Friday, May 31, 2013

क्या फैसले के अतरिक्त टिप्पणियां करना उचित है ?

इन दिनों एक जुमला बड़ा चर्चित है। वो है कि सीबीआई पिंजरे में कैद तोता है, जो केवल सरकार की भाषा बोलता है। असल में यह देश के सर्वोच्च न्यायालय की ओर से की गई टिप्पणी है, जिसका प्रतिपक्षी नेता जम कर इस्तेमाल कर रहे हैं। इस पर सैकड़ों कार्टून बन चुके हैं। हाल ही यूपीए टू सरकार के चार साल पूरे होने पर देश की राजधानी दिल्ली में भारतीय जनता युवा मोर्चा की ओर से जो रैली निकाली गई, उसमें तो बाकायदा तोते के एक पुतले को शामिल किया गया, जिस पर बड़े-बड़े अक्षरों में सीबीआई लिखा हुआ था। बेशक न्यायालय की टिप्पणी विपक्ष को अनुकूल तो सरकार को प्रतिकूल पड़ती है, मगर निष्पक्ष रूप से विचार किया जाए तो सवाल ये उठता है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के पास कानून के तहत फैसले सुनाने के अधिकार के साथ इस प्रकार की तीखी टिप्पणी करने का भी अधिकार है, जिसने एक संवैधानिक संस्था को इतना बदनाम कर दिया है, जिससे उसे कभी छुटकारा नहीं मिल पाएगा। यह एक नजीर जैसी हो गई है।

हालांकि यह सही है कि जिस मामले में यह टिप्पणी की गई है, उसमें सीबीआई ने सरकार के इशारे पर काम किया, इस कारण टिप्पणी ठीक ही प्रतीत होती है, मगर वह वाकई सरकार का गुलाम तोता ही होती तो सच-सच क्यों बोलती। उसने जो हल्फनामा पेश किया, उसमें भी सरकार की ओर से कही गई भाषा ही बोलती। इसमें कोई दो राय नहीं कि सीबीआई का कई बार दुरुपयोग होता है, या उसको पूरी तरह से स्वतंत्र होना ही चाहिए, उसके कामकाज में सरकारी दखल नहीं होना चाहिए, मगर टिप्पणी से निकल रहे अर्थ की तरह उसका दुरुपयोग ही होता है या दुरुपयोग के लिए ही उसका वजूद है अथवा वह पूरी तरह से सरकार के कहने पर ही चल रही है, यह कहना उचित नहीं होगा। अगर ऐसा ही होता तो वह केवल प्रतिपक्ष के नेताओं पर ही कार्यवाही करती, सरकारी मंत्रियों को शिकंजे में कैसे लेती? इसे यह तर्क दे कर काटा जा सकता है कि सरकार अपनी सुविधा के अनुसार उसका उपयोग करती है और बहुत राजनीतिक जरूरत होने पर अपने मंत्रियों को भी लपेट देती है, मगर यह बात आसानी से गले नहीं उतरती कि मात्र कोर्ट की टिप्पणी की वजह से ही सरकार ने अपने मंत्री शहीद कर दिए।

वस्तुत: न्यायालय ने यह टिप्पणी करके सीबीआई के अस्तित्व पर ही एक प्रश्रचिन्ह खड़ा कर दिया है। चूंकि सर्वोच्च न्यायालय सबसे बड़ी कानूनी संवैधानिक संस्था है, इस कारण वह किसी के भी बारे में कुछ भी टिप्पणी कर सकती है, इसको लेकर बहस छिड़ी हुई है। इसकी पहल की कांग्रेस के बड़बोले महासचिव दिग्विजय सिंह ने। हालांकि न्यायालय की अवमानना के डर से वे कुछ संभल कर बोले, मगर जन चर्चा में इस प्रकार की टिप्पणी को उचित नहीं माना जा रहा। वैसे यह पहला मौका नहीं है कि न्यायपालिका की ओर से इस प्रकार की टिप्पणी आई है। इससे पूर्व भी वह ऐसी व्याख्या कर देती है, जिसमें शब्दों को उचित चयन न होने का आभास होता रहा है। विशेष रूप से पुलिस तो सदैव नीचे से लेकर ऊपर तक जलील की जाती रही है। माना कि पुलिस अधिकारी विशेष अगर गलत करता है तो उस पर टिप्पणी की जा सकती है, मगर वही टिप्पणी अगर पूरे पुलिस तंत्र पर चस्पा हो जाती है तो कहीं न कहीं अन्याय होता प्रतीत होता है।

आम धारणा है कि लोकतंत्र में न्यायपालिका सर्वोच्च है, मगर सच ये है कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, तीनों एक दूसरे के पूरक तो होते ही हैं, नियंत्रक भी होते हैं। तीनों के पास अपने-अपने अधिकार हैं तो अपनी-अपनी सीमाएं भी। ऐसे ये कहना कि इन तीनों में न्यायपालिका सर्वोच्च है, गलत होगा। जहां विधायिका कानून बनाती है तो न्यायपालिका उसी कानून के तहत न्याय करती है। स्पष्ट सीमा रेखाओं के बाद भी दोनों के बीच कई बार टकराव होते देखा गया है। प्रधानमंत्रियों तक को न्यायपालिका को अपनी सीमा में रहने का आग्रह करना पड़ा है। इसकी वजह ये है कि न्यायपालिका की टिप्पणियों की वजह से कई बार विधायिका को बड़ी बदनामी झेलनी पड़ती है। कई बार तो ऐसा आभास होता है कि न्यायपालिका इस प्रकार की टिप्पणियां करके अपने आपको सर्वोच्च जताना चाहती है। वह यह भी प्रदर्शित करती प्रतीत होती है कि चूंकि विधायिका ठीक से काम नहीं कर रही इस कारण उसे कठोर होना पड़ रहा है। 

 मगर सवाल ये है कि अगर न्यायपालिका के उच्च पदों पर बैठे व्यक्ति विशेष अगर अतिक्रमण करें और एक आदत की तरह फैसले के अतिरिक्त टिप्पणियां भी करे तो उसकी देखरेख कौन करेगा? अर्थात अगर कोई न्यायाधीश अलिखित रूप से कोई अवांछित टिप्पणी कर दे तो प्रभावित किस के पास अपील करे? कदाचित पूर्व में न्यायाधीश इस प्रकार की टिप्पणियां करते रहे होंगे, मगर आज जब कि मीडिया अत्यधिक गतिमान हो गया है तो फैसले की बजाय इस प्रकार की टिप्पणयां प्रमुखता से उभर कर आती हैं। और नतीजा ये होता है कि जिन न्यायाधीशों का उल्लेख करते हुए सम्मानीय शब्द का संबोधन करना होता है, उनके बड़बोले होने का आभास होता है। आखिर में एक महत्वपूर्ण बात। अगर उच्चतम न्यायालय की ताजा टिप्पणी पर चर्चा करना अथवा उसके प्रतिकूल राय जाहिर करना उसकी अवमानना है तो उस टिप्पणी का विपक्षी दलों का अपने पक्ष में राजनीतिक इस्तेमाल या इंटरपिटेशन करना क्या है? क्या संदर्भ विशेष में न्यायालय की टिप्पणी करने के अधिकार की तरह अन्य किसी को भी उस टिप्पणी का हवाला देकर हमले करने का अधिकार है?

इस सिलसिले में हाल ही हुआ एक प्रकरण आपकी नजर है। बीते दिनों जब राजस्थान की राज्यपाल मारग्रेट अल्वा ने एक समारोह में कहा कि अधिकारी योजनाएं तो खूब बनाते हैं, मगर उनका क्रियान्वयन ठीक से नहीं होता, तो उनके बयान का प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे ने इस्तेमाल करते हुए सरकार पर हमला करना शुरू कर दिया। इस पर अल्वा को आखिर कहना पड़ा कि उनके बयान का राजनीतिक इस्तेमाल करना ठीक नहीं है और कम से कम राजनीतिक छींटाकशी में उन्हें तो मुक्त ही रखें।

नक्सली हमले- आखिर कब तक ?

आमतौर पर मीडिया की सुर्खियों से गायब रहने वाला छत्तीसगढ़ एक बार फिर से सुर्खियों में है। छत्तीसगढ़ के सुर्खियों में रहने की वजह एक बार फिर से नक्सली ही हैं जिन्होंने घात लगाकर किए हमले में छ्त्तीसगढ़ कांग्रेस के अधिकतर दिग्गज नेताओं की हत्या कर छत्तीसगढ़ पीसीसी को वीरान कर कर दिया है। किसी भी राजनीतिक दल के नेताओं पर शायद ये नक्सलियों का सबसे बड़ा हमला है लेकिन राजनीतिक दलों से इतर नक्सली इससे भी बड़े हमले कर सरकार का अपनी ताकत का एहसास पहले भी करा चुके हैं। तीन साल पहले अप्रेल 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या कर नक्सलियों ने राज्य व केन्द्र सरकार की नींद उड़ा दी थी। सवाल मुंह बाएं खड़ा था कि जब नक्सली 76 हथियारबंद जवानों को घेर कर मौत के घाट उतार सकते हैं तो नक्सली क्या नहीं कर सकते..? 

इसी तरह बीते साल अप्रेल 2012 में सुकमा कलेक्टर एलैक्स पॉल मेनन का अपहरण कर भी नक्सलियों ने सरकार को खुली चुनौती दी थी। कलेक्टर मेनन तो आखिर रिहा हो गए लेकिन एक कलेक्टर का अपहरण अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया। जब एक कलेक्टर ही सुरक्षित नहीं है तो आम आदमी की सुरक्षा की क्या गारंटी है..? छत्तीसगढ़ में अमूमन रोज नक्सली कभी गोलीबारी कर तो कभी बारुदी सुरंग से विस्फोट कर जवानों को निशाना बनाते रहे हैं। ये ख़बरें सिर्फ स्थानीय अख़बारों के पन्नों तक सिमट कर रह जाती हैं क्योंकि इन हमलों में एक या दो जवान ही शहीद होते हैं लेकिन जब तीन साल पहले दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद होते हैं या फिर कांग्रेस के काफिले पर हमला होता है जिसमें दिग्गज कांग्रेसी नेताओं समेत करीब दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है तो ये ख़बरें छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक भी पहुंचती हैं। 

नक्सलियों के बड़े हमलों के बाद छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक हंगामा मचता है। नकस्लियों के हमलों पर बहस का दौर शुरु हो जाता है लेकिन कुछ दिनों बाद शांति पसर जाती है और ऐसे ही एक बड़े हमले पर छत्तीसगढ़ से लेकर दिल्ली तक इसकी गूंज सुनाई देती है..! हालांकि ऐसा नहीं है कि कार्रवाई एक तरफ से ही होती है। सर्चिंग के दौरान या मुठभेड़ के दौरान आए दिए एक आद नक्सली के मारे जाने की खबर भी आती है और इस दौरान निर्दोष आदिवासियों की हत्या का आरोप भी जवानों पर लगता है जैसे हाल ही में बीजापुर के एड़समेटा गांव में तीन बच्चों समेत आठ लोगों की हत्या का आरोप जवानों पर लगा था लेकिन सवाल यहां भी खड़ा होता है कि आखिर क्यों नक्सल प्रभावित इलाकों में हमेशा अघोषित जंग के हालात बने रहते हैं..? 

जिस तरह से नक्सलियों ने जवानों और आदिवासियों के बाद अब नेताओं को अपने निशाने में लिया है उससे ये साफ जाहिर होता है कि नक्सली खुद को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं मानते और लोकतांत्रिक सरकार से इतर अपनी एक समानांतर सरकार चलाना चाहते हैं या कहें कि चला रहे हैं। अपने बाहुल्य वाले इलाकों में वे विकास कार्य नहीं चाहते क्योंकि उन्हें डर है कि अगर सड़क का निर्माण हो गया या उस इलाके में पक्के स्कूल या सरकारी इमारतें बन गयी तो सुरक्षाबल उसका इस्तेमाल उनके खिलाफ कर सकते हैं। सरकार नक्सलियों से हथियार डालकर बातचीत का रास्ता अपनाने की बात करती है लेकिन इसके बाद भी आए दिन छोटी मोटी नक्सली हमलों के बीच दंतेवाड़ा या सुकमा जैसे बड़े नक्सली हमले सामने आते रहते हैं ! 

जो साफ ईशारा करते हैं कि नक्सली कभी हथियार नहीं डालने वाले लेकिन इसके बाद भी स्वामी अग्निवेश टाइप लोग कहते हैं कि नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में 76 जवानों की हत्या की तो क्या हुआ…जवानों ने भी तो निर्दोष आदिवासियों को नक्सली बताकर उनकी हत्या की थी..! मतलब तो ये हुआ कि अग्निवेश नक्सलियों द्वारा जवानों की हत्या को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रहे हैं और अघोषित तौर पर नक्सलियों का समर्थन कर रहे हैं..! एक तरफ भारत पहले ही अपने पड़ोसी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और ड्रैगन के दोहरे खतरे से जूझ रहा है ऊपर से देश के अंदर विभिन्न राज्यों में नक्सली इससे भी बड़ा खतरा बनकर ऊभर रहे हैं लेकिन हमारी सरकार हर चीज का हल शांति प्रक्रिया से निकालना चाहती है। गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांतों पर चल रही हमारी सरकारों को कौन समझाए कि नक्सली शांति वार्ता से नहीं मानने वाले..!

नक्सली भी इस देश की ही नागरिक हैं लेकिन अगर वे हथियार की भाषा ही बोलना और समझना चाहते हैं तो क्यों न उनकी भाषा में उनसे बात की जाए..? क्या हमारी सरकार इतनी सक्षम नहीं है कि नक्सल बाहुल्य इलाकों में अभियान चलाकर नक्सलियों को हथियार डालने पर मजबूर कर दिया जाए। जाहिर है हमारी सरकार भी सक्षम है और सुरक्षाबल भी लेकिन फिर सवाल खड़ा हो जाता है कि ये फैसला ले कौन..? केन्द्र और राज्य सरकारों के साथ ही सभी राजनीतिक दलों को मिलकर ये फैसला लेना होगा कि वे अब और नक्सली हमले नहीं सहेंगे और समर्पण या बातचीत के रास्ते से न मानने पर नक्सलवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए एक दृढ़ निर्णय लेना ही होगा वर्ना एक अंतराल के बाद फिर से दंतेवाड़ा या फिर सुकमा जैसी घटनाएं हमारे सामने आती रहेंगी।

क्या पत्रकारिता में वाकई तरक्की आई है या फिर गिरावट ?

हिंन्दी पत्रकारिता के 187 वर्श पूरे हो चुके है, इन बिते वर्षो  में ये क्षेत्र अनेक गिरावट और तरक्की को देखा है। इन सब के अलावे अग्रेजी शासकों की प्रहार और अपातकाल की दंश को भी झेला है। मगर आज ये क्रांतिकारी हथियार कारपोरेट घरानों की जागिर बनते जा रहा है। क्योंकि आज संपादक मैनेजर की भूमिका अदा कर रहा है, तो मालिक दलाल के रूप में खबरों की आत्मा निकाल कर व्यापार कर रहा है। आज न्यूज चैनलों को लेकर यह सवाल बार बार उठता है कि जो कुछ खबरों के नाम पर परोसा जा रहा है, उससे इतर पत्रकारिता की कोई सोचता क्यों नहीं है। क्या ये सोच गिरावट की ओर इषारा नहीं करता है ? आज की पत्रकारिता कमरे में सिमटी कर रह गई है, जिसमें पत्रकारिता शब्द बेमानी हो चला है, और धंधा समूची पत्रकारिता के कंधे पर सवार होकर बाजार और मुनाफे के घालमेल में उलझ कर रह गया है। तो वही दुसरी ओर राजनीतिक दलों ने पत्रकारिता को अपने कोख में ही बड़ा करना शुरु कर दिया है। कोई संपादक कितनी क्रियेटिव है, आज ये मायने नहीं रखती है, उससे ज्यादा उस संपादक का महत्व बाजार से मुनाफा बटोरने का है। साथ ही इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि तकनीकी विस्तार ने मीडिया को जो विस्तार दिया है उतना विस्तार पत्रकारों का नहीं हुआ है। और मीडिया का यही तकनीकी विस्तार ने इस चकाचैध की रोशनी में युवाओं को अपने ओर खिंचने लगा है। और आज असल में इसी को पत्रकारिता मानने लगा है, और राजनीति को प्रभावित करने वाला चैथा खम्भा भी।

आज अखबार के एक ही पन्ने पर एक ही व्यक्ति से जुड़ी दो खबरें छपती हैं, जो एक दूसरे को काटती हैं। जो पीत पत्रकारिता के रूप में इस पेषे में जहर घोल रही है। जिस पत्रकारिता को लोकत्रंत्र के पहरुआ होना है, वह आज पहरुआ होने का कमीशन मांगने लगा है। साथ ही टीआरपी के नाम पर खबरों की जगह मनोरंजन और सनसनाहट पैदा करने वाले तंत्र-मंत्र को दिखा कर, आज के बाजारवादी चैनल और अखबार पत्रकारिता की परिभाशा को बदल दिया है। हाल के दौर में न्यूज चैनलों का लाइसेंस जिस तरह चिट-फंड करने वाली कंपनियो से लेकर रियल-इस्टेट के धुरंधरों को मिला है उसको भी लेकर सवाल उठ रहा है।

मिशन से शुरू हुई पत्रकारिता के कौशल में तब्दील होने का सच है। अब बेमानी लगने लगी है। यानी जिस जमाने में देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था और पत्रकारिता उसकी तलवार थी तब वह मिशन हो सकती थी। उसमें धन और रोजी नहीं थी। मगर बदलाव के इस दौर में ‘जाके पैर न फटे बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई’ का जुमला उछालकर पत्रकार और पत्रकारिता के स्वरूप और दायित्वों को समेटना अब बेमानी लगने लगी है। मगर इसी पत्रकारिता ने बोर्फोस से लेकर आदर्श सोसाइटी घोटाले को उजागर करके पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। तो वही दुसरी ओर अन्ना हजारे की आंदोनल का मीडिया कवरेज ने सरकार को जनसरोकार के आगे झुकने पर मजबुर किया। 
 
साथ ही आज के दौर में सोशल मीडिया ने मिस्र में सत्ता परिर्वतन में जो भूमिका अदा की उसको लेकर विष्व के कई सारे तानाषाहों की पैर तले जमीन खिसक गई। आज के बाजारीकरण के दौर में पत्रकारिता का काम भले ही बदला है। मगर फिर भी भारतीय पत्रकारिता की मूलधारा इस बाजारीकरण की आंच से नहीं पिघली हैं। उसमें जोखिम झेलने का जज्बा आज भी बरकरार है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या पत्रकारिता में वाकई तरक्की आई है या फिर गिरावट ?

Thursday, May 30, 2013

बदलते समय में पत्रकारिता- हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष रिपोर्ट !

अनेक दिवस-दिवसों की तरह 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस सिर्फ एक कर्मकांड नहीं है। साल-दर-साल अपने पेशे यानी पत्रकारिता को कसौटी पर कसने, मूल्यांकन करने और आत्म-निरीक्षण का यह दिन हमें अपनी परंपरा के प्रति जागृत करता है और आगे का रास्ता भी तय करने का अवसर देता है। साल 1826 की 30 मई को कलकत्ते (अब कोलकाता) की आमड़ातल्ला गली के एक कोने से प्रकाशित अल्पजीवी पत्र उदन्त मार्तण्ड ने इतिहास रचा था। मुफलिसी में भी अपने पत्रकारीय जज्बे को जिंदा रखने वाले इसके संपादक युगल किशोर सुकुल को 187 साल बाद याद करके भारतीय पत्रकारिता की संघर्षशीलता का रोमांच कौंध उठता है। थोड़ा पीछे देखें, तो ‘संघर्ष’ भारतीय पत्रकारिता की नियति प्रतीत होता है और आज भी वह इस पेशे का प्रेरणा-बिंदु या थाती है। पत्रकारिता के पौधे को सींचने वाली ‘कंपनी’ के मुलाजिम जेम्स आगस्टस हिक्की (भारत के पहले समाचार पत्र के संपादक) को ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश से निकाला दिया। कोलकाता के ही राजा राममोहन राय को अपने समाचार-पत्रों को सुधारवादी आंदोलनों का हथियार बनाने के लिए कट्टरपंथियों की तीखी आलोचनाएं व प्रहार झेलने पड़े। 

कोलकाता में ही बड़ा बाजार और दूसरे बाजारों में दुकान-दुकान, घर-घर जाकर सेठों को अपना अखबार ‘बांच’ (पढ़) कर सुनाने और बदले में चार-छह पैसा पाकर अखबार चलाने वाले उचित वक्ता के संपादक दुर्गाप्रसाद मिश्र का संघर्ष कम ही लोगों को ज्ञात होगा। घोर मुफलिसी में काशी की गंदी अंधेरी कोठरी में ‘स्वनामधन्य- संपादकाचार्य’ पराड़करजी के आखिरी दिनों की कहानी और भी सिहरन भरी है। वर्तमान दौर भी कम उद्वेलित नहीं करता। समूचे विश्व में पत्रकारिता आज भी संघर्ष और जज्बे का पेशा है। मिशन से प्रोफेशन और फिर ‘बिजनेस’ की बातें बहुत होती रही हैं, पर वास्तविकता से परे पत्रकारिता का कोई भी विमर्श कुछ भी अर्थ नहीं रखता। पहले मानते थे कि ललाट (मस्तक) पर टीका, धोती-कुरता, अंग-वस्त्रम् के बिना संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने का काम नहीं हो सकता। वक्त बदल चुका है। कुछ वैसी ही धारणा पत्रकारिता की ‘संघर्षशीलता’ को लेकर भी रही। बढ़ी हुई दाढ़ी, कुरता, कंधे पर बगल में टंगा थैला, फटी-पुरानी चप्पलें, बिवाई वाले पांव व वाचलता यानी किसी भी विषय पर कुछ भी उल्टी-सीधी क्रांतिकारी बयानबाजी- ये सभी एक पत्रकार को रूपायित करते थे। 

लेकिन आज के व्यावसायिक दौर में पत्रकारिता की कार्यशैली काफी कुछ बदल चुकी है। उसका स्वरूप निरंतर बदल रहा है। बदलाव के इस दौर में ‘जाके पैर न फटे बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई’ का जुमला उछालकर पत्रकार और पत्रकारिता के स्वरूप और दायित्वों को समेटना बेमानी है। मेरी दृष्टि में ‘मिशन’ से ‘प्रोफेशन’ के दौर में पहुंची पत्रकारिता के लिए व्यावसायिक नैतिकता (प्रोफेशनल एथिक्स) का महत्व सबसे ऊपर है। इसके बावजूद समूचा परिदृश्य निराशापूर्ण है। कितना भी प्रोफेशनलिज्म हो, पत्रकारिता का मूलमंत्र या पत्रकारिता की आत्मा ‘मिशन’ ही है और  वही रहेगी। तभी तो देश के लगभग 37,000 से ज्यादा स्ट्रिंगर और अल्पकालिक संवाददाता-पत्रकार पत्रकारिता की सेवा में जुटे हुए हैं। मोटी तनख्वाह या तनख्वाह न पाने वालों का असली मानदेय ‘मिशन’ की पूर्ति से मिलने वाला संतोष ही है। आखिर अपना कैमरा संभाले कमर तक पानी में घुसकर या नक्सलियों के ‘डेन’ (अड्डों) में जाकर कवरेज करने वाले किस पत्रकार की भरपायी की जाती है?

 या फिर आतंक के महासागर पाकिस्तान में मीडिया के लिए समाचार या कंटेंट जुटाने-लाने के लिए अपनी जान गंवा देने वाले, सिर कटा लेने वाले डैनियल पर्लो को भला कितना वेतन मिलता है? यह सच है कि आज के बाजारीकरण के दौर में पत्रकारिता का काम बदला है। ‘मीडिया कर्म’ को या पत्रकार को जर्नलिस्ट नहीं, ‘कंटेंट प्रोवाइडर’ माना जाने लगा है। फिर भी भारतीय पत्रकारिता की मूलधारा इस बाजारीकरण की आंच से नहीं पिघली। उसमें जोखिम झेलने का जज्बा बरकरार है। आज पत्रकारिता के कामकाज की दशाएं बदली हैं। एक पत्रकार को जीविका के लिए पूरा साधन न मिले, तो वह देश-दुनिया की चिंता क्या करेगा? फिर भी दूसरे पेशों में यह स्थिति पत्रकारिता क्षेत्र में काम करने वालों से काफी अच्छी है। चीन के ‘नंगे पैर डॉक्टर’ वाले प्रयोग का हमारी पत्रकारिता में एक अलग समर्पित रूप मिलता है। नंगे पैर गांव-गिरांव की सेवा करने वाले पत्रकारों की यहां कमी नहीं, पर इन्हें पूछता कौन है? वह दौर-ए-गुलामी था, यह दौर-ए-गुलामां है- पत्रकारिता के संघर्ष की इससे दो दिशाएं साफ होती हैं।

 तब ‘मिशन’ था अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति का और अब दौर है आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक दासता से मुक्ति का। इसी ‘मुक्ति’ की चाहत के साथ समर्पित भाव से काम करने वाले दुनिया के 29 देशों में 141 पत्रकारों ने अपनी जानें गंवा दीं। आंकड़े देखें, तो सीरिया पत्रकारों व पत्रकारिता के लिए सबसे खतरनाक देश है। भारतीय पत्रकारिता के बारे में भी कहा गया- ‘तलवार की धार पे धावनो है’- पत्रकारिता तलवार की धार पर दौड़ने के समान है। सचमुच इन 141 पत्रकारों ने सिर्फ एक वर्ष 2012 में ऐसा कर दिखाया। इनके जज्बे को भी सलाम करने का मौका है, अंडमान निकोबार की सेलुलर जेल में ही हजारों भारतीयों ने कालापानी की सजा काटी थी।  उस जेल की काल कोठरियों से अंग्रेज हुक्मरानों को दहला देने वाली ‘वंदे मातरम’ की जो आवाजें गूंजती थीं, उनमें बहुत से स्वर पत्रकारों-संपादकों के भी थे। जेल के फांसी घर में लटकते तीन फंदों पर कितने पत्रकार-संपादक झूल गए थे, लोगों को यह पता भी नहीं। इस विषय पर पत्रकारिता विश्वविद्यालयों और विभागों में शोधकार्य की आवश्यकता पर केंद्र सरकार-राज्य सरकारों को ध्यान देना चाहिए। 

उन पत्रकारों के संघर्ष और बलिदान को यह नमन-श्रद्धांजलि होगी। आज इसी के साथ स्वंतत्र पत्रकारिता के नाम पर मीडिया में, ब्लैकमेलरों के विरुद्ध समाज और खुद मीडिया की मुहिम जरूरी है। तभी तो भाषा, संदर्भ और विषय की जानकारी न रखने वाले, कहीं काम न पा सके लोगों के पत्रकारिता में घुस आने पर देश के जिम्मेदार लोगों की चिंता का हल ढूंढ़ा जा सकेगा।  तिलक, गांधी और भगत सिंह सहित आजादी के दौर के प्राय: सभी क्रांतिकारियों-राजनेताओं ने मिशन के लिए पत्रकारिता का सहारा लिया। वह भी भाषायी पत्रकारिता, खासकर हिंदी पत्रकारिता का, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सके। आज पत्रकारिता में इस मिशन या समर्पण को बनाए रखने के लिए समाज के सहारे और व्यापक समर्थन की जरूरत है।

लिव इन रिलेशनशिप- रखैल व्यवस्था का बढ़ता प्रचलन !

वर्तमान युवा पीढ़ी लिव इन रिलेशनशिप जैसे गैर सामाजिक संबंधों के प्रति अत्याधिक आकर्षित दिखाई दे रही है. इसके पीछे उनका तर्क यह है कि विवाह के बंधन में बंधने से पहले एक दूसरे को अच्छी तरह से समझ लिया जाए तो वैवाहिक जीवन में ताल.मेल बैठा पाना और आसान हो जाता है हालांकि हमारा परंपरावादी समाज महिला और पुरुष को विवाह से पहले साथ रहने की इजाजत नहीं देता किंतु अब हमारे युवाओं की मानसिकता ऐसी सोच को नकारने लगी है जो उन्हें किसी भी प्रकार के बंधन में बांध कर रख पाए इसीलिए युवा लिव इन में जाने से बिलकुल नहीं हिचकिचाते महिलाएं और पुरुष जब प्रेम संबंध में पड़ते हैं तो उन्हें लगता है कि विवाह से पहले एक साथ रहना बहुत जरूरी है, क्योंकि एक.दूसरे के साथ को लेकर सहज हो जाने से आगामी जीवन बिना किसी परेशानी के काटा जा सकता है शायद नहीं अनेक ऐसे उदाहरण हैं हमारे सामने जो लिव इन रिलेशनशिप की हकीकत बयां करते हैं ऐसे संबंध प्रेम पर नहीं शारीरिक आकर्षण पर निर्भर होते हैं और जब यह आकर्षण समाप्त होने लगता है तो तथाकथित प्रेम बोझ लगने लगता है झगड़े शुरू हो जाते हैं एक.दूसरे की उपस्थिति तक सहन नहीं की जातीण् अंतत: लिव इन रिलेशनशिप के साथ प्रेम भी समाप्त हो जाता है

हम इस बात को कतई नकार नहीं सकते कि लिव इन जैसे संबंधों के टूटने का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव महिलाओं पर पड़ता है हमारा समाज एक ऐसी महिला को कभी सम्मान नहीं दे सकता जो विवाह पूर्व किसी पुरुष के साथ एक ही घर में रह चुकी हो ऐसे हालातों में संबंध जब टूटता है तो उसका भविष्य अंधकारमय हो जाता है वहीं लिव इन में संलिप्त रह चुका पुरुष जो हमेशा से ही महिलाओं की अस्मत से खेलना अपना अधिकार समझता आया है की गलती को कोई महत्व ना देकर नजरअंदाज कर दिया जाता है महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा अपने संबंधों के प्रति अधिक संजीदा और भावनात्मक लगाव रखती हैं इसीलिए लिव इन संबंध के टूटने का प्रभाव केवल उन महिलाओं पर ही पड़ता है जो परंपरावादी सोच वाली आर्थिक तौर पर सेटल या अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त नहीं हैं बल्कि यह उन महिलाओं को भी अपनी चपेट में ले मानसिक रूप से आहत करता है जो मॉडर्न और आत्म .निर्भर होती हैं हालंकि कई ऐसी महिलाएं भी हैं जो अपने कॅरियर को प्राथमिकता देते हुए शादी जैसी बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से बचना चाहती हैं, लेकिन ऐसे में उन महिलाओं की मनोदशा को नहीं नकारा जा सकता जो किसी बहकावे में आकर ऐसे झूठे रिश्तों की भेंट चढ़ जाती हैं

हाल ही में पूर्व फ्लाइंग ऑफिसर अंजली गुप्ता और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की प्रथम वर्ष की छात्रा मालिनी मुर्मू द्वारा लिव इन के टूटने और प्रेमी के धोखा देने के बाद सुसाइड करना इसी तथ्य का एक ज्वलंत उदाहरण है आईआईएम जैसे संस्थान में दाखिला लेते ही मालिनी अपने उज्जवल भविष्य के विषय में आश्ववस्त हो गई थी, लेकिन उसकी किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था. फेसबुक पर सार्वजनिक स्टेटस के रूप में मालिनी के प्रेमी ने उसे ब्रेक.अप की जानकारी दी वहीं एक शादीशुदा व्यक्ति के प्रेम में धोखा खाने के बाद अंजली ने भी दुनियां के तानों से बचने के लिए आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठा लिया. लेकिन प्रेम के नाम पर उनका शारीरिक और मानसिक शोषण करने वाले उनके प्रेमियों पर किसी ने अंगुली नहीं उठाई.

यही हमारे समाज की कड़वी सच्चाई है यहां महिलाओं के अस्तित्व और उनके सम्मान को स्वीकार करना अभी तक एक चुनौती ही बना हुआ है पुरुष जैसे चाहेए जब चाहे महिलाओं को नीचा दिखा सकते हैं लेकिन हम नारी. सशक्तिकरण के विषय में सुनकर ही संतुष्ट हो जाते हैं जबकि जमीनी सच्चाई आज भी पहले जैसी ही है जिसके स्वरूप में भले ही थोड़ा.बहुत बदलाव आया है लेकिन महिलाओं की शोचनीय दशा जस की तस बनी हुई है ऐसी व्यवस्था में पुरुष द्वारा महिलाओं का भरपूर शारीरिक शोषण किया जाता है लेकिन उन्हें किसी भी प्रकार का पारिवारिक दर्जा या सामाजिक दर्जा देने का कोई रिवाज नहीं है

हम हमेशा भारतीय संस्कृति और परंपराओं की दुहाई देकर लिव इन रिलेशनशिप को गैर परंपरावादी मानकर गलत कहते हैं जबकि हमारा इतिहास इस बात का गवाह है कि महिलाओं को अपने अधीन रखनाए उनका शोषण करना भारतीय पुरुषों का बहुत पुराना शौक है जिसे परंपरा स्वरूप बेरोकटोक आज भी अपनाया जा रहा है जबकि यह सीधे.सीधे पुरुषों को उनका दमन करने का एक अन्य मौका दे देता है यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि महिलाओं का शोषण करने का ट्रेंड नए स्वरूप में एक बार फिर अपनी जड़ें जमा चुका है और अपनी आंखों पर आधुनिकता की पट्टी  बांधे हमारे मॉडर्न युवा इस बात को सोचना तो दूर सुनना भी पसंद नहीं करते

Tuesday, May 28, 2013

सत्यमेव जयते वास्तविकता या बाजारवाद ?

कन्या भ्रूण हत्या मानव जाति को कलंकित करता यह मसला आज भारतीय समाज की एक घृणित पहचान बन चुका है। गर्भ में पल रही कन्या भ्रूणों को कितनी बेदर्दी के साथ उसकी मां से अलग कर दिया जाता हैए उससे जीने का अधिकार छीन लिया जाता है। भारतीय समाज की जड़ों तक जा पहुंचे कन्या भ्रूण हत्या जैसे अमानवीय अपराधों पर भी अब बाजार की नजर पड़ गई है। आमिर खान जैसे स्टार ने अपने पहले टेलीविजन शो सत्यमेव जयते का इतना प्रचार किया कि सभी इस शो को देखने के लिए उत्सुक हो गए और कार्यक्रम को देखने के बाद दर्शक क्या मीडिया भी अब आमिर खान का गुणगान करने लगा और यह दिखाने की कोशिश करने लगा कि आमिर से पहले इस मुद्दे पर किसी ने आवाज उठाने की कोशिश नहीं की।


उपरोक्त मुद्दे पर कई लोगों का मानना है कि मीडिया के मिस्टर पर्फेक्शनिस्ट ने टेलीविजन पर डेब्यू करने के लिए सत्यमेव जयते नामक एक ऐसे शो को चुना जो दर्शकों का ना सिर्फ मनोरंजन करे बल्कि उन्हें समाज की कड़वी सच्चाइयों से भी अवगत करवाए। उनका पहला एपिसोड कन्या भ्रूण हत्या पर केंद्रित था। वर्षों से चली आ रही इस प्रथा के विरोध में ना जाने कितनी ही बार आवाज बुलंद की गई लेकिन जब इस आवाज पर मीडिया और ग्लैमर का तड़का लगा तब जाकर यह हमारे कानों तक पहुंची। बहुत लंबे समय से एक न्यूज चैनल पर जिंदगी लाइव नामक कार्यक्रम दिखाया जाता है जिसमें समाज के ऐसे ही चेहरों को उजागर किया जाता हैए जिन्हें देखकर आंखों में आंसू तक आ जाते हैं। लेकिन ना तो इस प्रोग्राम में कोई ग्लैमर है और ना ही इसे बहुत ज्यादा प्रचारित किया गया है। इसीलिए किसी ने भी इस कार्यक्रम के भावनात्मक पक्ष को तवज्जो नहीं दी। अगर इस कार्यक्रम को भी आमिर खान के बहुचर्चित शो सत्यमेव जयते की तरह प्रचारित किया जाता तो शायद बहुत पहले कन्या भ्रूण हत्या जैसी अनेक समस्याओं का हल खोज लिया जाता। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि जिन राज्यों में यह घटनाएं घट रही हैं वहां की सरकारें भी अपनी दुर्गति से परिचित नहीं थीं उन्हें तो आमिर ने बताया।


जैसा कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं वैसे ही इस मुद्दे पर विपरीत विचारधारा रखने वाले लोगों का साफ कहना है कि बेशक यह समस्याएं पहले भी कई बार उजागर की जाती रही हैंए इन पर कई बार आवाज उठाने की भी कोशिश की गई लेकिन अगर बॉलिवुड और बाजारवाद की सहायता लेकर कन्या भ्रूण हत्या जैसे अमानवीय कृत्यों पर रोक लगाई जा सकती है तो इसमें बुराई क्या है अगर आमिर खान अपने एक टेलीविजन शो के जरिए एक बड़े बदलाव का आश्वासन जनता को दे रहे हैं तो हमें उन्हें समर्थन देना चाहिए। ना कि पुरानी बातों और सरकार की नाकामियों को इस मार्ग में अवरोध बनने देना चाहिए।

क्या सामाजिक जरुरत है यौन संबंधों में उम्र वृद्धि ?

दिल्ली की एक अदालत के न्यायाधीश का मानना है कि सहमति से शारीरिक संबंध स्थापित करने की उम्र को बढ़ा कर अठ्ठारह वर्ष करने जैसा प्रस्ताव अलोकतांत्रिक है। इतना ही नहीं संबंधित जज का यह भी कहना है कि केंद्र सरकार का यह प्रस्ताव भारतीय समाज में व्याप्त पिछड़ेपन को साफ दर्शाता है। इससे पहले भी दिल्ली की एक अदालत ने सेक्स करने की उम्र अठ्ठारह वर्ष बढ़ाए जाने पर चिंता व्यक्त की थी। हालांकि यह न्यायाधीश महोदय का अपना निजी मत है लेकिन हमारे समाज में ऐसे बहुत से लोग हैं जो सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों की उम्र को बढ़ाए जाने के सख्त खिलाफ हैं। उनका मानना है कि पहले की अपेक्षा युवाओं का मानसिक और शारीरिक विकास कम उम्र में हो जाता है। ऐसे में यह कतई जरूरी नहीं है कि 18 वर्ष से कम उम्र की युवती के साथ जबरन संबंध स्थापित किया गया हो। सेक्स के प्रति रुझान और सहमति के कारण अगर युवती किसी प्रकार की पहल करती है तो इसे बलात्कार की श्रेणी में रखना पूर्णतरू गलत है। इस प्रस्ताव का सीधा और एकमात्र नुकसान केवल युवकों को ही होगा। 

भले ही वह इसमें पूरी तरह दोषी हों या ना हों उन्हें बलात्कार का दोषी ठहराकर प्रताड़ित किया जाएगा। यह दौर समानता का है इसीलिए एक ऐसे प्रस्ताव को पारित करनाए जो पूरी तरह एक पक्ष पर ही केंद्रित हैए नासमझी होगी। वहीं दूसरी ओर वे लोग हैं जो महिलाओं के हितों की रक्षा और उनके सम्मान को बरकरार रखने के लिए इस प्रस्ताव को बहुत जरूरी मानते हैं। सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों की उम्र अट्ठारह वर्ष करने जैसे प्रस्ताव का पक्ष लेते हुए इनका कहना है कि भारतीय समाज में हमेशा से पुरुषों द्वारा महिलाओं का शोषण किया जाता रहा है। भारतीय पुरुषों ने महिलाओं को हमेशा से ही उपभोग की वस्तु से अधिक और कुछ नहीं समझा है। कभी जबरन तो कभी उसे बहला.फुसलाकर उन्होंने अपने हितों को साधने का प्रयत्न किया है। किसी कठोर कानून की अनुपस्थिति के कारण महिलाओं के सम्मान के साथ खिलवाड़ करने वाला कोई बच ना सके इसीलिए इस प्रस्ताव का कानूनी रूप लेना बहुत जरूरी है।

जिस्मानी रिश्तों के लिए जरुरी क्या है, समाज या रजामंदी ?

पाश्चात्य देशों की तरह भारत में भी गर्भनिरोधक और कॉंट्रासेप्टिव पिल्स का बाजार दिनोंदिन गर्माता जा रहा है। युवाओं के बीच ऐसी दवाओं की बढ़ती लोकप्रियता उनके जीवन में आते खुलेपन की ओर इशारा करती है। विवाह पूर्व शारीरिक संबंध बनाना आज के युवाओं के दृष्टिकोण में कोई सामाजिक निषेध नहीं बल्कि व्यक्तिगत रजामंदी बन गया है। सेक्स जिसे कुछ समय पहले तक सामूहिक वार्तालाप में भी शामिल नहीं किया जाता था आज उसे धड़ल्ले के साथ प्रचारित किया जा रहा है। हाल ही में मुंबई की एक फार्मा कंपनी ने 18 अगेन नामक एक ऐसी क्रीम को बाजार में उतारा है जिसकी सहायता से महिलाएं अपना खोया कौमार्य वापिस पा सकती हैं। हालांकि इससे पहले भी सर्जरी की मदद से महिलाएं एक बार फिर से खुद को वर्जिन महसूस कर पाती थीं लेकिन यह सर्जरी भारत समेत अन्य एशियाई देशों के लोगों के लिए महंगी साबित होती थी। ऐसे में 18 अगेन क्रीमए जिसका उपयोग बड़ी सहजता और सुलभता के साथ किया जा सकता है का भारतीय समाज में प्रवेश करना अपने आप में बहस का मुद्दा बन गया है कि क्या भारतीय समाज में संबंधों की गरिमा और उनका महत्व घटता जा रहा है

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनके अधिकारों की पैरवी करने वाले लोगों का कहना है कि एक वयस्क व्यक्ति किससे और कब शारीरिक संबंध बनाता है यह उसकी अपनी मर्जी और सोच होनी चाहिए। यह पूरी तरह व्यक्तिगत मसला है जिसमें समाज या फिर किसी भी अन्य व्यक्ति को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होना चाहिए। व्यक्तिवाद का पक्ष लेने वाले लोगों का यह साफ कहना है कि आधुनिकता के निरंतर बढ़ते प्रचार.प्रसार के बाद भी अगर हम व्यक्ति के जीवन पर इस प्रकार पहरे लगाते रहेंगे तो यह वैयक्तिक रूप से बेहद निराशाजनक साबित होगा। आज की पीढ़ी की जीवनशैली काफी खुलापन लिए हुए हैं ऐसे में सेक्स को परंपरा से जोड़कर देखना हैरानी भरा कदम ही कहा जाएगा क्योंकि इसका संबंध संस्कृति से नहीं बल्कि व्यक्ति की अपनी मर्जी और उसके अपने निजी विचारों से है। उनके साथ किसी प्रकार की जबरदस्ती करना या संस्कृति के नाम पर उनके आपसी संबंधों को बाधित करना किसी भी रूप में न्यायसंगत नहीं है। कोई दो व्यक्ति अपने संबंध को आगे बढ़ाने के लिए शारीरिक रूप से नजदीक आते हैं तो यह उनकी अपनी सोच है इसमें समाज की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए। कई बार प्रेम संबंध सभी सीमाएं पार करने के बाद भी सफल नहीं हो पाता तो आगे का जीवन बिना किसी परेशानी के बिताने के लिए अगर महिलाएं 18 अगेन या ऐसी कोई अन्य क्रीमों का उपयोग करती हैं तो इसके बुराई भी क्या है।


वहीं दूसरी ओर गर्भनिरोधक गोलियों और 18 अगेन जैसी क्रीमों की भारत में बढ़ती लोकप्रियता को सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से बेहद घातक समझने वाले लोगों का मत है कि अगर हर कोई व्यक्तिगत विचारों और मर्जी को ही प्राथमिकता देगा तो इससे सामुदायिक एकता और सामाजिक गरिमा को नुकसान पहुंचेगा। भारत में विवाह पूर्व शारीरिक संबंध हमेशा से ही निषेध हैं और रहेंगे। अगर किसी व्यक्ति की गतिविधियां सामाजिक गरिमा पर पर प्रहार करती हैं तो इसे किसी भी रूप में सहन नहीं किया जा सकता। गर्भनिरोधक गोलियों और कौमार्य वापिस दिलवाने वाली क्रीमों की बढ़ती मांग भारतीयों के गिरते नैतिक स्तर को दर्शाती है जो हमारी संस्कृति को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है। टीण्वीण् पर आने वाले इनसे संबंधित विज्ञापन को देखकर युवा पीढ़ी भटक रही है और अगर इस बढ़ते प्रचलन को रोका नहीं गया तो वो दिन दूर नहीं जब पाश्चात्य देशों की भांति भारत में भी लोग बिना किसी शर्म और लिहाज के सार्वजनिक तौर पर एक.दूसरे के साथ शारीरिक निकटता बनाते नजर आएंगे।

आखिर क्या है नक्सलवाद का हल ?

हाल ही में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के काफीले पर हुए घातक नक्सली हमलेए जिसमें प्रदेश के शीर्ष कांग्रेसी नेताओं समेत लगभग 30 लोगों की जानें गईं और कई लोग गंभीर रूप से घायल हुएए को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘रेड कॉरिडोर’ अब और अधिक विस्तृत और खतरनाक होता जा रहा है। मध्य.प्रदेश के घने और आदिवासी इलाकों में फैला नक्सलवाद अब और अधिक खतरनाक होता जा रहा है और जो हिमाकत इस बार उन्होंने दिखाई उसे देखते हुए इस नक्सली हमले को अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमला करार दिया जा रहा है। आतंकवाद से भी कहीं ज्यादा विनाशक नक्सलवाद देश की अंदरूनी सुरक्षा को एक ऐसा खतरा है जिस पर आज तक नियंत्रण नहीं पाया जा सका है इसके विपरीत यह अपने पांव अब और ज्यादा पसारने लगा है। भारत की सीमाओं के भीतर पनप रही इस विरोधी लहर को जड़ से समाप्त करने के लिए बुद्धिजीवियों के दो वर्ग अलग.अलग कार्यवाहियों की मांग कर रहे हैं जिसमें से कुछ नक्सलवाद को समाप्त करने के लिए केवल सैनिक कार्यवाही को ही एकमात्र विकल्प बता रहे हैं तो कुछ सामाजिक.आर्थिक व्यवस्था में सुधार लाकर इस खतरे को टालने की पैरवी कर रहे हैं। हालांकि दोनों ही वर्ग देश के अंदरूनी हालातों को सुरक्षित करने के पक्ष में हैं लेकिन नक्सलवाद को खत्म करने के मामले पर एक.दूसरे से पूरी तरह असहमत प्रतीत होते हैं जिसकी वजह से इस बार यह मुद्दा एक गंभीर बहस में परिवर्तित हो गया है।


सैनिक कार्यवाहियों के पक्षधर बुद्धिजीवियों का कहना है कि भले ही इस बार के नक्सली हमले में ज्यादा संख्या में जानें गई हों लेकिन नक्सली शुरुआत से ही इतना ही ज्यादा निर्मम और हत्यारे प्रवृत्ति के रहे हैं। हर बार उन्होंने निर्दोष लोगों की जान ली है और उन पर कभी भी बातचीत का कोई असर नहीं हुआ है। इसके विपरीत हर बार वह और वहशीपन के साथ अवतरित होते आए हैं। देश के लिए खतरा बन चुके नक्सलवाद को समाप्त करने का एकमात्र उपाय सिर्फ और सिर्फ सैनिक कार्यवाही ही है। उनका कहना है कि हमारे पास इतने सक्षम सैनिक हैं कि वह मात्र कुछ दिनों में नक्सलियों की कौम को समाप्त कर देंगे और अगर व्यवहारिक रूप में देखा जाए तो आज हमारे पास यही एक उपाय भी है। सरकार के आगे हर समय नई मुश्किलें पैदा करने वाले नक्सलियों के सिर पर हर समय खून सवार रहता है और वह नहीं देखते कि जो उनका शिकार बन रहा है वो कौन हैए ऐसे में उनके प्रति किसी भी तरह की सांत्वना रखना अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है इसीलिए सख्त कदम तो उठाने ही पड़ेंगे।

वहीं दूसरी ओर इस विचारधारा के विपरीत पक्ष रखने वाले लोगोंए जिनका मानना है कि भारत के राजनैतिकए सामाजिक और आर्थिक हालातों में सुधार कर नक्सलवाद की समस्या पर काबू पाया जा सकता है का कहना है कि नक्सली हत्यारे नहीं बल्कि हमारी नीतियों से प्रभावित आदिवासी और गरीब तबके के लोग हैं। उनकी जमीनों पर अतिक्रमण करए उनसे उनके रहने और फलने.फूलने के सभी साधनों को छीनकरए हमने उन्हें अपने खिलाफ कर लिया है। अगर हम वाकई नक्सलवाद को समाप्त करने और देश की सुरक्षा के लिए गंभीर हैं तो हमें उन आदिवासियों से वार्तालाप कर इस समस्या का हल खोजना पड़ेगाए उन्हें हर वो हक देने होंगे जिनके ऊपर उनका अधिकार है। 

भारतीय सरकारों की नीतियों से आक्रोशित भारत के ही कुछ लोग भारत के खिलाफ हो गए हैंए उनकी समस्याओं को सुलझाए बिना किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि उन पर हुए अत्याचारों और अन्यायों की ही वजह से आज वह यह खूनी खेल खेलने के लिए मजबूर हुए हैं। उनकी दुर्दशा को समझते हुए सैनिक कार्यवाही जैसा विकल्प ना सिर्फ मानवाधिकारों के विरुद्ध है बल्कि घोर अमानवीय भी है क्योंकि इसमें ना सिर्फ नक्सली अपनी जान गवाएंगे बल्कि कई अन्य निर्दोष लोगों की भी जाने जाएंगी। इसीलिए बेहतर विकल्प सामाजिक और आर्थिक नीतियों में सुधार कर प्रत्येक भारतीयए भले ही वह नक्सली ही क्यों ना होए को अपने साथ लेकर चलना ही है।

Sunday, May 26, 2013

क्या नक्सलियों के खिलाफ सेना को उतारा जाए ?

छत्तीसगढ़ में हुए अब तक का सबसे बड़ा नक्सली हमले के बाद नक्सलियों के प्रति सरकार की नमरम रूख को लेकर कई अहम सवाल खड़े होने लगे है। 1200 से अधिक नक्सलियों ने सुकमा बस्तर हाईवे पर दरभा घाटी में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर जो बर्बर हमला किया है, उससे नक्सलियों की कायरता एक बार फिर सत्ता में बैठे केन्द्रीय नेतृत्व को, नक्सलियों के खिलाफ सेना को उतारने के लिए सोचने पर मजबुर कर दिया है। मगर यहा एक सवाल सरकार की उस नीति को लेकर उठ रहा है की कुछ दिन पहले सरकार ने नक्सलियों के लिए पैसा और सैन्य प्रषिक्षण देने की बात कर रही थी। जिसको लेकर सवाल खड़े भी खड़े हुए की आखिर सरकार नक्सलियों को बढ़ाना चाहती है या फिर उन्हें जड़ से मिटाना चाहती है।


आखिर सरकार अब तक नक्सली ऑपरेशन में सेना ओर वायुसेना का उपयोग क्यों नहीं करना चाहती हैं? आखिर कब तक निर्दोश लोगों की जान जाती रहेगी? कब तक हमारे जवाना और राजनेता तो कभी सरकारी अधिकारी उनके कायता की षिकार होते रहेंगे? इस हमले के बाद एक बार फिर से नक्सलियों के लिए वायुसेना का उपयोग करने की मांग उठने लगी है। श्रीलंका ने जिस तरह सेना का इस्तेमाल नक्सलियों की सफाया के लिए किया वैसी जरुरत आज देश में पनम रहे नक्सलियों की आंतरीक आतंकवाद को लेकर उठने लगी है। इतना कुछ होने बाद भी आज सरकार सेना का इस्तेमाल करें या न करें जैसे स्थिती में उलझी हुई है। केंद्र सरकार नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में इस कदर भ्रम में है कि 5 महीने में ही सैकड़ों लोगों की जान जाने के बाद भी वो फैसला नहीं ले पा रही है। 

आखिर सरकार ये फैसला लेने में इतना संकोच क्यों कर रही है। सेना का इस्तेमाल वहीं किया जाता है जहां देश की सुरक्षा और संप्रभुता को खतरा पैदा होता दिखे। फिर वो चाहे पड़ोसी मुल्क से हमला हो या फिर बाहर-भीतर से देश में दहशत फैलाने वाले आतंकवादियों का हमला हो। आज ये नक्सली अपने खिलाफ खड़े हर हिंदुस्तानी की जान आसानी से ले रहे हैं जैसे आतंकवादी- फिर सेना के इस्तेमाल में इतना संकोच आखिर क्यों? आखिर अर्धसैनिक बलों की पूरी ताकत झोंककर नक्सलियों के सफाए की ही कोशिश तो सरकार कर रही है। फिर ये कोशिश आधे मन से क्यों?

रॉ की रिपोर्ट के मुताबिक देश के 604 में से 160 जिलों के कई हिस्सों में आतंक के बूते इनकी समानांतर सरकार चलती है। तो फिर इस आतंक को कुचलने के लिए सेना को क्यों नहीं उतारा जा रहा है? नक्सलियों का असर उन इलाकों में सबसे अधिक है जहां खनिज संपदा भरपूर है जिसे नक्सली लूट कर व्यापार कर रहे है, और उस पैसे से निर्दोश लोगों की खून बहा रहे है, फिर भी हमारी सरकार आखिर क्यों चुप है। इतना ही नहीं ये नक्सली गा्रमीण इलाकों में लड़कियों, औरतों के साथ बंदूक के नोक पर स्वछंद यौनाचार कर रहे है, इस देश के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है।
1967 में पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ आंदोलन आज सत्ता पर कब्जे के लिए देष में शस्त्र युध्द की षुरूआत ये नक्सली कर चुके है, मगर लचर नेतृत्व के कारण आज ये अपनी हेकड़ी दिखा रहे है। ये नक्सली सड़क बिजली, स्कूल, पुल और दूसरी सुविधाओं को भी ध्वस्त करना शुरू कर दिए है। इस लड़ाई के खत्म होने में जितनी देर होगी। अपने ही देश के लोग उतना ज्यादा इस लड़ाई के हवन में स्वाहा होते जाएंगे। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या नक्सलियों के खिलाफ सेना को उतारा जाए ?

Saturday, May 25, 2013

क्या खेलों से राजनेताओं को दूर रखना चाहिए ?

एक जमाने तक देश के सबसे लोकप्रिय खेल हॉकी और फुटबॉल होते थे। मगर आज खेलों की भरमार लग गई है, जहा पर देश के जाने माने राजनेता खेल महासंघों की कुर्सी पर विराजमान होकर करोड़ो अरबों की वारे न्यारे कर रहे है। मगर आए दिन जिस प्रकार से देश के खेलों में राजनेताओं की पैठ बनी है उसको लेकर कई अहम सवाल खड़े हो रहे है। आज रसूख का पर्याय बन चुकी खेल संघों की कुर्सी पर राजनेता बरसों बरस से चिपके हुए है, तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या इन्हें वाकई खेल संघों की कुर्सी पर रहना चाहिए? भारत में बचपन में खिलवाड शब्द का प्रयोग बहुतायत में किया जाता है मगर आज के दौर में खेल संघों को देखकर यह कहा जा सकता है कि देश में खेल अब खिलवाड बन गए हैं।

नए दिशा निर्देशों के अनुसार कोई भी अध्यक्ष अधिकतम तीन और पदाधिकारी दो कार्यकाल ही पूरा कर सकता है। मगर आज महाराष्ट्र प्रदेश के पुणे से सांसद सुरेश कलमाडी पिछले 14 सालों तक भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष बने रहे। साथ ही वर्ष 2000 से एशियाई एथलेटिक्स संघ के अध्यक्ष का पद भी कलमाडी कब्जा जमाए रहे। इसी तरह विवादों से गहरा नाता रखने वाले जगदीश टाईटलर भारतीय जूडो फेडरेशन के अध्यक्ष पद पर बीस साल से काबिज हैं। वे भारतीय आलंपिक संघ के उपाध्यक्ष का ताज भी अपने ही सर पर रखे हुए हैं।

अखिल भारतीय फुटबाल संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और केंद्रीय उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल अब इस संघ के अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान हैं। इसी तरह भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा दस सालों से अखिल भारतीय टेनिस संघ के अध्यक्ष हैं। भारतीय ओलंपिक संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विजय कुमार मलहोत्रा ने तो सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं, वे 1973 से भारतीय तीरंदाज संघ के अध्यक्ष पद पर जमे हुए हैं। तो वही दुसरी ओर अरूण जेटली बीसीसीआई के उपाध्यक्ष पद पर बने हुए है। भारतीय बेडमिन्टन संघ के अध्यक्ष वी.के.वर्मा चैथी बार इसके अध्यक्ष बने हैं। वर्मा इसके अलावा एशियन बेडमिन्टन कनफडरेशन के सचिव और विश्व बेडमिन्टन फेडरेशन के उपाध्यक्ष भी हैं।

 हरियाणा के विधायक अजय सिंह चैटाला हरियाणा टेबिल टेनिस संघ पर अपना कब्जा 1987 से बनाए हुए हैं, वे सन 2000 से अखिल भारतीय टेबिल टेनिस संघ में अपनी जोरदार उपस्थिति भी दर्ज कराए हुए हैं। साथ ही अभय सिंह चैटाला पिछले नौ सालों से भारतीय बाक्सिंग संघ पर अपनी दावेदारी बनाए हुए हैं। इन नियम कायदों को धता बताते हुए नानावटी ने भारतीय तैराकी संघ के सचिव की कुर्सी छटवीं बार संभाली है, वे 1984 से इस संघ में हैं। शान का प्रतीक मानी जाने वाली भारतीय हाकी की स्थिति आज किसी से छिपी नहीं है। वर्षों से मठाधीशों के कब्जे से मुक्ति के लिए छटपटाती हाकी दम तोड चुकी है।

खन्ना परिवार का टेनिस संघ पर कब्जा 1988 से बरकरार है। 1988 से 1993 तक राजकुमार खन्ना टेनिस संघ के सचिव रहे और 2000 तक इसके अध्यक्ष रहे। इसके बाद राजकुमार खन्ना ने अपनी विरासत अपने पुत्र अनिल खन्ना को सौंप दी जो आज तक सचिव पद पर कायम हैं। निशानेबाजी के मामले में कभी अव्वल रहने वाला भारत आज इस क्षेत्र में दुर्दशा के आंसू बहाने पर मजबूर है। भारत में खेल संघ एक दशक से पूरी तरह से राजनेता, नौकरशाह और उद्योगपतियों के घरों की जागीर बनकर रह गया हैं। लंबी असाध्य बीमारी और निधन के चलते ही ये लोग संघ से विदा होते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी 1986 से भारतीय फुटबाल संघ के अध्यक्ष थे। जब वे 2008 में गंभीर रूप से बीमार हुए तब जाकर उनके स्थान पर संघ के ही उपाध्यक्ष एवं केंद्रीय उड्डयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल को अध्यक्ष बनाया गया। इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह जिनका निधन कुछ माह पहले हुआ है, वे भी 1999 से नेशनल रायफल संघ के अध्यक्ष रहे हैं।

अभी राजीव शुक्ला आईपील के चेयरमैन और बीसीसीआई के उपध्यक्ष बने हुए है। इसके पहले षरद पवार बीसीसीआई के अध्यक्ष पद पर मौजुद थे। कुल मिलाकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि देष में खेल अब खिलवाड बनकर रह गए हैं। बीसीसीआई चालीस हजार करोड़ रूपए की कंपनी बन चुकी है, मगर यहा खेलों का पतन हुआ है। देश की जनसंख्या 121 करोड़ हो गई है, फिर भी उस हिसाब से खेलों में हम कहीं नहीं हैं। इस स्थिति के लिए सिर्फ और सिर्फ खेलों में राजनेताओं का प्रवेश ही जिम्मेदार माना जा रहा है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या खेलों से राजनेताओं को दूर रखना चाहिए ?

खेल संघो में राजनेताओ की सूची 


शरद पवार, पूर्व बीसीसीआई अध्यक्ष, राजीव शुक्ला, आईपील चेयरमैन, प्रफुल पटेल अध्यक्ष, आल इंडिया फुटबाल फेडरेशन, फारूक अब्दुला अध्यक्ष, जम्मू कष्मीर क्रिकेट एसोसीएशन, सी पी जोषी अध्यक्ष, राजस्थान क्रिकेट एसोसीएशन, सुरेश कलमाडी पूर्व अध्यक्ष, भारतीय ओलंपिक संघ, जगदीश टाईटलर अध्यक्ष, भारतीय जूडो फेडरेशन, यशवंत सिन्हा अध्यक्ष, अखिल भारतीय टेनिस संघ, विजय कुमार मलहोत्रा अध्यक्ष, भारतीय तीरंदाज संघ, अरूण जेटली उपाध्यक्ष, बीसीसीआई, अजय सिंह चैटाला अध्यक्ष, हरियाणा टेबिल टेनिस संघ, अभय सिंह चैटाला, अध्यक्ष, भारतीय बाक्सिंग संघ, प्रियरंजन दासमुंशी पूर्व अध्यक्ष, भारतीय फुटबाल संघ, दिग्विजय सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री पूर्व अध्यक्ष, नेशनल रायफल संघ बृजभूषण शरण सिंह अध्यक्ष, भारतीय कुश्ती संघ, परमिंदर सिंह ढीढसा अध्यक्ष साइकिलिंग संघ, डी डी बोरो अध्यक्ष, फेंसिंग संघ, जे एस गहलौत अध्यक्ष, एमच्योर कबड्डी फेडरेशन, दिगंबर कामत अध्यक्ष, तैराकी संघ, भारत

Friday, May 24, 2013

क्या पानी का निजीकरण सही है ?

देश में आज जिस प्रकार से पानी का निजीकरण किया जा रहा है उससे तो लगता है की अब ‘‘जल ही जीवन है‘‘ जैसे नारा अब सिर्फ किताब के पन्ने में दब कर रह जाएगा। केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की ओर से जो बयान कुछ दिन पहले जारी किया गया है वो बेहद ही चैंकाने वाली है। केन्द्र सरकार पानी के निजीकरण करने पर विचार कर रही है। राष्ट्रीय जल नीति बहुत ही जल्द जारी की जाने वाली है। जल संसाधन मंत्रालय के मुताबिक जल नीति का मसौदा कई माह पहले तैयार कर लिया गया है, मगर विरोध के चलते अब तक सरकार कदम आगे नहीं बढ़ा पा रही है। इस बारे में लगातार विशेषज्ञों और संबंधित लोगों से चर्चा भी हो रही है। इसे देश के लिए सबसे बड़ी त्रासदी के रूप देखा जा रहा है। यहा सवाल खड़ा होता है की पानी हमारा होगा, सप्लाई प्रणाली एवं उपकरण भी हमारे होंगे और उसकी पंपिंग कर देसी या विदेशी कंपनियां देश से भारी भरकम मुनाफा कमाकर अपने खजाने भरेंगी। अगर यह योजना सफल हो जाती है तो इसके बाद देष में विदेशी कंपनियों से 30 साल तक समझौता किया जाएगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विदेशी संस्थानों के हाथ में पेयजल आपूर्ति का कार्य पूरी तरह आ गया तो फिर जल शुल्क तीन गुने हो जाएंगे।

हमारे देश में सबसे जयादा मीठे जल का भंडार है मगर अब इस निजीकारण के बाद जिसके पास पैसा नहीं होगा वो अब देष में प्यासे रहेगा। पिछले कई वर्षो से कॉरपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजर इस मीठे जल पर लगी हुई है। वे जानते हैं कि इसकी मार्केटिंग में कमाई की अपार संभावना है। उनकी नजर में यह नीला सोना है और आने वाले दिनों में इसका महत्व जमीन के नीचे से निकलने वाले कच्चे तेल से भी ज्यादा होगा। इसलिए 70 के दशक से शुरू हुए इस प्रयास में पहले जल वितरण की टेक्नोलॉजी से कमाई की गई, और अब निजीकरण करके एक बार फिर मुनाफे की रकम वसुलने के लिए सरकार ये प्रयास कर रही है। पानी जीवन के लिए आवश्यक है, पानी को हर व्यक्ति का बुनियादी अधिकार है मगर अब वह बाजार का माल होगा। उसे खरीदने और बेचने का मतलब है, जिसके पास खरीदने की ताकत नहीं है, उसका पानी से वंचित होना। क्या किसी सरकार या व्यवस्था को ऐसा करने का अधिकार है? क्या सरकारें हवा और पानी जैसे नैसर्गिक संसाधनों का स्वामित्व किसी को सौंपने का अधिकार रखती हैं? 

क्या ऐसे प्राकृतिक संसाधनों पर हर प्राणी का बुनियादी हक नहीं है? ये तमाम एैसे सवाल है जिसका जवाब सरकार के पास नहीं है। अगर एक गरीब परिवार की आय तीन हजार रुपये मासिक हो तो वह एक हजार या 900 रुपये तक पानी का बिल कहां से भरेगा और फिर बिल देने के बाद उनके पास क्या बचेगा। ये बेहद गंभिर सावाल है जो भारत जैसे देश के लिए सवालिया निषान खड़े कर रहे है। दुनिया में पानी का निजीकरण कोई नई बात नहीं है। सन् 1999 में लैटिन अमेरिकी देश बोलिविया में पानी का निजीकरण किया गया था। ठेकेदार कंपनी एगुअम डेल तुनारी ने अनुबंध के बाद न सिर्फ तीन गुना दाम बढ़ए बल्कि उसने कुओं और टयूबवेलों पर भी कब्जा कर उन पर मीटर लगा दिए थे। पानी की दर वृध्दि से उत्पन्न जनाक्रोश ने वहां गृहयुध्द की स्थिति निर्मित कर दी थी। 

अब लगता है की हमारे देश में पानी का निजीकरण के बाद इसी प्रकार की स्थिती उत्पन्न होने वाली है। समाज में आज कई एैसे समाजिक कार्यकर्ता है जिनका कहना है की पानी प्रकृति की देन है और उस पर किसी का स्वामित्व नहीं है, मगर सरकार को अपने मुनाफा के आगे ये सारी बातों का कोई तर्क समझ में नहीं आ रही है। पानी व्यक्ति के जीने का आधार है, इसलिए संविधान भी पानी की कीमत वसूलने की इजाजत नहीं देता। संविधान की धारा-21 व्यक्ति को जीने का अधिकार देती है जिसमें ऐसी वस्तु जिससे व्यक्ति का जीवन जा सकता है उसका निजीकरण संविधान का उल्लंघन है, तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या पानी का निजीकरण सही है ?

Tuesday, May 21, 2013

क्या मनमोहन सिंह चीनी पी एम के आगे घुटने टेक दिए है ?

क्या अर्थशास्त्री ली कचिंयांग ने अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह को ताड़ लिया है। क्या मनमोहन के बाजारवाद में अब चीनी सामानों की खुली घुसपैठ होगी। क्या उत्पादन समझौते से चीन भारत की खेती पर भी कब्जा करेगा। क्या चीन पड़ोसियो के जरीये भारत को सरहद पर घेरेगा। क्या चीन की नयी विदेश नीति भारत की आत्मनिर्भरता खत्म करने की है। यह सारे सवाल इसलिये क्योंकि जिस तरह चीन के साथ मीट, मछली, पानी, उत्पाद, इन्फ्रास्ट्रकचर और आपसी संवाद या रिश्तों को लेकर समझौते हुये, उसने कई सवाल समझौते के तौर तरीको को लेकर ही खड़े कर दिये हैं। मसलन चीनी सैनिकों ने लद्दाख में खुल्लम-खुल्ला घुसपैठ की। 22 किलोमीटर तक घुस आये। 

टैंट अभी भी भारत की सीमा के भीतर लगे हुये हैं। लेकिन चीन के प्रधानमंत्री के साथ खडे हुये तो मनमोहन सिंह घुसपैठ शब्द तक नहीं कह पाए। बोले घटना हुई। समझौते को लेकर कहा गया कि बॉर्डर मेकैनिज्म को और कारगर बनाया जाएगा। लेकिन कैसे, ना विस्तार से चर्चा हुई और ना ही कुछ बताया गया। और तो और चीन ब्रह्मपुत्र नदी के बहाव की जानकारी साझा करेगा यानी भारत में बाढ़ आने से पहले चीन बता देगा कि क्या होने वाला है, लेकिन मनमोहन सिंह यह भी पूछ नहीं पाये कि नदी पर जो डैम बनाए गए हैं, उस पर तो कोई जानकारी दीजिये ।

फिर आर्थिक-व्यापारिक समझौतों ने बता दिया कि जो कारोबार अभी 66 अरब डॉलर का है वह समझौतों के बाद बढ़कर 100 अरब डालर हो जायेगा। यानी अभी चीन की कमाई भारत के साथ तमाम व्यापारिक रिश्तों के 80 फिसदी लाभ की है, वह समझौते के बाद 90 फिसदी तक पहुंच जायेगी । तो फिर मनमोहन सिंह कर क्या रहे थे। जबकि इसी दौर में समझना यह भी चाहिये कि चीन भारत को चौतरफा घेर रहा है। पाकिस्तान के पीओके और अक्साई चीन ही नहीं बल्कि ग्वादर बंदरगाह उसके रणनीतिक कब्जे में हैं। श्रीलंका के हम्बटोटा बंदरगाह पर उसी का कब्जा है। बांग्लादेश की सेना में जल, थल वायु तीनो के लिये चीनी हथियार, टैंक, जहाज सभी चीनी ही हैं। 

जबकि यह वही चीन है जो बांग्लादेश को मान्यता देने के लिये 1971 में तैयार नहीं था। यही हाल म्यांमार का है। वहां भी चीन ने भारी निवेश किया है। नेपाल के साथ तो हर स्तर पर अब चीन जा खड़ा हुआ है । यानी भारत की चौतरफा घेराबंदी चीन के प्रधानमंत्री ली कचिंयाग ने शुरु की है। यह अलग बात है ली कचिंयाग ने राजनीति 1962 के बाद शुरु की। लेकिन जो रणनीति चीन बिछा रहा है उस बिसात को चीनी प्रधानमंत्री की मौजूदा यात्रा से ही समझना चाहिये कि दिल्ली से मुंबई होते हुये वह पाकिस्तान ही जायेंगे, तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या मनमोहन सिंह चीनी प्रधान मंत्री के आगे घुटने टेक दिए है ?

क्या जनता के लिए “भ्रष्टाचार” चुनावी मुद्दा नहीं है ?

हाल ही में हुए एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे के नतीजों पर गौर करें तो यदि आज चुनाव हो जाए तो यूपीए सरकार फिर से सरकार नहीं बना पाएगी। दिल्लीए उत्तर प्रदेशए महाराष्ट्रए बिहार समेत 21 राज्यों में हुए इस सर्वे के नतीजे ना सिर्फ कांग्रेस के विरोध में जा रहे हैं बल्कि भारी मतों से कांग्रेस की हार भी सुनिश्चित प्रतीत हो रही है। लेकिन वहीं अगर हम 2012.13 के बीच हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे देखें तो एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे के उलट ही हमें हर जगह कांग्रेस की जीत ही नजर आई है। जिसके बाद यह एक बहस का विषय बन गया है कि क्या एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे को आधार मानकर आगामी लोकसभा चुनावों में बड़े बदलावों की अपेक्षा की जा सकती है या फिर कांग्रेस की जीत के हालिया उदाहरण ही मिशन 2014 की तस्वीर पेश करने के लिए काफी हैं। बुद्धिजीवियों का वो वर्गए जो कांग्रेस की हार को मात्र एक भ्रम कह रहा हैए उसका कहना है कि भले ही कांग्रेस भ्रष्टाचार के बड़े.बड़े आरोपों से जूझ रही हो लेकिन जनता इस बात को समझती है कि कोई भी सरकार या राजनीतिक दल दूध का धुला नहीं है।
 
 सत्ता में आने के बाद हर कोई ताकत और पैसे के नशे में चूर हो जाता है। लेकिन जनता यह समझती है कि जिस तरह कांग्रेस ने देश की कमान संभाली हैए वह कोई अन्य दल कर ही नहीं सकता क्योंकि अंदरूनी कलहों और मतभेदों की वजह से कोई भी जनता के हित में काम नहीं कर पाएगाए जिसके परिणामस्वरूप जो हालात आज है उससे भी कहीं ज्यादा बदतर हालातों का सामना करना पड़ सकता है। कर्नाटकए हिमाचल प्रदेशए उत्तराखंड आदि राज्यों में कांग्रेस को मिली जीत यही जाहिर करती है कि जनता के बीच कांग्रेस का करिश्मा अभी भी बरकरार है और उसे कोई टक्कर नहीं दे सकता। जनता चाहे कुछ भी कह ले या सोच ले लेकिन बात जब वोट डालने की आती है तो वह उसे ही चुनती है जिसे वह सही समझती है।

लेकिन दूसरी ओर एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे को आगामी लोकसभा चुनावों का परिणाम मानने वाला बुद्धिजीवी वर्ग कुछ और ही तर्क दे रहा है। इस वर्ग के अनुसार कर्नाटक चुनाव जिसमें कांग्रेस की जीत को उसकी लोकप्रियता करार दिया जा रहा है वह कांग्रेस की जीत नहीं बल्कि भाजपा की हार थी। येदियुरप्पा के भाजपा से अलग होते ही यह स्पष्ट हो गया था कि वहां भाजपा जीत ही नहीं सकती। यहां तक कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी यह चुके हैं कि अगर कर्नाटक में भाजपा को जीत मिलती तो यह उनके लिए हैरानी का कारण बनता। नील्सन सर्वे के अनुसार उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मात्र 5 सीटें ही हासिल होंगी जबकि पिछले लोकसभा चुनावों में इनकी संख्या 21 थी। 
 
महाराष्ट्र में जहां कांग्रेस गठबंधन को पिछले साल 29 सीटें मिली थीं सर्वे के अनुसार उनकी संख्या घटकर मात्र 16 रह जाएगी। पिछले लोकसभा चुनावों में दिल्ली के सभी सातों निर्वाचन क्षेत्र में जीत सुनिश्चित करने वाली कांग्रेस को इस बार 5 जगहों पर हार मिलने की पूरी संभावना हैए वहीं दूसरी ओर बिहार में भी कांग़्रेस के लिए कोई उम्मीद की किरण नजर नहीं आ रही है। एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे देश के 21 राज्यों में किए गए और सभी ओर से नतीजे कांग्रेस के विरोध में ही जाते नजर आ रहे हैं। एबीपी न्यूज.नील्सन सर्वे को प्रमाण मानने वाले बुद्धिजीवियों का कहना है कि श्जनता कांग्रेस के सभी हथकंडों को अच्छी तरह समझती है इसीलिए वह अब दोबारा उस पर विश्वास करने का जोखिम नहीं उठा सकती। यह नतीजे भी उसी जनता की प्राथमिकताओं पर आधारित हैं जिसके वोट से राजनीतिक दलों की किस्मत तय होती है और अब जब इन्हीं नतीजों में जनता का रुख साफ दिखाई दे रहा है तो कैसे यूपीए सरकार के जीत की बात की जा सकती है।

Sunday, May 19, 2013

कौमार्य परीक्षण, यहां पीडि़ता पर उठती है उंगली !

देश की राजधानी दिल्ली में दुष्कर्म पीडि़ताओं को मुआवजा नहीं मिल पाने पर सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करते हुए इस संबंध में समुचित कदम उठाने के लिए दिशा.निर्देश जारी किया है। पिछले दिनों रोहिणी के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के सामने आए एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई। इस बारे में दिल्ली उच्च न्यायालय की तरफ से भी ऐसे लोगों की सहायता के लिए क्षतिपूर्ति योजना लागू करने के संबंध में अदालती आदेश राज्य सरकार को पहले दिया जा चुका है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने तत्काल यह आदेश दिया कि पीडि़ता के परिवार को एक लाख रुपया अंतरिम मुआवजे के तौर पर दिया जाए। इसके अलावा अदालत ने दिल्ली सरकार की उदासीनता पर तीखे प्रहार किए और कहा कि महिला व बाल विकास विभाग को ऐसे जरूरतमंद लोगों की हर तरह से मदद के लिए आगे आने की जरूरत है। वैसे मामला तब चर्चा में आया जब न्यायालय के सामने एक महिला ने यह अर्जी लगाई कि वह अपनी बेटी के साथ हुए यौन अत्याचार के मामले को आगे नहीं लड़ना चाहती। यह जानते हुए भी कि अपराधी के खिलाफ पक्के सबूत थेए कुछ समय के लिए समूची अदालत में सन्नाटा छा गया। न्यायाधीश महोदय द्वारा इसकी वजह पूछे जाने पर कि वह मां ऐसा क्यों सोचती है तब उसने अपनी आपबीती जो कहानी सुनाई उसे सुनकर वहां एकत्रित सभी लोगों का दिल पसीज गया।

गौरतलब है कि पांच साल पहले विकासपुरी के किसी विक्की सेन ने उस महिला की 14 साल की लड़की के साथ दुष्कर्म किया और उसके बाद से ही परिवार पर कहर बरपाना शुरू हो गया। जांच प्रक्रिया से आजिज आकर लड़की ने बताया कि पुलिस वाले उस प्रसंग को बार.बार उससे पूछते थे और उसे इस बात के लिए टोकते थे कि उस वक्त ही वह बाहर क्यों निकली थीघ् एसिड पीकर आत्महत्या की कोशिश करने के बाद उसे कृत्रिम आहार नली लगाई गई। पीडि़ता आज भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं है और वह ठीक से बोल भी नहीं पाती है। इस घटनाक्रम से क्षुब्ध मगर बेबस पिता को दो बार दिल का दौरा पड़ा। परिवार की माली हालत इस कदर खराब हो गई कि मकान तक बेचना पड़ा तथा इन दिनों महिला दूसरों के घरों में नौकरानी का काम कर परिवार का भरण.पोषण कर रही है। निश्चित ही दुष्कर्म पीडि़तों के साथ ऐसे असंवेदनशील व्यवहार का यह कोई पहला किस्सा नहीं है। कुछ समय पहले ही खबर आई थी कि किस तरह यौन अत्याचार पीडि़तों के लिए अनिवार्य घोषित की गई डीएनए जांच को भी अंजाम नहीं दिया जा रहा है।

राजधानी दिल्ली के आंकड़े थे कि पीडि़तों में से बहुत कम लोगों की डीएनए जांच कराई गई। दुष्कर्म पीडि़तों की जांच में बरती जा रही लापरवाही और इस दौरान प्रकट होते पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह के मसले अक्सर बहस का मुद्दा बनते हैं लेकिन स्थिति में बदलाव लाने की बजाय इसे एक सामान्य घटना मान लिया जाता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि बलात्कार एक मात्र ऐसा अपराध हैए जहां पीडि़त को ही आमतौर पर कठघरे में खड़ा किया जाता है। लंबी कानूनी प्रक्रिया के चलते वह भी मामले में रुचि खो देता है। ऐसे मामलों में त्वरित अदालतें कायम करने की बात भी अभी नीतिगत स्तर पर मंजूर नहीं की जा सकी है। पिछले ही साल ह्यूमन राइट्स वॉच नामक संगठन द्वारा तैयार रिपोर्ट डिग्निटी ऑन ट्रायल जो यौन अत्याचार पीडि़तों के परीक्षण में संतुलित पैमाने बनाने की जरूरत पर केंद्रित है प्रकाशित हुई। यौन अत्याचार अन्वेषण के तरीकों में मौजूद मध्ययुगीन पैमानों को उजागर करती रिपोर्ट ने इस विचलित करने वाले तथ्य को पेश किया कि किस तरह आज भी अदालती फैसलों या उसकी पूर्वपीठिका बनती अदालती कार्रवाइयों में पीडि़ता के चाल.चलन या उसके यौनिक अनुभव का मसला परोक्ष या अपरोक्ष रूप से उठता रहता है। तीस साल पहले इस संदर्भ में लंबे संघर्ष के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जरूरी दिशा.निर्देश दिए थे। इतना ही नहीं पीडि़ता की मेडिकल जांच के नाम पर आज भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी हैए जिसके तहत डॉक्टर पीडि़ता के यौनांग की जांच करके यह प्रमाणपत्र जारी करता है कि वह सहवास की आदी थी या नहीं और इस प्रमाणपत्र को बाद में मुकदमे के दौरान एक प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है।

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट जारी होने के पहले दिल्ली की अदालत के सामने उपस्थित एक मामले में यह मसला चर्चा में आया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ को साफ करना पड़ा था कि यौन हिंसा के मामलों की सुनवाई में इस किस्म का परीक्षण .जिसे पीवी परीक्षण कहा जाता है अप्रासंगिक है। एक महिला के साथ यौन अत्याचार के मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने यह बात कही थी और साथ ही साथ यह भी बताया कि इस आदेश की प्रतियां दिल्ली पुलिस आयुक्त को भेजी जानी चाहिए ताकि वह पुलिस अधिकारियों का ध्यान इस दिशा में खींच सके। अदालत का साफ मानना था कि पीडि़ता का फिंगर टेस्ट दरअसल उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। लगभग 27 साल पहले दुष्कर्म कानूनों में संशोधनों के लिए एक अहम कोशिश हुई थी। एक आदिवासी युवती मथुरा दुष्कर्म कांड में सुप्रीमकोर्ट ने तीस साल पहले एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया थाए जिसके बाद दुष्कर्म पीडि़ताओं के निजी इतिहास की बात करना अनुचित एवं गैर जरूरी माना गया।

1983 में सामने आए संशोधनों के बाद जब नया कानून बनाया गया तो उसमें ऐसे संवेदनशील पहलुओं के प्रति पर्याप्त सतर्कता बरती गई। इसके अलावा हमारे पितृसत्तात्मक समाज में जिस तरह दुष्कर्म के बाद पीडि़ता के सामाजिक बहिष्कार की स्थिति बनती दिखती हैए उसे मद्देनजर रखते हुए ही सर्वोच्च न्यायालय ने पीडि़ता की पहचान को गोपनीय रखने पर जोर दिया था। यौन अत्याचार पीडि़तों की जांच में प्रयुक्त अपराध चिकित्सा ;फॉरेंसिक साइंसद्ध के तौर तरीकों की दयनीय एवं भयानक स्थिति की चर्चा करने वाली सेवाग्राम के मेडिकल कॉलेज में कार्यरत डॉक्टर इंद्रजीत खांडेकर की बेहद चर्चित रिपोर्ट पीटिएबल एंड हारेंडस क्वॉलिटी ऑफ फोरेंसिक मेडिकल एक्जामिनेशन ऑफ सेक्सुअली असाल्टेड विक्टिम्स ने कुछ समय पहले इस संबंध में अहम सुझाव दिए थे। फोरेंसिक परीक्षण को बेहतर बनाने के लिए उसने नए नियमों की भी सिफारिश की थी। मालूम हो कि प्रोफेसर खांडेकर द्वारा तैयार सिफारिश पीडि़त महिलाओं के राय को अधिक तवज्जो देते हैं। वह इस संभावना को भी मद्देनजर रखते हैं कि किन्हीं दबाव में या प्रलोभन में आकर पीडि़त द्वारा अपने बयान से मुकर जाने की स्थिति में भी रिकॉर्ड में दर्ज अन्य सुबूत उत्पीड़क को दंडित करने में कामयाब हो सकें। बंबई उच्च न्यायालय के नागपुर पीठ के समक्ष प्रस्तुत इस रिपोर्ट के बाद अदालत की तरफ से महाराष्ट्र सरकार को बताया गया है कि वह इन नियमों को अस्पतालों एवं पुलिस थानों में भेजें और इस बारे में संपन्न कार्रवाइयों के बारे में अदालत को भी सूचित करे।

Saturday, May 18, 2013

क्या भारतीय व्यापारियों को खत्म किया जा रहा है ?

महाराष्ट्र के व्यापारी एक बार फिर से सड़को पर है, महाराष्ट्र में स्थानीय निकायों द्वारा व्यापारियों पर लगाए जा रहे कर एलबीटी, को लेकर व्यापररियों में विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है। लगता है एफडीआई के बाद अब सरकार एलबीटी कर लागू करके वहा के व्यापारियों को समाप्त करना चाहती है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई सहित महाराष्ट्र के अन्य शहरों में एलबीटी के विरोध में चल रही हड़ताल के कारण अब तक 75,000 करोड़ रुपयों के नुकसान हुआ है। ये नुकसान सिर्फ सरकारी राजस्व का ही नहीं हो रहा है, इसमे तमाम एैसे छोटे बड़े व्यपारियों का कमर टूट रहा है जो लगातार इसके बिरोध में पीछले कई दिनों से अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे है।


व्यापारियों के विरोध के बावजूद सरकार अभी तक झुकने को तैयार नहीं है। राज्य के दोनों सत्तारूढ़ दल कांग्रेस व राकांपा इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है। अब तक राज्य के 19 नगरपालिका क्षेत्रों में एलबीटी लागू की जा चुकी है। मुंबई में इसे एक अक्टूबर से लागू किया जाना है। एक महानगर में पहले सरकार एफडीआई की अनुमति देती है और फिर उसके बाद अब एलबीटी जैसे कर लागू करके उनके रोजी रोटी को मारना चाहती है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या ये कर सरकार विदेशी व्यापारियों के दबाव में लागू कर रही है, जो हमेषा से ही छोटे भारतीयें व्यापारियों के लिए तरह तरह के साजि़ष करते रहते है। 

मुंबई सहित राज्य के कई हिस्सों में चल रहे बंद के कारण आम आदमी को जरूरी सामानों की किल्लत होने लगी है। लोकल बॉडी टैक्स का ये मामला दिनों दिन गहराता ही जा रहा है। एलबीटी को लेकर महाराष्ट्र सरकार और फेडरेशन ऑफ महाराष्ट्र के बीच जारी टकराव की स्थिति उतपन्न हो गई है। इस पुरे घटनाक्रम पर अब सियासत भी तेज हो गई है। बीजेपी-शिवसेना और एमएनएस के बाद अब एनसीपी भी व्यापारियों के समर्थन में उतर आई है।

महाराष्ट्र में सबसे अधिक आक्ट्राई है और यहां हर चीज पर सबसे अधिक टैक्स देना पड़ता है। अगर अभी एलबीटी पूरी तरह से लागू की जाती है तो इससे हर जिस अन्य शहरों के मुकाबले जयादा दाम पर मिलेगी। अगर आप एक कार खरीदते हैं, और ये कार दिल्ली मे यदि पांच लाख में मिलेगी तो वही कार आपको मुम्बई में पांच लाख पचपन हजार में मिलेगी। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि आखिर एक देश में इतना अन्तर क्यों ? यह व्यवस्था व्यापारीयों पर सरकार जबरन थोपना चाहती है, ताकी विदेशी व्यापारियों को लूट की खुली छूट दी जा सके और वालमार्ट जैसे विदेशी व्यापारी आसानी से अपना पांव पसार सके। 

हर व्यापार मे कभी न बिकनेवाला भी माल होता है जिसे डेड स्टॉक के नाम से जाना जाता है, एल बी टी जैसे कर मे इसका कोई व्यवस्था नहीं किया गया है, इससे व्यापारियों को कर के नाम पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। सरकार की ओर से सेट ऑफ का कोई जिक्र नहीं है जिससे जितना माल बिके केवल उसी के उपर टैक्स भरा जाए। इसको लेकर व्यापारियों में काफी जयादा आक्रोष का माहौल बना हुआ है , और सरकार हाथ पर हाथ धरे चुप चाप तमाशा देख रही है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या वालमार्ट और एफडीआई के लिए भारतीय व्यापारियों को खत्म किया जा रहा है?

Friday, May 17, 2013

क्या आईपीएल पर प्रतिबंध लगना चाहिए ?

क्या आईपीएल को बंद कर दिया जाना चाहिए? स्पॉट फिक्सिंग में तीन खिलाडि़यों की गिरफ्तारी के बाद ये मांग फिर उठने लगी है। अपने खेल से देश के एक अरब लोगों का मनोरंजन करने वाले क्रिकेटर अगर इस तरह मुंह काला कर घूमें तो समझना मुश्किल नहीं कि संकट कितना बड़ा है। क्रिकेट का ये खेल माफिया डॉन से लेकर सत्ता की गलियारों तक गूंज रही है, आज यही कारण है की कोई भी दल या राजनेता इसे रोकने की जहमत नहीं उठा पा रहा है। खिलाडि़यों के साथ सट्टेबाजों की सांठ गांठ का गठजोड इस खेल के अंदर होने वाली खेल को उजागर कर दिया है। क्रिकेट के नाम पर पनपता हुआ ये कारोबार इतना प्रभावी होता जा रहा है और इसका मुनाफा इतना बडा है कि अब इसे रोक टोक पाना उसी तरह असंभव है जैसे कि देश में शराब के बढते फलते फूलते कारोबार को रोक पाना। जब भी ऐसी कोशिश की जाती है तो एक दलील दी जाती है कि करों के रूप में इससे भारत सरकार को बहुत बड़ी आय होती है। मगर ये दलील देने वाले हर बार क्यों भूल जाले है की राजस्व से भी एक बड़ा हिस्सा दफ्तरों में काम करने वालों लोगों को भी ये खेल कितना जयादा प्रभावित करता है, जो इसे देखने में समय को बर्बाद करते है।  

वैसे आईपीएल के साथ विवादों का सुरू से ही चोलि दामन का नाता रहा है। इससे पहले के संस्करण में भी अनेक विवाद आईपीएल की झोली में आए, जिसमें खिलाडियों द्वारा स्टेडियम में नशीले पदार्थ का उपयोग करने से लेकर चियर्स गर्ल का असलील नांच और मैच के बाद होने वाली रेव पार्टी काफी जयादा सुर्खीयों में रहा है। इन सब के अलावे आईपीएल में पैसों की अनियमितताएं भी एक बड़ा विवाद का कारण हमेषा से रहा है, इसी विवाद के कारण आईपीएल के पूर्व चेयरमैन ललित मोदी को हटाया गया। आईपीएल के पांचवें संस्करण में एक टीवी चैनल ने स्टिंग आपरेशन में कुछ आईपीएल खिलाडि़यों को स्पॉट फिक्सिंग करते हुए दिखाया। इस खबर ने क्रिकेट जगत को एक बार फिर शर्मसार किया। इस घटना के बाद एक और विवाद सामने आया जिसमे मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में एक मैच के बाद कोलकाता नाइट राइडर्स के मालिक शाहरुख खान ने सुरक्षाकर्मियों और स्टेडियम प्रबंधक से हाथापाई तथा गालीगलौज भी की। एैसे में ये सभी घटनाए इस बात को और प्रबल बना देती है की क्या आईपीएल पर प्रतिबंध लगना चाहिए? रॉयल चैलेंजर्स बंगलौर की तरफ से खेलने वाले ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ल्यूक पॉमबाश पर भी आरोप लगा कि उन्होंने दिल्ली के एक होटल में अमरीकी महिला जोहल हमीद को छेड़ा और उनके मंगेतर के साथ मारपीट भी की। विवादों का दौर यहीं समाप्त नहीं हुआ ये कारवा और आगे बढ़ता गया। 

मुंबई पुलिस ने ऑकवुड होटल में एक छापे के दौरान पुणे वॉरियर्स के दो खिलाडियों को पकड़ा जहा पर रेव पार्टी का आयोजन किया गया। इस पार्टी में नशीले पदार्थ और शराब बरामद किया गया। इन सब से इतर आईपीएल विवादों का साया संसद में भी गूंजा जहां पर 60 सांसदों ने एक सुर में कहा कि आईपीएल बंद किया जाए, सरकार ने उचित कदम उठाने के लिए आष्वसान दिया मगर ये खेल बदस्तूर जारी है। अंत में अपनी सनसनीखेज और आपत्तिजनक तस्वीरों से सोशल मीडिया में तहलका मचाने वाली पूनम पांडे ने कोलकाता नाइट राइडर्स की जीत के बाद ट्विटर पर अपनी निर्वस्त्र तस्वीर जारी करके विवादों की सूची को और गहरा कर दिया। आज आईपीएल में विवादों की सूची लगातार बढ़ती जा रही है, एैसे में  इसके अस्तित्व को लेकर कई सारे सवाल खड़े हो रहे है। अब आईपीएल में खिलाडि़यों को पैसे के साथ साथ लडि़कियां भी परोसी जा रही है। आईपीएल खेल कम मनोरंजन अधिक हो गया है जहा पर आज पैसों के साथ हंसीनाओं का संगम और जमघट लग रहा है। इन तमाम विवादों को खंगालने के बाद सवाल खड़ा होता है की क्या आईपीएल पर प्रतिबंध लगना चाहिए?

Wednesday, May 15, 2013

कर्नाटक चुनाव की राजनीतिक निष्कर्ष !

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणामों ने शायद ही किसी को अचंभित किया हो! परिणाम मतदान के काफी पूर्व बन चुके जनसामान्य के अनुमान और मतदान बाद के एक्ज़िट पोल्स के लगभग अनुरूप ही हैं। अप्रत्याशित न होने के बाद भी कर्नाटक चुनाव परिणाम समय और स्थान के संयोग के कारण राजनीतिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपूर्ण माने जा रहे थे। स्वाभाविक है भाजपा के लिए दक्षिण का एकमात्र किला होने के कारण कर्नाटक दक्षिण में भविष्य की उम्मीदों का आधार था जहां से पिछले लोकसभा चुनावों में उसके खाते में महत्वपूर्ण 19 सीटें आयीं थीं। वहीं केंद्र में बुरे समय से जूझती कॉंग्रेस के लिए एक बड़े प्रदेश के रूप में कर्नाटक एकमात्र ऐसा मौका था जिसने कि उसके लिए न केवल मरहम का काम किया वरन उसे यह संदेश देने का सशक्त अवसर भी दिया कि उसकी जड़े अभी तक हिली नहीं हैं। निश्चित रूप से कर्नाटक चुनाव परिणामों पर भाजपा को मंथन की आवश्यकता है और यही अब वो कर भी सकती है। किन्तु राजनीतिक दलों के अतिरिक्त कर्नाटक के चुनाव परिणाम राजनीतिक पंडितों के लिए भी गंभीर सबक हैं कि भारत की राजनीति को इसकी ऊबड़-खाबड़ जमीनी वास्तविकता के आधार पर ही समझा व परखा जाना चाहिए।

 कर्नाटक में येदुरप्पा फैक्टर को हाँलाकि नजरंदाज नहीं किया गया और न ही यह संभव था किन्तु मीडिया में अधिकांश विशेषज्ञों ने भाजपा की हार के लिए उसकी सरकार में कथित भ्रष्टाचार को ही प्रमुखता से जिम्मेदार ठहराया है, किन्तु जमीनी यथार्थ यह है कि भाजपा की हार के लिए येदुरप्पा व भ्रष्टाचार दोनों को एक साथ जिम्मेदार ठहराया जाना संभव ही नहीं है; न सैद्धान्तिक रूप से और न वास्तविकता की कसौटी पर ही.! किसी ग्रामसभा, निकाय चुनाव को निकट से देखने वाला व्यक्ति अथवा विधानसभा चुनाव में सक्रिय रहा कोई भी आम आदमी भारतीय राजनीति के कड़वे सच को बखूबी समझता है लेकिन अब हमें इसे आंकड़ों के स्तर पर बड़े विश्लेषकों की भाषा में भी समझने की आवश्यकता है। कर्नाटक राजनीति के निष्कर्षों से हम भारतीय राजनीति के वास्तविक चित्र व दूरगामी भविष्य को काफी हद तक समझ सकते हैं। सैद्धान्तिक रूप से, कर्नाटक के संदर्भ में, यह संभव नहीं है कि जो जनता भाजपा से भ्रष्टाचार के कारण कुर्सी खाली करा ले वही जनता येदुरप्पा को अपना समर्थन दे, बावजूद इसके कि येदुरप्पा के अपने बल बूते सरकार बनाने की संभावना शून्य थी।

जनता के समर्थन को स्पष्ट करने के लिए हम प्राप्त मतों के प्रतिशत को आधार बनाते हैं। इस चुनाव में कॉंग्रेस को 36.6% मत मिले और 42 सीटों  की बढ़त के साथ उसके विधायकों की संख्या 121 पर पहुँच गई। किन्तु 2008 की अपेक्षा कॉंग्रेस को मिले मतों में मात्र 1.8 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई है। भाजपा को अपने 2008 की अपेक्षा 13.9 प्रतिशत मतों का तगड़ा नुकसान हुआ और परिणाम स्वरूप उसे 70 सीटों से हाथ धोना पड़ा और उसके विधायकों की संख्या 40 तक लुढ़क गई। भाजपा से खिसके मतदाताओं का बड़ा हिस्सा, 9.8 प्रतिशत, कॉंग्रेस नहीं बल्कि बी एस येदुरप्पा के साथ गया, भले ही उनके खाते में 6 सीटें ही आई हों। हाँलाकि भ्रष्टाचार के मुख्य आरोपी तो येदुरप्पा ही थे और भाजपा ने उन्हें निकालने की बड़ा जोखिम लेकर भी  अपना दामन साफ कर लिया था। येदुरप्पा की पार्टी को मिले मतों का प्रतिशत अपने पहले ही चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा व जेडीएस के 20-20 प्रतिशत का लगभग आधा व विजेता कॉंग्रेस का एक तिहाई पहुँच गया जबकि येदुरप्पा को अपनी पार्टी बनाए छह महीने भी नहीं हुए थे।

इस तरह ये तर्क स्वीकार पाना कि जनादेश भ्रष्टाचार के विरोध में है हकीकत के आईने में संभव नहीं होता.! यदि भाजपा व येदुरप्पा को मिले मतों को जोड़ लिया जाए तो यह प्रतिशत अभी भी 29.8 होता है। अतः भाजपा को जो 13.9 प्रतिशत मतों का जो नुकसान हुआ उसने पूरे सियासी समीकरण निश्चित रूप से बदल दिए किन्तु उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनादेश कहकर परिभाषित नहीं किया जा सकता अन्यथा येदुरप्पा उसके सीधे लाभदार नहीं होते। कॉंग्रेस और जेएसडी को जो क्रमशः 1.8 व 1.1 प्रतिशत का लाभ हुआ क्योंकि येदुरप्पा के भाजपा छोड़ने से स्पष्ट हो गया था कि भाजपा सत्ता वापसी नहीं कर सकती अतः यही दोनों दल के सत्ता के संभावी दावेदार के रूप में बच रहे थे। यह राजनीति का यथार्थ है कि सत्ता के लिए विकल्प के रूप में जिस पार्टी की संभावना बन जाती है उसे एक जनभावना का लाभ मिलता है। यही कारण है कि राजनीतिक दलों को मतदान पूर्व एक्ज़िट पोल्स से ख़ासी आपत्ति रही है और अंत में चुनाव आयोग ने एक्ज़िट पोल्स को प्रतिबंधित ही करने का निर्णय लिया।

अतः कम तैयारियों व तमाम आरोपों के बाद भी येदुरप्पा की पार्टी को मिले बड़ी संख्या में मतों से हम दो ही तरह के निष्कर्ष निकाल सकते हैं; या तो कर्नाटक की जनता ने येदुरप्पा को भ्रष्टाचार का दोषी नहीं माना अथवा भ्रष्टाचार चुनाव का प्रभावी मुद्दा ही नहीं रहा। दुर्भाग्य से क्षेत्रीय राजनीति का कटु सत्य दूसरा बिन्दु ही है, क्षेत्रीय राजनीति में मतदाताओं के बींच भ्रष्टाचार अभी तक प्रभावी मुद्दा नहीं बन सका है। क्षेत्रीय राजनीति में विचारधारागत वोट बैंक के अतिरिक्त क्षेत्रीय मुद्दे ही प्रभावी व निर्णायक होते हैं। भ्रष्टाचार का मुद्दा वहाँ तक प्रभावी है जहां तक इसे क्षेत्रीय मुद्दे के रूप में स्थापित किया जा सके! किन्तु दुर्भाग्य से भारत के अधिकांश राज्यों के चुनाव परिणाम कम से कम अब तक यही सिद्ध करते आए हैं कि ऐसा जमीनी आधार पर नहीं हो सका है.! संभव है कि भारतीय मतदाता अभी तक यह स्वीकार ही न कर पाया हो कि भ्रष्टाचार का शासन व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा नहीं है.! अन्यथा कर्नाटक में जनता भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे येदुरप्पा को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतारकर बाहर का रास्ता दिखाने वाली भाजपा की अपेक्षा अधिक तीव्रता से नकारा जाना चाहिए था।

सबसे मुख्य बात कि भ्रष्टाचार के चुनावी मुद्दा रहते हुए केंद्र में भ्रष्टाचार के दलदल में फंसी, जूझती कॉंग्रेस जनता द्वारा प्रदेश के भ्रष्टाचार का विकल्प कैसे मानी जा सकती थी.? क्या केंद्र कॉंग्रेस के ही नेता कर्नाटक में स्टार प्रचारक नहीं थे? अंत में हमें क्षेत्रीय कारकों को ही स्वीकारना पड़ता है और यह स्थिति पूरे देश की है। हिमाचल प्रदेश में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे होने के बाद भी वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँच जाते हैं, उत्तराखण्ड में ईमानदार खंडूरी का कोई जादू नहीं चलता और अपनी ही सीट हार जाते हैं, उत्तर प्रदेश में सत्ता भ्रष्टाचार के दिग्गज आरोपियों माया मुलायम के बींच ही झूलती है, महाराष्ट्र में शरद पवार आज भी मराठा स्ट्रॉंगमैन के नाम जाने जाते हैं।  भ्रष्टाचार के प्रति उदासीन भारतीय राजनीति भारत का दुर्भाग्य है किन्तु शुभ संकेत यह है कि अब ग्रामसभा से लेकर विधानसभा व लोकसभा चुनावों तक विकास एक मुद्दा बनता जा रहा है, जनता किए गए काम पर सवाल पूंछने लगी है।

 हो सकता है विकास के प्रति जबाबदेही से भ्रष्टाचार पर लगाम लगे किन्तु यदि भ्रष्टाचार पर भी जनता जबाब मांगने लगे तो विकास पर लगी लगाम जल्दी ही हट जाएगी। दुर्भाग्य से यह तात्कालिक सच नहीं लगता अतः कर्नाटक में मुंह की खा चुकी भाजपा को 2014 में ध्यान रखना होगा कि भ्रष्टाचार को तीखा तीर तो बनाया जा सकता है लेकिन ‘जनता में आधार’ का धनुष भी मजबूत करना होगा, साथ ही इकलौते तीर से भी काम नहीं चलने वाला! कॉंग्रेस को ध्यान रखना होगा कि दिल्ली की दौड़ में क्षेत्रीय मुद्दों और समीकरणों की कर्नाटक जैसी सहूलियत उपलब्ध नहीं होगी, जनता तब दिल्ली का हिसाब मांगेगी, निःसन्देह काफी कुछ केंद्र के भ्रष्टाचार का भी.!

आज के सन्दर्भ में राजनैतिक विश्लेषण, कर्नाटक चुनाव विशेष !

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद मीडिया के द्वारा, चाहे वह प्रिंट मीडिया हो, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया हो या फिर सोशल मीडिया, सभी में भाजपा-कांग्रेस, मोदी-राहुल, हार-जीत आदि के समीकरणों पर चर्चा-बहस होने लगी है. इस बहस के परिदृश्य में आगामी लोकसभा चुनाव ही है. तमाम बहस, चर्चाओं में ये दर्शाया जा रहा है कि कहीं न कहीं मोदी कमजोर पड़ गए हैं, भाजपा का भ्रष्टाचार का मुद्दा जनता के बीच प्रभावी नहीं रहा है, राहुल जनता के बीच सशक्त होकर उभरे हैं, कांग्रेस की स्वीकार्यता जनता के बीच बढ़ी है. जो लोग भी राजनीति को सिर्फ शौकिया तौर पर ही समझने का प्रयास करते हैं या फिर राजनैतिक विश्लेषण करने में अपने पूर्वाग्रहों का सहारा लेते हैं उनके लिए किसी भी चुनावी परिणाम का सही से आकलन कर पाना आसान नहीं होता है. सम्बंधित चुनावी आकलन में उनका पूर्वाग्रह वास्तविकता पर हावी हो जाता है और अधिकतर ऐसे आकलन खुशफहमी के अलावा और कुछ नहीं होते.
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हमारे देश का राजनैतिक ढांचा जिस तरह का है, राजनीति का स्वरूप जिस तरह का है, मतदाताओं मानसिकता जिस तरह से मुद्दों-जाति-धर्म-क्षेत्रीयता के आधार पर बनती-बिगडती हों वहां की राजनीतिक हलचल का, चुनावी गतिविधि का आकलन कर पाना सहज काम नहीं होता है. इसके बाद भी यदि साधारण रूप में समझा जाए तो चुनावों के समय में राजनीति कुछ निश्चित बिन्दुओं के आसपास केन्द्रित होकर रह जाती है और उसी के अनुसार मतदाताओं का अपना व्यवहार बनने-बिगड़ने लगता है. इन बिन्दुओं में स्थानीय मुद्दे, क्षेत्रीय मुद्दे, राष्ट्रीय मुद्दे तो अपनी भूमिका निभाते ही निभाते हैं चुनाव विधानसभा का है अथवा लोकसभा का, सम्बंधित क्षेत्र के प्रत्याशियों की अपनी जन-स्वीकार्यता क्या है, किसी भी राजनैतिक दल की गतिविधियाँ और उनके नेताओं का चाल-चलन, सम्बंधित क्षेत्र/राज्य में राजनैतिक दलों के गठबंधन की स्थिति आदि को शामिल किया जा सकता है. इनके अलावा कुछ और भी बिंदु जाति, धर्म, क्षेत्र, व्यक्ति आदि को माना जा सकता है, इन सबके सम्मिलित स्वरूप के बाद ही मतदाता किसी भी दल की, प्रत्याशी की, मुद्दे की स्थिति को अर्श पर अथवा फर्श पर पहुँचाने का काम करते हैं.
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कर्नाटक विधानसभा चुनावों का आकलन करने के लिए इन चुनावों को किसी भी रूप में लोकसभा चुनावों की रिहर्सल अथवा सेमीफाइनल जैसा नहीं समझना चाहिए. विधानसभा चुनावों में मतदाता के सामने प्रदेश प्रमुखता से खड़ा दीखता है. उसके लिए मतदान करते समय सम्बंधित राज्य में राजनैतिक दलों की स्थिति, उसके क्रियाकलाप, प्रत्याशियों की अपनी व्यक्तिगत प्रस्थिति प्रमुख होती है. कर्नाटक चुनावों में वहां के मतदाताओं के लिए न तो मोदी प्रमुखता में रहे होंगे और न ही राहुल. जिस तरह से राष्ट्रीय स्तर पर घनघोर भ्रष्टाचार के बाद भी वहां के मतदाताओं द्वारा कांग्रेस को पूर्णबहुमत प्रदान किया है उससे साफ़ जाहिर होता है कि मतदाताओं ने प्रदेश स्तर पर भाजपा-कांग्रेस को तौलकर सत्ता प्रदान की है. भाजपा ने अपने भ्रष्ट मंत्री को बाहर का रास्ता दिखाकर भले ही कर्नाटक की जनता में स्वच्छ छवि का सन्देश देने का प्रयास किया था किन्तु राज्य में भाजपा के अन्य मंत्रियों-विधायकों के कारनामों ने उस सन्देश को जनता के बीच स्वीकार्य नहीं बनाया. कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणामों को देखकर भले ही ये कहा जाये कि वहां की जनता ने भाजपा के प्रादेशिक भ्रष्टाचार के ऊपर कांग्रेस के राष्ट्रीय भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया है किन्तु इसके पूर्व उस राज्य में कांग्रेस और भाजपा के साथ-साथ अन्य प्रभावी दलों का तुलनात्मक अध्ययन करना होगा; इन दलों के प्रत्याशियों की प्रस्थिति, उनके कार्यों का भी आकलन करना होगा.
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इस स्थिति को जाने-पहचाने बिना हार-जीत का आकलन पूरी गंभीरता से रखना कहीं न कहीं वास्तविकता से मुंह मोड़ना ही होगा. जो लोग सिर्फ कांग्रेस-भाजपा, मोदी-राहुल के नाम पर प्रभावित-दिग्भ्रमित होकर अपने-अपने अनुमान-आकलन दे रहे हैं उन्हें ऐसा करके खुशफहमी में रहने दिया जाए और जो लोग वाकई राजनैतिक विश्लेषण में रुचि रखते हैं, राजनैतिक विश्लेषण को शोधपरक अध्ययन मानते हैं वे कर्नाटक की वास्तविकता को जांचने-परखने के बाद ही अपना गंभीर और वास्तविकता के करीब आकलन प्रस्तुत करेंगे. ऐसे ही आकलन राजनीति के अध्ययन की पहचान होते हैं, राजनैतिक विश्लेषण को स्वीकार्य बनाते हैं और देश की राजनैतिक स्थिति का सही-सही अनुमान, पूर्वानुमान, आकलन, परिणाम बताते हैं. आज के विभ्रम भरे दौर में ऐसे ही अध्ययन, विश्लेषण, आकलन की आवश्यकता है.

Tuesday, May 14, 2013

क्या सत्ता परिवर्तन के बाद सुधरेगा पाकिस्तान ?

वर्ष 1999 में नवाज शरीफ के हाथ से सत्ता छीन लेने के बाद तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान में सेना का तानाशाही राज स्थापित किया था। यह वो समय था जब पहले से ही अपने अस्तित्व और वैश्विक पहचान सुधारने की कोशिशों में लगे पाकिस्तान को एक ऐसा झटका लगा जिससे वह आज तक उभर नहीं पाया। सत्ता सेना के हाथ में चले जाने के बाद मुल्क की तकदीर जो शायद बदल सकती थी वह गर्त की खाई में जाती रही। पाकिस्तान की आवाम तो शुरुआती समय से ही ध्वस्त अर्थव्यवस्थाए भ्रष्टाचार और दिनोंदिन मजबूत होते तालिबान से जूझ रही है लेकिन इस मुल्क की वजह से बाहरी देशों में भय और आतंकवाद का जो माहौल बना हुआ है उसकी वजह से वैश्विक पटल पर भी पाकिस्तान पर आतंकवादी राष्ट्र होने का ऐसा दाग लगा जिसे आज तक धोया नहीं जा सका है। भारत का पड़ोसी मुल्क होने के कारण पाकिस्तान की नकारात्मक गतिविधियों का प्रभाव भी सबसे ज्यादा भारत पर ही पड़ा। आतंकवाद का गढ़ बन चुका पाकिस्तान हर संभव प्रयास कर भारत में आतंकवादी घुसपैठ करवाता रहाए जिसके परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान के संबंध कभी अच्छे नहीं बन पाए।

लेकिन अब शायद पाकिस्तान की तकदीर उस पर मेहरबान होने जा रही है क्योंकि पाकिस्तान की जनता ने तानशाही का अंत कर लोकतांत्रिक तरीके से सरकार का चुनाव किया है और इस चुनाव में जीत दर्ज कर एक बार फिर वही नवाज शरीफ सत्ता में वापसी कर रहे हैं जिसे कभी मुशर्रफ ने गद्दी से गिराकर फांसी की सजा सुनाई थी। गठबंधन सरकार बनाकर नवाज शरीफ तीसरी बार पाकिस्तान की गद्दी संभालने जा रहे हैं। नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही जहां कुछ बुद्धिजीवी ऐसी उम्मीद कर रहे हैं कि शायद अब पाकिस्तान की भीतरी और बाहरी गतिविधियां नियंत्रित होंगी जिसके परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सुधरेंगे वहीं कुछ इसे मात्र एक कल्पना मान रहे हैंए क्योंकि उनका मानना है कि अभी भी उस मुल्क पर कट्टरपंथ पूरी तरह प्रभावी है जो उसे अन्य देशों के साथ संबंध सुधार की कवायद को प्रभावित करेगा।

पाकिस्तान के इस सत्ता परिवर्तन के बाद महत्वपूर्ण सुधारों की उम्मीद कर रहा वर्ग इस बात की पैरवी करता है कि नवाज शरीफ 13 वर्ष के इस अंतराल के बाद परिपक्व नेता के तौर पर देश के बाहरी और अंदरूनी गतिविधियों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए तैयार हैं। कारगिल युद्ध के समय भी पीएमएल.एन के नेता और पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का कहना था कि उन्हें कारगिल युद्ध के बारे में भनक भी नहीं थीए वह इस बात से पूरी तरह बेखबर थे कि पाकिस्तान की सेना ने भारतीय सेना के साथ युद्ध छेड़ दिया है। जाहिर है वह भारत के साथ युद्ध कर संबंध और नहीं बिगाड़ना चाहते थे और अब जब पाकिस्तान की सत्ता पर फिर एक बार नवाज शरीफ का राज स्थापित होने वाला है तो भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध सुधार जैसी उम्मीद की जा सकती है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान की लगभग अधिकांश जनता ऐसी है जिसका किसी ना किसी तरह से संबंध भारत से हैए इसीलिए राजनैतिक संबंध के साथ.साथ जमीनी स्तर पर भी बहुत हद तक संभव है कि पाकिस्तानए भारत के साथ संबंध सुधारे। नवाज शरीफ अपनी गलतियों से सबक लेकर सत्ता संभालने जा रहे हैं इसीलिए अब उनसे ऐसे किसी कदम की अपेक्षा नहीं है जिससे उनके संबंध पड़ोसी मुल्कों के साथ बिगड़ें। सेना की तानाशाही में उन्होंने पाकिस्तान के बिगड़ते हालातों और देश की जनता की त्रासदी को बहुत करीब से देखा है इसीलिए उम्मीद है कि वो ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे जिसकी वजह से हालात बद से बदतर हो जाएं।

वहीं दूसरी ओर वह वर्ग जो नवाज शरीफ की कार्यप्रणाली और भविष्यगत योजनाओं पर ज्यादा विश्वास नहीं कर रहा हैए का कहना है कि इस बदलाव से पाकिस्तान और भारत के संबंध में सुधार की उम्मीद करना खुद को भ्रमित करने जैसा है। पाकिस्तान की ओर से हमेशा से ही पहले आश्वासन दिए जाते हैं और उसके बाद पीठ पर छुरा घोंपा जाता है। पाकिस्तान के इतिहास पर नजर डाली जाए तो ऐसे कई उदाहरण मिल जाते हैं जब पहले दोस्ती का हाथ बढ़ाकर दगा दिया गया है। नवाज शरीफ पहली बार गद्दी संभालने नहीं जा रहे बल्कि यह उनका तीसरा कार्यकाल होगा। जब पहले वे मुल्क के सरताज थे तब भी भारत के साथ पाक के संबंधों में किसी प्रकार का सुधार नहीं था इसीलिए अब भी उनसे कोई अपेक्षा नहीं रखी जानी चाहिए। इस वर्ग में शामिल बुद्धिजीवियों का यह भी कहना है कि भले ही नवाज शरीफ भारत.पाकिस्तान के संबंध सुधारने की कोशिश करें लेकिन पाकिस्तान में व्याप्त कट्टरपंथ इन कोशिशों को साकार होने ही नहीं देगा।

पाकिस्तान में हुए इस सत्ता परिवर्तन के बाद भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों में होने वाले बदलावों से संबंधित दोनों पक्षों पर गौर करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैंए जैसेर
1 नवाज शरीफ सत्ता की कमान फिर एक बार संभालने जा रहे हैंए उनकी पूर्व की कार्यप्रणालीए प्राथमिकताएं और निर्णय क्षमता का आंकलन कर क्या इस बार सुधार की उम्मीद की जा सकती है
2 नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री बनने से भारत और पाकिस्तान के संबंध किस हद तक प्रभावित होंगे
3 भारतीय प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भारत आने का न्यौता दे चुके हैंए क्या हमारी यह पहल हमेशा की तरह हमारे लिए ही तो घातक सिद्ध नहीं होगी
4 पाकिस्तान में कट्टरपंथी गुट क्या पड़ोसी देशों के साथ संबंध सुधार की कोशिशें सफल होने देंगे

क्या ड्रैगन के आगे घुटने टेक रही है भारत सरकार ?

15 अप्रैल को चीनी सेना ने भारतीय नियंत्रण सीमा में लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में 19 किमी भीतर घुसपैठ करते हुए अपने पाँच तम्बू गाड़ दिये थे, परिणामस्वरूप सीमा के दोनों ओर लगभग बीस दिनों तक एक गहरे तनाव का वातावरण बना रहा। कई दौर की बातचीत एवं सुलह-समझौतों के बाद भले ही चीनी सेना वापस अपनी सीमा में चली गई हो लेकिन इसे भारत की किसी बड़ी जीत अथवा कूटनीतिक सफलता के रूप में जल्दबाज़ी में परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए। एक ऐसी कल्पित सफलता, जिसमें हमें कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, पर उल्लास के स्थान के पर समय मंथन व चिंतन का है कि आखिर ऐसी स्थिति उत्पन्न ही क्यों हुई.? इसके लिए तात्कालिक ही नहीं पुरानी कूटनीतिक व रणनीतिक असफलताओं व चूकों पर भी ईमानदारी से विचार होना चाहिए।

भारतीय सीमा में 19 किमी चीनी घुसपैठ न चीन की उद्देश्यहीन चूक थी और न ही 20-25 किमी के भारतीय परिक्षेत्र को हड़पने का प्रयास.! भारतीय नीतिकार भले ही चीनी सेना की वापसी पर अपनी पीठ ठोंक लें किन्तु सच्चाई यह है कि चीन वह अपने साथ ले जा चुका है जो वो लेने आया था। 15 अप्रैल को चीन भारत के दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र में घुसा था और सूचना होते ही 16 अप्रैल को भारत ने अपना विरोध दर्ज कराते हुए चीन से सेना वापसी की मांग कर डाली थी। 18 अप्रैल को दोनों देशों की सेनाओं के बींच हुई पहली फ्लैग मीटिंग निष्कर्षहीन रही। इसके बाद की सभी फ्लैग मीटिंग से भी कोई रास्ता नहीं निकल सका। मान्य सीमा के 19 किमी एक ऐसे देश की सेना की घुसपैठ जिसके साथ सीमा को लेकर हमारा कड़वा अनुभव रहा है निश्चित रूप से एक सामान्य घटना नहीं थी जिसकी उपेक्षा की जा सकती हो, देश के भीतर फैला व्यापक जनाक्रोश इस घटनाक्रम की संवेदनशीलता को व्यक्त करने के पर्याप्त था। राष्ट्र की संप्रभुता, जिसे कि भारतीय संविधान ने अपनी भावना के भीतर स्थान दिया है, राष्ट्र की आत्मा का सर्वोच्च व सर्व-प्राथमिक प्रश्न है। किन्तु दुर्भाग्य से भारत सरकार ने आश्चर्य व विडम्बनापूर्ण तरीके से चीन के सुर में सुर मिलाते हुए 20 अप्रैल को इस गंभीर मसले को स्थानीय समस्या कहकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया। जनता, विपक्ष व मीडिया के घोर दबाब के बावजूद सरकार घुसपैठ को महत्व न देते हुए 2 मई तक विदेश मंत्री की चीन यात्रा को सुनिर्धारित बताती रही। सीमा सुरक्षा जैसे एक गंभीरतम विषय पर सरकार के ऐसे लचर, लाचार, जनभावना विरोधी व कूटनीति से मीलों दूर कदम इतिहास में चूक के रूप में नहीं वरन घोर मूर्खता के रूप में अंकित किए जाते हैं! यही कारण है कि हमें आज फिर पलटकर इतिहास की ओर देखने की देखने व सीखने की आवश्यकता है।
 
1962 के युद्ध में मिली शर्मनाक हार नेहरू व उनके सहयोगियों की ऐसी ही मूर्खता का परिणाम थी जिसमें भारत को अपना लगभग 38,000 वर्ग किमी क्षेत्र चीन के हाथों गंवाना पड़ा था। किन्तु चीन का भारत के प्रति कुटिलतापूर्ण रवैया 1962 के बाद भी जारी रहा, और निःसन्देह अधिकांश मौकों पर भारत की लचर नीतियाँ भी! 1962 की पराजय के बाद भारत लंबे समय तक कोई प्रतिक्रिया देने अथवा दबाब बनाने की स्थिति में ही नहीं था अतः इन परिस्थितियों में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 1988 में किया गया चीन का दौरा एक सकारात्मक शुरुआत थी जोकि नेहरू द्वारा किए गए अनर्थ की भरपाई के लिए एकमात्र कदम हो सकता था। परिणामस्वरूप दोनों देशों ने सीमा संबंधी समस्या को नए सिरे से स्वीकारा और समाधान के लिए प्रतिबद्धता जताई। 1991 में चीनी प्रधानमंत्री ने भी भारत यात्रा की और सीमा समस्या को सुलझाने की बात दोहराई गई।

 किन्तु भारत-चीन सम्बन्धों में वास्तविक प्रगति नरसिम्हा राव के कार्यकाल में हुई और 1993 में दोनों देशों ने सीमा पर शांति बनाए रखने के समझौते पर हस्ताक्षर किए और विशेषज्ञों के एक समूह को संभावित समाधान तलाशने के लिए नियुक्त किया गया। परिणामस्वरूप आगे पूर्वोत्तर सीमा पर कई पोस्टों से दोनों देशों की सेना हटाये जाने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय हुए। यह प्रगति एक प्रारम्भ मात्र थी जिसे किसी सफलता के रूप में नहीं वरन सफलता प्राप्ति के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए था जिसके द्वारा एक एक करके भारत के हित साधे जा सकते थे, दुर्भाग्य से भारतीय नीतिनिर्धारक ऐसा नहीं कर सके। किन्तु चीन बखूबी जानता था कि उसे भारत से क्या चाहिए और तीन दशकों से ठंडे पड़े रिश्तों की नयी शुरुआत को अपने फायदे के लिए बखूबी प्रयोग किया।

चीन ने भारत के साथ रिश्तों को सामान्य करने की आड़ में दो बड़े व महत्वपूर्ण हित साधे; पहला व्यापारिक व दूसरा सीमा संबंधी। व्यापार के क्षेत्र में जहां चीन ने भारत को अपने बाज़ार के रूप में छोटे बड़े सामानों से पाट दिया और अरबों डॉलर का शुद्ध लाभ अपने विकास के लिए निकाला वहीं भारत निर्यात के मामले में पूर्णतः असंतुलित व्यापार की चपेट में है। सीमा विवाद के मुद्दे पर भी भारत सभी सौदों में घाटे में ही रहा है। उदाहरण के लिए कश्मीर के अक्साई चिन मसले पर भारत वहीं खड़ा है किन्तु चीन अरुणाचल प्रदेश पर लगातार दबाब बढ़ाता जा रहा है। 1993 की शुरुआत के एक दशक बाद भी सीमा विवाद पर भारत अपने किसी भी दावे को मजबूत नहीं कर सका, यद्यपि चीन द्वारा कब्जे में लिए गए कैलाश मानसरोवर को तीर्थयात्रा के लिए अवश्य खोला गया। 2003 में एक बार फिर भारत-चीन संबंधों में एक नई शुरुआत देखने को मिली और विशेष प्रतिनिधियों के स्तर पर वार्ताएं आयोजित हुईं और परिणामस्वरूप चीन ने पहली बार सिक्किम को भारतीय प्रदेश स्वीकारते हुए भारत के मानचित्र में दिखाया। 

किन्तु भारत ने इसके लिए एक बड़ी कूटनीतिक कीमत चुकाई और तिब्बत को चीन का अभिन्न भाग स्वीकार कर लिया। निश्चित रूप से यह बड़े घाटे का सौदा नहीं होता यदि भारत सरकार सिक्किम के साथ साथ कम से कम अरुणाचल प्रदेश और केंद्रीय सैक्टर के क्षेत्रों, जोकि भारतीय नियंत्रण में ही हैं, को भारतीय क्षेत्र स्वीकार करवा लेती। फिर हम वेस्टर्न सैक्टर मे चीनी अधिकृत भारतीय क्षेत्र को विवाद और समझौते का केंद्र बना सकते थे। किन्तु यही पूरे इतिहास में भारतीय पक्ष की सबसे बड़ी कूटनीतिक असफलता रही है कि भारत ने समझौता उस पर किया जो उसका अपना है और उसके नियंत्रण में भी है, और वह भी अधूरा समझौता! इस तरह चीन को भारतीय पक्ष ने अपने आप बढ़त व दबाब बनाने की स्थिति में पहुंचा दिया। इसी गलती को भारत ने 2013 में फिर दौलत बेग ओल्डी में दोहराया है।

भारत सरकार भले ही मुंह चुराने के लिए स्थिति साफ नहीं कर रही हो किन्तु जितना अब तक स्पष्ट हो सका है उसके आधार पर चीनी सेना के भारतीय क्षेत्र से हटने के लिए भारत को चीन की मांगों के सामने घुटने टेकने पड़े। भारतीय सीमा में सेना की चुमार पोस्ट को खाली करने व वहाँ बनाए गए बंकर हटाने के लिए भारत को तैयार होना पड़ा। चुमार भारतीय सैन्य दृष्टिकोण अत्यधिक महत्वपूर्ण पोस्ट है जहां से काराकोरम के उस पार चीन द्वारा बनाए गए हाइवेज़ पर चीनी सेना की गतिविधि पर नजर रखी जा सकती है किन्तु चीन अपने क्षेत्र से इस ओर नहीं देख पाता। यह पोस्ट पीपल्स लिबरेशन आर्मी को अत्यधिक खटक रही थी। इसी तरह सम्पूर्ण भारतीय सीमा पर सैन्य दृष्टि से विशाल इनफ्रास्ट्रक्चर बना चुके चीन को पिछले तीन चार सालों से भारतीय सेना द्वारा बनाई जा रही सड़कों व हवाईपट्टियों पर गहरी आपत्ति है।

भारत ने यदि चीन की शर्तों को मानते हुए ऐसे कुछ भी समझौते किए हैं तो निश्चित रूप से उसने भविष्य के लिए चीन को ऐसी घुसपैठों व अन्य समानान्तर तरीकों से भारत को मजबूर करने का निमंत्रण दे दिया है। मैंने लिखा कि चीन जिस उद्देश्य के लिए दौलत बेग ओल्डी में घुसा उसे वह पाकर निकला है। पहला; भारत के प्रतिरोधहीन लचर नेतृत्व की कलई खोलकर चीन ने न सिर्फ भारतीय पक्ष पर अपना दबाब स्पष्ट कर दिया वरन भारत को मजबूर कर मनमुताबिक सौदेबाजी का एक और रास्ता खोज निकाला है, दूसरा; चुमार जैसी रणनीतिक पोस्ट को खाली कराने में सफलता प्राप्त करने के साथ साथ भारत को ऐसे किसी निर्माण के विरुद्ध चेतावनी दे दी है, तीसरा; बिना किसी सैन्य कार्यवाही के भारतीय सेना को अपने ही क्षेत्र से पीछे हटने को मजबूर कर भारतीय नियंत्रण वाले क्षेत्र को विवादित चित्रित करने में सफलता पा ली है। 

अब भविष्य में जब कभी भारत अक्साइ चिन की बात उठाएगा चीन भारत के इस क्षेत्र पर ही सवाल उठाकर उसे रक्षात्मक भूमिका में आने को मजबूर करेगा। यही चीन की रणनीति रही है और इसी के तहत भारत को दबाब में लाने के लिए उसकी ओर से भारतीय सीमा में घुसपैठ होती है, अरुणाचल प्रदेश के सरकारी अधिकारी को वीजा देने से इन्कार किया जाता है, कश्मीर को विवादित क्षेत्र बताकर स्टेपल वीजा जारी किया जाता है, भारतीय सेना के अधिकारी जनरल जसवाल को वीजा देने से इन्कार किया जाता है और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अरुणाचल प्रदेश यात्रा का चीन यह कहकर विरोध करता है कि भारतीय प्रधानमंत्री चीनी क्षेत्र में अनाधिकृत प्रवेश कर रहे हैं। इन सब के बाद भी भारत सरकार सख्त संदेश तक देने की हिम्मत नहीं जुटा पाती, उल्टे ब्रह्मपुत्र पर चीन द्वारा बांध बनाने जैसे गंभीर मुद्दे पर लंबे समय तक देश की जानता को ही गुमराह करके रखती है!

1962 से लेकर 2013 तक एक के बाद एक की गई गलतियों के बाद भारत के पास सीमित विकल्प बचे हैं और उन सभी विकल्पों के लिए प्रबुद्ध कूटनीति व निर्णायक इच्छाशक्ति वाले नेतृत्व की आवश्यकता है। सबसे पहले भारत को स्पष्ट कर देना चाहिए कि यदि चीन अरुणाचल प्रदेश समेत भारत के किसी भी हिस्से पर सवाल उठाता है तो भारत तिब्बत पर अपने रुख पर पुनर्विचार करने के लिए विवश होगा। दूसरा, चीन के किसी अतिक्रमण या घुड़की के जबाब में सरकार को चीनी दोस्ती का नेहरू राग अलापना बंद करके दृढ़ता से देश की जानता को आश्वासन देना चाहिए कि भारत परमाणु शक्ति सम्पन्न देश है और किसी भी स्थिति में देश की सीमाओं की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है ताकि चीन तक भारत के सख्त रुख का संदेश जाए। इसके अतिरिक्त जापान सहित पूर्वोत्तर के वियतनाम जैसे उन सभी देशों के साथ सम्बन्धों को वरीयता से सुदृढ़ करना चाहिए व उनकी चीन विरोधी स्थिति को उसी प्रकार भुनाना चाहिए जैसे चीन पाकिस्तान में करता है।

 वर्तमान में ईरान व उत्तर कोरिया जैसे मुद्दों पर अमेरिका इस्राइल आदि के साथ कूटनीतिक तरीकों से चीन को विपरीत ध्रुव पर पहुंचाना चाहिए व उसकी वर्तमान स्थिति को भुनाना चाहिए। साथ ही रूस के सम्बन्धों को समानान्तर तरीके से मजबूत करना होगा। इसके अतिरिक्त सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, सैन्य आत्मनिर्भरता व व्यापार। व्यापार में 2011-12 में भारत का चीन को मात्र निर्यात 17.90 अरब अमेरिकी डॉलर रहा जबकि चीन ने भारत को 57.55 अरब अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया। इस वर्ष भारत के निर्यात में 19.6% की तीव्र कमी हुई। हम चीन को खनिज, दुर्लभ मृदा तत्व व कॉटन आदि कच्चा माल बेंचते हैं और बदले में सजावट से लेकर मशीन तक बना बनाया माल खरीदते हैं। इस असंतुलन को न सिर्फ हमें पाटना होगा वरन यह समझते हुए कि भारतीय बाज़ार चीन की बड़ी आर्थिक ताकत है और चीन इसे खोना कभी नहीं चाहेगा। 

अतः चीन के किसी भी अवांछनीय कदम उठाते ही हमें इस बात का दृढ़ संदेश देना चाहिए कि यदि सीमा संबंधी भारतीय हितों पर आंच आती है तो ऐसे में चीन के साथ व्यापारिक संबंध बिलकुल कायम नहीं रखे जा सकते! चीन को होने वाला भारतीय अधिकांश निर्यात दुर्लभ मृदा तत्व जैसे कच्चे माल का है जिसके लिए भारत के पास और भी बाज़ार हैं जिन्हें भारत को जापान आदि में तलाशना चाहिए। आवश्यकता तो यह है कि व्यापार के दांव को भारत चीन अधिकृत कश्मीर के लिए भी सफलतापूर्वक प्रयोग करे लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि भारत सैन्य व व्यापारिक दोनों रूप से आत्मनिर्भर बने। निश्चित रूप से ये कूटनीतिक तीर भारत के तरकश में अभी भी बचे हुए हैं लेकिन प्रश्न यह है कि वो धनुर्धर अभी हमारे पास कहाँ है जो इनका सधा प्रयोग कर सके। वैश्विक राजनीति में हर कूटनीतिक तीर का या तो आपको लाभ उठाना आना चाहिए अन्यथा उसी से आप क्षति भुगतने के लिए तैयार रहें।

Monday, May 13, 2013

मेरे पास सिर्फ माँ है !

दुनिया ही क्या समूची सृष्टि में मां को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। पशु-पक्षी जगत से लेकर मानव जगत में मां की महिमा अपरंपार है। सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को जन्म देने वाली मां को विश्‍व की समस्त संस्कृतियों में सबसे बड़ा दर्जा दिया गया है। भारत में तो मातृ पूजा हजारों साल से चली आ रही है। हम तो धरती को भी मां के रूप में पूजते हैं। दरअसल जिन स्थानों पर मनुष्य का जीवन भोजन के लिए प्रकृति पर अधिक निर्भर रहा, वहां के लोगों ने स्त्री की उर्वरता, पोषण की सामर्थ्य, ममता और सृजनात्मकता को नमन करते हुए मातृशक्ति की कल्पना की। माँ, समूची धरती पर बस यही एक रिश्ता है जिसमें कोई छल कपट नहीं होता। कोई स्वार्थ, कोई प्रदूषण नहीं होता। इस एक रिश्ते में निहित है अनंत गहराई लिए छलछलाता ममता का सागर। शीतल, मीठी और सुगंधित बयार का कोमल अहसास। इस रिश्‍ते की गुदगुदाती गोद में ऐसी अनुभूति छुपी है मानों नर्म-नाजुक हरी ठंडी दूब की भावभीनी बगिया में सोए हों। माँ, इस एक शब्द को सुनने के लिए नारी अपने समस्त अस्तित्व को दाँव पर लगाने को तैयार हो जाती है। नारी अपनी संतान को एक बार जन्म देती है। लेकिन गर्भ की अबोली आहट से लेकर उसके जन्म लेने तक वह कितने ही रूपों में जन्म लेती है। यानी एक शिशु के जन्म के साथ ही स्त्री के अनेक खूबसूरत रूपों का भी जन्म होता है। ‘माँ’ शब्द की पवित्रता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि हिन्दू धर्म में देवियों को माँ कहकर पुकारते है। बेटी या बहन के संबोधनों से नहीं। मदर मैरी और बीवी फातिमा का ईसाई और मुस्लिम धर्म में विशिष्ट स्थान है।

नारी जननी है, जो अपने एक संतति को जन्म देने के लिए लाखों शारीरिक और मानसिक कष्टों का सामना करती है। एक संतान को जन्म देने से पहले और उसके जन्म के बाद अपना जीवन, खुशियां उसी के नाम कर देती है। अपना खून (दूध) पिलाकर बच्चे को पोषित करती है। भावी पीढ़ी में नैतिकता के बीज बोती है। महान लेखक मैरी मैक्लॉयड ने कहा है कि किसी नस्ल का सच्चा मूल्य उसके नारीत्व के लक्षण से मापा जाना चाहिए। नारी ही इस समाज का प्रारंभिक गुरु है। वही अपने संस्कार, सोच, विचार, भाषा आदि अगली पीड़ी को निशुल्क उपलब्ध कराती है। एक सच्ची मार्गदर्शिका बन कर अपने परिवार को, समाज को सुख और उन्नति की राह पर अग्रसर करती है। माँ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए एक दिवस नहीं एक सदी भी कम है। किसी ने सच ही कहा है ना कि सारे सागर की स्याही बना ली जाए और सारी धरती को कागज मान कर लिखा जाए तब भी माँ की महिमा नहीं लिखी जा सकती। भारत में जहां मां को शक्तिरूपा माना जाता है और गाय को उसका प्रतिरूप, वहीं ग्रीक संस्कृति में मां को गैया कहा जाता था।

 बौद्ध धर्म में तो भगवान बुद्ध के स्त्रीरूप में देवी तारा की महिमा गाई जाती है। रंग और विशेषताओं के अनुसार देवी तारा के दर्जनों रूपों की पूजा की जाती है। यहूदियों की बाइबिल के अनुसार कुल 55 पैगंबर धरती पर आए उनमें से 7 स्त्रियां थीं। ईसाई समुदाय में तो मदर मैरी की महिमा का लंबा इतिहास है और प्रभु यीशु की माता को सर्वोपरि माना गया है। यूरोप के कई देशों में, खास तौर पर ब्रिटेन और आयरलैंड में तथा पुराने ब्रिटिश उपनिवेशी देशों में मदरिंग सण्डे मनाने की परंपरा आज भी विद्यमान है। वैसे अगर गौर से देखा जाए तो दुनिया के विभिन्न धर्मों में बहुत से ऐसे ईश्‍वर या देवदूत हुए हैं, जिन्हें मां ने ईश्‍वरीय इच्छा के लिए जन्म दिया, फिर वो चाहे राम हों, कृष्ण हों, ईसा मसीह हों, भगवान महावीर हों अथवा गणेश। इस्लाम में मां को बहुत उच्च स्थान दिया गया है। पैगंबर मोहम्मद साहेब का कहना था कि जन्नत का दरवाजा मां के कदमों में है। अर्थात्‌ जिसने मां को नाराज किया या दुख पहुंचाया तो ऐसे इंसान को जन्नत में जगह नहीं मिलती। एक बार एक व्यक्ति ने पैगंबर मोहम्मद साहेब से पूछा कि हे खुदा के पैगंबर, मुझे समझाओ कि मैं किसके प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करूं? मोहम्मद साहेब ने कहा, ‘तुम्हारी मां।’ व्यक्ति ने फिर पूछा, ‘इसके बाद?’ मोहम्मद साहेब ने कहा, ‘तुम्हारी मां।’ उस आदमी ने फिर से पूछा, ‘इसके बाद?’ मोहम्मद साहेब ने कहा, ‘तुम्हारी मां।’ बंदे ने चौथी बार पूछा, ‘और उसके बाद?’ मोहम्मद साहेब ने कहा, ‘अपने पिता के प्रति।’ इस्लामी देशों में मोहम्मद साहेब की बेटी फातिमा के जन्मदिन को मातृत्व का दिवस माना जाता है। बहुत से अरब देशों में 21 मार्च को मातृदिवस मनाया जाता है।

वर्तमान समय की नारी जागरूक व शिक्षित है। आज वह सुशिक्षित होकर अपने जीवन को सार्थक करना चाहती है। इसके लिए वह अपनी इच्छानुसार कार्य चुनती है और उसे पूर्ण समर्पण, निष्ठा एवं तन्मयता से करती है। मां के पास दो आंखें नहीं वरन् चार आंखें होती हैं। उसका दिमाग दसों जगह दौड़ता है। मां व नारी एक ही समय में अनेक कार्यों को उत्कृष्ट तरीके से कर सकती हैं। इसलिए आज नारी अधिकतर क्षेत्र में सफल है। अपने क्षेत्र में सफल होने के साथ ही वह एक मां भी है और इन सबके साथ मां की भूमिका को न सिर्फ अच्छी तरह से बल्कि सर्वश्रेष्ठ तरीके से निभा रही है। शिक्षित होने के कारण वह विश्व में घट रही सभी घटनाओं व परिवर्तनों से वाकिफ है। बच्चों को किस उम्र में क्या शिक्षा देनी है, वह जानती है। आज अनेक सफल मांएं ऐसी हैं जो स्वयं तो अपने कार्यक्षेत्र में सफल हैं ही ,उनके बच्चे भी अपने कार्यक्षेत्र में सफलता के परचम फहरा रहे हैं । मां के त्याग, संघर्ष, ममता व प्रेम के बिना बच्चों की सफलता असंभव है। मां की पोशाक बदलने से उसका स्वभाव, ममता व प्रेम नहीं बदला। आज मां साड़ी, सूट-सलवार, स्कर्ट या जींस कुछ भी पहने लेकिन उसके सीने में मां की तड़प, उसकी ममता, वैसा प्रेम और दुलार आज भी बरकरार है।

‘माँ’ की ममता और उसके आँचल की महिमा का को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। नौ महीने तक गर्भ में रखना, प्रसव पीड़ा झेलना, स्तनपान करवाना, रात-रात भर बच्चे के लिए जागना, खुद गीले में रहकर बच्चे को सूखे में रखना, मीठी-मीठी लोरियां सुनाना, ममता के आंचल में छुपाए रखना, तोतली जुबान में संवाद व अटखेलियां करना, पुलकित हो उठना, ऊंगली पकड़कर चलना सिखाना, प्यार से डांटना-फटकारना, रूठना-मनाना, दूध-दही-मक्खन का लाड़-लड़ाकर खिलाना-पिलाना, बच्चे के लिए अच्छे-अच्छे सपने बुनना, बच्चे की रक्षा के लिए बड़ी से बड़ी चुनौती का डटकर सामना करना और बड़े होने पर भी वही मासूमियत और कोमलता भरा व्यवहार…..ये सब ही तो हर ‘माँ’ की मूल पहचान है। इस सृष्टि के हर जीव और जन्तु की ‘माँ’ की यही मूल पहचान है। हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब ‘माँ’ की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी ‘माँ’ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बावजूद ‘माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनंत महिमा को आज तक कोई शब्दों में नहीं पिरो पाया है।

हमारे देश भारत में ‘माँ’ को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है और वेदों में ‘माँ’ को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम ‘माँ’ के रूप में की उद्बोधित किया गया है:  मशहूर फ़िल्मकार यश चोपड़ा की दीवार 1975 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है । यश चोपड़ा निर्मित दीवार हिन्दी सिनेमा की सबसे सफलतम फिल्मों मे से है जिसने अमिताभ के “एंग्री यंग मैन” के खिताब को स्थापित कर दिया। इस फिल्म ने अमिताभ के करियर को नयी बुलंदियों पर पहुँचा दिया। इस फिल्म के ज्यादातर हिस्से में अमिताभ बच्चन का अभिनय जबर्दस्त रहा था मगर फिल्म का वह हिस्सा जहाँ शशि कपूर अमिताभ बच्चन से कहते हैं “मेरे पास माँ है ” आज तक हिंदी सिनेमा के सबसे बढ़िया संवादों में माना जाता है ।इस एक संवाद में ही शशि कपूर ने दर्शकों की वाहवाही लूटी थी । बहुत खुशनसीब होते हैं वह लोग जिनके पास उनकी माँ होती है।धरती पर ईश्वर का दूसरा रूप माँ में है ।एक जमाना था, जब श्रवण कुमार जैसे पुत्र ने अपने अंधे माता-पिता की सेवा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। आधुनिक श्रवण कुमार आधुनिकता के आकर्षण में धन कमाने की अंधीदौड़ में वृद्ध माता-पिता को जीवन के अंतिम दौर में अकेले रहने को विवश कर रहे हैं। माता-पिता की छाया में ही जीवन सँवरता है। माता-पिता, जो निःस्वार्थ भावना की मूर्ति हैं, वे संतान को ममता, त्याग, परोपकार, स्नेह, जीवन जीने की कला सिखाते हैं।

आज आधुनिकता और पैसे कमाने की दौड़ में लोग अपने माँ -बाप को बोझ समझने लगे हैं ।आजकल एकल परिवारों के चलते परिवार विघटित हो रहे हैं ।पर जो लोग अपने माँ-बाप की सेवा करते हैं उनका मान-सम्मान करते हैं उनसे ज्यादा सुखी व्यक्ति दुनिया में कोई नहीं हो सकता है। हमारे समाज में हर बात को महत्व देने के लिए 365 दिनों में से सिर्फ ‘एक दिन’ तय कर दिया गया हैं, पर माँ को महत्व देने के लिए सिर्फ एक दिन काफी नहीं हैं। जिस तरह माँ की ममता और प्रेम ‘असीमित और नि:स्वार्थ’ है, उसी तरह माँ के लिए हर दिन एक महत्व लिए होना चाहिए, और सिर्फ दिन ही क्यों बल्कि हर क्षण वह हमारे लिए महत्वपूर्ण होनी चाहिए।

अगर हम भी बिना किसी स्वार्थ के उन्हें आदर देकर, माँ की ममता को भूले बिना और उनका हर सुख-दु:ख में साथ दें, तो अपना जीवन सार्थक बना सकते है।मां की अंगुली पकडक़र ही तो कई बार गिर-गिर और संभल कर हम चलना सीखते हैं। विफलताओं की ठोकर लगने पर मां के कोमल स्पर्श मात्र से शरीर में एक नई शक्ति का संचार हो जाता है। मगर कुछ मां ऐसी भी है जो बदनसीब हैं। क्या बीतती होगी उस माँ पर जिसने नौ महीने तक पेट में जिस बच्चे को पाला आज वह बूढ़ी मांओं का खर्च उठाने को तैयार नहीं है।यदि आपके पास भी माँ है तो दुनिया के सबसे सौभाग्यशाली व्यक्तियों में से एक है। अपने पास इस माँ रूपी ईश्वर को हमेशा साथ रखें।