Friday, April 19, 2013

हिन्दुओं का दर्द, जहा कदम कदम पर रोती है जिंदगी !

                                       देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान
                                               कितना बदल गया इनसान
                                 सूरज न बदला चांद न बदला ना बदला रे आसमान
                                             कितना बदल गया इनसान


हिन्दू शास्त्रों के अनुसार मानव जीवन कई कई योनियों के बाद संभव हो पाता हैए और ऐसा माना जाता है कि मानव ए भगवान् की सबसे सफल ए अशचार्यजनक और सबसे सम्रध रचना है ! अगर हम इस बात को मानते हैं तब हमें उस भगवान् का धन्यवाद भी करना चाहिए जिसने हमें इस रूप में दुनिया में भेजा है ! लोग धन्यवाद करते भी हैं पूजा पाठ करके ! भले ही विभिन्न रूप में करते हैं लेकिन करते तो हैं ! लेकिन क्या यही और इतना ही काफी है हम इंसान का रूप पाकर इस मद में अंधे हो जाते हैं और भगवान् द्वारा प्रदान करी गयी सुविधाओं का दुरूपयोग कर उन्हें कम करते जा रहे हैं  ! भगवान् भी कभी कभी अपनी इस रचना पर गर्व करने की बजाय दुःख करता होगा कि मैंने ये क्या कर दिया !

पिछले कुछ समय से इस तरह की घटनाएं विश्व भर में घटित हो रही हैं जो मन को अन्दर तक हिला देती हैं ! भारत में पाकिस्तान से आये कुछ हिन्दू भारतीय नागरिक बनना चाहते हैं क्यों क्योंकि पाकिस्तान में उनकी जान और माल की हिफाज़त का उन्हें कोई  भरोसा नहीं है ! उनकी लड़कियों और महिलाओं की इज्ज़त महफूज़ नहीं है ! क्या एक  राष्ट्र इतना कुत्सित हो सकता है कि वो अपने ही नागरिकों की हिफाज़त न कर सके अब कहाँ हैं इस्लाम की हिमायत करने वाले ठेकेदार  और ऐसा सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं जहां जहां मुस्लिम आबादी बाहुल्य में है वहां यही हालात  हैं !  असल में पाकिस्तान में हिन्दू ही नहीं बल्कि कोई भी सुरक्षित नहीं है ! क्या विश्व समुदाय को ये नहीं दीखता है घ् क्या कश्मीर में पल पल अपनी टांग अडाने वाले मानव अधिकार आयोग को पकिस्तान्ब की कारगुजारी समझ में नहीं आती है आप स्वयं समझ सकते हैं ! कश्मीर तो भारत का हिस्सा था वहां मुस्लिम अधिसंख्यक थे उन्होंने वहां से हिन्दुओं को भगा दिया तो पाकिस्तान से भगाने में  क्या दिक्कत रही होगी  भारत की सरकार पहले भी श्मूर्ति बनकर बैठी रही और आज भी बैठी है ! स्वीकार क्यों नहीं कर लेते कि  हम हिजड़ों की औलाद हैं हमारे बस का कुछ भी नहीं !

हमारे यहाँ  शाहरुख़ खान को कोई कुछ कह दे तो पाकिस्तानए  भारत में अल्पसंख्यकों की हिफाज़त का सवाल उठा  देता है लेकिन हमारे हिन्दू बिरादरी के लोग पाकिस्तान छोड़कर आ जाते हैं तो भी भारत  की सरका कुछ नहीं करती हिंदुस्तान की पहिचान कृष्णा और राम से है ये हमें समझना होगा ! हम धर्म निरपेक्ष है लेकिन हमारी संस्कृति भारतीय संस्कृति है हिन्दू संस्कृति  है ! हम पाकिस्तान जैसे असफल भूखे और आतंकवादी राष्ट्र से ये उम्मीद नहीं कर सकते कि वो अल्पसंख्यकों पर हो रहे जुल्मो सितम के खिलाफ कोई  कार्यवाही करेगा लेकिन हम विश्व समुदाय को आगाह कर सकते हैं कि  वो उस पर दबाव डाले ! पाकिस्तान से आये हिन्दू जब अपनी अपनी कहानी बयान करते हैं तब आँखों से आंसू आने लगते हैं कि क्या ऐसा भी हो सकता है क्या इंसान ऐसा भी कर सकता है इन कुछ हिन्दुओं की स्थिति को देखकर पाकिस्तान में रह रहे लगभग पच्चीस लाख हिन्दुओं की बेचारगी का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है कि वहां मानवता कैसे रहती होगी क्या इस्लाम इसकी इज़ाज़त देता है या सब कुछ बस इस्लाम ही है और मानवता कुछ भी नहीं कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे पाकिस्तान में इंसान नहीं हैवान बसते हैं !

मैं मानता हूँ कि वहां  भी कुछ इंसान है लेकिन उनकी हैवानों के सामने कोई औकात नहीं रही होगी ! मैं मानता हूँ कि  इस्लाम के सच्चे हितेषी भी वहां होंगे लेकिन कठमुल्लों के सामने उनकी हैसियत कमजोर रह गयी होगी लेकिन इस तरह तो मानवता ख़त्म हो जायेगी पता नहीं क्यूँ आज ऐसा लगता है धर्म मज़हब शायद इंसान से ज्यादा महत्वपूर्ण हो चला है ! और एशिया में तो शायद और भी ज्यादा ! खाड़ी  के कुछ  देशों में हर रोज़ के विस्फोट शायद एक दिन सभ्यता को ही नष्ट न कर दें ! पाकिस्तान और अफगानिस्तान में आपस में लड़ते झगड़ते तालिबान और कठमुल्ले शायद इंसान को वहां रहने ही नहीं देना चाहते ! ये शायद पाषाण  युग है ए जो जीतेगा वही जीएगा  ! बाकी को न जीने का हक़ है और न इस दुनिया में रहने का हक़ ! दुनिया को जंग का मैदान बना दिया है लोगों ने ! अगर कैसे भी दौनों  कोरिया अपनी अपनी बात पर अड़ गए  और कल को युद्ध हो जाए तब क्या होगा ए अनुमान लगाया जा सकता है आज इंसान शायद जंगली पशुओं से मुकाबला करना चाहता है कि  कौन जीतेगा और जो जीतेगा वो दूसरे  को मारेगा और उसका खून पिएगाए  उसका मांस खायेगा ! 

कभी श्री लंका में सिंहलीज़  तमिल हिन्दुओं का सफाया कर देना चाहते हैं तो कभी बंगला देश हमारे एहसानों के बदले हमारी कौन  को ही खतम कर देना चाहता है ! हालाँकि 100 करोड़ से ज्यादा और दुनिया भर में फैले हुए हिन्दुओं को इतनी आसानी से ख़त्म नहीं किया जा सकता ! वो दिन और थे जब हिन्दू लाचार था कायर था  !  हमारी सरकारें किसी मजबूरी से बंधी हो सकती हैं हम नहीं ! ये भी सत्य है कि  हिन्दू आज भी सहनशील है मानवता का पुजारी है और इसी वज़ह से वो हिंदुस्तान से गुलाम के रूप में जाकर मॉरिशस और फिजी में सत्ता तक पहुँचता है ए इसी वज़ह से माइक्रो सॉफ्ट जैसे संसथान में 40 प्रतिशत से ज्यादा अपना योगदान देता है ! तभी सुनीता विलियम्स और कल्पना चावला जैसे बेटियां उसके घर की शोभा बनती हैं ! तभी 34 प्रतिशत नासा के कर्मचारी  भारतीय और हिन्दू होते हैं ! इसीलिए ए क्योंकि हमारे लिए मानवता सर्वश्रेष्ठ है  धर्म नहीं !

हालाँकि ये मानव प्रवृति है कि  वो दुसरे को न तो खुश देख सकता है और न ही प्रसन्न ! भगवान् गौतम बुद्ध ने हमेशा अहिंसा  का  नारा  दिया किन्तु बुद्ध धर्म के अनुयायियों ने जिस तरह का कत्ले आम मचाया  हुआ है वो कहीं से भी इस धर्म की शिक्षाओं पर खरा नहीं उतरता ! श्री लंका में सिंहलीज़  लोगों ने प्रभाकरन के बहाने लाखों तमिलों का खून बहा दिया ये कैसा धर्म है भाई बर्मा में बोद्धों ने रिंगानिया समुदाय के मुस्लिमों को घरों में जिन्दा जला दिया ए ये कैसी धरम की शिक्षा है भाई ये कैसा धर्म है और आज भी यही सब चल रहा है ! मुझे नहीं मालूम कि  आज तक कभी किसी हिन्दू राजा  ने या हिन्दुओं ने दूसरे धर्म  के मानने वालों से कभी इस तरह का सलूक किया हो या देश से भगाया हो संभव है इतिहास में ऐसा कुछ हुआ हो लेकिन मैं नहीं जानता !

आज शायद दुनिया को कुछ लोग जितना खूबसूरत  बना देना चाहते हैं ए ये धर्मों के ठेकेदार उसी दुनिया को बदबूदार ए खतरनाक और कुरूप करने में लगे हुए हैं ! कल्पना करिए उन लोगों के बारे में उनकी जिंदगी के बारे में जो हर पल मौत को देखते होंगे ! जो हर पल अपनी बहन बेटियों की इज्ज़त लुट जाने के डर  से सहमे सहमे से रहते होंगे ! कल्पना करिए उन मासूमों की जिंदगी की जिनकी आँखों में सुनहरे कल के सपने होंगे और जिन्हें अनायास ही अकस्मात ही मौत अपने आगोश में ले लेती होगी ! जहां जिन्दगी पल पल और कदम कदम रोती  होगी  !  तो क्या ऐसा धर्म  जरुरी है मानव के लिए ?

क्या आज रामायण से हम दूर हो रहे है ?

जीवन का अधार कही जाने वाली रामायण आज हम सब से दूर होती जा रहा है। राम का अर्थ है मेरे भीतर का प्रकाश, मेरे दिल के भीतर का प्रकाश। आप के भीतर का ओज ही राम है। 1987 का एक दौर था जब हर घर में दूरदर्षन के माध्यम से रामायण की गूंज सुनाई देती थी, सदियों से हर हिन्दुस्तानी के दिलों में रमने वाले राम की काल्पनिक छाया एक राम राज की ओर लोगों को दिषा दे रही थी, और अर्यावर्त की एक नई सुबह फिर से हिन्दुस्तान को अपने सांस्कृतिक विरासत में नई जोष भर चुकी थी। मगर आज हम उस राम को भूला दिए है, स्वार्थ और भौतिकवाद इस कदर हावी हो चुकी है की आज राम का जगह रावण ले चुका है। मर्यादा पुरूशोत्तम राम की आदर्ष जीसे हर मनुश्य अपने जीवन का मूल कर्तब्य मानता है, जिसका नाम सुबह षाम हर कोई जापता है, आज उसे आधुनिकता की आंधी उड़ा कर पंष्चमी चाल चलन की मैली मिट्टी हमेषा के लिए उसे दफन कर दी है। तो ऐसे सवाल भी खड़े हो रहे है की क्या आज वाकई हम सब रामायण से दूर हो रहे है। 

जिस रामायण की कहानी ने 100 मिलियन से अधिक दर्शकों को आकर्षित किया था। आज उसे कोई देखना नहीं चाहता है। रामायण भारत और विश्व टेलिविजन इतिहास में सबसे अधिक देखा जाने वाला कार्यक्रम बन गया था। सीता को राम की सेविका और उनकी हर आज्ञा को आंख मूंदकर स्वीकार करने वाली पत्नी की आदर्ष हर औरत अपनी नैतिक कर्तब्य मानती थी। मगर आज हर नारी सीता की आदर्षो को सिर्फ एक कहानी मात्र बताकर खुद को आधुनिक दिखाने की होड़ में विष्वास करने लगी है। यही कारण है की रामायण और राम हम सब से दूर हो गये है। महात्मा गांधी ने एक बार कहा था कि, ‘यदि तुम मुझ से सब कुछ छीन लो तो मैं जी सकता हूं, लेकिन यदि तुम मुझसे राम को दूर ले जाओगे तो मैं नहीं रह सकता।

रामायण पौराणिक ग्रंथों में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली किताब है। रामायण सिर्फ एक कथा अवतार या कालखंड ही नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का रास्ता बताने वाली सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है। रामायण हर एक रिश्तों पर लिखा गया है, हर रिश्ते की आदर्श स्थितियां, किस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करें, विपरित परिस्थिति में कैसे व्यवहार करें, ऐसी सारी बातें हैं। जिसे आज हम सब को सबसे जयादा जरूरत है, मगर युवा पीढ़ी इन ग्रन्थों को पढ़ना तो दूर देखना नहीं चाहता है। उसे सिर्फ विदेषी प्रकाषकों की मनगणंत कहानीय जयादा रोजक लगती है। वही दुसरी ओर माता पिता अपने बच्चों को संस्कृत और हिन्दी पढ़ाने के बजाय उसे अंग्रेजी पढ़ाना पसंद करते है जिसके कारण धर्म और अघ्यात्म आज हमारे घर और समाज से दूर होते जा रहा है। जिसे आज हमे अपने जीवन में अपनाकर उसे बेहतर बनाने की जरूरत है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या रामायण से हम दूर हो रहे है ?

रामायण की आदर्श और हमारे जीवन में उसकी उपयोगिता ! 




- दशरथ ने अपनी दाढ़ी में सफेद बाल देखकर तत्काल राम को युवराज घोषितकर उन्हें राजा बनाने की घोषणा भी कर दी। हम जीवन में अपनी परिस्थिति, क्षमता और भविष्य को देखकर निर्णय लें। कई लोग अपने पद से इतने मोह में रहते हैं कि क्षमता न होने पर भी उसे छोडना नहीं चाहते।

- राजा बनने जा रहे राम ने वनवास भी सहर्ष स्वीकार किया। जीवन में जो भी मिले उसे नियति का निर्णय मानकर स्वीकार कर लें। विपरित परिस्थितियों के परे उनमें अपने विकास की संभावनाएं भी तलाशें। परिस्थितियों से घबराएं नहीं।

- सीता और लक्ष्मण राम के साथ वनवास में भी रहे, जबकि उनका जाना जरूरी नहीं था। ये हमें सिखाता है कि किसी की परिस्थितियां बदलने से हमारी उसके प्रति निष्ठा नहीं बदलनी चाहिए। हमारी निष्ठा और प्रेम ही हमें ऊंचा पद दिलाते हैं।

- भरत ने निष्कंटक राज्य भी स्वीकार नहीं किया, राम की चरण पादुकाएं लेकर राज्य किया। हमारा धर्म अडिग होना चाहिए। अधिकार उसी चीज पर जमाएं जिस पर नैतिक रूप से आपका अधिकार हो और आप उसके योग्य हों। भरत ने खुद को हमेशा राम के अधीन समझा, इसलिए जो राजा पद राम को मिलना था, उसे भरत ने स्वीकार नहीं किया।

- राम ने सुग्रीव से मित्रता की, सुग्रीव को उसका राज्य और पत्नी दोनों दिलवाई। आप भी जीवन में मित्रता ऐसे व्यक्ति से करें, जो आपकी परेशानी, आपके दुरूख को समझ सके।

- राम हमेशा भरत की प्रशंसा करते, उसे ही अपना सबसे प्रिय भाई बताते, जबकि राम के साथ सारे दुरूख लक्ष्मण ने झेले, इसके बावजूद भी लक्ष्मण ने कभी इसका विरोध नहीं किया। आप कोई भी काम करें तो उसे कर्तव्य भाव से करें, प्रशंसा की अपेक्षा न रखें, प्रशंसा की इच्छा हमेशा काम से विचलित करती है।
 

Wednesday, April 17, 2013

सत्ता के ढाई केंद्र वाला माडल और कांग्रेस !

देश की सियासी फिजां में इन दिनों बस एक ही बात पर चर्चा हो रही है कि कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह सही कह रहे हैं अथवा जनार्दन द्विवेदी। दोनों ही ने अपने अपने तरीके से सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के प्रयोग को सफल और असफल करार दिया है। दिग्विजय सिंह की बात में वंशवाद की हिमायत की बू आती है तो द्विवेदी का कहना वंशवाद की समाप्ति की ओर इशारा कर रहा है। भारत में ही इस बात का उदहारण मौजूद है कि यहां वंशवाद की परंपरा भी रही है तो वंशवाद से इतर ब्रितानी गोरों ने लंबे समय तक यहां राज भी किया है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी का तिलिस्म दरक चुका है। कांग्रेस के अंदर अब नेहरू गांधी परिवार का चमत्कार ढहने पर है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ही भ्रष्टाचार पर अपना मुंह बंद रखकर देश की जनता की नजरों से उतर चुके हैं। राहुल के अंदर देश को संभालने का माद्दा नजर नहीं आता हैए वहीं दूसरी ओर टाईम मेग्जीन एक बार फिर पलनिअप्पम चिदम्बरम को ही मनमोहन सिंह का सक्सेसर बता रही है। देखा जाए तो सत्ता के दो नहीं ढाई केंद्र हैं देश में वर्तमान समय में!

देश पर आधी सदी से ज्यादा राज करने वाली सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस जिसे आजादी के उपरांत महात्मा गांधी ने भंग करने की सिफारिश की थी में स्वाधीनता के बाद से ही सामंतशाही हावी रही है। कांग्रेस के अंदर वंशवाद का बटवृक्ष किसी से छिपा नहीं है। पंडित जवाहर लाल नेहरू के उपरांत इंदिरा गांधीए राजीव गांधीए संजय गांधीए सोनिया गांधीए राहुल गांधीए वरूण गांधीए सियासी बियावान में विचरण कर रहे हैं। इनमें से मेनका और वरूण कांग्रेस से बाहर हैं। नब्बे के दशक में नरसिंहराव और सीताराम केसरी ने कांग्रेस को कुछ समय तक नेहरू गांधी परिवार की छाया से दूर रखा किन्तु उसके बाद एक बार फिर इस बटवृक्ष पर निठल्ले बैठे कांग्रेसी अमर बेल जैसे परजीवी बनकर लदे रहे और कांग्रेस की बागडोर तथा सत्ता की धुरी एक बार फिर सोनिया गांधी के पास लाकर रख दी। जैसे ही राहुल गांधी सोचने समझने के लायक हुए उन्हें भी महिमा मण्डित करना आरंभ कर दिया गया।

राहुल गांधी भी इन कांग्रेस के मठाधीशो के रंग में ही रंग गए। बाद में जब राहुल को अहसास हुआ कि उनके पैरों के नीचे जमीन ही नहीं है तो वे हतप्रभ रह गए। राहुल ने धीरे धीरे अपने कदम वापस खींचे और प्रधानमंत्री ना बनने की अपनी मंशा जाहिर कर दी। फिर क्या था राहुल को आगे कर सत्ता की मलाई चखने वाले निठल्लों को यह बात रास नहीं आई और उन्होंने फिरसे राहुल के पीएम बनने की संभावनाओं को हवा देना आरंभ कर राहुल के मन में पीएम बनने की अभिलाषाएं जगाना आरंभ कर दिया। कांग्रेस के इस तरह के शातिर नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक है। जनता जाग चुकी हैए मीडिया को प्रलोभन देकर आप अपने कब्जे में ले सकते हैं पर सोशल मीडिया ने अपनी जो दमदार मौजूदगी दर्ज कराई है वह निश्चित तौर पर सियासी लोगों की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलकाने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है।

इतिहास साक्षी है कि देश पर आक्रमण कर बाबर से लेकर औरंजेब और बहादुर शाह जफर तक खानदानी राज रहा है। बादशाह अकबर ने इस देश पर पचास साल लगातार राज किया है। अकबर की न्यायप्रियता के कारण जो नींव रखी गई थी वह उनकी नाकारा आल औलादें सौ साल तक भुनाती रहीं। इसके बाद जब बहादुर शाह जफर ने देश पर राज किया तब कंपनी बहादुर यानी ईस्ट इंडिया कंपनी के पैर पसारने के उपरांत लाल किले तक ही सिमट गया। उस वक्त राज जरूर जफर का था पर आदेश ईस्ट इंडिया कंपनी का ही चला करता था। आज के दौर में यह उदहारण इसलिए भी प्रासंगिक माना जा सकता है क्योंकि आज राज नेहरू गांधी परिवार का ही चल रहा है। देश में उनकी मंशा कि बिना पत्ता भी नहीं खड़क रहा है। मनमोहन सिंह देश के वजीरे आजम जरूर हैं पर उनकी भी इतनी ताकत नहीं कि वे अपनी मर्जी से देश को चला सकें। देश की सत्ता और शक्ति का शीर्ष केंद्र सालों से 10 जनपथ यानी सोनिया गांधी का आवास ही बना हुआ है।

इक्कीसवीं सदी का सपना देशवासियों ने बड़े ही चाव के साथ देखा था। आज इक्कीसवीं सदी का तेरहवां साल आधा बीतने को हैए पर इसके बाद भी आज देश की रियाया अपने आप को गोरे ब्रितानियों के बजाए स्वदेशी कालों की गुलाम समझ रही है। जनता को जो मिलना चाहिए वह उसे मिल ही नहीं पा रहा है। अनुसूचित जाति और जनजाति को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण का प्रावधान संविधान में दस सालों के लिए किया गया था। आज संविधान बने छः दशक से ज्यादा समय हो गया है पर देश के हुक्मरान इन्हें मुख्य धारा में ला नहीं पाए हैंए परिणामस्वरूप आज भी आरक्षण का जिन्न सामान्य वर्ग पर हावी है। आज कांग्रेस की हालत इतनी गई गुजरी हो गई है कि वह जमीनी स्तर पर लड़ाई लड़ने के बजाए एक परिवार के भरोसे ही देश को हांकना चाह रही है। कांग्रेस के नेता एक परिवार विशेष के भाटचारण और महिमामण्डन को ही अपना मूल मंत्र मान रहे हैं। इन्हीं नेताओं के चलते इस परिवार के कथित युवा किन्तु वस्तुतः प्रोढ़ होते सदस्य को लोगों की आलोचनाओं का शिकार होना पड़ रहा है।

शिवसेना भी राहुल पर वार कर रही है तो भाजपा उन्हें आड़े हाथों ले रही है। राहुल कहते हैं उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनना पर उन्हें पीएम बनाने के लिए कांग्रेस महासचिव राजा दिग्विजय सिंह सारे घोड़े छोड़ने पर आमदा नजर आ रहे हैं। राजा दिग्विजय सिंह द्वारा सोनिया और मनमोहन सिंह के दो पावर सेंटर को गलत और असफल बताया जाकर नई बहस छेड़ दी जाती है। इसकी काट के रूप में जनार्दन द्विवेदी सोनिया मनमोहन के दो पावर सेंटर वाले फार्मूले को सफल निरूपित करते हैं। समझ में नहीं आता कि दो राजनेता इस तरह परस्पर विरोधी बयान देकर जनता को भ्रमित क्यों करना चाह रहे हैं। इसके पीछे उनका क्या हिडन एजेंडा है। उधर टाईम पत्रिका एक बार फिर पूरी ईमानदारी के साथ मनमोहन के सक्सेसर के बतौर पलनिअप्पम चिदम्बरम का नाम आगे कर रही है।

दिग्विजय सिंह या जनार्दन द्विवेदी जो चाहे कहें पर वस्तुस्थिति यह है कि देश में सत्ता के दो नहीं ढाई केंद्र हैं। एक हैं 7ए रेसकोर्स रोड़ पर रहने वाले प्रधानमंत्री डॉण्मनमोहन सिंहए दूसरी 10ए जनपथ में निवासरत यूपीए चेयर पर्सन श्रीमति सोनिया गांधी और तीसरे 12ए तुगलक लेन को आशियाना बनाने वाले राहुल गांधी। इस तरह देश में सत्ता के ढाई केंद्र अस्तित्व में हैं। 42 साल के अम्योच्योर पालीटिशिन राहुल गांधी आज भी अपनी मां श्रीमति सोनिया गांधी के मानिंद लिखा लिखाया भाषण पढ़ रहे हैं। उद्योगपतियों से रूबरू राहुल के भाषण के दौरान उनका एक पन्ना कहीं खो गया तो वे बोल उठे आई लास्ट। क्या यही अपरिपक्व राजनेता देश को इक्कीसवीं सदी का सपना दिखाने में सफल हो पाएंगेघ् कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की देश के हालातों और भ्रष्टाचार को छोड़कर अन्य बेमतलब के विषयों पर बयानबाजी को देखकर कहा जा सकता है कि .ष्ष्कौन है सच्चा कौन है झूठा हर चेहरे पे नकाब है

सांस्कृतिक आतंकवाद की आहट पर नज़र !

जब भी आतंकवाद की चर्चा की जाती है तो मन में तुरन्त ही बम विस्फोट, अपहरण, आगजनी, रेल दुर्घटनायें, मौत जैसी वीभत्स घटनाओं की छवि अंकित हो जाती है। देश तथा देशवासी विगत कई वर्षों से आतंक के इसी चेहरे से परिचित रहे हैं। आतंकवाद का यह रूप हमारे मन-मष्तिष्क पर इस कदर से हावी हो गया है कि हमें इसका कोई अन्य स्वरूप नजर ही नहीं आता है। देखा जाये तो यह आतंकवाद का वह चेहरा है जो हमें स्पष्ट रूप से दिख रहा है, इसके अतिरिक्त अन्य आतंक के चेहरे हमारे आसपास होने के बाद भी हमें दिखाई नहीं देते हैं। विभिन्न प्रकार के आतंकी स्वरूपों में हमें प्रमुखता से सांस्कृतिक आतंकवाद को देखने और समझने की आवश्यकता है।
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सांस्कृतिक आतंकवाद देश के अन्दर आतंक की वह अवधारणा है जो बिना जान लिये, बिना बम धमाके किये हमारे देश को खोखला कर रही है। देश के समृद्ध विकास, आर्थिक उन्नति, प्रोद्योगिकी सक्षमता, शैक्षिक उन्नयन, उसकी सांस्कृतिक विरासत, जीवन-मूल्यों, मानवतावाद आदि से अपना विभेद रखने वाले देशों ने जब देख लिया कि भारत को आर्थिक रूप से, तकनीकी रूप से, सैन्य क्षमता के द्वारा, विज्ञान-प्रोद्योगिकी के द्वारा नियन्त्रण में रखना सम्भव नहीं है तो देश-विरोधी ताकतों ने विध्वंस का सहारा लिया। देश भर में होने वाली आतंकवादी घटनाओं, मजहबी फसादों के बाद भी देश की एकता अक्षुण्य रही, विकास-यात्रा बाधित नहीं हुई तो देश में सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने का कार्य विघटनकारी ताकतों के द्वारा किया जाने लगा।
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युवाओं को आकर्षित कर उन्हें दिग्भ्रमित करने वाले समारोहों का आयोजन किया जाने लगा; विभिन्न विदेशी चैनलों के जरिये से घरों के भीतर पहुंच कर हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जाने लगा; आधुनिकता के नाम पर परिवार को विखण्डित किया जाने लगा; समूची दुनिया में भातरीय अस्मिता के नाम पर यहां की महिलाओं को आधार बनाकर विभिन्न विद्रूप कार्यक्रमों को संचालन किया जाने लगा। प्रत्येक पल, प्रत्येक क्षण ऐसा माहौल बनाया जाने लगा मानो भारत देश सिर्फ और सिर्फ देह के आसपास विचरने वाले, महिलाओं के प्रति हिंसा का भाव रखने वाले, सेक्स के प्रति लालायित रहने वाले नागरिकों का देश बन गया हो। आधुनिकता की अवधारणा को विभिन्न तरीकों से इस तरह से परिभाषित किया जाने लगा कि देश की सांस्कृतिक विरासत यहां के युवाओं के साथ-साथ बुजुर्गों को भी दकियानूसी, पाखंड से भरी दिखाई देनी लगी है। इन सबका दुष्परिणाम यह हुआ कि हमारे समाज से परिवार की अवधारणा का विलोपन हो गया; रिश्तों की मर्यादा का ह्रास होने लगा; महिलाओं को आधार बनाकर बाजारवाद की संकल्पना का विकास होने लगा; राष्ट्रवाद की गरिमामयी छवि का विखण्डन होने लगा।
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आज के बम धमाकों, नित होते हादसों, मौतों के बीच इस आतंकवाद से भी लड़ने की आवश्यकता है। हमें हमारी युवा पीढ़ी के सामने देश के स्वर्णिम इतिहास को रखना होगा; यहां की भव्य सांस्कृति विरासत से उसका परिचय करवाना होगा; देह-सुख से इतर रिश्तों की मर्यादा को समझाना होगा; बाजारवाद से इतर सामाजिकता का विकास करवाना होगा; वैश्विक जीवन के साथ-साथ राष्ट्रवाद का पाठ भी पढ़ाना होगा; आर्थिक मूल्यों से ऊपर जीवन-मूल्यों को रखना होगा। यदि हम इस तरह के कुछ कदमों को उठाकर दिग्भ्रमित होती युवा पीढ़ी को समझाने में सफल हुए तो सम्भव है कि आतंकवाद के इस छिपे चेहरे-सांस्कृतिक आतंकवाद-को हम अपने घरों के भीतर पहुंचने से रोक लेंगे।

क्या मोदी से अच्छा पी एम पद की उमीदवार सुषमा हो सकती है ?

जैसे.जैसे वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों का समय नजदीक आता जा रहा है वैसे.वैसे राजनीतिक गलियारों में होने वाली हलचलें तेज होती जा रही हैं। जाहिर सी बात है समय बहुत कम बचा है और वर्तमान हालातों को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि सभी पार्टियों को खुद को अन्य से बेहतर साबित करने के लिए अभी बहुत ज्यादा तैयारियां करनी हैं। यूपीए की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी को उम्मीदवार बनाकर मैदान में उतारना लगभग तय और स्वीकृत है लेकिन जब बात एनडीए की होती है तो यूं तो भाजपा की ओर से वर्ष 2014 के लिए नरेंद्र मोदी का प्रोजेक्शन किया जा रहा है और क्षेत्र विशेष से निकालकर उनकी छवि को राष्ट्रीय स्तर पर भी उभारा जा रहा है लेकिन एनडीए समेत स्वयं भाजपा में से भी मोदी की उम्मीदवारी का सांकेतिक विरोध शुरू हो गया है। नीतीश कुमार और शरद यादव भी नरेंद्र मोदी की दावेदारी को खारिज करने जैसा संकेत देते हुए यह कह चुके हैं कि जल्द ही बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा की जानी चाहिए। हालांकि इस बीच जो नाम तेजी के साथ लोकप्रियता बटोर रहा है वह है महिला राजनेता सुषमा स्वराज का। एनडीए का घटक दल शिवसेना पहले ही यह साफ कर चुका है कि सुषमा स्वराज ही बाला साहेब ठाकरे की पसंद थीं। शिवसेना के अलावा ऐसे बहुत से दल और व्यक्ति विशेष हैं जो सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री पद का बेहतर उम्मीदवार बताने से नहीं हिचकते। उनका कहना है कि अगर मोदी की जगह सुषमा पर दांव लगाया गया होता तो हालात जुदा होते। इस बीच सुषमा और मोदी के नामों पर एक बहस छिड़ चुकी है क्योंकि जहां बुद्धिजीवियों का एक वर्ग सुषमा को बेहतर बता कर नरेंद्र मोदी को नकारता प्रतीत हो रहा है वहीं नरेंद्र मोदी को भारत के लिए उपयुक्त प्रधानमंत्री कहने वाले भी पीछे नहीं हैं।


नरेंद्र मोदी का पक्ष लेने वाले लोगों का कहना है कि मोदी छा जाने वाले नेता हैं। वह जहां भी जाते हैं अपने प्रशसंकों का एक गुट तैयार कर देते हैं। वह जब बोलते हैं तो सामने वाले के पास बोलने के लिए कुछ नहीं बचता। उनकी भाषण शैली कमाल की है। वह विशाल व्यक्तित्व वाले नेता हैं और उन्हें आरएसएस समेत भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह का समर्थन भी प्राप्त है। गुजरात को विकास का मॉडल बनाने वाले नरेंद्र मोदी को विकास पुरुष का दर्जा दिया जाता है। आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करने में नरेंद्र मोदी पूरी तरह सक्षम हैं और उनका मीडिया मैनेजमेंट भी उनके लिए रामबाण का काम करता है। अब वह गुजरात तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि खुद को राष्ट्रीय स्तर का नेता भी घोषित करने की तैयारी में हैं। वहीं दूसरी ओर नरेंद्र मोदी का विरोध इस बात पर किया जाता है क्योंकि वह आज भी अपनी तानाशाह छवि से बाहर नहीं आ पाए हैं। हिंदुत्व का पुरोधा होने का ठप्पा उनका पीछा नहीं छोड़ पा रहा है जिस वजह से वह आज भी सांप्रदायिक नेता के तौर पर ही जाने जाते हैं। उन्हें ना सिर्फ एनडीए में बल्कि भाजपा में भी सर्वसम्मति वाले नेता के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा रहा है।


वहीं दूसरी ओर बुद्धिजीवियों का वर्ग जो सुषमा की पैरवी करता है उसका कहना है कि सुषमा स्वराज को अगर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाता है तो जाहिर है उन्हें महिला होने का फायदा अवश्य मिलेगा। देश की अन्य सबसे बड़ी पार्टी ;कांग्रेसद्ध और बड़े गठबंधन ;यूपीएद्ध की मुखिया भी एक महिला ही है इसीलिए अगर सुषमा की छवि को उभारा जाएगा तो इसका फायदा भाजपा समेत एनडीए को अवश्य मिलेगा। दूसरी ओर सुषमा भाजपा के वरिष्ठ और सम्माननीय सदस्य लालकृष्ण आडवाणी की पसंदीदा उम्मीदवार हैं और उनका एनडीए और भाजपा दोनों में ही कोई विरोधी नहीं है। सुषमा एक प्रखर नेता और बेहतरीन वक्ता हैंए उन्हें सर्वसम्मति से स्वीकार किए जाने की संभावनाएं भी तीव्र हैं। मोदी जहां राष्ट्रीय स्तर पर खुद को साबित करने की कोशिश कर रहे हैं वहीं सुषमा स्वराज पिछले 25 सालों से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। वह विपक्ष की नेता तो हैं ही साथ ही उन पर कभी किसी भी प्रकार का सांप्रदायिक होने जैसा भी आरोप नहीं लगा है। लेकिन सुषमा की दावेदारी को खारिज करते हुए और मोदी का पक्ष लेने वाले बुद्धिजीवियों का कहना है कि जहां मोदी को पिछले दो सालों से प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट किया जा रहा है वहीं इस पद के लिए सुषमा का नाम कहीं भी सुनाई नहीं दे रहाए उन्हें तरजीह दी ही नहीं जा रही तो उनके बारे में बात करने का कोई फायदा ही नहीं है।

Tuesday, April 16, 2013

मुंबई के पुलिस थानों से भगवान की मूर्ति हटाना कितनी सही ?

मुंबई पुलिस की बेतूका फरमान एक बार फिर सामने आई है। जिसे सुन कर आप भी हैरान रह जाएंगें। जी हां अब मुंबई के थानों में भगवान की मूर्तियां और तस्वीरें नहीं रहेंगी। न ही थाना परिसरों में पूजापाठ होगी और न उत्सव मनाए जाएंगे। पुलिस आयुक्त डॉ. सत्यपाल सिंह ने सभी थानेदारों को मूर्तियां-तस्वीरें हटाने के निर्देश दिए थे। इस काम के लिए तय समय सीमा समाप्त हो चुकी है, लेकिन महानगर के कुल 92 थानों में से महज 20 फीसद थानों ने पुलिस आयुक्त के निर्देश का पालन किया है। पुलिस आयुक्त कार्यालय से दो अप्रैल को जारी निर्देश पत्र में कहा गया था कि किसी भी सरकारी दफ्तर, विशेष कर पुलिस विभाग में किसी धर्म विशेष से जुड़ी तस्वीरें एवं मूर्तियां नहीं लगाई जानी चाहिए। पूजापाठ व उत्सव भी नहीं मनाया जाना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने से अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में असुरक्षा की भावना जन्म लेती है। उन्हें यह लग सकता है कि धर्म विशेष में आस्था रखने वाला पुलिस विभाग उनके साथ न्याय नहीं कर सकता। इससे समाज में द्वेष की भावना पैदा हो सकती है।

पुलिस आयुक्त डॉ. सत्यपाल सिंह की इस आदेष से कई अहम सवाल खड़े हो रहे है, की क्या मुंबई पुलिस को पूजा पाठ करने की अजादी नहीं है। क्या इससे हिन्दु धर्म के लोगों का आक्रोष नहीं बढ़ेगा? क्या ये संविधान के अनुच्छेद 25 का उलंघन नहीं है, ये अनुछेद किसी भी धर्म को समानता का अधिकार प्रदान करता है, और अपने धर्म को प्रचार प्रसार करने कि पूर्ण अजादी प्रदान करता है, तो एैसे में आखिर मुंबई पुलिस के आयुक्त किस अधार पर भेदभाव कर रहे है, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते है। मुंबई के पुलिस थानों में लगाए गए भगवान की मूर्तियां किसी धार्मिक संगठ की ओर से या किसी के दबाव में नहीं रखी गई बल्कि खुद पुलिस थानों की अधिकारीयों और कर्मचारियों की ओर से स्थापित की कई है। देष की सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुकी है की हिन्दुत्व सिर्फ एक धर्म ही नहीं बल्कि जीवन जीने की एक कला है, जो किसी भी व्यक्ति को सही मार्ग पर चलने की रास्ता दिखाती है। देश में ये कोई पहला एैसा वाक्या नहीं है जब इस तरह की आदेष जारी की गई हो, एैसी घटना को बार बार इसलिए भी दोहराया जा रहा है ताकी हिन्दु धर्म को समाप्त किया जा सके।

 ये सड्यंत्र देष में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में राजनीति करने वाली पार्टीयों के दबाव में भी किया जा रहा है। ताकी इसे चुनाव में मुद्दा बनाया कर अपने आप को सेकुलर साबित कर सके। भगवान की मूर्ति सिर्फ महाराश्ट्र के पुलिस थानों में ही नहीं है, इस तरह के पूरे देश भर के थानों में भगवान की मूर्ति मौजूद है, तो क्या इसका मतलब देश भर के पुलिस थानों से भगवान की मूर्ति हटाना चाहिए। मगर अब तक महाराश्ट्र के अलावे किसी और राज्य के पुलिस आयुक्त की ओर से कभी भी कोई आपती जारी नहीं की गई, तो फिर एैसा मुंबई पुलिस आयुक्त क्यों कर रहे है, इसका जावाब खुद मुंबई पुलिस आयुक्त को देना होगा।

महाराश्ट्र के साथ साथ देश भर के कई एैसे पुलिस थानें है जहा पर हिन्दु देवी देवताओं की मंदिर मौजूद है, तो क्या वहा की लागों को न्याय नहीं मिलती है। पुलिस को धर्मनिरपेक्ष दिखाने के लिए क्या उसे हटा देना चाहिए? इतना ही नहीं देश में आज भी कई एैसे पुलिस थाना खुद देवी देवताओं के स्थान पर बने हुए है जहा पर वहा के स्थानीय लोग नियमीत रूप से पूजा पाठ करते है, क्या उनके उपर पूजा पाठ करने पर प्रतिबंध लगा देना देना चाहिए। ये तमाम एैसे सवाल है जो खुद मुंबई पुलिस आयुक्त के बेतूके फरमान पर खड़े होने लगे है। तो क्या एैसे में पुलिस थानों से भगवान के मूर्ति को हटाना सही है?

Saturday, April 13, 2013

नक्सली बनो पैसा पाओ जैसी नीति क्या सही है ?

केंन्द्रीय सत्ता बनाम नक्सलवाद की लड़ाई में सरकार तीसरें रास्तें के आसरे विकल्प तलास रहीं है। ये विकल्प केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से नक्सलियों के आत्मसमर्पण को लेकर जारी की गई नई नीति केंद्रीय सत्ता के समर्पण को बयान कर रही है। नक्सलियों को मुख्यधारा में शामिल करने के उद्देश्य से जिन तमाम उपायों की घोषणा की गई है, उससे तो यही लगता है कि उन्हें शासन के खिलाफ बगावत करने के लिए पुरस्कृत किया जा रहा है। और सरकार इन नक्सलियों के आगे घुटने टेक रही है। इस नई नीति के तहत नक्सली संगठनों की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो में शामिल कथित बड़े नक्सलियों को ढाई लाख रुपये और राज्य कमेटी में शामिल सदस्यों और कमांडर कहे जाने वाले नक्सलियों को डेढ़ लाख रुपये की सहायता दी जाएगी। इसके अलावा उन्हें रोजगार के लिए तीन साल तक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इस दौरान उन्हें चार हजार रुपये की मासिक सहायता भी प्रदान की जाएगी। साथ ही यदि वे हथियारों के साथ समर्पण करते हैं तो उन्हें उसके लिए अलग से पैसा दिया जाएगा। इतना ही नहीं उनके मामलों का निपटारा फास्ट ट्रैक अदालतों में होगा और इस दौरान सरकार उन्हें कानूनी सहायता भी देगी? छोटे-मोटे मामलों में शामिल रहे नक्सलियों को माफी देने का भी प्रावधान है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या लोगों को नक्सली बनने के लिए इनाम दिया जा रहा है।

देष में जब भी नक्सल आत्मसर्मपण की पेषकष हुई है, तो इसे नक्सली संगठनों ने ठुकराने का ही काम किया है। जब कभी भी संघर्ष विराम हुआ भी तो नक्सलियों ने उस अवधि का इस्तेमाल खुद को संगठित करने और अपने आप को ताकतवर बनाने में किया। तो सवाल यहा भी खड़ा होता है की फिर सरकार किस अधार पर इस नीति को लागू करना चाहती है? क्या यहा भी उसे वोट की सियासत नज़र आ रही है? या फिर मनरेगा जैसा कोई नया घोटाले का समंदर ? ये सवाल यहा हम इसलिए भी उठा रहे है क्योंकि अब तक सरकार के पास एैसी कोई अधिकारिक आकड़ा मौजूद नहीं है जिसके अधार सरकार ये तय कर पायेगी की कौन से गांव में कौन नक्सली है और कौन आम नागरीक। भारत सरकार नक्सलियों से जिस तरह निपट रही है उससे दुनिया भर में पहले से ही उसकी भद पिट रही है। आंतरिक सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से निपटने के मामले में भारत एक नरम राष्ट्र के रूप में उभर सामने आया है। एैसे में नक्सलियों के साथ सरकार की इस नीति से कई अहम सवाल खड़े हो रहे है। 

जहानाबाद जेल ब्रेक से लेकर लालगढ के दौर में न सिर्फ नक्सलवादी की मारक क्षमता बढ़ती हुई दिखायी दे रही है बल्कि संसदीय राजनीति और राज्य व्यवस्था नक्सलवादी प्रभावित इलाकों में प्रभावहीन होकर उभर रही है। तो वही सरकार कर्रवाई करने के बजाय नरमी दिखा रही है, जो पूरी तरह से सरकार की संवेदनहीनता को दर्षा रही है। आज संसदीय राजनीति में हाथ जलाये बगैर राजनीतिक दलों को भी नक्सलियों ने अपने प्रयोग में मोहरा बनाया है। षायद यही कारण है की सरकार इस प्रकार के नक्सल समर्थित नीति को आगे बढ़ाने की दिषा में बल दे रही है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या, नक्सली बनों पैसा पाओ जैसी ये नीति सही है ?

Friday, April 12, 2013

क्या रिस्तें पैसें की बली चढ़ रहे है ?

                                इनसानों ने पैसे के लिए आपस का प्यार मिटा डाला,
                               हँसते बसते घर फूँक दिए धरती को नर्क बना डाला।

                                मिट्टी से निकाला सोने को सोने से बनाए महल मगर,
                               जज़बातों के नाज़ूक रिश्ते को मिट्टी के तले दफ़ना डाला।

इंसानियत का रिश्ता इंसानों को जानवरों से अलग करता है लेकिन इंसान उस रिश्ते की ही बलि चढ़ा दे तो फिर फर्क क्या रहेगा ? जी हां, आज हम एैसा इसलिए कह रहें है की क्योंकि इस भौतिकवादीता के आंधी में कुछ भी शाश्वत नहीं रह गया है। बदलते जमाने ने मौसमों की तरह रिश्तों की तासीर को बदल डाली है। खून और पानी में कोई अंतर नहीं दीख रहा है, क्योंकि रुपए-पैसों और जमीन-जायदाद के आगे सारे रिश्ते बेमानी हो गए है। हर आंगन और परिवार कुरुक्षेत्र बन गया है और जमीन का टुकड़ा हस्तिनापुर। तो एैसे में सवाल भी खड़े होने लगे है, की क्या आज रिस्ते नाते पैसे की बली चढ़ रहे है। हर भाई धृतराष्ट्र की भूमिका में नज़र आ रहा है तो बेटा दुर्योधन बन बैठा।


शेक्सपियर की नाटक किंग लियर के तरह आज हू बहू रिस्तें कलंकीत होने लगे है, जो आज के समकालीन संदर्भ में सटीक बैठता है। खून पानी ही होता होगा शायद, तभी तो चड्ढा भाईयों ने एक-दूसरे पर रिवॉल्वर तानते हुए एक बार भी नहीं सोचा। तो वही रीयल स्टेट कारोबारी दीपक भारद्वाज की हत्या सुपारी देकर उसके अपने ही बेटे ने करवा दी। हाल ही में घटीत ये दोनों घटनाए सिर्फ उदाहरण मात्र है। लेकीन शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता होगा जब अखबारों में रिश्तों के बली चढ़ने की खबरें न होती होंगी। आज देष में हर रोज एैसी हजारों घटनाए आम आम बात हो गई है, जो इस ओर इषारा कर रही है की रिस्तें पैसे की बली चढ़ रहे है। पैसे की मोह में आज रिस्तें दरकने की बात हर रोज सामने आ रही है। ये घटनाए एक सभ्य समाज के विनाश के पूर्व की आहट है, जिसे हम सब को समझने की दरकार है।

 तेजी से विकसित हो रहे शहरीकरण में ऐसी घटनाएं भारतीय समाज पर सवालिया निशान लगाती हैं। समाज रूपी परंपरा आज टूट रही है और भौतिकता हर ओर अपना पैर पसार रही है। हर रिश्ते की अपनी एक मर्यादा होती है लेकिन जब कोई मर्यादा को लांघ जाता है तो रिश्ते अपनी गरिमा ही नहीं विश्वास भी खो बैठते हैं। एैसे में आज हम सब को इसकी चिंता करनी की जरूरत है। इस रिस्तें की पतझड़ में आधुनिकता की तूफ़ान हमारे समाज को जड़ से न उखाड़ दे, इसकी चिंता आज लोगों को सताने लगी है। सांस्कृतिक आदर्शांे की बलि भोगवादी परंपरा को जन्म दे रही है, जहा पैसें रिस्तेंकी अहमीयत को तय करते है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या रिस्तें पैसें की बली चढ़ रहे है?

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा ...!

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून। पानी गए न ऊबरे मोती मानुष चून। वर्षों पुराना यह दोहा कभी नीतिवाद से प्रेरित लगता था, लेकिन आज यह सच साबित होता दिख रहा है। बढ़ते जल संकट को लेकर पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा का यह कहना कि अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर लड़ा जाए, भविष्य में पानी के भयावह संकट की चेतावनी देते हैं। महाराष्ट्र के 34 जिले इस समय भयंकर सूखे की चपेट में हैं।सूखे ने पिछले चालीस सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। लगातार दूसरे साल भी बारिश कम होने से ऐसी स्थिति बनी हुई है। मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र के कई इलाके 1972 के बाद सबसे बड़े सूखे का सामना कर रहे हैं।इस भीषण सूखे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य के जलाशयों में इस वक्त महज 38 प्रतिशत पानी है और मराठवाड़ा जोन के जलाशयों में तो 13 प्रतिशत पानी ही बचा है। इलाके में गन्ना, हल्दी, केले की फसलें पानी न मिलने से बर्बाद हो गई हैं। नतीजतन, यहां के किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। साफ है कि स्थिति विकट है। तालाबों,  नदियों, कुओं- सभी से पानी गायब हो गया है। पानी बस यहां के लोगों की आंखों में दिखता है। सूखे का सबसे ज्यादा असर मराठवाड़ा में है। याद करें, 1972 में सूखे से देश भर में खाद्यान्न की कमी हुई थी और सारे खाद्य उत्पादों के दाम बढ़ गए थे। भारत सरकार को फिर खाद्यान्न आयात बढ़ाने पड़े थे। कुछ ऐसी हालत 2009 में भी हुई। इस बार भी महाराष्ट्र में सूखे ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। यह ठीक है कि सरकारी नीतियों में सूखा पीड़ितों की फिक्र दिखने लगी है, पर किसी भी योजना तक उनकी पहुंच आसान नहीं दिखती। अभी आलम यह है कि किसानों को समय चलते मदद नहीं मिली तो वे कर्ज और आर्थिक नुकसान के बोझ तले दिनोंदिन और दबते चले जाएंगे।

 यह जगजाहिर है कि हाल के वर्षों में कर्ज न चुका पाने के कारण ही ज्यादातर किसान जान दे रहे हैं। पूरे देश में विदर्भ ऐसा क्षेत्र है जहां सबसे ज्यादा किसानों ने कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या की है। जाहिर है, सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद आत्महत्याओं का सिलसिला जारी है। कहने का तात्पर्य यह है कि इतनी बड़ी आपदा के बावजूद अब तक सरकार ने किसानों के हित में कोई सीधा और कारगर कदम नहीं उठाया है। महाराष्ट्र अकेला ऐसा राज्य है, जो कृषि के मुकाबले उद्योगों को पानी उपलब्ध कराने को ज्यादा प्राथमिकता देता है। इसलिए यहां जो सिंचाई योजनाएं बनती हैं, उनका पानी शहरों में उद्योगों की जरूरतों पर खर्च कर दिया जाता है। अमरावती जिले में ही, जो सबसे ज्यादा सूखाग्रस्त इलाका है, प्रधानमंत्री राहत योजना के तहत अपर वर्धा सिंचाई प्रोजेक्ट बनाया गया, लेकिन जब यह बनकर तैयार हुआ तो राज्य सरकार ने निर्णय लिया कि इसका पानी एक थर्मल पावर प्रोजेक्ट को दे दिया जाए। बहरहाल, सूखे की अब तक जो भयावह तस्वीर दिख रही है, उससे स्पष्ट है कि इस बार खेती-किसानी को बुरी तरह प्रभावित होने वाली है और इसका असर उन किसानों पर पड़ना तय है, जिन्होंने भारी कर्ज लिया है। यह ठीक है कि सूखे से अकाल की समस्या अब तक नहीं है पर मौजूदा परिस्थितियां डराने वाली हैं। यही वजह है कि सूखे से उत्पन्न स्थिति को लेकर अब केंद्र सरकार भी चिंता में दिखने लगी है। कृषि मंत्री शरद पवार भी सूखे को लेकर अपनी चिंता जाहिर कर चुके हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) ने महाराष्ट्र के लिए 1,207 करोड़ रुपये का सूखा राहत पैकेज मंजूर कर दिया है। लंबे समय से महाराष्ट्र सरकार इसकी मांग कर रही थी। सूखे की विकरालता को देखते हुए यह राशि बहुत ज्यादा नहीं है, परंतु कम भी नहीं है। यदि इसका ईमानदारी के साथ सौ फीसद उपयोग किया जाए तो काफी हद तक सूखे की समस्या से निजात पायी जा सकती है। खैर, इस पैकेज का कितना सही इस्तेमाल हो पाएगा, इस पर बड़ा सवाल बना हुआ है।

महाराष्ट्र में कुल 34 जिलों में से सोलापुर, अहमदनगर, सांगली, पुणे, सतारा, बीड़ और नासिक सूखे से सबसे अधिक प्रभावित जिले हैं। बुलढाना, लातूर, उस्मानाबाद, नांदेड़, औरंगाबाद, जालना, जलगांव और धुले जिलों में भी स्थिति गंभीर है। राज्य में कुछ जिले पशुचारे और पेयजल की गंभीर किल्लत का सामना कर रहे हैं। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में सूखे के हालात को देखते हुए मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने लोगों से अपील की है कि वे सूखा पीड़ितों की मदद के लिए आगे आएं और सूखे से निपटने के लिए बनाए गए मुख्यमंत्री राहत कोष में अधिकाधिक दान कर राज्य सरकार की मदद करें। राज्य सरकार ने इस बार के सूखे को पिछले चालीस सालों में सबसे भयंकर सूखा घोषित किया है। अकाल का सीधा संबंध अर्थव्यवस्था से है। व्यापक शहरीकरण के बावजूद महाराष्ट्र में कृषि ही अर्थव्यवस्था का पूरक आधार है। अब राज्य को अपने संसाधन अकाल से निपटने में लगाने पड़ेंगे। बड़ा संकट यह है कि भूजल स्तर राज्य के उन हिस्सों में भी नीचे जा रहा है जहां पर्याप्त वर्षा हुई थी। राज्य में ढेरों सिंचाई परियोजनाएं कई दशकों से किसी न किसी छोटे-मोटे कारण से अधूरी पड़ी हैं। यहां दशकों पूर्व जो महत्वाकांक्षी जल संवंर्धन योजना शुरू की थी, वह अब सिर्फ दिखावा रह गई हैं। वास्तव में देश के किसानों के लिए मौसमी बारिश बड़ी अहमियत रखती है क्योंकि देश के केवल 40 फीसद कृषि क्षेत्र के बारे में यह कहा जा सकता है कि वहां सिचाई की सुविधाएं हैं और एकाध मानसून में गड़बड़ी वह बर्दाश्त कर सकता है। लेकिन शेष 60 फीसद इलाका पूरी तरह मौसमी बारिश पर निर्भर होता है और ऐसे में अगर बारिश सामान्य से कम हुई, तो मुश्किल होना स्वाभाविक है।

इस तरह कहा जा सकता है कि अभी भी भारतीय कृषि बहुत हद तक प्राकृतित बारिश पर निर्भर है। अगर महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति इसी तरह बनी रहती है तो आने वाले कुछ समय में देश की अर्थव्यवस्था पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। क्योंकि ग्रामीण आमदनी और उपभोक्ता खर्च के लिए मौसमी बारिश अहम कारक है, साथ ही सूखे से भारतीय अर्थव्यवस्था के तीन क्षेत्रों- आर्थिक विकास, खाद्यान्न संकट और मुद्रास्फीति- पर असर पड़ना सुनिश्चित है। जाहिर है जिस तरह से सिंचाई भगवान भरोसे है और ग्लोबल वार्मिंग से बारिश का चक्र बदल रहा है उसका सीधा असर कृषि पर पड़ रहा है। दिन-प्रतिदिन हमारी जरूरतें बढ़ रही हैं। ऐसे में बिना सिंचित क्षेत्र में वृद्धि के सिर्फ मानसून के भरोसे इसे हासिल करना असंभव है। आज भी देश की 60 फीसद आबादी कृषि पर निर्भर है, जीडीपी का लगभग 13.6 प्रतिशत अब भी कृषि एवं सहायक गतिविधियों से प्राप्त होता है। इस तरह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अभी भी कृषि का विशेष महत्व है और कृषि के लिए मानसून का। यह देश की विडंबना है कि आजादी के छह दशक बाद भी हम कृषि के संदर्भ में मानसून पर अपनी निर्भरता कम नहीं कर पाए।

1972 के बाद महाराष्ट्र सबसे बड़े सूखे की चपेट में है, करीब आधा महाराष्ट्र बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है।हमारे देश में 72 प्रतिशत आबादी के पास जरूरत भर भी पानी नहीं है, वह पानी क्या बचाएगी। 28 प्रतिशत पानी वाले लोग ही पानी बचाने की क्षुद्रताभरी बातें करते हैं। आजादी के तुरंत बाद गाँवों को छोड़कर हमारी सरकार ने नगर में पानी की जो व्यवस्था खड़ी की थी, उस व्यवस्था का कालक्रम में उसने सही-सही संरक्षण, संवर्धन और अनुरक्षण नहीं किया। तो क्या ऐसे में पानी की किल्लत नहीं होगी? वैज्ञानिक हमें डराते हैं, बुद्धीजीवी भरमाते हैं। किसी के पास पानी बनाने का वैकल्पिक उपाय नहीं है। पानी प्रकृति की अनुपम देन है। हम इसका दुरुपयोग होने से रोक सकते हैं। कहने को हम कह सकते हैं कि नदियाँ सूख रहीं हैं, ताल-तलैया सूख रहे हैं, जलप्रपात सूख रहे हैं, नदी का स्रोत सूख रहा है, लेकिन उसे रोकने के उपाय हमारे पास नहीं हैं। अगर उपाय होता तो देश में कई जगहों पर रेगिस्तान बनने से रोक सकते थे, लेकिन हमारे वैज्ञानिक के पास डराने के अलावा कोई समाधन नहीं है। यह प्रकृति का चक्र है, जिसे कोई रोक नहीं सकता है। जल के लिए जो मारा-मारी है, वह हमारी क्षुद्र मानसिकता का परिचायक ही है। ऐसी परिस्थिति में यह कहीं और बढ़कर दुर्भाग्यपूर्ण और लज्जाजनक है कि समस्याओं को लेकर भी कुछ लोग सरकारी संगठन बनाकर माल बटोरने में लगे हैं, उनकी कार्यशालाएँ शानदार होटलों में चलती हैं। नदी के किनारे की गंदगी को साफ करने के लिए उनके पास न समय है और न ही कुदाल और न ही देह गंदा करने का इरादा। पानी बचाने की बात बेमानी है, हाँ, हमें पानी का दुरुपयोग अवश्य रोकना चाहिए। इसका हम संकल्प लें।

गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि तर्को, तथ्यों और हकीकत के धरातल पर वाकई हम खतरनाक हालात की ओर बढ़ रहे हैं।पानी की कमी की बात करते ही एक बात हमेशा सामने आती है कि दुनिया में कहीं भी पानी की कमी नहीं है।धरती से पानी खत्म हो गया तो क्या होगा। कुछ ही सालों बाद ऐसा हो जाए तो ताजुब नहीं होना चाहिए। भूगर्भीय जल का स्तर तेजी से कम हो रहा है। ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। यही सही समय है कि पानी को लेकर कुछ तो सोचा जाए। पानी खत्म हो गया तो कैसा होगा हमारा जीवन। आमतौर पर ऐसे सवालों को हम अनसुना कर देते हैं और ये मान लेते हैं कि ऐसा कभी नहीं होगा। गंभीरता से देखें तो पाएंगे कि तर्को, तथ्यों और हकीकत के धरातल पर वाकई हम खतरनाक हालात की ओर बढ़ रहे हैं। पानी की कमी की बात करते ही एक बात हमेशा सामने आती है कि दुनिया में कहीं भी पानी की कमी नहीं है। दुनिया के दो तिहाई हिस्से में तो पानी ही पानी भरा है तो भला कमी कैसे होगी। पर मानवीय जीवन जिस पानी से चलता है उसकी मात्रा पूरी दुनिया में पांच से दस फीसदी से यादा नहीं है। नदियां सूख रही हैं। ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। झीलें और तालाब लुप्त हो चुके हैं। कुएं, कुंड और बावडियों का रखरखाव नहीं होता। भूगर्भीय जल का स्तर तेजी से कम होता जा रहा है। हालत चिंताजनक है-आखिर किस ओर बढ़ रहे हैं हम।

नासा के सेटेलाइट के आंकड़ें कहते हैं कि अब भी चेता और पानी को बचा लो अन्यथा पूरी धरती बंजर हो जाएगी, लेकिन दुनिया से पहले अपनी बात करते हैं यानि अपने देश की। जिसके बारे में विश्व बैंक की रिपोर्ट का कहना है कि अगले कुछ सालों के बाद भारत में पानी को लेकर त्राहि-त्राहि मचने वाली है। सब कुछ होगा, लेकिन हलक के नीचे दो घूंट पानी के उतारना ही मुश्किल हो जाएगा। हजारों साल पहले देश में जितना पानी था वो तो बढ़ा नहीं, स्रोत बढ़े नहीं, लेकिन जनसंख्या कई गुना बढ़ गई। मांग उससे यादा बढ़ गई। पानी के स्रोत भी अक्षय नहीं हैं, लिहाजा उन्हें भी एक दिन खत्म होना है। विश्व बैंक की रिपोर्ट को लेकर बहुत लोग उसे कामर्शियल दबावों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की साजिश से जोडक़र देख सकते हैं। उन्हें लगता है कि अपनी इस रिपोर्ट के जरिए यूरोपीय देशों का पैरवीकार माना जाने वाला विश्व बैंक कोई नई गोटियां बिठाना चाहता हो, लेकिन इस रिपोर्ट से अपने देश के तमाम विशेषज्ञ इत्तफाक रखते हैं। पर्यावरणविज्ञानी कहते रहे हैं कि पानी को बचाओ। बात सही है कि जायरे और कनाडा के बाद दुनिया में सबसे यादा पानी भारत में है। अभी भी समय है कि हम चेतें और अपने पानी के स्रोतों को अक्षय ही बनाए रखें। एक सदी पहले हम देशी तरीके से पानी का यादा बेहतर संरक्षण करते थे, लेकिन नई जीवनशैली के नाम पर हम उन सब बातों को भूल गए। हम भूल गए कि कुछ ही दशक पहले तक हमारी नदियों में कल-कल करके शुध्द जल बहता था। अब ऐसा नहीं रहा। तथाकथित विकास की दौड़ में शुध्द पानी और इसके स्रोत प्रदूषित होते चले गए। अनियोजित और नासमझी से भरे विकास ने नदियों को प्रदूषित और विषाक्त कर दिया। जल संरचना तैयार करने पर ध्यान तो दिया गया, लेकिन कुछ ही समय तक जबकि ये एक सतत प्रक्रिया थी, जो चलती रहनी चाहिए थी। एशिया के 27 बड़े शहरों में, जिनकी आबादी 10 लाख या इससे ऊपर है, में चेन्नई और दिल्ली की जल उपलब्धता की स्थिति सबसे खराब है। मुंबई इस मामले में दूसरे नंबर पर है। जबकि कोलकाता चैथे नंबर पर। दिल्ली में तो पानी बेचने के लिए माफिया की समानांतर व्यवस्था ही सक्रिय हो चुकी है। हालत ये है कि पानी का कारोबार करने वाले इन लोगों ने कई इलाको में अपनी पाइप लाइनें तक बिछा रखी हैं। इनके टैंकर पैसों के बदले पानी बेचते हैं।

पानी की कमी को लेकर टकराव तो अभी से पैदा हो गया है। कई राज्यों में नदियों के जल बंटवारे को लेकर दशको से विवाद जारी है। कावेरी के पानी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु में टकराव, गोदावरी के जल को लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक में तनातनी और नर्मदा जल पर गुजरात और मध्यप्रदेश में टकराव की स्थिति। ये टकराव कभी रायों के बीच गुस्सा पैदा करते रहे हैं तो कभी राजनीतिक विद्वेष का कारण बनते रहे हैं। दरअसल भारत का नब्बे फीसदी हिस्सा नदियों के जल पर निर्भर करता है, जो विभिन्न रायों के बीच बहती हैं। हमारे देश में अब तक स्पष्ट नहीं हो सका है कि नदी का कितने जल पर किसका हक है। दूसरे देशों में जहां पानी को लेकर दिक्कतें हैं, वहां जल अधिकारों को साफतौर पर परिभाषित किया गया है। इनमें चिली, मैक्सिको, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश शामिल हैं। पाकिस्तान और चीन भी पानी के अधिकारों को लेकर सिस्टम बनाने में लगे हैं। मौसम में बदलाव से भारत में पानी की समस्या और विकराल होगी। मानसून के प्रभावित होने और ग्लेशियर्स के पिघलने से भारत को स्थिति से निपटने के बारे में सोचना होगा। भारत में दोनों ही स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। कुछ इलाको में बाढ़ आ जाती है तो कुछ इलाके सूखे का शिकार हो जाते हैं। भारत के कृषि सेक्टर को मानसून के बजाए दूसरे विकल्प तलाशने अगर जरूरी हो चले हैं तो पानी के उचित संरक्षण की भी।

भारत के बांध प्रति व्यक्ति करीब 200 क्यूबिक मीटर पानी स्टोर करते हैं, जो अन्य देशों चीन, मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका प्रति व्यक्ति 1000 मीटर से खासा कम है। पूर्वोत्तर रायों में, जहां साल भर खासी बारिश होती है। बेहतर जल संरचना से मिलने वाला धन यहां की तस्वीर बदल सकता है। छोटे स्तर पर सामुदायिक जल एकत्रीकरण और वाटर हार्वेस्टिंग प्रोजेक्ट्स भी भविष्य में काम की चीज साबित हो सकते हैं। दुनिया में पानी की मात्रा बहुत ही सीमित है। इस पर ज़िंदा रहने वाली मानव जाति और दूसरी प्रजातियों को इस बात की उम्मीद नही रखनी चाहिए कि उन्हें हमेशा पानी मिलता रहेगा। धरती का दो-तिहाई हिस्सा पानी से घिरा है। लेकिन इसमें से ज़्यादातर हिस्सा इतना खारा है कि उसे काम में नहीं ला सकते। सिर्फ ढाई फ़ीसदी पानी ही खारा नहीं है। हैरानी की बात ये है कि इस ढाई फ़ीसदी मीठे पानी का भी दो-तिहाई हिस्सा बर्फ़ के रूप में पहाड़ों और झीलों में जमा हुआ है। अब जो बाकी बचता है उसका भी 20 फ़ीसदी हिस्सा दूर-दराज़ के इलाक़ों में है। बाकी का मीठा पानी ग़लत वक़्त और जगह पर आता है मसलन मानसून या बाढ़ से। कुल जमा बात ये है कि दुनिया में जितना पानी है उसका सिर्फ़ 0.08 फ़ीसदी इंसानों के लिए मुहैया है। इसके बावजूद अंदाज़ा है कि अगले बीस वर्षों में हमारी माँग करीब चालीस फ़ीसदी बढ़ जाएगी।

संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूएनईपी ने 1999 में एक रिपोर्ट पेश की थी। इसमें कहा गया था कि पचास देशों में 200 से भी ज़्यादा वैज्ञानिकों ने पानी की कमी को नई शताब्दी की दो सबसे गंभीर समस्याओं में से एक बताया था। दूसरी समस्या धरती का बढ़ता तापमान थी। हम अपने पास उपलब्ध पानी का 70 फ़ीसदी खेती-बाड़ी में इस्तेमाल करते हैं। लेकिन विश्व जल परिषद का मानना है कि सन् 2020 तक पूरी दुनिया को खाना खिलाने के लिए हमें अभी मौजूद पानी से 17 फ़ीसदी ज़्यादा पानी चाहिएगा। हम इसी ढर्रे पर चलते रहे तो आने वाले दिनों में आज के मुक़ाबले ऐसे लाखों लोग ज़्यादा होंगे जो हर रात सोते वक्ते भूखे-प्यासे होंगे। आज पूरी दुनिया में हर पाँच में से एक आदमी को पीने के साफ़ पानी की सुविधा नही है। हर दो में से एक को साफ़-सुधरे शौचालय की सुविधा नहीं है। हर रोज़ क़रीब तीस हज़ार बच्चे पांच साल की उम्र पूरी कर पाने से पहले ही मर जाते हैं। इनकी मौत या तो भूख से या फिर उन बीमारियों से होती हैं जिनकी आसानी से रोक-थाम की जा सकती थी। पीने का साफ़ पानी अच्छी सेहत और खुराक की चाबी है। जैसे चीन में एक टन चावल पैदा करने के लिए एक हज़ार टन पानी का इस्तेमाल होता है।

जल संकट के कई कारण हैं। एक तो बड़ा ही साफ़ है। जनसंख्या में बढोत्तरी और जीवन का स्तर ऊँचा करने की चाह। दूसरा है पानी को इस्तेमाल करने के तरीक़े के बारे में हमारी अक्षमता। सिँचाई के कुछ तरीक़ों में फ़सलों तक पानी पहुंचने से पहले ही हवा हो जाता है। प्रदूषण की वजह से  हमें अभी जो पानी उपलब्ध है वो भी गंदा होता जा रहा है। मध्य एशिया में अराल समुद्र एक ऐसा ही उदहारण है कि किस तरह प्रदूषण ज़मीन और पानी को बर्बाद कर सकता है। दिलचस्प बात ये है कि सरकारें पानी की अपनी समस्याओं को बरसाती पानी और धरती पर मौजूद पानी पर निर्भरता बढ़ाने के बजाए भूमिगत पानी का इस्तेमाल कर सुलझाना चाहती हैं। लेकिन इसका मतलब ये हुआ कि बैंक खाते में पैसा जमाए कराए बिना लगातार पैसे निकाले जाना। नदियों और झीलों का पानी भूमिगत जल से आता है और ये सूख सकता है। ज़मीन के भीतर से निकाले गए मीठे पानी की जगह खारा पानी ले सकता है। और ज़मीन के भीतर से पानी निकालने के बाद जो जगह खाली बच जाती है वो कई बार तबाही पैदा कर सकती है। जैसा कि बैंकाक, मेक्सिको शहर और वेनिस में हुआ। इस समस्या से निपटने के लिए कुछ रास्तों पर काम शुरु किया जा सकता है। सिंचाई के लिए फव्वारे वाली सिंचाई जिसमें कि सीधा पौधों की जड़ों में पानी की बूंदे डाली जाती हैं। एक रास्ता ऐसी फ़सलें बोना का भी है जो पानी पर ज़्यादा निर्भर न रहती हों। या फिर खारे पानी को मीठा किया जाए लेकिन इसमें काफी ऊर्जा लगेगी और कचरा फैलेगा। मौसम बदलने से कुछ इलाक़ों में ज़्यादा पानी गिरेगा तो कुछ में कम। साफ़ बात है कि कुल मिलाकर असर मिला-जुला ही रहेगा। लेकिन अगर हमें जल संकट से उबरना है तो हमें यूएनईपी की रिपोर्ट पर ध्यान देना होगा जिसमें कहा गया है कि पूरे ब्रहांड में सिर्फ पृथ्वी ही है जहां पानी है और जल ही जीवन है।

आज देश की 14 बड़ी नदियां बड़े संकट की शिकार हैं। छोटी नदियां मर रही हैं। नदियां मरती रहीं तो हमारा अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा। नदियों के बहाव क्षेत्र में वास स्थान बनाये जा रहे हैं और नदियां उफान को तैयार हैं। आज स्थिति यह बनती है कि कहीं बाढ़ से परेशानी है, तो कहीं सुखाड़ से। लेकिन साथ ही साथ यह भी सही है कि नदियां लाखों सालों का कैलेंडर बनाकर चलती हैं। वे लाखों साल में बनती हैं। न मालूम कौन सी नदी कितने बरस बाद फिर कब जिंदा हो जाये? कुछ पता नहीं। लेकिन हमें सजगता तो बरतनी ही होगी। 20 वर्ष में गंगा की साफ-सफाई के मद में सरकार 39,226 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है, लेकिन सामाजिक व बुनियादी मसलों को ध्यान न देने की वजह से अब तक नाकामी हाथ लगी है। इसलिए हमें कानूनी पक्ष को मजबूत करने के साथ ही सामाजिक पक्ष पर भी लोगों की सोच बदलनी होगी। केवल कभी-कभार आंदोलन करने मात्र से स्थिति में सुधार नहीं होगा। इसके लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी। यह तो सभी स्वीकार करते हैं कि आगे आने वाले समय में देश के समक्ष जल संकट एक बड़ी चुनौती बन कर उभरेगा। आज भी जगह-जगह पर पानी की कमी की वजह से संघर्ष की स्थिति है। लेकिन यह सवाल हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या हम इस समस्या के प्रति सजग हुए हैं। जवाब यही है कि – नहीं। तो फिर जब हम ही सजग नहीं हैं, तो देश के नीति नियंताओं से यह कैसे अपेक्षा कर सकते हैं कि वे इस मसले पर गंभीर होंगे।

Tuesday, April 9, 2013

क्या यौन उत्पीड़न के लिए उत्प्रेरक है, इज्जत की अवधारणा ?

उत्तर प्रदेश में पारिवारिक रंजिश का बदला लेने के लिए पहले एक परिवार के पुरुषों ने दूसरे परिवार की महिला के साथ गैंग रेप किया फिर इस गैंग रेप का बदला लेने के लिए पीड़ित महिला के पुरुष संबंधियों ने उक्त परिवार की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया। सीरिया के अंदर भड़की विरोध की आग को दबाने के लिए सीरिया की सेना द्वारा विरोधी गुट में शामिल महिलाओं का ना सिर्फ बेहद अमानवीय तरीके से बलात्कार किया जा रहा है बल्कि उन्हें क्रूरतम तरीके से प्रताड़ित भी किया जा रहा है। नक्सलवादए जिसे भारत की आंतरिक सुरक्षा और शांति के लिए खतरा करार दिया जाता हैए उससे निपटने के लिए भी सरकारी नुमाइंदे नक्सली और माओवादी महिलाओं से निपटने के लिए उनका बलात्कार करते हैं या चीरहरण कर उन्हें सरेआम घुमाते हैं। इतना ही नहीं नक्सली भी सरकारी नुमाइंदों को मजा चखाने के लिए उनसे संबंधित महिलाओं को ही अपना शिकार बनाते हैं।

यह भले ही हालिया उदाहरण हों लेकिन प्राचीन काल में भी जब कोई आक्रमणकारी किसी राज्य पर अपना कब्जा कर लेता था तो वह उस राज्य को नीचा दिखाने के लिए सबसे पहले राज्य की महिलाओं पर ही धावा बोलता था। उसकी सेना घरों में घुसकर या फिर राह चलती महिलाओं को अगवाकर उनके साथ बलात्कार करती थी। यह भी देखा गया है कि हमारी क्षेत्रीय गालियां भी स्त्री अंगों और उनसे कथित रूप से जोड़ ली गई नातेदारियों से ही संबद्ध रहती हैं। विभिन्न प्रकार के वाद.विवाद में जनसामान्य के बीच एक.दूसरे से नाता जोड़ने की भी बात सुनी जा सकती है।

ऐसे हालातों में प्रश्न यह उठता है कि आखिर इज्जत का ठीकरा महिलाओं के सिर फोड़कर हम क्यों उन्हें पुरुषों का शिकार बनने देते हैंघ् इस मुद्दे पर बुद्धिजीवियों का दो वर्ग अलग.अलग राय रखता है। बुद्धिजीवियों का एक वर्ग तो यह स्पष्ट कहता है कि सामाजिक मानसिकता के अनुसार महिलाओं को ही घर और परिवार की इज्जत कहा जाता है। इसीलिए जब किसी व्यक्ति को परिवार पर आघात करना होता है तो वह उसकी ष्इज्जतष् यानि महिला को ही अपना निशाना बनाता है। पारिवारिक कलह और रंजिश का बदला लेने के लिए महिलाओं के साथ ही यौन हिंसा की जाती हैए क्योंकि महिला ही परिवार की कथित इज्जत है। इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है महिलाओं के प्रति हो रहे ऐसे अपराधों के लिए जिम्मेदार काफी हद तक उनके सिर मढ़ी गई इज्जत ही है।

वहीं बुद्धिजीवियों के दूसरे वर्ग में शामिल लोगों का स्पष्ट कहना है कि यद्यपि महिलाओं के प्रति हो रहे ऐसे अत्याचार बेहद दुखद हैं लेकिन इनका संबंध परिवार या समाज की इज्जत से ना होकर उनकी कमजोर शारीरिक अवस्था से है। पुरुष अपनी भड़ास निकालने के लिए महिलाओं को इसीलिए निशाना नहीं बनाते क्योंकि वे परिवार की इज्जत हैं बल्कि उन्हें इसीलिए निशाना बनाया जाता है क्योंकि वे शारीरिक रूप से कमजोर होती हैं और उन्हें आसानी से दबाया जा सकता है। पुरुषों द्वारा पुरुषों पर अत्याचार इसीलिए कम किया जाता है क्योंकि समान ताकत की बात हो जाती है।

इसीलिए वे परिवार या समाज की महिलाओं पर ही अपना रोष निकालते हैं। वहीं ऐसा करने का दूसरा कारण यह भी है कि महिलाओं को निशाना बनाने से उनसे संबंधित पुरुष टूट जाते हैंए मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाते हैं जो अपने आप में एक अचूक हथियार है। पुरुषों द्वारा महिलाओं को बस इसीलिए निशाना नहीं बनाया जाता क्योंकि वे उन्हें इज्जत मानते हैं बल्कि इसलिए बनाया जाता है क्योंकि वे परिवार की सबसे कमजोर हिस्सा होती हैं जिन पर वार करना आसान होता है।

Saturday, April 6, 2013

मुलायम की चाहत और सियासी चालबाजी !

राजनीति में वह ताकत है जो होनी को अनहोनी और अनहोनी को होनी में बदलने का माद्दा रखती है। राजनीति में कभी कोई स्थाई विरोधी और स्थाई दोस्त नहीं होता। कब क्या होगा यह कोई नहीं जानता। कल तक एक दूसरे की आलोचना करने वाले राजनेता कब एक दूसरे का समर्थन करने लगें इसे भी कोई नहीं जनता। लेकिन इतना जरूर है कि राजनीति अवसरों को भुनाने का सुपर एक्शन खेल है। जो इस खेल के हर बिशात को समझ जाता है केन्द्रिय राजनीत की चाभी उसी के हाथ में होती है। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव राजनीत के इस खेल के एक ऐसे ही खिलाडी है जिसकी हर चाल के अपने आप में एक अलग मायने होते है। वो कब किस के साथ होंगे ये समझना किसी के बस की बात नहीं होती। वक़्त से साथ अपने रुख को कैसे बदलना है ये मुलायम सिंह यादव बेहतर भला कौन समझ सकता है ? यही कारण है कि कल तक कांग्रेस के संकटमोचक रहे मुलायम आज उसके लिए चिंता का विषय बन गए हैं। कांग्रेस को डर है कि कहीं सपा उससे अपने समर्थन वापस न ले। दरअसल मुलायम सिंह की खासियत ही यही है कि वो जब भी अपनी चाल चलते है तो हुकुम का इक्का अपने हाथ में रखते है। यही कारण है कि क्या साथी और क्या विरोधी ? सभी सब कुछ जान कर भी मुलायम का खुला विरोध नहीं कर पाते। मौजदा दौर में कांग्रेस अपनों में उलझी है एक-एक करके उसके सभी साथी उसका साथ छोड़ रहे है, ऐसी स्थिति में कांग्रेस के पास अपनी सरकार बचाने के लिए सिवाए सपा की बातों को मानने के आलावा कोई चारा नहीं है। हलाकि बसपा एक विकल्प के तौर पर है लेकिन कांग्रेस अच्छी तरीके से जानती है कि सिर्फ बसपा के दम पर वो अपनी सरकार नहीं बचा पायेगी इसलिए वो सपा की हर जायज  ना-जायज बातों को मान रही है। 

जिसकी बानगी पिछले दिनों देखने को मिली जब बेनी के बयान पर सपा ने लोकसभा में हंगामा किया और उनके इस्तीफे की मांग की। सपा अच्छी तरह से जानती थी की अपने सहयोगियों से परेशान कांग्रेस हर कीमत पर सपा को मनायेगी कि वो बेनी के इस्तीफे मांग छोड़ दे और हुआ भी यही, चलते सदन में कांग्रेस प्रमुख ने मुलायम के पास जाकर उनसे बेनी के इस्तीफे की मांग न करने का अनुरोध किया जिसे सपा प्रमुख ने मान लिया। हालाँकि एक बार फिर बेनी ने मुलयम के खिलाफ तल्ख़ टिपण्णी की है। एक बार फिर सपा ने उनका इस्तीफा माँगा है पर अंततः परिणाम फिर वही होंगे जो पिछली बार हुए। कांग्रेस सपा को मनायेगी और सपा मान भी जाएगी। दरासल बेनी का इस्तीफा तो सपा भी नहीं चाहती थी, सपा तो ये बताना चाहती थी कि तुम क्या तुम्हारी पार्टी प्रमुख भी हमारे सामने झुकेगी जो वो लगातार करके दिखा रही है । समर्थन वापसी के डर चलते कांग्रेस लगातार सपा के दबाव में आ रही है। यही कारण है कि पिछले एक महीनो कई बार सपा प्रमुख ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ तल्ख़ टिपण्णी की और कांग्रेस उसे सुनती आई। अधिकृत तौर पर कांग्रेस का कोई भी नेता मुलायम की टिप्पड़ी के खिलाफ खुलकर नहीं बोल रहा है पर अनधिकृत तौर कांग्रेस ने बेनी वर्मा आगे कर दिया है। बेनी लगातार बयानबाजी कर रहे है। दरअसल कांग्रेस की रणनीत है कि जब तक यूपी में कांग्रेस लोकसभा चुनाव के लिए मजबूत न हो जाये बेनी अघोषित तौर पर पार्टी के लिए सपा के खिलाफ बयानबाजी करते है ताकि मुस्लिम मतदाताओ में सपा की छवि कुछ हद तक ख़राब हो। 

मुलायम कांग्रेस की इस रणनीत का बखूबी समझ रहे है। यही कारण है कि जब भी केंद्र की कांग्रेस सरकार से समर्थन वापसी की बात आती है मुलायम सांप्रदायिक शक्तियों के नाम कांग्रेस सरकार से समर्थन वापस लेने से इनकार कर देते है। दरसल मुलायम इस बात को अच्छी तरीके से समझ रहे है कि यदि अभी केंद्र से समर्थन वापस लिया गया तो राजनैतिक रूप से सपा का नुक्सान होगा और उस पर एक धर्मनिरपेक्ष सरकार गिराने की तोहमत लगेगी जो सपा पर बेनी के लगाये आरोपों को प्रमाणित करेगा। इसलिए राजनीत में 60 बरस बिताने वाले मुलायम अभी समर्थन वापसी के पक्ष में नहीं है। मुलायम जानते है कि लोकसभा चुनावो के हिसाब से अभी सपा यूपी में तैयार नहीं है। यूपी में स्थापित उनकी सरकार कानून व्यवस्था के नाम पर पूरी तरह से विफल है। मुलायम की दृष्टि यू.पी. की बिगड़ती कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार से उपजी सरकार विरोधी आवाजों को पहचान रही है। वे अच्छी तरह जान गए हैं कि 2014 के लोकसभा चुनाव सपा के लिए सरल नहीं हैं। यदि यही स्थिति रही तो उनकी हार निश्चित है। वे यह भी जानते हैं कि चुनाव की दृष्टि से केन्द्र सरकार की नाकामियों, भ्रष्टाचार और घोटालों के कारण कांग्रेस की स्थिति दयनीय है। पिछले साल हुए यू.पी. विधानसभा चुनावों में युवराज राहुल गांधी के धुआंधार प्रचार के बाद भी कांग्रेस की शर्मनाक पराजय को भी वे अच्छी तरह जानते हैं।

 वे यह भी अनुमान लगा रहे हैं कि राज्य की बिगडती कानून व्यवसथ के चलते वर्तमान में यू.पी. में भाजपा की स्थिति मजबूत होती जा रही है और सपा के खिलाफ बड़ा चुनवी मुद्दा भाजपा के हाथ में है जिसका लाभ भाजपा को लोकसभा चुनावों में मिलना तय है। ऐसी स्थिति में अभी केंद्र सरकार को गिरना कही न कही अपने पैरो पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा। इसलिए अब वो यूपी में सपा का बिगड़ता जनाधार सँभालने में लगे हुए है। और इसके लिए उनका सबसे मुफीद हथियार साम्प्रदायिकता है। इसलिए वो लगातार ऐसी बयानबाजी कर रहे है जिसका सीधा असर मुस्लिम वोट बैंक पर हो। इसी क्रम में उन्होंने उतर प्रदेश की बिगडती कानून व्यवस्था को मीडिया का दोगलापन करार देते हुए उसे दिल्ली और गुजरात की कानून व्यवस्था से जोड़ते है। वस्तुतः मुलायम की यह पैंतरेबाज़ी एक तीर से दो निशाने लगाने वाली है। एक तरफ जहाँ वो दिल्ली की कांग्रेस सरकार के खिलाफ बने महौल को भुनाना चाहते है वो वही दूसरी तरफ गुजरात को जोड़कर मुस्लिम मतदाताओ में ये जता रहे है कि किस तरह मीडिया जान बूझकर सांप्रदायिक शक्तियों को मजबूत कर रही है। उनकी कोशिश है कि साम्प्रदायिकता की धार को प्रदेश में इतना मजबूत कर दिया जाये कि आगमी लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में सपा के खिलाफ बिगडती कानून व्यवस्था को विपक्ष चुनावी मुद्दा न बना पाए । वो चाहते है की उत्तर प्रदेश का लोकसभा चुनाव साम्प्रदायिकता के ऐसे चूल्हे पर सेका जाये जहाँ से उत्तर प्रदेश के मुलिस्मो के वोटो को पूरी तरह से सपा के लिए केन्द्रित किया जा सके।

 और जब तक पूरी तरह से यूपी में सिक नहीं जायेगा  मुलायम केंद्र की कांग्रेस सरकार अपना समर्थन वापस नहीं लेंगे। अब देखना ये होगा कि प्रदेश में साम्प्रदायिकता को मजबूत करने की मुलायम ये कोशिश लोकसभा चुनाव में क्या गुल खिलाती है? और मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश से सपा के लिए कितनी सीट निकाल पाते हैं ? रही बात मुलायम के तीसरे मोर्चे की। तो मुलायम ये बात अच्छी तरह से समझ रहे है कि मौजूदा दौर कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ है एक तरफ जहाँ आम जनता कांग्रेस की महंगाई और भ्रष्टाचार से उबी है तो वही दूसरी अल्पसंख्यक वर्ग भाजपा के मोदी प्रेम के चलते उससे अलग हो जायेगा। ऐसे में उन्हें अपनी बरसो पुरानी हसरत पूरी होती दिख रही है। हसरत इस देश का प्रधानमंत्री बनने की। उन्हें लग रहा है कि अगर इस मौके को भुनाया जाये तो प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुचना आसन होगा। मुलायम जानते है कि प्रधानमंत्री बनने का उनका सपना तीसरे मोर्चे की सरकार आने पर ही पूरा हो सकता है इसलिए वो लगातार जनता के सामने तीसरे मोर्चे को विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील है। हालाँकि ये कोई पहली बार नहीं हो रहा जब तीसरे मोर्चे को राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक विकल्प बनाने के प्रयास किये जा रहे हो इससे पहले भी कई बार तीसरे मोर्चे को राष्ट्रीय स्तर पर एक राजनैतिक विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिशे वामपंथी दलों विशेषकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में की गयी जो हर बार विफल रही। 

तीसरे मोर्चे के गठन की अब तक कवायद पर गौर करे तो पता चलता है जब भी इस तरह की जब भी कोई कोशिश हुई, वो कोशिश मुह के बल गिरी। १९९६ में जब अटल सरकार अल्पमत में आ गयी तो वामपंथी पार्टियों ने छोटे दलों को जोड़ कर तीसरे मोर्चे का गठन किया। कांग्रेस और सी.पी.एम ने इस मोर्चे को बाहर से समर्थन दिया जबकि प्रमुख वामपंथी पार्टी सी.पी.आई सरकार में शामिल हुई और एच.डी देवगौड़ा के नेतृत्व में केंद्र में तीसरे मोर्चे ने सरकार बनायीं किन्तु देवगौड़ा के नेतृत्व में बनी सरकार ज्यादा दिन नहीं चल पायी और देवगौड़ा की जगह पर तीसरे मोर्चे ने इंद्र कुमार गुजराल को देश का प्रधानमंत्री बनाया पर गुजराल की सरकार भी ज्यादा नहीं चल पायी और तीसरे मोर्चे की यह सरकार लगभग दो साल के कार्यकाल में ही सिमट कर रह गयी। वर्तमान दौर में मुलायम की जो तीसरे मोर्चे को स्वरुप में लाने की चाहत उभरी है वो वस्तुतः १९९६ की इसी घटना की देन है जब एच.डी. देवेगौड़ा के प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद लेफ्ट के सपोर्ट से मुलायम सिंह प्रधानमंत्री पद के बेहद नजदीक पहुंच गए थे पर अपने ही समाजवादी नेताओं की यादवी लड़ाई में मुलायम उस समय पीएम बनते-बनते रह गए और आइ.के. गुजराल पीएम बन गए। अप्रैल १९९७ की वो कसक सपा प्रमुख के दिल में अभी तक है और उन्हें लगता है की अब वो समय आ गया जब उनका १५ साल पुराना सपना पूरा हो सकता है इसीलिए वे राष्टीय स्तर पर इस कोशिश में लगे है कि सभी छोटे दलों को मिलाकर तीसरे मोर्चे का गठन किया जाये।

 हलाकि की तीसरे मोर्चे के गठन की सम्भावना काफी कम दिखती है क्योकि संभावित रूप से तीसरे मोर्चे में शामिल होने वाले दलों की अपनी अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा है लेकिन फिर भी चूँकि राजनीत अंतहीन समझौतो और संभावनाओ का खेल है इसलिए अभी से कुछ भी कहना सही नहीं होगा। पर इतन तय है कि तीसरा मोर्चा की सरकार न आने की स्थिति में भी मुलायम सत्ता के लिए अपना मोह नहीं छोड़ पाएंगे और जरुरत पड़ने पर वो भाजपा के साथ भी जायेंगे जिसका इजहार वो आडवानी प्रेम के रूप में कर चुके हैं।

आधुनिक प्रेम और यौन-अपराध का संबंध !

भारतीय समाज में प्रेम की अवधारणा जितनी पवित्र और मासूम मानी गई है आज उस अवधारणा को उतना ही कलंकित किया जा रहा है. प्रेम को किसी समय में आत्मिक रूप देकर उसकी पवित्रता को बनाये रखने का प्रयास किया जाता था वहीं आज प्रेम को आत्मा से विलग करके देह के आसपास केन्द्रित कर दिया गया है. प्रेम को लेकर जैसे ही बात की जाती है उसके निहितार्थ शरीर से, शारीरिक संबंधों से लगाने शुरू कर दिए जाते हैं. हमारा वास्तविक समाज हो या फिर फिल्म की काल्पनिक दुनिया, सभी में प्रेम को इस तरह से प्रस्तुत किया जाता है कि यदि युवा लड़के-लड़कियों ने आपस में प्रेम नहीं किया तो उनका जीवन व्यर्थ. अपने जीवन की इसी व्यर्थता को रोकने के लिए ही युवा प्रेम संबंधों के लिए इधर-उधर भटकते रहते हैं और कहीं न कहीं इसी भटकन में वे अपने आपको अपराधों की तरफ ले जाते हैं. इस बात को पूर्वाग्रह मुक्त होकर देखा जाना चाहिए और समझना चाहिए कि समाज में किस तरह से सेक्स की अवधारणा को प्रतिष्ठित किये जाने के प्रयास चल रहे हैं. इसके साथ ही इस बात को भी समझना चाहिए कि जिस समाज में सेक्स को सर्वोपरि रखकर युवाओं के सामने पेश किया जा रहा हो वहां प्रेम की सात्विक अवधारणा कैसे बरकरार रह सकेगी? टीनएजर्स आज बुरी तरह से इस रोग से पीड़ित दिखाई देते हैं. स्कूली छात्र-छात्राओं को गलबहियाँ करते हुए, आपत्तिजनक स्थितियों में आसानी से देखा जा सकता है. 

यही उन्मुक्त वातावरण और स्वछन्द सोच ऐसे युवाओं को शारीरिक संबंधों की तरफ ले जाता है. कई बार सहमति से और कई बार असहमति होने पर जबरन शारीरिक संबंधों की परिणति इन युवाओं के द्वारा होती देखी जाती है. शारीरिक संबंधों को किसी भी कीमत में पाने की कोशिश जाने-अनजाने युवाओं को प्रेम-अपराधों की तरफ मोडती है. हमारे आसपास एक-दो नहीं कई-कई उदाहरण हैं जो दर्शाते हैं कि कैसे युवाओं ने प्रेम संबंधों के नाम पर गैंग रेप को, रेप को अंजाम दिया है. ऐसा नहीं है कि प्रेम के सभी मामलों में ऐसा ही होता है, ऐसा भी नहीं है कि सभी युवा प्रेम के नाम पर अपराधों को अंजाम देते हैं पर जिस तरह का माहौल आज बनता जा रहा है उसके चलते निरपराध प्रेम सम्बन्ध देखने को न के बराबर मिल रहे हैं. प्रेम संबंधों के चलते होने वाले अपराधों को रोकने के लिए समाज में सेक्स से ज्यादा सकारात्मक प्रेम संबंधों की अवधारणा को पुष्ट करने के प्रयास किये जाने चाहिए. युवाओं में इस बात का सन्देश दिया जाना चाहिए कि प्रेम गलत नहीं है, प्रेम की विकृति गलत है. प्रेम के नाम पर सिर्फ और सिर्फ सेक्स-प्राप्ति की चाह रखना, उसे पोषित करना गलत है. इस तरह की अवधारणा को रोकने से ही प्रेम-अपराधों पर रोक लग सकेगी.

नरेंद्र मोदी बनाम भाजपा की रणनीति !

भारतीय जनता पार्टी के नए अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा कर दी है, यह अनुमानों के अनुसार ही था। जैसा कि सभी को पहले से पता था कि इस बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नरेंद्र मोदी को शामिल किया जाएगा। मोदी को ना सिर्फ इस शीर्ष समिति में शामिल किया गया बल्कि उनके नजदीकी गुजरात के गृहमंत्री रहे अमित शाह को शामिल किया जो कथित तौर पर सोहराबुद्दीन फर्जी इनकाउंटर मामले में लिप्त हैं और कोर्ट में इस संबंध में केस चल रहा है। एक बार तो शाह को राज्य से बाहर यानि की तड़ीपार भी किया गया था। अमित शाह को गुजरात में नरेंद्र मोदी के बाद मुख्यमंत्री के तौर पर देखा जा रहा है। शाह, मोदी के सबसे प्रमुख विश्वासपात्रों में से एक हैं। बिडंबना देखिए कि राजनाथ सिंह ने ही छह साल पहले नरेंद्र मोदी को यह कहते हुए पार्टी की केंद्रीय समिति से बाहर कर दिया था कि जब कोई अन्य मुख्यमंत्री समिति में नहीं हैं तो मोदी क्यों? लेकिन इस बार तो सब कुछ जैसे मोदीमय लग रहा है। वैसे भी पुरानी कहावत है कि समय होत बलवान जगत में, समय होत बलवान। और अभी मोदी सभी पर भारी पड़ रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर मीनाक्षी लेखी को लाया गया है जो मोदी की धुर प्रशंसक हैं और उनकी तरफ से विभिन्न टेलीविजन चैनलों पर बहस हिस्सा लेती रही हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि भाजपा इस बार फिर से अपने पुराने राग पर लौट आई है, लेकिन इस बीच पार्टी का चाल,चेहरा और चरित्र पूरी तरह से बदल चुका है और वह सत्ता प्राप्त करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाना चाहती है चाहे वह कथित तौर पर कट्टर हिदुत्व का मामला हो या कोई और। भाजपा की केंद्रीय समिति में वरुण गांधी, उमा भारती जैसे चेहरों को शामिल करके पार्टी यही संदेश देना चाह रही है।


केंद्रीय समिति में बिहार से नीतीश कुमार के आलोचक और पूर्व बिहार भाजपा अध्यक्ष और प्रसिद्ध चिकित्सक सी.पी.ठाकुर को शामिल करके पार्टी ने नीतीश कुमार को स्पष्ट तौर पर संदेश दे दिया है। बिहार से ही मोतिहारी के सांसद, राधामोहन सिंह को पार्टी अनुशासन समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। जबसे नरेंद्र मोदी ने गुजरात में तीसरी बार सफलता हासिल की है तभी से भारतीय जनता पार्टी में उनका कद लगातार बढ़ता जा रहा था। मोदी ने गुजरात में 2002 में हुए गोधरा दंगों को भूलाकर गुजरात को विकास की नई पटरी पर खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई है और इसे उनके घोर विरोधी भी स्वीकार करते हैं। हां, ये बात अलग है कि हरेक राजनीतिक दल की तरह उनकी कृपा भी अन्य उद्ममियों की अपेक्षा में एक विशेष समूह अडानी समूह पर ज्यादा बनी रही और उनके शासन के दौरान यह देखने आया कि अडानी समूह ने बड़ी तेजी के साथ हर क्षेत्र में विकास की। चाहे वह बिजली परियोजना हो या कोई और अडानी समूह का हस्तक्षेप हर जगह है, दूसरे उद्ममियों को भी गुजरात ने इस बीच अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। पश्चिम बंगाल के सिंगुर विवाद के बाद टाटा को अपनी फैक्ट्री लगाने के लिए नरेंद्र मोदी ने हर तरह की सुविधा उपलब्ध कराने में सहयोग किया। आज गुजरात में भरपूर बिजली मिल रही है और इसका परिणाम यह है कि हर उद्ममी के लिए वह प्राथमिकता सूची में पहले स्थान पर कायम है। 
 
गुजरात में नरेंद्र मोदी विकास के लाख वादें करें लेकिन राज्य में कुपोषण की दर काफी है, ऐसा लगता है जैसे प्रमुख शहरों में दिन-रात चमकती बिजली और औद्योगिकीरण के बाद राज्य के दूर-दराज और गांवों में रहने वाले लोगों की अपेक्षा हुई है। जैसा कि दिल्ली और अन्य राज्यों के महानगरों में भी देखने को मिलता है। बड़ी-बड़ी सड़के और अट्टालिकाओं के बीच मध्यम वर्ग और गरीब तथा झोपड़ियों में रहने वालों की सुध लेना नेताओं के लिए जरूरी नहीं रह गया है। जब-जब कांग्रेस पार्टी और अन्य दल नरेंद्र मोदी और गोधरा कांड की चर्चा करते हैं, तब-तब नरेंद्र मोदी के पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण तेजी से होता है। दूसरी पार्टियां जहां मुस्लिम वोटों के लिए गोधरा कांड को चर्चा में बनाए रखना चाहती है तो इसी कारण से कांग्रेस को तीसरी बार गुजरात में हार का सामना करना पड़ा है। हाल के दिनों में यह देखने को मिला है कि नरेंद्र मोदी के या तो पक्ष में बातें की जाती है या उनके धुर विरोध में, लेकिन चर्चा का केंद्र मोदी ही रहते हैं। राजनाथ सिंह भली-भांति से इस स्थिति को समझते हैं और उन्होंने पार्टी की नैया पार लगाने के लिए नरेंद्र मोदी पर दांव लगाने का निर्णय लिया है। नरेंद्र मोदी के नाम पर एनडीए के कुछ घटक दल नाराज हो सकते हैं, लेकिन आज की परिस्थिति में भाजपा के लिए यह भी उचित नहीं है कि वह नमो यानि नरेंद्र मोदी को नकार सके।
 
बिहार में जनता दल यूनाईटेड और भारतीय जनता पार्टी का संयुक्त गठबंधन शासन कर रहा है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार धमकी देते रहे हैं कि वे नरेंद्र मोदी को आगे करने पर पार्टी के साथ अपना गठबंधन तोड़ देंगे, लेकिन अभी तक ऐसा कुछ देखने को नहीं मिल रहा है। हां, पर्दे के पीछे से नीतीश कुमार कांग्रेस के साथ जरूर गलबहियां कर रहे थे, जिसका परिणाम बजट सत्र के दौरान दखने को मिला जब नीतीश कुमार ने केंद्रीय बजट को सराहा और वित्त मंत्री पी.चिदंबरम ने विशेष राज्य के दर्जा के लिए जरूरी बदलाव के संकेत दिए। लेकिन यह बात नीतीश कुमार को अच्छी तरह से पता है कि मौजूदा समय में बिहार और देश में कांग्रेस की हालत अच्छी नहीं है और देश भर में कांग्रेस के खिलाफ एक लहर सी है। यूपीए-2 के दौरान आए दिन भ्रष्टाचार के मामले देखने को मिले। यहां तक कि पूर्व केंद्रीय संचार मंत्री और डीएमके के नेता ए.राजा ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले का बारे प्रधानमंत्री को सारी बातें मालूम थीं और प्रधानमंत्री कार्यालय में विशेष सचिव पुलक चटर्जी भी सारी बातों से अवगत थे, तो फिर प्रधानमंत्री ने पूरे देश के सामने झूठ बोला कि उन्हें हकीकत मालूम नहीं था, जबकि स्थिति ठीक इसके विपरीत थी। सभी ने देखा कि किस तरह से डीएमके के द्वारा समर्थन वापस लेने के अगले ही दिन सीबीआई या दूसरे शब्दों में कहें तो कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इंवेस्टीगेशन ने किस तरह से डीएमके प्रमुख करुणानिधि के पुत्र स्टालिन के बेटे के घर पर छापा मारा और छापा मारने का कारण दो महीने पहले खरीदी गई विदेशी गाड़ी पर आयात शुल्क ना चुकाना कारण बताया गया। 

सीबीआई छापे से केंद्र सरकार मायावती और मुलायम को संदेश देने में कामयाब रही, क्योंकि दोनों नेताओं के खिलाफ आय से ज्यादा संपत्ति का मामला सीबीआई के यहां लंबित है। छापे का परिणाम यह हुआ कि मायावती और मुलायम ने अपना समर्थन जारी रखने का एलान कर दिया। यह केंद्र सरकार के लिए राहत की ख़बर थी क्योंकि केंद्र सरकार डीएमके के समर्थन लेने के बाद से अल्पमत में चल रही है और उसे बचाए रखने के लिए मायावती, मुलायम के समर्थन की बेहद जरूरत है। देश भर में मंहगाई और भ्रष्टाचार के कारण सत्ताधारी दल के विरुद्ध माहौल बन रहा है लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि विपक्षी पार्टियां इस माहौल को अपने पक्ष में किस तरह से भुनाती हैं, क्योंकि विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों में भी अच्छी स्थिति नहीं है। अब नरेंद्र मोदी के सामने आने वाले विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती है। पार्टी में एकमात्र वे ऐसे नेता हैं जिनका कद राज्य के बाहर है और उनमें वोटों के ध्रुवीकरण की क्षमता भी है।
कर्नाटक और दिल्ली विधानसभा के लिए होने वाले चुनाव नमो के लिए एक परीक्षा की घड़ी है और पूरे देश पर इसका असर पड़ने की संभावना है। वैसे सभी दलों की नज़र यूपी में अधिक से अधिक लोकसभा सीट लाने पर है, क्योंकि यूपी में 80 लोकसभा सीट है और जो भी पार्टी यहां अच्छा प्रदर्शन करेगी। आगामी सरकार के गठन में उसकी भूमिका निश्चित तौर पर निर्णायक होगी। 

मुलायम सिंह यादव ने साल भर पहले से इस संबंध में तैयारी शुरू कर दी है और पार्टी प्रत्याशियों के नाम भी घोषित कर दिए हैं, लेकिन हाल के दिनों में यूपी में प्रशासन की कमजोरी और दंगों के भड़कने से समाजवादी पार्टी का मुस्लिम वोट प्रभावित हुआ है। इसके अलावा, मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन से सौदेबाजी के लिए एनडीए के शासन को बेहतर तक बता डाला। सपा का एकमात्र मकसद कांग्रेस से अधिक से अधिक वित्तीय मदद झटकना है जिससे कि अखिलेश सरकार विभिन्न योजनाओं को पूरा कर सके और आगे के लिए संभावना भी बनाई रखी जा सके। यानि कि दोनों हाथों में लड्डू, लेकिन यह कई बार भारी भी पड़ता है जैसा कि पहले कल्याण सिंह और साक्षी महाराज का सपा में शामिल करके पार्टी भुगत चुकी है, लेकिन पहलवान मुलायम सिंह कब कौन पैंतरा बदल दें, ये तो वही जाने। आखिर में वे कुश्ती के पुराने खिलाड़ी रहे हैं और राजनीति में दांव-पेंच बहुत मायने रखता है। खैर, हम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा द्वारा आगामी चुनाव लड़ने की बात कर रहे थे और अभी देखना बाकि है कि राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है। यह तो आने वाला समय ही बतायेगा।

दुनिया की मजा लेलो ये दुनिया तुम्हारी है !

एक तरफ गुजरात के सौराष्ट्र का पूरा इलाका और महाराष्ट्र भीषण सूखे की चपेट में है. वहीँ आसाराम बापू का नया शिगूफा सुनिए. उन्होंने भरी सभा में कहा है कि वे चमत्कारी हैं. जहां चाहे वहां पानी बरसा सकते हैं. एक तरफ गुजरात का सौराष्ट्र और दूसरी तरफ महाराष्ट्र दोनो जगह भीषण सूखे की चपेट में हैं. बावजूद इसके आसाराम ने अपने भक्तों पर होली के बहाने जमकर पानी की बर्बादी की. जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि वे सूखाग्रस्त इलाके में जब चाहे तब पानी बरसवा सकते हैं.  आसाराम ने गुजरात में अपने भक्‍तों के साथ होली मनाते हुए अपनी सारी सीमाएं लांघ दीं. इस दौरान उन्होंने मीडियावालों की तुलना कुत्तों से भी की. साथ ही कहा कि हम किसी सरकार के बाप से पानी नहीं लेते. गौरतलब है कि 40 साल के सबसे भीषण सूखे से संघर्ष कर रहे महाराष्ट्र की सरकार ने आसाराम से सिर्फ इतना कहा था कि लोग प्यास से मर रहे हैं, आप होली के नाम पर पानी ऐसे मत बहाइए और पानी देने से मना कर दिया था. इस पर आसाराम का पारा चढ़ गया था. उन्होंने आध्यात्मिक संत की परम्परा को ताक पर रख कर एक सड़क छाप की तरह व्यवहार किया.  मीडिया पर निशाना साधने के दौरान अपने आप को बापू कहते हुए आसाराम कहते हैं कि बापू मूंग दल रहे हैं और कुत्ते भौंक रहे हैं. इतना ही नहीं गुजरात और महाराष्ट्र के सूखे को नजरअंदाज करते हुए आसाराम कहते हैं कि भगवान मेरे साथ हैं, मैं तो दिल खोल के रंग बरसाऊंगा. उन्होंने खुद के पास चमत्कारिक शक्ति होने का दावा किया. इतना ही नहीं भगवान को अपना यार बता डाला. उन्होंने कहा कि हम तो ‘यार’ के पानी से रंग बरसाते हैं. जहाँ भी सुखा पड़ रहा होता है हम वहां पानी बरसवा देते हैं…!

इन सब बातों को सुनकर एक आम आदमी जो आसाराम की अंधी भक्ति करता है वो और भी अन्धविश्वासी हो जाएगा. क्योंकि उसे लगता है कि बाबा सब कुछ कर सकते हैं. क्या खूब आसाराम का कमाल है. मुझे तो हँसी आती है ऐसे ढोंगियों की बातों पर….क्या खूब मजाक है हमारे देश मे अलादीन का चिराग है और हम लोगो को खबर नही. आसाराम को तत्काल महाराष्ट्र और देश के अन्य सूखाग्रस्त राज्यों मे जाकर बारिश करवानी चाहिये. आसाराम के होते हुए इस देश मे सूखे की वजह से देश मे इंसानो और जानवरो की भूख से मौत हो रही है ? वाह, आसाराम कभी भी बारिश करवा सकता है मगर लगता है दिमाग और आंख से कमजोर है जो सूखाग्रस्त इलाके इसे नजर नही आ रहे. दोष बापू का नही, बापू के अन्धे भक्तो का है, अनपढ और अज्ञानी की फ़ौज को सामने खड़ा करके बापू यह भूल कर रहे है कि उसकी लाठी मे आवाज नही होती है. फिर यह ना कहना की अरे क्या हुआ हमारे यार ने ही तो लाठी मारी है. आसाराम जी आप संत का मतलब जानते हो या यूँ ही आम जनता को बेवकूफ बना रहे हो ....!

 स्व अंत जो अपने यानी उसके पास अपना कहने के लिये परिवार,घर, धन संपदा यहा तक कि शरीर भी अपना न माने उसे संत (अपभ्रंश) बोलते है. ढोंग पाखंड पर आधारित धर्म व्यवसाय करने वाला,क्रोध-लोभ-मोह से युक्त सांसारिक लाभ लेने वाला तुम्हारी तरह स्वयंभू संत कोई और न होगा. आसाराम बापू की उम्र कितनी है यह तो पता नही लेकिन उनके आये दिन आये बयानों को  सुन कर ऐसा लगता है की वो पूरी तरह से ये भूल चुके हैं कि वो एक मनुष्य मात्र हैं. और एक भारतीय परिवेश में निवास करते हैं.आसाराम क्या कहते है उसका भी उसे भान नही है, कभी-कभी मुझे तो उन लोगो पर भी तरस आता है जो इस सत्य के मार्ग से भटके हुए के पीछे दौड़ते है, संत कौन होता है ? उसका जीवन कैसा होता है ? हिन्दू या मुसलमान दोनो में संतो और सूफ़ियों की परम्परा रही है जो आम लोगों के दुख-दर्द और मुश्किल में सही राह बताते हैं जिससे उनका दुख कुछ कम हो और वे संकटों का धैर्य से मुकाबला कर सकें. सच्चे संत का जीवन आडंबर रहित, सदा और अहंकार से मुक्त होता है. आज के संत बड़े-बड़े आश्रम-बंगले बना कर बैठे हैं, आलीशान कारों में घूमते हैं और अपने ही बेटों-बेटियों को उत्तराधिकारी बना देते हैं जिससे उनका अपार धन उनके पास ही रहे. या सारे ढोंगी-धूर्त लोग होते हैं जो दिखाने के लिये थोड़ा जन-कल्याण का काम करते हैं लेकिन सबसे बड़ा हिट उनका खुद का स्वार्थ साधना होता है. 

ऐसों को ईश्वर कभी माफ नहीं करता और हम आपने सामने ही इनकी दुर्गति देख सकते हैं. जनता ने अंधभक्ति नहीं बल्कि विवेक और समझदारी से काम लेना चाहिये. जिस दिन आचार्य रजनीश ने अमेरिका में अपने आप को भगवान होने की घोषणा की थी उसके कुछ ही दिनों बाद अमेरिकी सरकार ने रजनीश को लात मारकर भगा दिया था,उनके भक्तों की आंखे भी खुल गयी सभी उन्हें छोड् कर चले गये । वहां से उनका पतन चालू हो गया था जो उनके अंत के साथ समाप्त हो गया ।इसका भी अंत निकट है क्योंकि इसने भी अहं ब्रम्हास्मी रूप मिथ्याहंकार की घोषणा कर दी है । देखा जाए तो प्राचीन काल के संतों के पास ना तो कोई फोज थी ना उनके पास कोई क़िला या महल था जबकि उनसे पहले के लोगो की निशानियाँ मिस्र मे भरी पड़ी है जो मालदार थे ओर अपनी पूजा करवाते थे ना उन्होने कभी यह कहा की उनकी तो अल्लाह से यारी है वो बारिश करा देंगे बस उन्होने एक सीधा ओर सच्चा रास्ता दिखाया था  लेकिन आजकल के बाबा सारे महलों मे रहते है जिसे चाहता है कुत्ता बोलते है जिसे चाहता है उड़वा देते है.कारों का काफिला साथ चलता है ओर हम जेसे भोले भाले लोग 10/ 10रू चंदा देकर इन बाबा लोगों को अरबपति बना देते है ओर फिर नीचे खड़े होकर अपने ही पेसों का रंग डलवा कर खुश हो जाते है…! 

जो लोग इस चोर पाखंडी को समर्थन करते हैं वो लोग पानी की इस तरह बर्बादी छोटे बच्चो की हत्या, उनके आश्रम मे सेक्स स्कॅंडल, समगलिंग इन सब चीजो को भी समर्थन कर रहे हैं.. यह विशुद्ध धर्म व्यवसायी है. अंधभक्तो का हुजूम इसे ईश्वर का पर्याय समझता है. ढोंगी इस देश को लूटते आये और मूर्खो की बहुलता से लूटते रहेगे. और एक बात इन्हे संत की पदवी किसने दी या तो ए स्वाएंभु संत हो गये है या किसी बेवकूफ ने ही संत की पदवी बहाल की होगी, और यह संत जो इतनी मस्ती मे बात करता है तो इसकी सरकार ने भी इंक्वाइरी करना चाहिये. सच तो यह है कि हमें बेसिरपैर की बातें और बकवास सुनने में मजा आता है और हम भी अपने जीवन में किसी चमत्कार की आशा करने लगते हैं..!

अगर सच ही बरसात करवाना किसी के हाथ में होता तो दुनिया में कभी अकाल नहीं पड़ता…सूखा भी नहीं पड़ता और सूखे से लोग कभी मरते नहीं ऐसी बातों की उपेक्षा कीजिये.आज से पहले भी ऐसे बहुत से लोग हुये है जिन्हे यह भ्रम था की वे भगवान है. परंतु न वे भगवान थे और न यह भगवान है. यह हम लोगों की बेफकूफी है कि हम इन लोगों के सामने नतमस्तक होकर इन लोगों को इस प्रकार भ्रम में डूबने देते है. आसाराम का भ्रम भी दूर हो जायेगा बस जरूरत है कि अपने आपको पहचानो और अंधभक्ति में न पड़ो. भारत मे बेवकूफो की कोई कमी नहीं है इसीलिये ये धर्म के ठेकेदार लोगो को बेवकूफ बनाते है ये देखकर मुझे शमशाद बेगम का वो गाना याद आता है “दुनिया की मजा लेलो दुनिया तुम्हारी है, दुनिया को लात मारो दुनिया सलाम करे ”

जम्मू कश्मीर से तमिलनाडु तक हाल ऐ दास्तान !

कौन कहता है कि नेता जनता के लिए नहीं लड़ते..? उनकी हक की आवाज़ नहीं उठाते..? उनके लिए लड़ाई नहीं लड़ते..? उन्हें जनता की चिंता नहीं है..? नेताओं को जनता की चिंता भी है और वे उनके हक की आवाज़ भी उठाते हैं बशर्ते इसमें उनका भी तो कुछ फायदा होना चाहिए। नेताओं को वैसे भी जनता से क्या चाहिए एक अदद वोट। इस एक वोट के लिए तो हमारे नेतागण किसी भी हद तक जा सकते हैं..! वोटों को साधने का कोई मौका ये नेता नहीं छोड़ते चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े..! हिंदुस्तान की राजनीति कुछ ऐसे ही चलती है। बरसों से यही तो होता आ रहा है। अलग – अलग राज्यों की भाषा, संस्कृति अलग- अलग है लेकिन नेताओं का चरित्र बिल्कुल एक  जैसा है..! उत्तर से लेकर दक्षिण तक की हालिया राजनीतिक हलचलें इस तस्वीर की धुंधलाहट को और साफ करती है। शुरुआत वर्तमान में सबसे चर्चित दक्षिणी राज्य तमिलनाडु से करते हैं। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को चेन्नई में आईपीएल मैचों में श्रीलंकाई खिलाड़ियों के खेलने पर एतराज है। इतना ही नहीं वे भारत सरकार से श्रीलंका से मैत्रीपूर्ण संबंध खत्म करने तक की वकालत करती हैं। उन्हें श्रीलंका को भारत का मित्र देश कहने में तक आपत्ति है। जयललिता तो जयललिता द्रमुक प्रमुख करुणानिधि को ही देख लिजिए। श्रीलंकाई तमिलों के लिए केन्द्र सरकार से समर्थन तक वापस लेने से पीछे नहीं हटे। आखिर क्यों..? श्रीलंका के तमिलों के हितों की रक्षा के बहाने खुद को तमिलों का सबसे बड़ा हितैषी जो साबित करना है तभी तो तमिलनाडु में तमिलों की सहानुभूति हासिल कर पाएंगे..! 

जयललिता के तेवर देखकर तो ऐसा लगता है कि जैसे तमिलनाडु में रहने वाले तमिलों को कोई दुख तकलीफ है ही नहीं..! जैसे तमिलनाडु में न तो तमिलों के मानवाधिकारों का हनन होता है और न ही तमिलों के साथ किसी तरह की ज्यादती..! मैडम जी अच्छा लगा सुनकर कि आपको श्रीलंकाई तमिलों की चिंता है लेकिन पहले अपने राज्य के हालात तो सुधार लें…उनकी सुध तो ले लें…फिर करना श्रीलंकाई तमिलों की चिंता..!
जयललिता जी राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो(एनसीआरबी) के आंकड़े कहते हैं कि 2011 में देश में अपराधों के मामले में उत्तर प्रदेश(33.4 %) के बाद दूसरा नंबर तमिलनाडु (11.5 %) का है। आपको अपने घर को आग से बचाने की चिंता नहीं है लेकिन दूसरे के घर की आग की भभक आपको परेशान कर रही है। वोटों के लिए हमारे एक और राज्य बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी आजकल कुछ ज्यादा ही सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। उन्हें बिहार को हर हाल में विशेष राज्य का दर्जा जो दिलवाना है। कभी बिहार में तो कभी दिल्ली में बिहार के लोगों के नाम पर उनके हक की बात करते दिखाई दे रहे हैं। इस बहाने बिहार की जनता का हितैषी कहलाने का तमगा भी हासिल कर लेंगे ताकि आम चुनाव में भी बिहार की जनता इनकी पार्टी के उम्मीदवारों को जिता कर संसद पहुंचाए..! 

इन सब से दो कदम आगे हैं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला। साहब जिस देश में रहते हैं…जिस देश की खाते हैं उसके खिलाफ बोलने में नहीं हिचकते..! मानवता की दुहाई देकर देश के दुश्मनों की पैरवी करने का कोई मौका नहीं चूकते..! अफजल गुरु की फांसी के बाद उमर की प्रतिक्रिया को याद ही होगी आप सभी को। उमर की प्रतिक्रिया से तो ऐसा लग रहा था मानो अफजल को फांसी देकर सरकार ने बड़ी गलती कर दी..! इन साहब को भी सिर्फ वोट ही दिखाई देते हैं। सीमा पार से आकर भारतीय सैनिकों का सिर कलम करने वाले या देश की संसद पर हमला करने वाले इन्हें नहीं दिखाई देते..! इन्हें तो कश्मीर में जवानों का हथियार लेकर चलने में तक आपत्ति है..! इनका बस चले तो आतंकी अगर जवानों पर हमला करें तो ये जवानों को मुकाबला करने के लिए लाठी पकड़ा दें..! हाल ही में सीआरपीएफ जवानों पर आतंकियों ने जब हमला किया तो क्या ऐसा नहीं हुआ था..? 

ये कहानी सिर्फ तमिलनाडु, बिहार या जम्मू-कश्मीर की ही कहानी नहीं है…सभी राज्यों में कुछ ऐसा ही हो रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि हर राज्य में ये काम करने वाले सत्ताधारी दल के नेता अलग – अलग हैं…उनकी पार्टी अलग है लेकिन सबके तीर का निशाना एक ही है…वोटबैंक..! आखिर सत्ता की चाबी हासिल करने का यही तो सबसे सटीक तरीका जो लगता है इन्हें..! विडंबना देखिए फैसला तो जनता को ही करना होता है लेकिन हमारे देश की जनता बड़ी भोली है…हर बार नेताओं की मीठी बातों पर इनके झूठे वादों पर एतबार कर लेती है…और इन्हें सौंप देती है सत्ता की चाबी…लेकिन बड़ा सवाल तो ये है कि आखिर कब तक..? क्या जनता समझ पाएगी इन नेताओं का चरित्र..?

Friday, April 5, 2013

क्या देश की सारी नदीयों को एक साथ जोड़ी जाएं ?

मैं नदी हूँ, अब नहीं मै ऊछलूंगी। सूख गए कण्ठ गर मेरे तो, बन्द बोतल नीर का पता मैं पूछ लूंगी। कितनी लाशों और कितने ढेर को कब तलक मै सम्भालूँ, और क्यों ? अधमरी तो हूँ मैं सालों-साल से, उम्मीद बंधती है नहीं इस चाल से। सुध मेरी लो, नहीं और कुछ लूंगी मैं नदी हूँ।

ये नदी का दर्द है जीसकी पीड़ा को आज हम सब भूला दिए है। जिस नदी ने हमारे देश की नाम और विरासत को नई पहचान दी, जिन नदीयों के नाम के आसरे ही हम सब की पहचान दुनिया के देषों में हुई, जिसे कभी अंग्रेजों ने इंडस नदी के नाम पर हमारे देष को इंडिया कहा, तो दुसरी ओर देषप्रेमियों ने हिंडन के नाम पर इसे हिन्दुस्तान कहा। मगर आज नदी अपने वजूद को बचाने के लिए तड़प रही है। देश के उत्तर की नदियों को दक्षिण की नदियों से जोड़ने का पहला प्रस्ताव 1970 में पेश किया गया था। सूखी हुई नदियों की इसी तड़प को तरलता देने के लिए इंदरागांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक ने कई बार जितोड़ प्रयास किए मगर नतीजा कुछ भी नही निकला। भीषण सूखे के बाद नदियों को आपस में जोड़ने के लिए 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसके लिए विशेष कायदल गठित किया था। 5 लाख करोड़ रुपये की यह पूरी परियोजना थी, जिसे 2016 तक पूरा किया जाना था। मगर आज भी जमीनी हकीकत कोसों दूर है। 30 नदियों को आपस में जोड़ने की योजना इस परियोजना के अंतगत प्रस्तावित की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को देश में नदियों को जोड़ने संबंधी महत्वाकांक्षी परियोजना पर समयबद्ध तरीके से अमल करने का निदेश भी दे चूकी है।

 यह योजना 1980 में विकसित हुए नेशनल पसपेक्टिव प्लान का सुधरा हुआ रूप है। इस योजना का मकसद था सहायक नदियों के पानी को इकट्ठा कर सिंचाइ और जल-विद्युत परियोजनाओं के लिए इस्तेमाल करना। आज ये परियोजना लागू हो गई होती तो महाराश्ट्र में भिशण सूखे से कुछ हद तक निजात पाई जा सकती था। साथ ही बिहार जैसे राज्यों को हर साल बाढ़ से होने वाली माल जाल की क्षती से बचा जा सकता है। मगर अब तक यूपीए सरकार इस परियोजना को लागू करने के बजाय इसके उपर कुण्डली मार कर बैठी हुई है। सरकार इस परियोजना को लागू करने में हुई देरी को लेकर अंतराश्ट्रीय समझौते का हवाला दे रही है सरकार का कहना है कि गंगा नदी के पानी के बंटवारे के बारे में दिसंबर 1996 की भारत-बंग्लादेश के बिच हुई समझौते का क्या होगा। अगर गंगा का पानी दूसरे नदियों की ओर मोड़ा गया तो इस संधि की शर्तो को कैसे पूरा किया जाएगा। 

इस परियोजना को लेकर सिर्फ आर्थिक पक्ष ही नहीं है, बल्कि उसके साथ सामाजिक, भौगोलिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक मुद्दे भी जुड़े हैं। जिससे परियोजना को लागू करने में अड़चने आरही है। साथ ही पड़ोसी देष के बीच जल-विवाद का क्या होगा? ये भी एक बड़ा सवाल है। राज्य भी इस परियोजना को लेकर आपती जता रहे है। ओडिशा इसे मानने को तैयार नहीं है, आंध्रप्रदेश भी अपना कदम आगे बढ़ाने के मूड में नहीं है। विदेशी पूंजी पर चलने वाले कई एनजीओ भी स्थानीय निवासियों के विस्थापन के मुद्दे को जोर-शोर से उठाते रहे है, जिसके कारण राज्य सरकारें भी हिचकीचा रही है। राहुल गांधी ने इस कार्यक्रम को विनाशकारी विचार कहकर खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा था कि यह योजना देश के पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है। भारत की सत्ताधारी पार्टी के प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी के इस बयान से प्रभावित होकर तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसे मानव, आर्थिक और पारिस्थितिक विनाश बताया था। केंद्र में सत्ता परिवर्तन होने के बाद यह योजना दलगत राजनीति की भेंट चढ़ गई और नई सरकार को पुरानी सरकार के फैसले में खोट दिखाई देने लगा। मगर एक बार फिर से इस परियोजना ने सबका ध्यान खिंचा है, तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या देश की सारी नदीयों को एक साथ जोड़ी जाएं ?

Thursday, April 4, 2013

‘अँग्रेज़ी’ का उपनिवेश, और भारत !

बात अँग्रेजों के ज़माने की है। तब हमारा मुल्क गुलाम था। अँग्रेज़ तो हम पर हुकूमत के ही इरादे से आए थे। लिहाजा सत्ता-व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी उन्हें मंज़ूर न थी। इसीलिए शासक हमेशा ग्रेट ब्रिटेन से एक्सपोर्ट किए जाते थे। सन सत्तावन के विद्रोह से यही कोई चार साल पहले ब्रिटिश क्राउन को अहसास हुआ कि भारत में भी शिक्षित लोग रहते हैं। उन्हें भी अँग्रेज़ों की ही तरह पढ़ने-बढ़ने का अधिकार है। लिहाजा 1853 में क़ानून बना। भारतीय अब आईसीएस की परीक्षा में बैठ सकते थे। शर्त यह थी कि परीक्षा के लिए ब्रिटेन जाना पड़ेगा। अधिकतम आयु सीमा 23 साल तय की गई थी। और भी कई छोटे-मोटे पेंच थे। मतलब क़ानून और क्राउन की मंशा एक ही थी। असंतोष का साँप मरा, अँग्रेज़ों की लाठी भी नहीं टूटी। कहने की ज़रूरत नहीं कि 1864 से पहले तक एक भी भारतीय आईसीएस की परीक्षा पास नहीं कर पाया। भारतीयों में शिक्षा के प्रसार से जैसे-जैसे उनके आईसीएस बनने के आसार बढ़े, नियम भी कड़े होते चले गए। 1853 में जो आयु-सीमा 23 साल थी, वह 1879 में महज 19 साल पर आ अटकी। 1861 में भारत लोक सेवा अधिनियम बना। कुछ उच्च और महत्वपूर्ण पदों को आरक्षित कर दिया गया। 1864 में रविन्द्र नाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येन्द्र नाथ ठाकुर ने इतिहास रचा। वह आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले पहले भारतीय बने। लीक बनी और इस तरह 1876 तक 12 भारतीय आईसीएस अधिकारी बनने में कामयाब रहे। अंग्रेजों की परेशानी अब बढ़ने लगी। शासितों और गुलामों की शासन में भागीदारी, सिस्टम के लिए ख़तरनाक मानी गई। लिहाजा 1879 में लॉर्ड लिटन के प्रयासों से नया प्रादेशिक सिविल सेवा क़ानून बना। 

अब उच्च सामाजिक स्थिति वाले व्यक्तियों को परीक्षा के झंझटों से मुक्ति दे दी गई और उनके मनोनयन की जिम्मेदारी प्रांतीय सरकारों को सौंप दी गई। अँग्रेज़ी कुचक्र के कारण आईसीएस अधिकारी बन पाने में विफल रहे सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी ने इसका विरोध किया। 1885 में कांग्रेस के पहले अधिवेशन में यह मुद्दा उठा। लॉर्ड डफरिन को चार्ल्स एचिसन की अध्यक्षता में आयोग गठित करना पड़ा। हमारी जिज्ञासा का केन्द्र यह इतिहास नहीं है। हम तो यह जानना चाहते हैं कि लिटन का ‘मोटिव’ क्या था? आईसीएस की परीक्षा तो सन 1922 तक ब्रिटेन में ही होती रही। देश के तमाम लोग सामंत और साभ्रांत नहीं थे। जो सामंत और साभ्रांत थे, वही अंग्रेज़ी की पढ़ाई और परीक्षा के लिए ब्रिटेन जाने की औक़ात भी रखते थे। फिर उच्च सामाजिक स्थिति से लिटन का क्या तात्पर्य था? कहीं ऐसा तो नहीं कि लॉर्ड लिटन की दृष्टि में वही व्यक्ति उच्च-सामाजिक स्थिति वाला हो सकता था, जिसकी अंग्रेजों(सिस्टम) के प्रति स्वामी-भक्ति असंदिग्ध हो! ताकि व्यवस्था में उसकी भागीदारी क्राउन के लिए ख़तरा नहीं बन सके! निस्संदेह आईसीएस परीक्षा के लिए शर्तों को कठोरतम बनाने और मनोनयन द्वारा अपने विश्वासपात्रों में पद बांटने के लिए ही लिटन ने यह क़ानून बनवाया था। आज़ादी से पहले क्राउन के ‘बिहाफ’ में ईस्ट-इंडिया कम्पनी और वायसराय शासन करते थे। आज़ादी के बाद जनता के ‘बिहाफ’ में ‘देसी लॉर्ड’ का शासन स्थापित हुआ। मान्यता थी कि आज़ाद मुल्क की अपनी भाषा भी होती है। लिहाजा सर्वसम्मति से ‘हिन्दी’ भारत की ‘राजभाषा’ घोषित कर दी गई। लेकिन हिन्दी जनता की भाषा थी। और जनता की भाषा में राजकाज का कोई इतिहास नहीं था। इसीलिए ‘भारत का संविधान’, दरअसल ‘कंस्टिच्यूशन ऑव इंडिया’ का अनुवाद है।

आज़ादी के बाद भी कई दशकों तक यूपीएससी(आईसीएस का पोस्ट-इंडिपेंडेंट फॉर्म) की परीक्षाओं में अँग्रेज़ी की अनिवार्यता बनी रही। बाद में क्षेत्रीय राजनीति की मजबूरी ने ‘हिन्दी’ और अन्य भारतीय भाषाओं को भी जगह दिलवा दी। आज़ादी के दशकों बाद तक, आम-आदमी तो क्लर्क और चपरासी से ऊँचे ओहदे का सपना भी नहीं देख पाया। लिहाजा व्यवस्था का संकट पैदा नहीं हुआ। शिक्षा के प्रसार और निम्न-मध्यवर्गों में आई चेतना ने ‘सिस्टम’ के सामने जब नई चुनौतियां पेश करनी शुरू कर दीं तो परेशानी बढ़ी। खुली प्रतियोगिता के कारण आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में ग़रीब परिवारों के बच्चे योग्यता और प्रतिभा के बल पर दाखिला लेने लगे। अँग्रेजी की अनिवार्यता खत्म होने के बाद यूपीएससी में भी इसी वर्ग के युवा ‘इंग्लिश स्पोकेन’ अभिजात्य पर भारी पड़ने लगे। चूँकि भारत अब ब्रिटिश उपनिवेश नहीं है, लिहाजा इन पर अंकुश लगाने में व्यवस्था को थोड़ी हिचक हो रही थी। इसलिए पहले इन नये रंग-रूटों की ‘मशरूमिंग’ कर उन्हें अपने रंग में ढाला गया। लेकिन अब प्रतिभा की बाढ़ ने परंपरागत अभिजात्य तबके के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। महंगे इंग्लिश स्कूल-कॉलेजों में मोटी फीस के एवज़ में उपहार स्वरूप मिले 95-99% वाले अंक-पत्रों और अँग्रेजी में महारथ के बाद भी यह लोग सिस्टम में अपनी धाक बनाए रखने में अक्षम सिद्ध हो रहे हैं। इनकी विशेषता ‘इंग्लिश स्पोकन’ होना ही है।

एक और अहम कारण यह कि निम्न और निम्न-मध्यवर्ग के आईएएस-आईपीएस सिस्टम को ठीक उसी तरह सपोर्ट नहीं कर सकते, जैसा कि अभिजात्य वर्ग से आनेवाले अधिकारी करते रहे हैं। पिछले दो दशकों से भूमंडलीकरण और उद्योगीकरण की घुड़दौड़ ने व्यवस्था को जनता की नज़रों में नंगा किया है। कई आलाधिकारियों ने सरकारी नीतियों पर सवाल उठाए हैं। ऐसे में सिस्टम को ऐसे रंगरूटों की ज़रूरत है जो सिर्फ उसके आदेशों का पालन करे। ऐसे में मैकॉले के बाद लॉर्ड लिटन की याद स्वभाविक थी। अगर आज़ादी के बाद से भारतीय शासन-व्यवस्था को आपने क़रीब से देखा है, तो यह प्रयास अस्वभाविक नहीं था। सरकार पहले आईआईटी को लेकर गंभीर हुई।

प्रवेश पानेवाले बच्चों के ‘लेवल’ को लेकर चिंता ज़ाहिर की और जो नया ‘फॉर्मूला’ दिया, उससे यह मंशा जाहिर हो गई कि सरकार आखिर किन छात्रों का प्रवेश रोकना चाहती है। और अब सिविल सर्विसेज में अँग्रेज़ी को अनिवार्य करने का कुचक्र रचा गया। मानो आईएएस-आईपीएस बनने के बाद आपको भारत में नहीं, यूरोप और अमेरिका में काम करना है! या कि भारत की जनता अँग्रेजी ही बोलती और समझती है? मतलब साफ है कि सरकार वैसे अधिकारी चाहती है, जो जनता की नहीं, बल्कि सिस्टम की भाषा को समझे। सिस्टम का फ़र्माबरदार बन सके। यह काम तो सुविधाभोगी वर्ग ही कर सकता है। पैटर्न में बदलाव का मक़सद भी यही था। लिटन टर्मिनोलॉजी में कहें तो सिविल सर्विसेज को अब सीधे-सीधे समाज में परंपरागत रूप से उच्च-स्थान प्राप्त व्यक्तियों के लिए ‘रिज़र्व’ करने की साजिश चल रही है। आईआईटी जेईई के पैटर्न में बदलाव का मकसद भी यही था। खनिज-सम्पदा वाले राज्यों में निरंकुश पुलिस-तंत्र। जनता के साथ गुलामों जैसा सलूक। प्रतिभाओं को कुचलने के लिए प्रतिकूल नीतियाँ। करीब सात दशक बाद भी अँग्रेज़ी की अनिवार्यता! यह परिदृश्य इस बात का सबूत है कि देश छोड़कर सिर्फ अँग्रेज़ ही गए थे। भारत अँग्रेजों का तो नहीं, अँग्रेज़ी का उपनिवेश आज भी है।

Tuesday, April 2, 2013

मासूम बच्चियों के यौन अपराध के लिए जिम्मेदार कौन ?

दिल्ली की रहने वाली पांच साल की मासूम बच्चीए जिसने शायद बेदर्द दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं थाए को कुछ दरिंदों ने अपनी हैवानियत का शिकार बनाया। वह अपने हमउम्र बच्चों के साथ घर के बाहर खेल रही थी और वहीं से उसे अगवा कर उसका बलात्कार किया गया। आज वह अबोध बच्ची जिन्दगी और मौत के बीच झूल रही है। दूसरी घटना भी अपराधों की राजधानी बन चुकी दिल्ली के एक सरकारी स्कूल की हैए जहां स्कूल कैंपस के भीतर ही महज दूसरी कक्षा की ही छात्रा के साथ दुष्कर्म किया गयाए लेकिन यह घिनौनी हरकत किसने कीए इसका जवाब ढूंढ़ने में पुलिसए प्रशासन और स्कूल अधिकारी सभी नाकामयाब सिद्ध हो रहे हैं। बलात्कार की बेहद घिनौनी और अमानवीय घटनाओं की बढ़ोत्तरी पर समाज के एक वर्ग का यह साफ कहना है कि महिलाओं का छोटे.छोटे कपड़े पहननाए उनका रात के समय घर से बाहर निकलनाए अन्य पुरुषों के संपर्क में आना और आधुनिकता का जामा ओढ़ लेना ही उनके साथ हो रही ऐसी घटनाओं का कारण हैए लेकिन वे बच्चियां जो अबोधावस्था में ही हैवानों का शिकार बन जाती हैं उन पर यह मान्यता किसी भी रूप में खरी नहीं उतरती बल्कि पूरी तरह फेल हो जाती है।

महिलाओं की स्वतंत्रता की पैरवी करने वाले बुद्धिजीवियों का यह मत है कि समाज और प्रशासन का ढीला रवैया और ऐसी गंभीर घटनाओं के प्रति लचर प्रतिक्रिया से ही ऐसे वहशियों को ज्यादा शह मिलती है और वे खुले आम अपनी घिनौनी मानसिकता को अंजाम देते हैं और अब हालात ऐसे हो चुके हैं कि वे मासूम बच्चियों को ही अपना निशाना बनाने लगे हैं। वे लोग जो महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले कपड़ों और उनके मेक.अप को उनके प्रति होते अत्याचारों का कारण बताते हैंए उन पर कड़ा निशाना साधते हुए नारीवादियों का कहना है कि पहले तो महिलाओं को अपने अनुसार जीने की पूरी आजादी है लेकिन अगर एक बार को मान भी लिया जाए कि उनकी कुछ हरकतें पुरुषों को उनके प्रति शारीरिक रूप से आकर्षित करती हैं तो इन मासूम बच्चियों का क्या कसूर हैं जो ना तो मेक.अप करना जानती हैं और ना ही पुरुषों को अपने प्रति आकर्षित करनाघ् इस वर्ग में शामिल लोगों का यह साफ कहना है कि पुरुषों की तरह महिलाओं को भी अपना जीवन अपनी मर्जी से जीने का हक है और अपराधों के वास्तविक दोषियों को नजरअंदाज कर महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराने वाला हमारा पुरुष समाज उनके इस अधिकार को बाधित करता है।

वहीं दूसरी ओर समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो यह कहता है कि पुरुषों के अंदर शारीरिक संबंधों को लेकर जो कुंठा पल रही होती है उसी के परिणामस्वरूप वह मासूम बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं और इस कुंठा का एकमात्र और मुख्य कारण है किशोरियों और युवतियों का चाल.चलन जो भारतीय संस्कृति के अनुसार सही नहीं ठहराया जा सकता। मासूम का यौन शोषण पुरुषों की प्राथमिकता कभी नहीं होती बल्कि वह जब अपनी शारीरिक इच्छाएं पूरी नहीं कर पाता तो वह ऐसा कुछ करने के लिए विवश हो जाता है। ऐसे लोगों का स्पष्ट कहना है कि आधुनिकता की भेंट चढ़ चुकी भारतीय नारी की शालीनता ही बच्चियों के प्रति बढ़ने वाले ऐसे यौन अपराधों के लिए दोषी है। वे पुरुष जो संबंधित महिला के साथ संबंध नहीं बना पाते वही मासूम पर अपनी हवस उतारते हैं। हालांकि पुरुषों को भी इस अनैतिक कृत्य के अपराध से मुक्त नहीं किया जा सकता लेकिन कहीं ना कहीं निर्दोष अबोध बच्चियों के साथ हो रहे इन कृत्यों के लिए तथाकथित समझदार महिलाएंए जो हर बात पर आजाद होने का दंभ भरती हैंए ही जिम्मेदार हैं।

क्या अरविंद केजरीवाल का संघर्ष एक छलावा है ?

आम जनता की हालत में अहम परिवर्तन लाने के मकसद से कभी टीम अन्ना के सदस्य रहे आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल बिजली.पानी के दामों में हुई बढ़ोत्तरी के विरोध में अनशन पर बैठे किंतु उन्हें अपेक्षित जन समर्थन हासिल नहीं हुआ। जबकि पिछली बार जब जनलोकपाल जैसे मुद्दे को उठाकर अन्ना हजारे भूख हड़ताल पर गए थे तो मीडिया के साथ.साथ पूरी दुनिया की नजरें उन पर टिकी थीं। किंतु अब अलग.थलग पड़ गए अरविंद केजरीवाल किसी भी परिदृश्य में नहीं रहे। ना ही उन्हें मीडिया फोकस कर रही है और ना ही जिस जनता के लिए उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बगैर अनशन ठाना उसने ही उन्हें महत्व दिया। हालांकि इससे पहले जब अनशन करने के लिए अन्ना हजारे सामने आए थे तब क्या आम क्या खास सब के सब उनके साथ जुड़ने के लिए बेताब थे। आम जनता अन्ना की एक झलक पाने के लिए भीड़ जुटाया करती थीए उनके समर्थन में नारे लगाती थी और हर बड़ा राजनेता उनके साथ मंच साझा करने के लिए अपनी बारी का इंतजार करता था। इतना ही नहीं नामचीन सिलेब्रिटीज तक ताक लगाए बैठते थे कि कब उन्हें निमंत्रण आए अन्ना के समर्थन में भाषण देने का। लेकिन अब जब अरविंद केजरीवाल अकेले अपने दम पर लड़ रहे हैं तो उन्हें कोई भी पूछने वाला नहीं रह जनता द्वारा अरविंद केजरीवाल के आंदोलन से मुंह मोड़ लेने के बाद बने सामाजिक और राजनीतिक हालातों पर बहस करने के लिए बुद्धिजीवियों के दो वर्ग बन गए हैं। दोनों वर्गों के लोग अरविंद केजरीवाल और उनके द्वारा किए जा रहे अनशन को अलग.अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।

कुछ लोगों का कहना है कि  आज जबकि हर क्षेत्र में राजनीति हावी है और भारत की राजनीति को तो वैसे भी स्वार्थ की राजनीति का ही दर्जा दिया जाता है तो ऐसे में अगर कोई भी व्यक्ति समाज सुधार की दिशा में अपने कदम बढ़ाता है तो उसके उद्देश्यों को भुलाकर उसके हर कदम को राजनीति से प्रेरित मानकर नकार दिया जाता है। आमजन की मूलभूत जरूरत बिजली के बढ़ते दामों को वापस लेने के लिए अरविंद ने सरकार पर जोर देना चाहा। लेकिन जिस जनता के लिए वह यह कर रहे हैं वही उन्हें समर्थन देने के लिए तैयार नहीं है और वो भी बस इस आधार पर क्योंकि जनता अरविंद केजरीवाल का राजनीति की ओर रुख करने जैसी मंशा को पचा नहीं पा रही है। राजनीति को आजकल गंदगी माना जाने लगा है और यह भी कहा जाता है कि बिना इस गंदगी में उतरे इसे साफ करना नामुमकिन है। ऐसे में अगर अरविंद केजरीवाल स्वस्थ राजनीति का स्वप्न सजाए उसमें उतरना चाहते हैं तो इसमें गलत क्या है!

वहीं दूसरी तरफ वे लोग हैं  जो यह साफ कहते हैं कि अरविंद केजरीवाल का कोई भी उद्देश्य जन हितार्थ नहीं है। वह पूरी तरह राजनीतिक मंतव्यों को साधने की फिराक में हैं जिसके लिए वह जनता को माध्यम बना रहे हैं। जनता उनकी राजनीतिक मंशाओं को समझती है इसीलिए अरविंद को समर्थन देने से बच रही है। वह जानती है कि राजनीति में कदम रखने के बाद कोई भी व्यक्ति जनता का हितैषी नहीं रहता। सत्ता के नशे में चूर वह सिर्फ वही निर्णय लेता है जिससे वह अपनी कुर्सी को बचाए रख सके। राजनीति के मैदान में कई ऐसे व्यक्तित्व मौजूद हैं जो भोलीभाली जनता की संवेदनाओं का फायदा उठाकर राजनीति में प्रदार्पित तो हुए लेकिन कुर्सी संभालते ही वह सारे वादे भूल गए जो कभी उन्होंने जनता के साथ किए थे। अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक पार्टी ;आम आदमी पार्टीद्ध अगर सरकार बनाने में सफल हो जाती है तो जाहिर है वो भी ऐसा ही करेंगे। जनता समझदार है इसीलिए वह उन पर विश्वास नहीं कर रही है।