख ही दी, साथ ही सरकार को अपनों के कारण ही असहज हालात का सामना भी करना पड़ा। विपक्षी दल भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने आपदा के दौरान राज्य सरकार पर किसी तरह के आक्षेप से परहेज किया है, लेकिन अपनों का रवैया तल्ख है।राज्य सरकार आपदा राहत में नाकाम साबित हुई तो केंद्र सरकार ने खुद राहत कार्यो की कमान संभाल ली। दरअसल जब आपदा बरसी तो राज्य सरकार को कतई अंदाजा नहीं हुआ कि इससे जानमाल की इस कदर भारी तबाही हुई है। यही वजह रही कि जब केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे देहरादून पहुंचे तो उन्होंने मीडिया के सामने स्वीकार किया कि आपदा राहत को लेकर केंद्र व राज्य सरकार में तालमेल की कमी रही। इससे किरकिरी राज्य सरकार की ही हुई।

उत्तराखंड में आपदा राहत का पहला चरण निपटते ही सियासी सैलाब नजर आने लगा है। कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीति गरमा गई है। दोनों ही दलों ने सीधे किसी पर हमला करने के बजाय एक-दूसरे के खिलाफ साइबर युद्ध छेड़ दिया है। सोशल साइट ट्विटर पर सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी के हमले के बाद लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने उनका जवाब तो दिया ही, साथ ही आपदा प्रबंधन में राज्य व केंद्र सरकार को असफल बताते हुए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा का इस्तीफा भी मांग लिया। इस जंग की शुरुआत की सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी ने। उन्होंने संसद के दोनों सदनों के प्रतिपक्ष के नेताओं सुषमा स्वराज और अरुण जेटली पर उनके उत्तराखंड न जाने को लेकर ट्विटर पर कटाक्ष किया। साथ ही, कहा कि यह पार्टी सिर्फ कांग्रेस नेताओं के दौरे की आलोचना करती रही है। जेटली की तरफ से उठाए गए सवालों की तरफ इशारा करते हुए तिवारी ने ट्वीट किया कि विपक्ष के नेता सीबीआइ की स्वायत्तता पर प्रस्तावों की आलोचना कर सकते हैं, जिसे अभी सुप्रीम कोर्ट में पेश किया जाना है, लेकिन उनके पास उत्तराखंड के दौरे का समय नहीं है।

सुषमा स्वराज ने ट्विटर पर ही तुरंत पलटवार किया। उन्होंने लिखा कि गृह मंत्री के निर्देश के कारण ही वह उत्तराखंड नहीं जा सकीं। सरकार पर पीड़ितों के लिए कुछ नहीं करने का आरोप लगाते हुए उन्होंने लिखा कि जो संकट के समय सही शासन नहीं दे सके, उसे एक दिन भी सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं है। नेता विपक्ष ने कहा, ‘मुझे यह कहते हुए दुख होता है कि उत्तराखंड सरकार इस आपदा से निपटने में पूरी तरह नाकाम रही है। इसके लिए राज्य सरकार को बर्खास्त कर दिया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से केंद्र की सरकार भी इससे निपटने में पूरी तरह नाकाम रही।’ उन्होंने कहा कि जब हम बात जिम्मेदारी की उठाते हैं, आप इसे राजनीति करार देते हैं। हम राजनीति के नाम पर सरकार को उसकी नाकामी से बचकर नहीं जाने दे सकते। जितना भी राहत-बचाव कार्य हुआ है, वह सब सेना, वायुसेना और आइटीबीपी ने किया है। उन्होंने अपने जान की बाजी भी लगा दी। मैं उन्हें सलाम करती हूं। सुषमा के इस ट्वीट के जवाब में मनीष तिवारी ने फिर लिखा कि अगर लोकसभा की नेता विपक्ष गृह मंत्री की सलाह पर अमल करती हैं तो भाजपा अध्यक्ष और चुनाव समिति के प्रमुख पर ये लागू क्यों नहीं होता। नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह उत्तराखंड गए थे। मनीष से उलट कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने इस मौके पर किसी को राजनीति न करने की नसीहत दी।

उत्तराखंड में दर्जनों बस्तियों की बर्बादी रोकी जा सकती थी। सैकड़ों जानें बचाई जा सकती थीं।हजारों घर बचाए जा सकते थे और बचाया जा सकता था इस सुंदर सूबे को बर्बादियों का टापू बनने से।अगर संविधान की शपथ लेकर राज करने वाली सरकारों ने झूठ न बोला होता था। जी हां आपकी चुनी हुई सरकारों ने आपसे झूठ बोला है।
झूठ का सबूत अमेरिका से आया सबूत नहीं है। इसी गणतंत्र के उपग्रहों और वैज्ञानिकों की गवाही है ये। लेकिन न उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को सोने से फुर्सत थी और न राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण नाम के परिंदे के बहेलियों को रोने से।6 घंटे का ऐसा वक्त जो उत्तराखंड के लिए सबसे भयावह होने वाला था, बचाने वाले बर्बादी के दस्तावेज पर अपनी बेफिक्री के दस्तखत कर रहे थे।

राज्‍य के मुख्‍यमंत्री विजय बहुगुणा कहते हैं कि बादल फटने के बारे में कोई पहले से नहीं बता सकता। काश मुख्यमंत्री सच बोल रहे होते। सच तो ये है कि बादल फटने से पूरे छह घंटे पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी (इसरो) ने आफत की सारी तस्वीर शीशे की तरह साफ कर दी थी। 16 जून को उत्तराखंड में तेज बारिश शुरू हो चुकी थी।जीएमटी के मुताबिक सुबह साढ़े सात बजे यानी भारतीय समयानुसार दोपहर एक बजे ये रिपोर्ट जारी की थी इसरो ने। इस पर साफ-साफ लिखा है कि उत्तराखंड में बादल फट सकते हैं। वो भी मुहावरे की भाषा में नहीं। कस्बों और शहरों के नाम के साथ। एक नहीं दो नहीं पूरे 11 जगहों पर ईश्वर के आने वाले आतंक की भविष्यवाणी।

ये 11 जगहें हैं: बारकोट, कीर्तिनगर, मुनिकीरेती, नरेंद्र नगर, पौड़ी, रायवाला, ऋषिकेष, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, टिहरी, उत्तरकाशी! इसरो ने अपनी ये रिपोर्ट उत्तराखंड की सरकार को भी भेजी थी और एनडीएमए को भी। लेकिन इतनी जरूरी सूचना पर सियासत के सम्राट सोते रहे। ये रिपोर्ट आने के छह घंटे के बाद उत्तराखंड के हालात हौसले के दायरे से बाहर निकल चुके थे। आपदा से पहले तेज इंतजामों की खाने वाले एनडीएमए के खुदा भयावहता को भांपने में असमर्थ रहे। एक साधारण वैज्ञानिक सूचना को दरकिनार करके सबने मिलजुलकर उत्तराखंड को एक अनियंत्रित आपदा की तरफ धकेल दिया था। उन छह घंटों में कुछ भी हो सकता था। सियासत के सूरमा कहते हैं कि बादल फटना एक दैवीय आपदा है और इसका पता नहीं लगाया जा सकता। झूठ बोलते हो आप सरकार। सरासर झूठ। बादल फटने की जुबानी बाजीगरी में अपराध ढकना चाहते हैं। एक घंटे में दस सेंटीमीटर की बारिश को बादल फटना कहते हैं और इसका पता लगाने की मेटार नाम की मशीन मुश्किल से डेढ़ करोड़ की आती है।इसरो का कहा सुन लिया होता सत्ता और नौकरशाही के नियंताओं ने तो उत्तराखंड एक नर्क में बदलने से बहुत हद तक बच जाता। लेकिन एक सामूहिक अपराध ने साधना की सुहानी तस्वीरों पर हजारों मौतों का नाम लिख दिया। दाता होने के राजनैतिक दंभ ने विज्ञान के अभिमान को ऐसे चूर किया कि सत्यानाश की तस्वीर तक नहीं देख सकीं सिंहासन की आंखें।

प्रकृतिक आपदा के 16 दिन बाद उत्तराखंड में खंड-खंड जिन्दगी की यह तस्वीरें बताती है कि हालात और बिगड रहे है। राहत सिर्फ नाम की है। आपदा प्रबंधन चौपट है। मौसम के आगे बेबस पूरा तंत्र है। जिन्दगी की आस जगाने वाला तंत्र, राजनीतिक दलो के घाटे मुनाफे में बंट गया है। सीएम से लेकर पीएम तक राहत कोष की रकम से जिन्दगी लौटाने के सपने देख रहे हैं। राज्य के मुख्यमंत्री यह बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है कि उनकी सत्ता को कोई दूसरा राजनेता हिलाने की कोशिश करें। या मोदी सरीखा कोई सीएम मदद देने की बात कह कर देश को यह एहसास कराये कि बहुगुणा कमजोर हैं। तो बीते 15 दिनों में मौत का आंकडा लगातार बढ रहा है उसकी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री ने नहीं ली। दोष मौसम पर मढा।बीते 16 दिनों में 200 से ज्यादा गांव में सबकुछ खत्म होने का अंदेशा लगातार गहराया है।

तमाम जद्दोजहद के बाद भी 4000 से ज्यादा लोग अब भी फंसे है।बिगडे मौसम के आगे अगर आपदा प्रबंधन नतमस्तक है और सियासत चमक रही है।तो होगा क्या?और देश के बाकी राजनेता जो 2014 के मिशन में लगे हैं उन्हें उत्तराखंड दल-दल लगेगा।ध्यान दें तो हो यही रहा है और राहत से लेकर आपदा प्रबंधन तक सियासी स्क्रिप्ट के तहत दिल्ली से देहरादून तक लिखा जा रहा है। हर सियासी चेहरा अपने अनुकुल सियासी बयान देकर विरोधी पर राजनीतिक आपदा लाने जा रहा है। इस आपदा के बारे में सोचें तो तीन बातें सामने आतीं हैं। पहली ये कि हम इस प्रकृतिक आपदा से कुछ सबक ले सकें और भविष्य में आपदा से बचने के लिए कोई विश्वसनीय व्यवस्था कर सकें। यानि ऐसा कुछ कर पायें जो आपदा प्रबंधन व्यवस्था को सुनिश्चित कर सके। दूसरी बात यह है कि प्रशासन को कटघरे में लाकर उसे जबाबदेह बनाने का इंतजाम कर सकें। और तीसरी बात यह है कि शासन को घेरकर जनता को यह बताने की कोशिश करें कि आपदा के बाद की स्थिति से निपटने में आपकी सरकार नाकाम रही। लेकिन यहां सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या विगत में ऐसी आपदाओं से हमने कोई सबक नहीं लिया था? इस बारे में कहा जा सकता है कि आपदा प्रबंधन को लेकर पिछले 2 सालों से जिला स्तर तो क्या बल्कि तहसील स्तर पर भी जोर-शोर से कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। लेकिन ये कोशिशें जागरूकता अभियान चलाने के आगे जाती नहीं दिखीं। अब सवाल यह है कि क्या देश के 600 जिलों के लिए हम 2 लाख करोड़ रुपये का अलग से इंतजाम करने की स्थिति में हैं ? उत्तराखंड की इस विभीषिका का पूर्वानुमान करते हुए क्या कोई आपदा प्रबंधन व्यवस्था बनाने में हम आर्थिक रुप से समर्थ हैं ? सवाल यहीं नहीं खत्म होते क्योंकि ऐसी प्राकृतिक आपदा के खतरे के दायरे में उत्तराखंड के अलावा 100 से ज्यादा इलाके आते हैं।

उत्तराखंड की प्राकृतिक आपदा से हमें यह साफ संदेश मिल रहा है, कि हम अपनी छोटी-बड़ी नदियों के पाटों का पुनःनिर्धारण कर लें। देश में उत्तराखंड की इस आपदा से हमें यह सबक भी मिल रहा है कि वर्षा के जल का स्थानीय तौर पर ही प्रबंधन करना बुध्दिमत्तापूर्ण है। इसके लिए यह सुझाव भी दिया जा सकता है, कि देश में पारम्परिक तौर पर मौजूद 10-12 लाख तालाबों की जलधारण क्षमता की बहाली करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। लगे हाथ यह भी याद दिलाया जा सकता है, कि टिहरी बाध की जलधारण क्षमता के कारण ही उत्तराखंड की विभीशिका के और ज्यादा भयानक हो जाने की स्थिति से हम बच गये हैं। इन सब बातों के मद्देनजर हमें अपनी नीतिओं और नियोजन के तरीके पर गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। उपनिषदों में हिमालय को देव-भूमि कहा गया। देव स्वभाव से शांत और संतोषी होते हैं। अत: वे हिमालय पर शांति और संतोष चाहते हैं, मगर हमने इसका घोर उल्लंघन किया है। एक तो उत्तराखंड में 70 बांध बना दिए। इनमें 37 हिमालय के पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र-गंगोत्री, भागीरथी और अलकनंदा नदियों पर हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर बारूद से विस्फोट किया गया है, जिसके कारण हिमालय जर्जर हो गया है।

दूसरे, नदियों से खनिजों का अंधाधुंध दोहन और उनके किनारों का अतिक्रमण करके वहां पर मानव बसाहट कर दी गई, जिससे उनकी जल-प्रवाह प्रणाली अब प्राकृतिक नहीं रही। नदियों में प्रलयंकारी बाढ़ का यही कारण है। बांधों, सड़कों और बसाहट के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हुई है। पेड़ पहाड़ों की सतही मिट्टी और नीचे चट्टानों में जड़ें फोड़ कर मिट्टी और चट्टानों को बांधे रखते हैं, यह तो एक तरह की ‘ग्राउटिंग’ है। पेड़ कट जाने से ऊपरी मिट्टी की सतह बह जाती है और नीचे चट्टानों के अस्थिर हो जाने से स्खलन होने लगता है। वषर्-2000 में उत्तराखंड में 85 प्रतिशत वन आवरण था, जो कि 2010 में घटकर 75 प्रतिशत रह गया। यद्यपि विकास आवश्यक है, लेकिन प्रकृति के सिद्धांतों को दरकिनार करके नहीं। हिमालय के नाजुक संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करके उसे ‘बायोस्फीयर रिजर्व’ घोषित करना चाहिए। इसके बाहर वहां का विकास देश-विदेशों में विकसित तकनीकों के अनुसार ही किया जाए।इसके कुछ सबक भविष्य में ऐसी आपदाओं को रोकने व उनसे निपटने में सहायक होंगे। इसका पहला सबक यह है कि हम प्रकृति का आदर और प्रकृति के सिद्धांतों का पालन करें। प्रकृति बहुत दयालु और सहिष्णु है, पर एक सीमा तक। सीमा लांघ जाने पर वह कुपित होकर कहर बरपा देती है।

Tuesday, July 2, 2013

मचल उठता था उसका दिल हशिनाओं को देख कर !

पेड सेक्स के विषय में आजकल चर्चाएं जोरों पर हैं लेकिन इस तरह अपनी शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति करना तब एक दंडनीय अपराध बन जाता है जब इस इच्छा पूर्ति का माध्यम कोई नाबालिग हो जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भारत में 18 वर्ष से कम उम्र की किसी भी किशोरी के साथ उसकी मर्जी से या जबरन शारीरिक संबंध स्थापित करना एक दंडनीय अपराध है लेकिन फिर ऐसा करने वाले अपराधी को क्या सजा दी जाती है कोई सजा दी भी जाती है यह एक अलग मामला है लेकिन इटली के पूर्व प्रधानमंत्री को आखिरकार उनके ऐसे शर्मनाक कृत्य के लिए सजा प्रदान कर ही दी गई!

पैसे के एवज में एक नाबालिग युवती के साथ शारीरिक संबंध स्थापित करने के आरोप में इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बर्लुस्कोनी को सात साल की सजा और उनके किसी भी तरह के सार्वजनिक पद को संभालने पर भी पाबंदी लगा दी गई है

यौन अपराध के अलावा सिल्वियो बर्लुस्कोनी पर अपने पद और शक्तियों का दुरुपयोग करने का भी आरोप लगाया गया है 76 वर्षीय रंगीन मिजाज सिल्वियो बर्लुस्कोनी पर यह कोई पहला मामला नहीं है इससे पहले भी उनकी रंगिनी दुनिया से पर्दा उठाया जा चुका है करीमा नामक इटली की एक बार डांसर के साथ शारीरिक  संबंध स्थापित करने और उसे चोरी के आरोप से बचाने के लिए अपने पद का दुरुपयोग करने जैसे आरोपों से भी इटली के पूर्व प्रधानमंत्री कानून के शिकंजे में आ चुके हैं!

वैसे अगर आप रंगीन मिजाज सिल्वियो बर्लुस्कोनी के जीवन में आई महिलाओं के बारे में जानना चाहते हैं तो हम आपके लिए एक बेहतर माध्यम सिद्ध हो सकते हैं चलिए हम आपको बताते हैं कि सेक्स स्कैंडल से लगातार जुड़े रहने वाले सिल्वियो बर्लुस्कोनी  का संबंध किन.किन महिलाओं से रहा !

1- करीमा एल महरॉग नाइट क्लब डांसर करीमा एल महरॉग वही महिला है जिसके साथ पैसे देकर संबंध बनाने जैसे आरोप में सिल्वियो बर्लुस्कोनी को सजा दी गई है उल्लेखनीय है कि जब करीमा 17 वर्ष की एक नाइट क्लब डांसर थी तब इटली के पूर्व प्रधानमंत्री ने उसके साथ संबंध बनाए थे!

2- पेट्रेजिया डी एडारियो बुंगा.बुंगा पार्टियां आयोजित करने वाली एस्कॉर्ट पेट्रेजिया और नाडिया नामक एक कॉलगर्ल के साथ भी सिल्वियो बर्लुस्कोनी के संबंध थे!

3- क्वीन बी सेक्स पार्टियों में क्वीन बी के नाम से जानी जाती मशहूर टीवी एक्टर सबीना ने यह दावा किया था कि बर्लुस्कोनी के साथ रहते हुए वह गर्भवती भी हुई थी लेकिन बर्लुस्कोनी ने इस दावे को खारिज कर दिया था!

4- निकोल मेनेटी कभी यह सिल्वियो बर्लुस्कोनी डेंटिस्ट हुआ करती थी लेकिन इसके साथ.साथ वह बर्लुस्कोनी के लिए एस्कॉर्ट भी मुहैया करवाती थी कुछ समय बाद अपने सबसे बड़े ग्राहक सिल्वियो बर्लुस्कोनी की मेहरबानी से वह लोम्बार्डी की प्रांतीय काउंसिलर भी चुनी गई थी!

5- नेओमी लेटिजियार नेओमी नाम की मॉडल की वजह से ही माना जाता है बर्लुस्कोनी का अपनी दूसरी पत्नी वेरोनिका से तलाक हुआ था वैसे हम आपको बता दें कि बर्लुस्कोनी ने वेरोनिका को एक टॉपलेस नाटक में देखने के बाद शादी के लिए प्रपोज किया था! इतना ही नहीं वर्ष 1985 में ही उन्होंने अपनी पहली पत्नी कार्ला को तलाक दे दिया था!

6- फ्रांसेस्का पास्कल उम्र में लगभग 50 साल छोटी फ्रांसेस्का से बर्लुस्कोनी ने सिर्फ सगाई की थी और अपनी यह सगाई उन्होंने पिछले साल तोड़ दी

पत्नियों को गुमनामी और पति मशहूर !

कई सालों तक एक.दूसरे से सच्चा प्यार किया तब जाकर शादी करने का फैसला लिया पर जब शादी हो गई तो कुछ सालों बाद तलाक ले लिया समाज कितना भी आगे बढ़ जाए पर तलाक लेने की सजा पत्नियों को मिलती है पति की शख्सियत वैसी ही बनी रहती है जैसी शादी से पहले थी पर पत्नी गुमनामी के अंधेरे में कहीं गुम हो जाती है!

शाहिद कपूर की मां नीलिमा अजीम को एक्टर पंकज कपूर से तलाक के बाद गुमनामी मिली एक्टर पंकज कपूर की शादी नीलिमा अजीम के साथ दस सालों तक चली थी पर सालों बाद पंकज ने नीलिमा को तलाक दे सुप्रिया पाठक के साथ दूसरी शादी रचा ली थी आज नीलिमा अजीम का नाम किसी अंधेरे में गुम है

सैफ का नाम बॉलीवुड में प्रेम लीलाएं करने के लिए जाना जाता है थोड़े समय पहले सैफ ने करीना कपूर से शादी की थी अमृता सिंह सैफ अली खान की पहली पत्नी थीं जो उनसे लगभग 12 साल बड़ी थीं जब से सैफ और अमृता का तलाक हुआ है तब से लेकर आज तक अमृता का नाम शायद ही कहीं सुनाई पड़ता है!

नादिरा बब्बर यह नाम आपने आज से कई सालों पहले सुना होगा नादिरा और राज बब्बर की मुलाकात तब हुई जब राज बब्बर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ाई कर रहे थे कई सालों बाद जब राज बब्बर को अभिनेत्री स्मिता पाटिल से प्यार हुआ तो उन्होंने नादिरा बब्बर को तलाक दे हमेशा के लिए गुमनामी के अंधेरे में छोड़ दिया!

रीना दत्त और आमिर खान का प्रेम विवाह था जिस कारण उनका रिश्ता खुशी.खुशी 16 साल तक चला पर फिल्म लगान के सेट पर आमिर खान को किरण राव से प्यार हो गया और उन्होंने रीना दत्त को तलाक दे दिया पर आज भी रीना दत्त आमिर खान के घर आती.जाती रहती हैं!

बॉलीवुड के मशहूर गीत लेखक जावेद अख्तर ने हनी ईरानी को तलाक तब दिया जब उन्हें शबाना आजमी से प्यार हो गया था जावेद अख्तर और हनी ईरानी के फरहान और जोया अख्तर नाम के दो बच्चे भी हैं हनी ईरानी भी अच्छी लेखिका हुआ करती थीं लेकिन उन्होंने जावेद अख्तर से तलाक के बाद कुछ भी खास और नया नहीं लिखा! 

आरती बजाज को तोहफे में फिल्म निर्देशक और निर्माता अनुराग कश्यप से दुख मिला है अनुराग कश्यप से तलाक से पहले आरती बजाज उनकी हर फिल्म में काम किया करती थीं लेकिन उनसे तलाक के बाद आरती बजाज किसी भी फिल्म में निर्देशन करती हुई नजर नहीं आईं आरती  ने सालों बाद फिल्म घनचक्कर  में फिल्म एडिटर के तौर पर काम किया

वक्त बदला पर बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं बदला कविता कुंद्रा और नंदिता का नाम शायद तीन.चार साल से आपको सुनाई नहीं दे रहा होगा कविता कुंद्राए राज कुंद्रा की पहली पत्नी हैं और उनसे राज कुंद्रा ने तलाक शिल्पा शेट्टी के प्यार में पड़ कर ले लिया फैशन डिजाइनर नंदिताए संजय कपूर की पत्नी थीं लेकिन करिश्मा कपूर के प्यार की खातिर संजय ने नंदिता को तलाक दे दिया

मेरी गलती क्या है कोई तो बताये ?

कई बार बिना किसी गलती के आपको ऐसी सजा मिलती है जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होती है कई बार कुछ ऐसे गुनाह आपके साथ होते हैं कि आपको पता भी नहीं चलता कि आपके साथ कोई गुनाह है जब तक पता चलता है तब तक उस गुनाह के लिए आपको ही गुनहगार बताकर आपको ही उसकी सजा भी दे दी जाती है आप बेगुनाह होकर भी किसी को समझा नहीं पाते कि आपने कुछ नहीं किया पर जरा सोचिए कि किसी ने गुनाह भी आपके साथ किया और आपको इंसाफ मिलने की बजाय सजा मिले तो आप कैसे रिएक्ट करेंगे शायद यह सब आपको कहानी लगे पर यह कहानी नहीं एक खौफनाक हकीकत है

वृंदा एक 28 साल की युवा महिलाए दो बच्चों की मां है वृंदा ज्यादा पढ़ी. लिखी नहीं है पर गांव के स्कूल से दसवीं पास है 22 साल की उम्र में उसकी शादी पास के गांव में मनोज से हुई वृंदा के मां.बाप की तीन और बेटियां थीं किसी तरह ले.देकर इसकी शादी कर उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी की कुछ सालों बाद वृंदा का पति अचानक बीमार रहने लगा डॉक्टर से दिखाया तो पता चला कि वृंदा के पति को एड्स है परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई पर सबसे बड़ा पहाड़ तो वृंदा पर टूटा डॉक्टर ने वृंदा को भी टेस्ट कराने को कहा वृंदा भी पॉजिटिव थी पति के दुख में डूबी वृंदा को पता भी नहीं था कि एड्स होता क्या है और क्यों होता है पर इसके पॉजिटिव होने का पता चलने पर परिवार ने अपने बेटे को एड्स होने का दोषी उसे बताकरए उसे घर से निकाल दिया मायके गई तो सारी बात जानकर मायके वालों ने भी उसे ही कुलक्षिणी बताकर घर से निकाल दिया वृंदा ने बहुत कहा उसकी गलती नहीं पर किसी ने उसकी बात नहीं मानी इलाके में एड्स की बात फैल जाने से उसे कोई काम भी नहीं देता था आज उसकी हालत यह है कि वह सड़कों पर भीख मांगकर अपने मौत के दिन गिन रही है

यह दर्दनाक कहानी आज हजारों महिलाओं की बदकिस्मत तकदीर है एड्स एक ऐसी बीमारी है जो आज की आधुनिक जीवनशैली में बड़ी तेजी से फैल रही है पहले लोग इसके बारे में बात ही करने से कतराते थे आज सरकारी प्रयासों से लोगों में इस रोग को लेकर जागरुकता आई है पर हमेशा की तरह एक बार फिर एड्स के रूप में महिलाओं के चरित्र विश्लेषण करने वाला एक और लांछन तैयार हुआ है सरकारी प्रयासों से समाज में जिस तेजी से एड्स के लिए जागरुकता आई है! लोगों में इसे लेकर छुपाने का भाव भी पैदा हुआ है पुरुष प्रधान समाज यह मानने को तैयार नहीं होता कि यह उसकी गलतियों का फल है यूं तो यह महिला.पुरुष की बहसबाजी से बहुत दूर का मुद्दा है पर यह फिर भी महिला.पुरुष बहसबाजी का मुद्दा बन गया है आप पूछेंगे कैसे?

सरकारी अस्पतालों में सूचीबद्ध आंकड़े बताते हैं कि कई ऐसे युवा जो शादी के पहले एचआईवी पॉजिटिव थे ने शादी के बाद अपनी युवा पत्नियों को भी यह रोग दे दिया बहुत बाद में जब उन्हें यह बात पता चलती है तो पत्नी की जांच करवाई जाती है जाहिर है कि पति इंफेक्टेड है तो पत्नी तो होगी ही डॉक्टरी जांच रिपोर्ट साफ बताती है कि पति की रोग की जटिलता पत्नी से अधिक है पर फिर भी समाज में बेटे की साख को बचाने के लिए बहूए पत्नी को कुल्टाए कुलक्षिणी कहकर घर से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जाता है बिना यह सोचे कि एक तो उस बेचारी औरत को मुफ्त का रोग मिलाए और उस पर से उसकी बीमारी के बारे में जानकर समाज उसे तरह.तरह से प्रताड़ित करेगा !

महिला शोषण का यह रूप शायद आपके लिए नया हो पर सच है एक हद तक समाज भी इसके लिए जिम्मेदार है शादी करते हुए हम कुंडलियां तो मिलाते हैंए घर पैसा परिवार तो देखते हैंए पर लड़के.लड़कियों का स्वास्थ्य परीक्षण जरूरी नहीं समझते आज की आधुनिक जीवनशैली में बहुत जरूरी है कि शादी के वक्त घर.परिवार पैसा देखने के साथ लड़के.लड़कियों का स्वास्थ्य परीक्षण भी करवाया जाए यह किसी की निजता का हनन नहीं है यह लड़के.लड़की दोनों के परिवार को स्वेच्छा से करना चाहिए यह निजता से ज्यादा दो जिंदगियों का सवाल होता है

एड्स की बीमारी एक बड़ी सामाजिक समस्या है आज की उच्छृंखल जीवनशैली का उपहार है यह रोग पर हर जगह यह सोच सही हो जरूरी नहीं वृंदा जैसे केस एड्स से भी भयानक हैं इसके लिए जरूरी है शादी के नियम.कायदोंए परंपराओं से अलग भी कुछ सोचा जाए !

विकसित भारत का सपना और कुपोषण का सच !

कनाडा के एक गैर सरकारी संगठन द्वारा विश्वभर में करवाए गए एक सर्वे के नतीजों के अनुसार वैश्विक स्तर पर मौजूद कुपोषित लोगों की संख्या में से लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा भारत में रहता है! हाल ही में हुआ यह सर्वे हमारी सरकारी नीतियों और नागरिकों को मुहैया करवाई जाने वाली सुविधा इंतजामों की पोल खोलता प्रतीत होता है क्योंकि इस अध्ययन के द्वारा यह स्पष्ट तौर पर कहा जा रहा है कि उभरती अर्थव्यवस्था के बावजूद भारत के हालात अति पिछड़े देश जैसे ब्राजील, नेपाल, बांग्लादेश से कुछ ज्यादा अलग नहीं हैं. कनाडा के गैर-सरकारी संगठन माइक्रोन्यूट्रीएंट इनिशिएटिव के अध्यक्ष एमजी वेंकटेश मन्नार का कहना है कि कम ऊंचाई के होने, शरीर में खून की कमी के होने और कम वजन जैसे आंकड़े सबसे ज्यादा भारत में ही हैं. मन्नार के अनुसार भारत में स्वास्थ्य मंत्रालय सहयोगी मंत्रालयों जैसे महिला और बाल विकास मंत्रालय, शिक्षा और ग्रामीण विकास मंत्रालय आदि में बंटा हुआ है लेकिन विडंबना यही है कि समस्या को कोई भी मंत्रालय गंभीरता से नहीं लेता और ना ही कोई इस बाबत जवाबदेही के लिए ही तैयार होता है.

इस सर्वे के नतीजे एक तरफ तो भारत के हालिया स्थिति को वर्णित कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर इन परिणामों ने एक बहुत बड़ी बहस को भी जन्म दिया है कुछ लोग ऐसे शर्मनाक आंकड़ों के लिए सरकारों और राजनीतिक दावों को आड़े हाथों ले रहे हैं वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके अनुसार राजनीतिक नीतियों के कारण ही यह नतीजा भारत के हालातों का परिमार्जित रूप है!

बुद्धिजीवियों का एक वर्गए जो देश की जनता के ऐसे हालातों के लिए स्वार्थी राजनीति को ही दोषी ठहरा रहा है का कहना है कि वैश्विक स्तर पर तुलना करने के बाद अगर भारत को ऐसे शर्मनाक आंकड़ों का मुंह देखना पड़ रहा है तो इसके लिए जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ हमारी असफल नीतियां ही हैं ऐसी नीतियां जिन्हें दिखावे के लिए बना तो लिया जाता है लेकिन लागू करने के लिए कोई कोशिश नहीं की जाती भले ही भारत को एक कल्याणकारी राज्य का दर्जा दिया जाता हो लेकिन वोटबैंक की राजनीति के तहत काम कर रही हमारी सरकारें सुविधाएं भी वहीं मुहैया करवाती हैं जहां उन्हें अपना फायदा नजर आता है एक तरफ लोग भूखों मरने के लिए मजबूर हैं तो दूसरी ओर सरकारें सिर्फ वायदों के भरोसे ही अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रही हैं ऐसे वायदे जिनके पूरे होने की उम्मीद करना खुद को धोखा देने जैसा है

वहीं दूसरी ओर बुद्धिजीवियों के दूसरे वर्ग में शामिल लोगों का यह साफ कहना है कि यह सरकारी नीतियों का ही परिणाम है जो स्वतंत्रता से लेकर अब तक भारत के हालातों में उल्लेखनीय परिमार्जन देखे जा सकते हैं पहले की तुलना में अब हम अनाज उगाने में सक्षम हुए हैं और अनेक सुविधाएं भी नागरिकों को उपलब्ध करवाई जा रही हैं मेडिकल सुविधाएं और खाद्य पदार्थों के वितरण जैसी नीतियां भी भारत के हालातों को सुधारने की कोशिश कर रही हैं आजादी के बाद से ही भारत के सामने कई चुनौतियां घड़ी हैं जिन पर धीरे.धीरे काबू पाया जा रहा है इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि इन चुनौतियों से निपटने में कुछ हद तक हम सफल हुए हैं लेकिन एक लंबी रेस अभी बाकी है जिसमें निश्चित ही हमें सफलता हासिल होगी !

बिहार बनाम बर्तमान राजनीति 2013 !

बिहार की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों का निष्पक्ष विश्लेषण करने पर ऐसा लगता है जैसे आने वाले समय में मुख्यमंत्री, नीतीश कुमार की वही हालत होने वाली है जो आज लालू प्रसाद यादव की है। हां, इसमें थोड़ा समय लगेगा। अभी नीतीश कुमार सत्ता में हैं तो ज्यादा उछल रहे हैं। केंद्र से सहायता भी मिल रही है, लेकिन यह ना भूलें कि वोट नीतीश कुमार को नहीं गठबंधन को मिला था। नीतीश कुमार की भाव-भंगिमा को देखकर ऐसा लगता है कि उन्हें अपने बारे में कुछ ज्यादा ही गलतफहमी हो गई है। राजनीति में ऐसा होता रहा है। कई बार भीड़ को देखकर नेता लोग अपने समर्थकों का गलत अनुमान लगा लेते हैं। इनकी राजनीतिक औकाद क्या थी, जब इन्होंने लालू प्रसाद से हटकर समता पार्टी का गठन किया था तो 7 विधायक जीतकर आए थे।

ये तो भारतीय जनता पार्टी है जिसने इन्हें केंद्र में मंत्री पद दिया और ये अपनी जड़ें मजबूत कर सकें और आज ये उन्हें ही पाढ़ पढ़ा रहे हैं। बिहार और देश की जनता सब देख-सुन रही है। बिहार की जनता देश को हमेशा एक नई राजनीतिक दिशा देने में आगे रही है। बिहार से ही महात्मा गांधी ने नीलहे अंग्रेजों के विरोध और किसानों के हितों के लिए चंपारण में सत्याग्रह की शुरुआत की थी। फिर, आपातकाल के दौरान जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया था और पूरा देश जयप्रकाश नारायण के साथ हो लिया था।

आज की परिस्थितियां उनसे भिन्न नहीं है। देश में विभिन्न पार्टियों के नेतागण जनता से किए वादे को पूरा करना अपना लक्ष्य नहीं बनाते हैं बल्कि वे सदैव जनता को जाति-धर्म और प्रांत के झगड़ों में उलझाये रखकर सत्ता की मलाई खाते हैं। जनता इन्हें नजदीक से देखते हुए भी एकदम से निरीह है, उसे दो वक्त की रोजी-रोटी की पड़ी है और इसी का फायदा नेतागण और माफिया गिरोह उठाते हैं। लेकिन जब जनता का गुस्सा उबाल खाता है तो फिर बड़े-बड़े महारथियों को धूल चाटनी पड़ती है।

बिहार में मुख्यमंत्री, नीतीश कुमार ने कांग्रेस के 4 विधायकों और 4 निर्दलियों की सहायता से विश्वास मत हासिल कर लिया। लेकिन जैसा कि उन्होंने बिहार की जनता से वादा किया था कि अगर हम घर-घर में बिजली नहीं पहुंचा सके तो हम आपसे वोट मांगने नहीं आयेंगे। अभी तक तो स्थिति यह है कि राजधानी पटना ही में कई-कई घंटों बिजली नदारद रहती है बाकि के शहरों में स्थिति का अंदाजा इसी से लग सकता है। गांवों की बात तो छोड़ ही दीजिए इस वक्त।

जेडीयू के पास 118 विधायक हैं, बीजेपी 91 सीटों पर काबिज है जबकि आरजेडी के पास 23 सीटें हैं। कांग्रेस के पास चार विधायक हैं जबकि निर्दलीय छह सीटों पर और अन्य 2 सीटों पर कायम हैं। कांग्रेस की नज़र नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के 20 लोकसभा सदस्यों पर है, क्योंकि ममता बनर्जी की तृणमूल और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) जैसी पार्टियों के समर्थन खींच लेने से सरकार अल्पमत में चल रही है और अभी अपना कार्यकाल पूरा करने के लिए जेडीयू के लोकसभा सदस्यों की हमेशा जरूरत रहेगी।

वैसे भी, जेडीयू ने राष्ट्रपति चुनाव के समय में कांग्रेस प्रत्याशी, वर्तमान राष्ट्रपति, डॉ. प्रणव मुखर्जी को वोट दिया था और बदले में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार ने बिहार सरकार को ना सिर्फ पिछड़े राज्यों के लिए नई नीति की घोषणा का वादा किया बल्कि बिहार को केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही आर्थिक मदद में 12 हजार करोड़ रुपये अतिरिक्त दिए। बिहार में, कई परियोजनायें तो ऐसी है जो वर्षों से धूल फांक रही थी और उनके लिए धन का आवंटन भी हुआ था, लेकिन धरातल पर कोई कार्यवायी होती नहीं दिख रही थी। ऐसी ही एक परियोजना बौद्ध सर्किट के विकास की है जिसे जापान की सरकार ने 2010 में ही वित्तीय मदद देने की पेशकश की थी, लेकिन पता नहीं किन कारणों से उसे रोककर रखा गया था, अब गठबंधन टूटने के बाद इन परियोजनाओं पर काम शुरू होता दिख रहा है, ऐसी चर्चा चल रही है। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार की रेलवे निर्माण के क्षेत्र में कार्यरत एजेंसी, राइट्स ने पटना में मेट्रो रेल के परिचालन संबंधी योजना को भी हरी झंडी दे दी है।

अभी की स्थिति में नीतीश कुमार और केंद्र की कांग्रेस की सरकार दोनों का हित सध रहा है लेकिन नीतीश कुमार, राजनीति के मंजे हुए किलाड़ी है और उन्हें राज्य की वास्तविकता के बारे में पूरा अंदाजा है। राज्य में मुस्लिमों की आबादी 16 प्रतिशत तक है। अभी तक यह आबादी लालू प्रसाद यादव के साथ है। गौरतलब है कि लालू प्रसाद यादव ने 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्र को समस्तीपुर में रोककर मुस्लिमों का वोट थोक मात्रा में पाया था और तब से लेकर अब तक मुस्लिम यादवों का गठजोड़ कायम है और इसी के बीते लालू प्रसाद ने बिहार में 15 वर्षों तक शासन किया था।

नीतीश कुमार के साथ में कुर्मी-कोयरी, अति पिछड़ों, महादलितों का वोट बैंक है और अगर वे इसके साथ में थोड़ी मात्रा में भी मुस्लिमों को जोड़ने में कामयाब रहे तो फिर उनकी जीत पक्की है। इसके लिए वे दिन-रात नई-नई घोषणायें कर रहे हैं तथा पाकिस्तान की यात्रा करके मुस्लिमों के बीच में संदेश देने की कोशिश भी की है। लेकिन बिहार में अभी तक मुस्लिम समुदाय कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के बीच बंटा हुआ है और इसे तोड़ना नीतीश के लिए आसान काम नहीं है।


लालू प्रसाद यादव इतनी आसानी से अपने वोट बैंक को जाने नहीं देंगे। नीतीश कुमार ने मुस्लिम मतों को आकर्षित करने के लिए सीमांचल प्रांत के बाहुबली और अपराधी नेत और लालू प्रसाद के समर्थकों में शुमार रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री, तुस्लीमुद्दीन को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया है। इसके अतिरिक्त जेडीयू से वर्तमान में कई मुस्लिम विधायक है, लेकिन अगले चुनाव में उंट किस करवट बैठता है, अभी देखना बाकि है। वैसे राजनीति में ना तो कोई स्थायी दोस्त होता है और ना ही दुश्मन।

राजनीतिक क्षेत्रों में ऐसी चर्चा चल रही है कि आने वाले समय में लालू यादव के चारा घोटाला को भूलकर बिहार और देश की जनता अगर, वर्तमान मुख्यमंत्री, नीतीश कुमार के मॉरीशस कनेक्शन को याद रखें तो गलत नहीं होगा। केंद्र सकार नीतीश कुमार और कंपनी का मॉरीशस में बड़े-बड़े होटलों और अन्य व्यवसायों में निवेश से संबंधित कागजातों को जांच कर रही है। कांग्रेस के साथ नीतीश के राग का यह बड़ा कारण है। नीतीश कुमार की स्वच्छ और धवल छवि सिर्फ और सिर्फ मीडिया जनित है, वे भी अन्य राजनेताओं की तरह उतने ही भ्रष्ट हैं, लेकिन अभी इस मुद्दे पर कुछ भी कहना जल्दीबाजी होगी क्योंकि जांच रिपोर्ट जब तक नहीं आती, तब तक कुछ बी कहना गलत होगा और हमें नहीं लगता कि आने वाले समय में यह आयेगी भी। क्योंकि कांग्रेस और नीतीश कुमार दोनों एक-दूसरे से गलबहियां करने वाले हैं। हालांकि, दबाव बनाने के लिए, चुनावों तक कहीं कोई बड़ा खुलासा हो जाये तो किसी को इस पर आश्चर्य नहीं होगा? आखिर, लालू यादव के समय के सारे अपराधियों के साथ होते हुए भी नीतीश कुमार कैसे पवित्र और स्वच्छ रहे।

अब तो आने वाला वक्त बतायेगा कि गठबंधन टूटने के बाद, बिहार में जनता दल यूनाइटेड या भारतीय जनता पार्टी में से किसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ेगा? हम तो बस इंतजार करो और देखो की नीति को जानते हैं। कहीं ऐसा ना हो कि चौबे गए, छब्बे बनने और दूबे बन गए। वैसे बिहार की जनता ने गठबंधन को बहुमत दिया था ना कि जनता दल यूनाइटेड या नीतीश कुमार को। अभी चुनाव कराके देख लें नीतीश कुमार तो हकीकत खुद ब खुद सामने आ जायेगी। महाराजगंज में प्रभुनाथ सिंह की जीत कई बातों को बयां कर देती है। कुर्मी और कोयरी वोटों पर अन्य नेताओं की पकड़ भी अच्छी-खासी है। इनमें उपेन्द्र वर्मा, सतीश कुमार सहित कई अन्य नाम शामिल हैं।
कई बार तो ऐसा लगता है कि जिस तरह से, लालू प्रसाद यादव ने राबड़ी देवी की सरकार बचाने के लिए शीबू सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा की मांग को मानते हुए बिहार का बंटवारा करने में तनिक भी संकोच नहीं किया लेकिन बाद का हश्र सबको पता है। 

उसी तरह से जेडीयू और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन को बिहार की जनता ने विकास के नाम पर वोट दिया था ना कि ओछी राजनीति करने के लिए। आज सुशासन और मीडिया जनित छवि के नाम पर भले ही नीतीश कुमार अपनी सरकार बचा ले गए हैं लेकिन उनका राजनीतिक भविष्य इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। किस तरह से लालू प्रसाद यादव पिछले दस सालों से दोबारा सत्ता प्राप्त करने को लालायित हो गए हैं, कुछ इसी तरह का हाल हमारे सुशासन बाबू का होने वाला है, लेकिन आस-पास में स्थित चापलूसों की चांडाल चौकड़ी उन्हें हकीकत को पहचानने नहीं दे रही है, ये चापलूस तभी तक हैं जब तक वे जीत रहे हैं, जैसे ही हाथ से सत्ता गई सारे के सारे गायब हो जायेंगे। क्योंकि राजनीति में ना तो कोई स्थयी दोस्त होता है और ना ही दुश्मन।।
बिहार के लोग तो विकास चाहते हैं, जिससे कि कंधा से कंधा मिलाकर हम देश के अन्य राज्यों के साथ चल सकें। जाति और धर्म की राजनीति से किसी का कोई भला नहीं होने वाला। हां, राजनेता जरूर आम-आदमी के बीच फूट डालने में इस कारण से सफल हो जाते हैं और रहे भी हैं। अंग्रेजों के जमाने से फूट डालो और शासन करो की यह नीति चल रही है।

ये वही नीतीश कुमार हैं जिन्होंने गुजरात के कच्छ में 13 दिसंबर 2003 को एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था – मुझे पूरी उम्मीद है कि नरेंद्र बाई बहुत दिनों तक सिमटकर गुजरात में नहीं रहेंगे, देश को उनकी सेवा का मौका मिलेगा। तब वे केंद्र में रेल मंत्री थे और रेल प्रोजेक्ट का उद्घाटन कर रहे थे और आज का दिन है दोनों के सुर बदले-बदले से हैं। और पूछने पर पलटकर कहते हैं कि ये प्रोटोकॉल से बंधे थे। हद होती है राजनीतिक बेशर्मी की , वैसे बी अब सुचिता औऱ नैतिकता की बात राजनीति में रही नहीं।

वर्तमान समय में नीतीश कुमार दूसरों की बात सुनना छोड़कर अपनी बात को पार्टी और संगठन पर लादना शुरू कर दिया है। शरद यादव तो बस पार्टी का राष्ट्रीय मुखौटा भर है, शरद यादव सिर्फ वही बोलते हैं जो नीतीश कुमार कहते हैं। अपने राजनीतिक लाभ को देखते हुए नीतीश कुमार को एक बहाना चाहिए था और नरेंद्र मोदी के तौर पर उन्हें वो बहाना मिल गया है। नरेंद्र मोदी का नाम लेकर वो बिहार में मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी बनना चाहते हैं इससे उसकी राजनीति का परिचय तो मिलता ही है, नीतीश कुमार एंड कंपनी और अन्य दलों के चरित्र का भी पता चलता है। इस देश में पार्टियों और नेताओं का हित जब तक सधता रहा है तब तक वे एक-दूसरे के साथ होती हैं और जैसे ही उन्हें लगता है कि आगे वाला बंदा बाजी मार ले जायेगा तो फिर टंगड़ी मारते देरी नहीं लगती। ऐसा ही कुछ हो रहा है, इन दिनों? आम-आदमी की परवाह किसी को नहीं। अगर, अगले चुनाव में किसी को बहुमत मिल जाता है या बहुमत के करीब होता है तो फिर इनकी बोली कुछ और होगी।