Saturday, March 30, 2013

क्या आज शिवाजी महाराज के विचारों की जरूरत नहीं है ?

आज के इस भौतिकवादी युग में षिवाजी महाराज कि उतनी ही जरूरत है जितना कि उनके षाशनकाल में हुआ करती था। बात चाहे हिन्दू ह्रदय सम्राट बिरषिवाजी महाराज की कुषल प्रशासनिक कार्यषैली कि हो, या फिर गरीब और असहाय लोगों के आसुओं के पोछने कि हर मोड़ पर वे आदर्ष और प्रखर राश्ट्रवाद के योध्दा साबित हुए। यही कारण है कि षिवाजी के विचारों को देष में आज कही जयादा जरूरत महसूस हो रही है। जिस षिवाजी के आदर्षो पर आज के युवा पीढ़ी को चलना चाहिए आज उनके आदर्षो को महाराष्ट्र में ही इतिहास की पुस्तकों से शिवाजी राजे का नाम धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। सेकेण्डरी स्कूल की इतिहास की पुस्तकों में शिवाजी का नाम कहीं नहीं है। सन 2008 तक इन बच्चों को यह भी पढ़ाया जा रहा था कि दादो कोंडदेव शिवाजी के गुरु थे। 2010 आते-आते यह तथ्य कुछ लोगों के आंखों में चुभने लगा। और चार सौ साल पुराने इतिहास के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया गया। साथ ही लाल महल से उनकी मूर्ति हटाने की बात होने लगी है। आखिर आज के राजनीतिज्ञ क्या चाहते हैं। क्या वे नहीं चाहते कि आज की युवा पीढ़ी शिवाजी जैसे जुझारू, देश के बारे में पढ़े, उन्हें जाने, उनसे प्रेरणा ले और उनका अनुशरण करे। या उन्हें यह डर है कि अगर युवा पीढ़ी सचमुच शिवाजी की अनुशरणकर्ता बन गर्इ तो उनकी अपनी राजनीति का क्या होगा? आज हमारे देश में जातिगत राजनीति खेली जा रही है। ऊपर-ऊपर से हम खुद को धर्म निरपेक्ष और जाति निरपेक्ष कहते हैं पर हकीकत कुछ और ही बयान कर रही है। एैसे में षिवाजी के कुषल और दक्ष प्रतिभा की यहा पर हम सब को सख्त जरूरत है।
 
 शिवाजी महाराज की गणना श्रेष्ठ हिंदू राजाओं में की जाती है वे जितने लोकप्रिय महाराष्ट्र में हैं, उतने ही लोकप्रिय देश के अन्य हिस्सों में भी हैं। अपने अधिकारों, समुदाय, समाज, इतिहास, स्वतन्त्रता के समर्थन में षिवाजी ने हमेषा लड़ा और लोगों को न्याय दिलाने के लिए आगे लाए। आज राजनीति की खातिर इतिहास को बदलने की कोशिश और उन्हे भूलने कि आदत कर्इ अहम सवाल खड़े करता है। एक तरफ औरंगजेब की पांच लाख की सेना का आक्रमण तो दूसरी तरफ साम्राज्य की अंतर कलह ऐसी विकट परिसिथति में जिस महापुरुष ने 22 वर्ष कि अल्प आयु में क्षत्रपति जैसे दायित्व का भार सुशोभित किया जिसने नौ वर्षो तक सफलता पूर्वक शासन ही नहीं किया बलिक हिन्दवी साम्राज्य का विस्तार भी किया ऐसे महान देश धर्म वीर कि जरूरत आज के इस भारतभूमी की एक बार फिर से आवष्यकता है। राजनीति, संघर्ष और स्वाभिमान के साथ जीना षिवाजी के चरितार्थ से सिखने की जरूरत है। शिवाजी के जीवन से सम्बद्ध लगभग सभी प्रसंग प्रेरणा दायी व आदर्श हैं। तो एैसे में क्या षिवाजी महाराज के विचारों की जरूरत पहले से कही जयादा नहीं है।

क्या तीसरे मोर्चे की राजनीति देश के लिए सही है ?

देश में एक बार फिर से तीसरे मोर्चे की आहट सुनार्इ देने लगी है। भारत के संसदीय लोकतंत्र में कर्इ बार तीसरा मोर्चो बना और टूटा है। मगर मुलायम सिंह यादव ने एक बार फिर तीसरे मोर्चे की राग अलापना सुरू दी है। एैस में क्षेत्रिये दलों के बिच सुगबुगाहट तेज हो गर्इ है। तो वही कांग्रेस और बीजेपी इस पर भड़की हुर्इ हैं। मुलायम कह रहे हैं कि अगले दस साल तक किसी भी एक दल को बहुमत मिलने की संभावना नहीं है लिहाजा तीसरे मोर्चे की सख्त जरूरत है। अभी तक कांग्रेस के संकटमोचन बने मुलायम शायद कांग्रेस से अलग रास्ते की तलाश कर रहे हैं। इसी तरह यूपीए के तकरीबन हर फैसले में साथ रहने वाली एनसीपी को भी इसकी जरूरत महसूस हो रही है। उधर जेडीएस ने भी मुलायम के सुर में सुर मिलाया है। सीपीआर्इ भी सकारात्मक रुख दिखा रही है। लगता है इन दलों को इस बात का आभास हो रहा है कि यूपीए सरकार कभी भी गिर सकती है और कभी भी चुनाव का बिगुल बज सकता है। तीसरे मोर्चे की पिछले संस्करणों को देखें तो यह विशुद्ध स्वार्थ का गठजोड़ का राजनीति रहा है। मुलायम की साख सिर्फ यूपी में है और जीतते भी यूपी में है, लेकिन तीसरे मोर्चे की हवा वह महाराष्ट्र के सांगली में दे रहे है। जहां वह एक सीट भी जीत ले तो बड़ी बात होगी, लेकिन महाराष्ट्र में तीसरे मोर्चे का मतलब है शरद पवार की सियासत में पैनापन लाना। तीसरे मोर्चे की दस्तक, बीजू जनता दल की पहल और शरद पवार के प्रधानमंत्री बनने की इच्छा ने चौदहवी लोकसभा चुनाव से पहले इसके संकेत दिये थे ताकी सत्ता के लिये जीत से पहले और सत्ता भोगने के लिये जीत के बाद के गठबंधन में खासा बदलाव तय किये जा सके। क्या ये गठजोड़ भारतीय राजनीति में कोर्इ बड़ा बदलाव कर सकती है, यह सबसे बड़ा सवाल है। आज के दौर में देश जिन हालातों से गुजर रहा है, उसमे सत्ता से जुड़कर मलार्इ खाने की जो परंपरा राजनीतिक दलों की बन पड़ी है, उसमें सरकार चलाने की कांग्रेस और बीजेपी की अपनी सोच टिकती कहा है ये भी एक बड़ा सवाल है। 

जाहिर है सरकार देश में होनी चाहिये। जिसकी नजर में आम आदमी हो। हर धर्म-प्रांत का व्यä हिे। देश की अर्थव्यवस्था बाजार पर नहीं खुद पर निर्भर हो। आतंकवाद के जरीये बंटते समाज को बांधा जा सके। पड़ोसी देश आंखे न तरेरे । सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद हो। यानी देश में कही लोकतांत्रिक सरकार है, इसका एहसास देश को हो। मगर अब तक के तीसरे मोर्चे की सरकार कि इतिहास को देखा जाए तो हर बार ये सारे मुददे इससे काफी दूर रहा है। मुशिकलों में मुहाने पर खड़े देश को लेकर कोर्इ सहमति तीसरे मोर्चे में बन पायेगी यही सबसे बड़ी संकट देष में तीसरे मोर्चे को लेकर हमेषा से खड़ा होते रहा है, जाहिर है यह समझ देश चलाने के लिये होगी तो सौदेबाजी की राजनीति कर अपने वोटबैंक को सत्ता से मलार्इ दिलाने की क्षेत्रिय राजनीति बंद हो जायेगी। जब-जब तीसरे मोर्चे की गठन की हवा बही कुर्सी की लड़ार्इ में, तीसरा मोर्चा बनते-बनते, बनाने से पहले बिखर गया। बाधा हर बार यही रही कि इस मोर्चे का प्रधान मंत्री कौन बनेगा ? मुलायम सिंह का प्रयास हमेशा ही रहता है की तीसरी मोर्चा बने और मुलायम इस मोर्चे के सरकार में प्रधान-मंत्री बने। मोर्चे में शामिल होने वाली पार्टी के मुखिया इस पद को हासिल करना चाहता हैं, और इसी में मोर्चा नहीं बन पाता है। स्वार्थ की बात से दूर हो कर पार्टियाँ तीसरी मोर्चा बना सकती है, पर स्वार्थ से दूर होना पार्टियों के लिए आसमान से तारे तोड़ना जैसी बात है। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है की क्या तीसरे मोर्चे की राजनीति देष के लिए सही है।

Saturday, March 23, 2013

भगत सिंह को शहीद का दर्जा अब तक क्यों नहीं ?

                                              हंसते हंसते सूली पर वो चढ़ गया।
                                               उसे इस देष की फिक्र थी हरदम
                                                हमने न ये शौक देखी किसी में,
                                           मगर उसने कहा ये इंतहा ऐ वतन है।

देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर करने वाले शहीद भगत सिंह को ‘राष्ट्र पुत्र’ का दर्जा अब तक क्यों क्यों नहीं, ये एक अपने आप में बड़ा सवाल है, जिसे देष जानना चाह रहा है। भारत सरकार के फाईलों में आज इस राश्ट्रयोध्दा को षहिद का दर्जा देने के लिए जगह नहीं है। देष के हर एक युवा भगत सिंह को षहिद का दर्जा दिलाने के लिए इसके हक में संघर्श कर रहा है, मगर इस देष कि सरकार अब भी भगत सिंह के अधिकारों पर कुंडली मार कर बैठी हुई है।

                                      रात भर झिलमिलाता रहा चाँद तारों का वन।
                                      मोम की तरह जलता रहा शहीदों का तन।।

जब आरटीआइ के तहत केंद्रीय मंत्रालय फ्रीडम फाइटर आजादी विंग से यह जानकारी मांगी गई कि शहीद ए आजम भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को अभी तक शहीद का दर्जा दिया गया है या नहीं। तो जवाब में मंत्रालय के निदेशक ने गोलमोल जवाब देकर उनको शहीद मानने से इनकार कर दिया। एक तरफ सरकार शहीदों को पूरा मान व सम्मान देने की बात करती है। वहीं दूसरी ओर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सबसे बड़ी भूमिका निभाने वाले शहीदों को शहीद का दर्जा अभी तक सरकार नहीं दे सकी है। एैसे में सरकार कि नीति और नीयत दोनों पर बेहद गंभीर सवाल खड़े करते है।

समाज में शहीदों को याद करना आज के दौर में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि उनके जीवन से हमें देश और समाज के लिए निस्वार्थ जीने की प्रेरणा मिलती है। मगर तरकष के तिर हर बार सरकार कि खोखली नीयत पर इस लिए घूम जाती है क्योंकि, हम जिस समय और व्यवस्था में जी रहे है वो ऐसे लोगों को चर्चा का विषय नहीं होने देना चाहती, जिन्होंने दूसरों की गुलामी के लिए अपनी आजादी दांव पर लगा दी, जिन्होंने दूसरों के आंसुओं के लिए खुद की मुस्कान की बलि चढ़ा दी। ये व्यवस्था ऐसे व्यक्तित्व से युवाओं का ध्यान खीचना चाहती है। और बार बार पूछती है कि भगत सिंह को षहिद का दर्जा अब तक क्यों नहीं।

                                      शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
                                     वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।।

Friday, March 22, 2013

संजय दत्त से सहानुभूति क्यों दिखाई जा रही है ?

वर्ष 1993 में हुए मुंबई विस्फोटों के मामले में शस्त्र अधिनियम के तहत संजय दत्त को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी दोषी करार दिया गया है। न्यायालय ने संजय दत्त को पांच साल कैद की सजा सुनाई है। मगर इस सजा को लेकर देष में राजनीति भी सुरू हो गई है। कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला कह रहे है कि संजय दत्त की सजा पर विचार होना चाहिए। मुलायम सिंह यादव सरिखें नेता इसमें अपना राजनीतिक वदजूद तलास रहे है, तो वही दुसरी ओर पूर्व जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने महाराष्ट्र के राज्यपाल से अपील की है कि वो संविधान की अनुच्छेद 161 के तहत संजय दत्त कि सजा को माफ कर दें। संजय दत्त पहले भी 18 महीने जेल में सजा काट चुके है। मगर यहा सवाल खड़ा होता है कि आखिर संजय दत्त के साथ ये सहानुभूति क्यों दिखाई जा रही है। जबकि उन्हें खुद कोर्ट ने दोशी ठहराया है। क्या इससे 1993 के बम धमाके में मारे गए लोगों के परिवार कि भावनाएं आहत नहीं होगी, जिस हमले ने सिर्फ मुंबई ही नहीं पूरे देष को दहला कर दिया था। जिसका जख्म आज भी वहा के लोगों कि दिलों दिमाग पर कायम है। इस पूरे घटनाक्रम पर जब संजय दत्त को हवाई अड्डे पर गिरफ्तार कर पूछ ताछ किया गया था, तो संजय दत्त ने कथित तौर पर इस बात को स्वीकार किया था कि अबू सालेम जनवरी 1992 में मैग्नम विडियो कंपनी के मालिकों समीर हिंगोरा और हनीफ कड़वाला उनके साथ घर आए थे। जिसका संबंध कही न कहीं कथित तौर पर उस हमले से था। इन तीनों लोगों को माफिया डॉन दाउद इब्राहिम का नजदीकी बताया गया था और मुंबई हमलों की साजिश रचने का आरोप दाउद पर लगाया गया था। एक तरफ जहां कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने फिल्म अभिनेता संजय दत्त की सजा माफी पर विचार की मांग की है तो वहीं बीजेपी ने इस मांग पर सवाल उठा दिया है। बीजेपी का कहना है कि आखिर संजय दत्त की सजा क्यों माफ की जानी चाहिए जबकि कानून सभी के लिए एक है। सवाल यहा ये भी है कि अगर इसी तरह सजा माफ होने लगी तो इससे लोगों में गलत संदेश जाएगा कि बड़े लोग अपराध करके बच जाते हैं। बड़े पिता की संतानों के अपराध माफ हो जाते हैं। तो एैसे में सवाल खड़ा होता है कि संजय दत्त से आखिर सहानुभूति क्यों दिखाई जा रही है।

एके-56 का सचः

बॉलीवुड में संजय दत्त अपनी दरियादिली के लिए जाने जाते हैं। हालांकि मुकदमे की सुनवाई के दौरान संजय दत्त ने अपना इकबालिया बयान बदल दिया। लेकिन पहले उन्होंने अपने बयान में कथित रूप से स्वीकार किया था कि उन्होंने इन तीनों व्यक्तियों से एक एके-56 रायफल इसलिए ली थी क्योंकि मुंबई में हुए दंगों के बाद उनके प क्लिक करें रिवार को धमकियाँ मिलीं थीं और उन्हें उनकी सुरक्षा की चिंता थी। संजय दत्त ने कथित तौर पर इस बात को भी स्वीकार किया था कि जब मुंबई बम धमाके हुए तब वह विदेश में थे और उन्होंने अपने मित्र युसूफ नलवाला से उस रायफल को नष्ट करने के लिए कहा था। इसी के बाद संजय दत्त को हिरासत में लिया गया था और उनपर टाडा कानून के तहत मुकदमा चलाया गया था। संजय को अगले 18 महीने जेल में बिताने पड़े थे और तब जाकर उनकी जमानत हो सकी थी।

संजय दत्त की पूरी कहानी:

जादू की झप्पी देकर कैरेक्टर रोल में पहचान बनाने वाले संजय दत्त का बुरा वक्त फिर शुरु हो गया है। उतार-चढ़ाव उनकी जिंदगी का हिस्सा रहा है। कभी हालात ने मजबूर किया तो कभी खुद गलती कर बैठे। एक नायक की फिल्मी जिंदगी की ये हैं दो तस्वीरें एक बुरा और दूसरा अच्छा पर ये सिर्फ फिल्मी परदे के किरदार भर हैं। असल जिंदगी की सच्चाई आज संजय दत्त के सामने आ चुकी है। 29 जुलाई 1959 को सुनील दत्त और नर्गिस के घर में संजय बलराज दत्त का आगमन हुआ। फिल्मी माहौल में बड़ा हुआ सिर्फ तेरह साल की उम्र में पापा संग रेशमा और शेरा फिल्म में काम कर जता दिया कि वो बॉलीवुड में बड़ा नाम करने को तैयार है लेकिन सही मायनों में दत्त का ये मुन्ना पूरी जिन्दगी के लिए ‘प्रोब्लम चाइल्ड’ ही बन गया। संजय की 53 साल की जिंदगी उस फिल्मी स्क्रिप्ट की तरह है जिसमें बिगड़े हुए रईस जादे का ठोकर खाकर सम्भलना और बार बार अपने को संकटों के बीच फंसे पाना है। संजय दत्त की पूरी जिंदगी एक तरह से संकट से ही भरी हुई रही। कभी संजय ने दुश्वारी को खुद दावत दी तो कभी किस्मत ने उनको मुश्किल में डाला। फिर चाहे नशे की आदत हो, हथियार रखने में 16 महीने की सजा काटना हो या शादी शुदा जिंदगी में लगातार आये उतार चढ़ाव। 1981 में रॉकी फिल्म से बॉलीवुड का सफ़र शुरू करने वाले संजय पर सबसे पहले उसी साल दुखों का पहाड़ टूटा जब उनकी मां नर्गिस का निधन हो गया। कहते हैं संजय दत्त उस समय बुरी तरह टूट गए और बाद में गलत संगत और कामयाबी के नशे में उन्हें ड्रग्स की आदत लग गई। 

पिता सुनील दत्त ने संजय की इस नशे की लत को छुड़ाने के लिए जमीन आसमान एक कर दिया। सुनील दत्त उन्हें इलाज के लिए अमरीका में एक नशा उन्मूलन केंद्र ले गए जहां लंबे इलाज के बाद संजय दत्त ने ड्रग्स को अलविदा कहा और दोबारा बॉलीवुड वापसी की। फिल्मी दुनिया में आने के बाद संजय को अपने उम्र से बड़ी रिचा शर्मा से मोहब्बत हो गई और और दोनों ने 1987 शादी कर ली। संजय की निजी जिन्दगी में एक भूचाल तब आया जब उनकी पुत्री त्रिशाला दत्त के जन्म के कुछ ही दिन बाद उनकी पत्नी ऋचा को ब्रेन कैंसर हो गया और नौ साल बाद ही रिचा की मृत्यु हो गई। संजय फिर अकेले हो गए। फिल्मी करियर फिर से मुश्किल में आ गया। फिल्मी खलनायक की जिंदगी का संकट भरा समय तो सही मायने में 1993 में आया। मुंबई बम धमाकों के दौरान संजय दत्त पर हथियार रखने का खुलासा हुआ। संजय उस समय मॉरिशस में फिल्म आतिश की शूटिंग कर रहे थे। तुरंत मुंबई पहुंचे तो हवाई अड्डे पर पूछताछ के दौरान ही उन्हें गिरफतार कर लिया गया। पूछताछ के दौरान संजय दत्त ने कथित तौर पर इस बात को स्वीकार किया था कि अबू सालेम जनवरी 1992 में मैग्नम विडियो कंपनी के मालिकों समीर हिंगोरा और हनीफ कड़ावाला के साथ उनके घर आए थे। 

हालांकि संजय ने सफाई दी कि हथियार उन्होंने अपनी हिफाजत के लिए रखे थे लेकिन बम धमाको के साजिश करने वालो के करीबियों से संपर्क रखने का खामियाजा संजय को भुगतना ही पड़ा। टाडा कानून के तहत संजय पर मुकदमा चलाया गया और छह साल की सजा हुई। हालांकि 2006 में संजय को तब बड़ी राहत मिली जब मुंबई बम धमाकों मामले की सुनवाई कर रही टाडा अदालत ने कहा कि संजय एक आतंकवादी नहीं है और उन्होंने अपने घर में गैरकानूनी रायफल अपनी हिफाजत के लिए रखी थी। उन पर टाडा के आरोप खत्म कर दिए गए और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी करार दिया गया। हालांकि 16 महीने जेल की सजा काटने के बाद संजय को जमानत मिल गई। संजय तब से बेल पर थे। जेल और बदनामी का संकट झेलने के बाद संजय दत्त ने फिर से अपनी गाड़ी को पटरी पर लाने की कोशिश की। ये वो दौर था जब संजय अपनी जिंदगी में फिर से अकेले पड़ चुके थे। पहली पत्नी रिचा के निधन के दो साल बाद संजय ने रेहा पिल्लई को जीवन संगिनी बनाया था लेकिन ये शादी भी ज्यादा समय तक नहीं चल पाई। 2005 में दोनों का तलाक हो गया। बार बार ठोकरे खाने वाले संजय की जिंदगी में 2003 में एक मुकाम आया जब उनकी श्मुन्नाभाई एमबीबीएसश् फिल्म रिलीज हुई। इस फिल्म में संजय की रील और रियल लाइफ को ही बदल कर रख दिया। संजय को परदे के अपने किरदार के जरिये समाज में खोई प्रतिष्ठा को वापस पाने का भी संकेत मिल गया था और मुन्नाभाई के सिक्वल लगे रहो मुन्नाभाई ने इसे साबित भी कर दिया। बापू के दम पर एक खलनायक को गाधीगिरी की नई राह मिल गई थी। 

2006 के बाद संजय दत्त ने कॉमेडी पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया। बुरे किरदारों से लगभग तौबा की और कई फिल्मों में पुलिसिया वर्दी पहन कर अपनी छवि को साफ सुथरा रखने की कोशिश की। 2008 में संजय ने तीसरी शादी की और वो भी  नाटकीय अंदाज में। दो साल तक अपने लव अफेयर को छुपाये संजय दत्त ने मान्यता से मुंबई के एक अपार्टमेन्ट में शादी रचाई। लेकिन शादी पर भी विवाद हुआ। मेराज नाम एक शख्स ने ये दावा किया कि मान्यात से उसका निकाह पहले ही हो चुका है और संजय मान्यता की शादी गैर- कानूनी है। एक बार फिर संजय दत्त कानूनी पचड़े में पड़ गए। आठ महीने तक कोर्ट में मामला चला और आखिरकार संजय दत्त के हक में ही फैसला आया। शादी का विवाद तो थम गया, लेकिन एक बार फिर राजनीति की वजह से संजय दत्त सुर्खियों में आ गए। बहन प्रिया दत्त ने संजय की मर्जी के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली तो परिवार में दरार खुलकर सामने आ गया। खुद अमर सिंह के कहने पर राजनीति में आए। 2009 में समाजवादी पार्टी ज्वॉइन कर ली, लेकिन यहां भी संजय दत्त का साथ विवादों ने नहीं छोड़ा। ऊपर से कोर्ट की सख्ती अलग। संजय दत्त को लखनऊ में चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं दी गई और संजय दत्त ने आखिरकार राजनीति से तौबा कर ली।

Wednesday, March 20, 2013

क्या वर्जिनिटी की अवधारणा खत्म होनी चाहिए ?

कुछ माह पूर्व इंडिया टुडे-नीलसन द्वारा संपन्न एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि “कैजुअल सेक्स की बढ़ती पहुंच के बावजूद आज लगभग 65 प्रतिशत पुरुष अपने लिए कुंवारी (वर्जिन) पत्नी की तलाश कर रहे हैं।” वह ऐसी महिला को अपनी जीवनसंगिनी नहीं बनाना चाहते जिसने विवाह से पहले किसी के साथ सेक्स किया हो। भारतीय युवाओं की मानसिकता और उनकी प्राथमिकताओं को केन्द्र में रखकर किया गया यह सर्वेक्षण वर्तमान हालातों के मद्देनजर विवादास्पद हो गया है। क्योंकि एक ओर जहां वन नाइट स्टैंड और कैजुअल सेक्स का प्रचलन जोरों पर है, वहां “वर्जिन पत्नी” की मांग थोड़ी अटपटी लगती है। भारतीय समाज में ‘वर्जिनिटी की अवधारणा’ पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कुछ लोगों का यह स्पष्ट कहना है कि विवाह से पहले पुरुष चाहे कितने भी संबंध बना ले लेकिन वह किसी का भी जवाबदेह नहीं होता। वहीं अगर महिला ऐसा कर ले तो यह उसकी सामाजिक-पारिवारिक अवहेलना का कारण बन जाता है और उसका पूरा जीवन एक बुरा सपना बनकर रह जाता है और यह सिर्फ इसीलिए क्योंकि हमारा समाज आज भी शारीरिक संबंधों को अपेक्षाकृत ज्यादा अहमियत देता है, जबकि उसे वर्तमान हालातों और युवाओं की बदलती मानसिकता को पूरी तरह स्वीकार कर वर्जिनिटी की अवधारणा को ही समाप्त कर देना चाहिए। 

आज चारो ओर आधुनिकता अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रही है। साथ काम करने और पढ़ने-लिखने के कारण स्त्री-पुरुषों के बीच निकटता बढ़ती जा रही है। अगर ऐसे में उनके बीच किसी भी प्रकार के शारीरिक संबंध विकसित होते हैं तो उन्हें मात्र नैसर्गिक संबंधों की ही तरह देखा जाना चाहिए। इसमें सही और गलत की तो कोई बात ही नहीं है। यह व्यक्तिगत मसला है और इसमें समाज का किसी भी प्रकार का दखल नहीं होना चाहिए। आज जब महिला और पुरुष दोनों ही विवाह पूर्व सेक्स करने से नहीं हिचकते तो ऐसे में अगर महिला विवाह के बाद किसी भी तरह से प्रताडि़त की जाती है तो इसका कारण सिर्फ और सिर्फ हमारी खोखली हो चुकी मानसिकता है, जिसे जल्द से जल्द परिवर्तित कर देना चाहिए। 

वहीं दूसरी ओर परंपराओं और नैतिक सामाजिक मान्यताओं के पक्षधर लोगों का यह मानना है कि अगर विवाह पूर्व शारीरिक संबंधों के क्षेत्र में समाज अपना दखल देना बंद कर देगा तो हालात बद से बदतर होते जाएंगे। वर्जिनिटी की अवधारणा को समाप्त करने का अर्थ है युवाओं को सेक्स की खुली छूट दे देना। उन्हें किसी भी प्रकार की नैतिक जिम्मेदारियों से मुक्त कर देना। अगर हम ऐसा कुछ भी करते हैं तो यह सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को पूरी तरह समाप्त कर देगा। कैजुअल सेक्स आदि जैसे संबंध हमारे समाज के लिए कभी भी हितकर नहीं कहे जा सकते इसीलिए अगर परंपराओं, नैतिकता और मूल्यों को सहेज कर रखना है तो वर्जिनिटी की अवधारणा को भले ही जोर-जबरदस्ती के साथ लेकिन कायम रखना ही होगा। वर्जिनिटी अर्थात कुंवारेपन की अवधारणा को मौजूदा भारतीय परिप्रेक्ष्य के अनुसार देखने और उसका आंकलन करने के बाद निम्नलिखित प्रश्न हमारे सामने मौजूद हैं जिनका जवाब ढूंढ़ा जाना नितांत आवश्यक प्रतीत होता है, जैसे-

1. भारतीय समाज अपने मूल्यों और आदर्शों का पक्का देश है। यहां अगर वर्जिनिटी के महत्व को समाप्त कर दिया जाए तो मौजूदा हालात किस तरह प्रभावित होंगे?

2. शारीरिक संबंध व्यक्तिगत मसला है उस पर समाज का दखल किस हद तक सही ठहराया जा सकता है?

3. मौजूदा हालातों के अनुसार वर्जिनिटी की अवधारणा को कितना सही ठहराया जा सकता है?

4. जब कई पुरुष भी विवाह पूर्व सेक्स संबंधों में लिप्त रहते हैं तो उनका एक वर्जिन बीवी की तलाश करना कहां तक सही है?

सेक्स एजुकेशन क्या समय की जरुरत बन गयी है ?

अगर सरकार या सरकार का थिंक टैंक ये समझती है कि सेक्स एजुकेशन देकर यौन अपराधो पर लगाम लगा लेगी तो ये सिर्फ इस बात को प्रदर्शित करती है कि सरकार, जनता को सिर्फ बहकाने की कोशिश कर रही है। या फिर सरकार को ये समझ मे नही आ रहा है कि वो इस परिस्थिति से कैसे निबटे, तो ये नुस्खा आजमा कर देखना चाहती है। अगर जनता को कोई लाभ नही हुआ तो कम से कम नेता राजनीतिक लाभ तो उठा ही सकते है। और वैसे भी सरकार जनता की समस्याओं पर गम्भीर कब हुई है? जस्टिस जे.एस. वर्मा की समिति स्कूली पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा को शामिल करके बच्चों को सही-गलत जैसे व्यवहार और आपसी संबंधों के विषय में बताना चाहती है। केन्द्रीय मानव संसाधन और विकास मंत्री एम.एल. पल्लम राजू भी वर्मा समिति से सहमत होकर इसे लागू करने की सोच रही है, मै इन समिति और मंत्रियों से ये पूछना चाहता हूँ कि क्या उन्हे बच्चो के मौजूदा पाठ्यक्रम के बारे मे अवगत नही है..? ये सही-गलत और आपसी सम्बन्ध के विषय मे पहले से ही “शारीरिक व नैतिक शिक्षा” के रूप मे शामिल है.. जिसे बच्चे रट-रट्कर परीक्षा पास कर लेते है। लेकिन क्या बच्चों द्वारा नैतिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल शिक्षाओं का अनुसरण किया जाता है? फिर क्या जरूरी है कि सेक्स के बारे मे बताई गई सैद्धांतिक बातों से बच्चों मे इसकी व्यवहारिक बातो को जानने के उत्सुकता नही बढेगी? जहाँ तक सवाल है यौन अपराधो का, तो सेक्स एजुकेशन का इससे कोई सम्बन्ध नही दिखता। और जिन अपराधो के लिए बच्चो को शिक्षाएँ दी जा रही है और यहाँ तक कि कठोर कानून भी है, क्या किसी को उन अपराधों में कमी दिखाई देती है ? दिन-ब-दिन अपराध और भ्रष्टाचार की घटनाएँ बढ़्ती ही जा रही है..। 

एक-दो घटना (जैसे दिल्ली गैंगरेप मामला) जो मीडिया की नजर मे आ जाती है उसे सारी दुनिया देखती है, लेकिन इस तरह की घटनाएँ अब आम होने लगी है. जरा आप अपने आस-पास झाँक कर देखे तो पता चलेगा। इन अपराधो को सरकार की कोई भी व्यवस्था या कानून नही रोक सकती। जब तक सरकार बच्चो को समझाने के बजाए बड़ो को यानि खुद और अपने मंत्रियो को समझाना शुरू नही कर देती। देश के अपराध, भ्रष्टाचार या घर की गन्दगियाँ ऊँचें स्थान से साफ होना शुरू हो तो साफ हो सकता है. और बच्चे तो वही करने की कोशिश करते है जो वो बड़ो को करते हुए देखते है। अब मै अपराध के कुछ ऐसे उदाहरण और उस पर प्रश्न चिन्ह लगाउँगा जो कम-से-कम महिला पाठक् को तो पसन्द नही आयेगी। पता नहीं सरकार हर क्षेत्र मे महिलाओ को आरक्षण देकर आगे क्यों लाना चाहती है ? और एक महिला, आई0 एस0, आई0 पी0 एस0 बनकर मंत्रियो के साथ रंगरलियाँ मनाना चाहती है(ऐसा भी खबर आया है) ? नेताएँ अपने घर की छोटी-बड़ी पार्टी मे भी अर्धनग्न व कम उम्र लड़कियों को नचाकर आनन्द लेते है क्या इससे यौन अपराध को हवा न मिलेगी? एक महिला, पुलिस बनकर क्या दिखाना चाहती है? क्या पुलिस बनने के लिए पुरूष कम पड गये है। एक बड़ी कम्पनियाँ अपना प्रोडक्ट बेचने के लिये अपने प्रोडक्ट के साथ अर्धनग्न स्त्रियों को खड़ा कर देती है और ताज्जुब की बात ये है कि ये लडि़कियाँ और स्त्रियाँ नये जेनरेशन का हवाला देकर हंसते हुए अपने कपड़े उतार देती है। आज टेलीविजन पर दिखने वाले शत-प्रतिशत विज्ञापन महिलाओ द्वारा आकर्षक और कम कपड़े पहना कर कराये जाते है। 

विज्ञापन में प्रोडक्ट पर कम लड़कियों के शरीर पर टेलीविजन के कैमरा का फोकस ज्यादा रहता है। कंपनियाँ अपने रिसेप्शन पर एक आकर्षक, मनलुभावन और कम उम्र की लड़कि को बिठाती है क्योंकि इससे उसकी कम्पनी मे ज्यादा से ज्यादा लोग आये और आते भी है, कम से कम उस लड़्की को देखने और उससे बैठकर बकवास करने का उचित तरीका तो लोगों को मिलता ही है और इसमे कम उम्र के लड़्के ही नहीं अधेड़ और बूढ़े लोग भी शामिल होते है। अगर किसी टेलीकॉम कम्पनी के कस्टमर केयर पे कोई लड़्की मिल जाये फिर देखिये क्या-क्या बातें और कितनी देर तक होती है। इन सब का परिणाम अब ये भी देखा गया है कि एक मध्यम वर्गीय आदमी अगर एक दुकान भी खोलता है तो दुकान अच्छा चले इसके लिये एक सुन्दर लड़्की को काउंटर पर बिठाता है। 

एक शादी में जब मै गया तो देखा कि लड़कियां ने ऐसे कपड़े पहन रखे थे जिससे उसका आधा शरीर तो साफ-साफ दिखाई पड़्ता था, जबकि मौसम सर्दियों का था हमलोगों ने जैकेट पहन रखा था। क्या इससे अपराध नबढ़ेगा? इसमें बहुत हद तक लड़कियाँ व उनके माता-पिता खुद जिम्मेदार है लडि़कियाँ अपने घर का काम भूलकरलक्ष्मीबाई, कल्पना चावला, और पी0टी0 उषा आदि का हवाला देकर घर से बाहर निकलना शुरू कर दिया है. सभी को ऐसा नही करना चाहिए था. और इसमे सरकार भी बहुत जिम्मेदार है। सेक्स एक नेचुरल क्रिया है जिसके साथ जितना भी आप छेड़्छाड़ करने की कोशिश करेंगे उतना ही ये घातक सिद्ध होगा। और इसके प्रति आप किसी की मानसिकता एजुकेशन से नही बदल सकते आपने चारो तरफ अर्धनग्न लड़कि का मेला लगा रखा है और उसमे भी आपके नेता और बड़े लोग गन्दी हरकत करने से बाज नही आते, ऐसे मे आप बच्चो को सेक्स ऐजुकेशन देकर उससे क्या अपेक्षा रखते है ?  ऐसे में तो सेक्स ऐजुकेशन से अच्छा तो मेडीटेशन अच्छा रहेगा जिससे बच्चे अपने इच्छाओ को काबू में करना सीख लेंगे। फिर हो सकता है कि आने वाले जेनरेशन मे कुछ कम अपराध हो, लेकिन अभी क्या होगा कहना कठिन है।

Sunday, March 17, 2013

क्या हिन्दू धर्मं को खत्म करने की साजिस हो रही है ?

आज के भौतिकवादी दुनिया में हिन्दू देवी देवताओं का मजाक उड़ाना आम बात हो गया है। बात चाहे देष का हो या फिर विदेष का दोनों जगह सिर्फ हिंन्दू देवी देवताओं को अपमान कर उनके महत्व को कम करने कि साजिस हो रही है। एैसे ही कुछ वाक्या आज देष के जाने माने षिक्षण संस्थानों में से एक, गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय में देखने को मिला है। विश्वविद्यालय के प्रवेश फॉर्म में मुस्लिम, जैन, सिख और इसाई के लिए तो कॉलम हैं, लेकिन हिंदू के लिए कोई कॉलम नहीं है। उन्हें अन्य के कॉलम में टिक करना होता है। विश्वविद्यालय में तीन वर्षो से फार्म का यही प्रारूप है। इस बारे में जब कुलपति प्रो. दिलीप के. बंदोपाध्याय से पुछा गया तो उन्होने बताया कि हमारा विश्वविद्यालय सरकार की आरक्षण नीति का पालन करता है। हम किसी के साथ भेदभाव नहीं करते हैं। हमने अल्पसंख्यकों की मेरिट के आधार पर प्रवेश को सरल बनाने के लिए ऐसा किया है। ऐसा किसी अन्य विश्वविद्यालय में नहीं होने के सवाल पर सवाल कुलपति ने कोई टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया। सवाल यहा सिर्फ अल्पसंख्यकों की मेरिट या प्रवेष प्रक्रिया को सरल बनाने को लेकर नहीं है। क्योंकि आज विष्वविधालय के साथ 106 कॉलेज जुड़े हैं। इसमें 7-8 अल्पसंख्यक संस्थान भी हैं, संख्या के अधार पर भी यहा पढ़ने वाले हिन्दू छात्रों कि संख्या बहुतायत संख्या में है। एैसे सवाल खड़ा होता है कि क्या ये हिन्दू धर्म को खत्म करने कि साजिस नहीं है। 

क्या ये वहा पढ़ने वाले छात्रों के साथ धर्म के अधार भेदभाव नहीं? भेदभवाव का ये मामला संविधान के अनुच्छेद 25 का भी उलंघन करता है, ये अनुछेद किसी भी धर्म को समानता का अधिकार प्रदान करता है, और अपने धर्म को प्रचार प्रसार करने कि पूर्ण अजादी प्रदान करता है, तो एैसे में आखिर ये विष्वविधालय किस अधार पर भेदभाव कर रहा है इसका अंदाजा आप खुद- ब-  खुद लागा सकते है। इस संबंध में जब विश्वविद्यालय के ज्वाइंट रजिस्ट्रार पीके उपमन्यु पूछा गया तो उनका कहना है कि यह बड़ा मुद्दा नहीं है। हमने उन धर्मो का नाम दिया है, जिनको केंद्र सरकार अल्पसंख्यक मानती है। बाकी लोगों के लिए हमने अन्य का कॉलम दिया है। आखिर यहा हिन्दूओं को अन्य कालम में क्यों रखा गया है क्या उनका कोई धर्म नहीं? बात सिर्फ आज के दौर में एैसे विष्वविधालय तक का ही सीमित नहीं है। एैसे ही एक और चैकाने वाला वाक्या नागपुर में भी आया है। नागपुर का आयकर ट्रिब्यूनल मानता है कि हिंदुत्व कोई धर्म नहीं है। इतना ही नहीं न्यायाधिकरण करोड़ों हिंदुओं के आराध्य भगवान शिव, हनुमान जी और मां दुर्गा को भी किसी खास पंथ से जुड़ा नहीं मान रहा है। 

उसका तर्क है कि ये देवी-देवता ब्रह्मांड की अलौकिक महाशक्तियां हैं। अब आप इसे क्या कहेंगे? साजिस और सरारत, बात चाहे कुछ भी मगर ये षीधे तौर हिन्दुओं के ह्रदय को आहत करने वाला है जिसे कभी माफ नहीं किया जा सकता है। नागपुर स्थित आयकर ट्रिब्यूनल ने हाल ही में जारी अपने एक आदेश में उपरोक्त टिप्पणी की है। स्थानीय शिव मंदिर देवस्थान पंच कमेटी संस्थान की याचिका का निस्तारण करते हुए ट्रिब्यूनल ने भगवान शिव की पूजा को धार्मिक कार्य मानने से इन्कार किया है। ट्रिब्यूनल के सदस्य पीके बंसल और डीटी गार्सिया के अनुसार, तकनीकी तौर पर हिंदुत्व न तो कोई मजहब है और न ही हिंदुओं को कोई धार्मिक समुदाय माना जाता है। इन देवी-देवताओं को केवल ब्रह्मांड की अलौकिक महाशक्तियां ही माना जाता है। ये दोनों घटनाएं इस ओर इषारा कर रहा है कि हर ओर आज हिन्दू धर्म खतरे में है। हम भी इस बात को हमेषा से कहते आ रहा ताकि देष के हिन्दू एैसे साजिसों के प्रति सजग रहे और प्रखर राश्ट्रवाद कि बुलंद आवाज आपके दिलोदिमाग में हमेषा कायम रहे।

Saturday, March 16, 2013

क्या हमारी विदेश नीति विफल हो गई है ?

सरकार कि विदेष नीति कि विफलता एक बार फिर से सामने आई है। भारतीय मछुआरों की हत्या के आरोपी दो इटैलियन नौसैनिकों के भारत वापस न भेजने के इटली के फैसले के बाद दोनों देशों के बीच उपजे विवाद ने सरकार के विदेष नीति पर नई बहस छिड़ गई है। वही दुसरी ओर पाकिस्तान भारत को आंखे दिखा रहा है। भारतीय संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी दिए जाने के विरोध में पाकिस्तान अपने संसद में निंदा प्रस्ताव को पास कर, भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठेंगा दिखा रहा है, और इटली जैसे देष भारतीय सर्वोच न्यालय कि कानूनी प्रक्रिया का मजाक उड़ा रहे है। सरकार कि ये विफलता खुद चीख चीख कर बता रही है कि भारतीय सताधिशों कि विदेष नीति किस प्रकार से विफल हो चुकी है। एैसे में सवाल खड़ा होता है क्या सरकार ये कि राजनयीक नकामी नहीं है? बात चाहे इटली के नौसैनिकों की हो या फिर पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवाद कि हो हर जगह भारत के हुक्मरानों की असफलता साफ नजर आती है। आज भले ही इसके लिए दोष इटली को दें या फिर पाकिस्तान को दें, लेकिन सच्चाई यही है कि भारत सरकार को अपनी खुद की गलती अब भी नजर नहीं आ रही है। यही से सुरू होता है हमारी विदेष नीति कि विफलता। आज पाकिस्तानी आर्मी हमारे देष के जावानों का सर काट कर ले जा रहे है, तो दुसरी ओर भारत के विदेष मंत्री पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को बिरयानी खिलाकर अपने देष में स्वागत करते है, क्या कांग्रेस सरकार कि यही है विदेष नीति। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को दिए गये भोज के बाद वहा कि मीडिया नें जोर शोर से यह प्रचार करना शुरू कर दिया कि अगर भारतीय सैनिकों कि हत्या पाकिस्तान करवाया होता तो भारतीय विदेशमंत्री पाक पीएम से मिलते भी नहीं, भोज देना तो दूर कि बात होती। 

आज दुनिया इस सच को जानती है कि जिसके दिए जख्मों से दिल छलनी हो तो मिलना तो दूर देखना भी अच्छा नहीं लगता और यहाँ तो हम उनसे मिलने के लिए दिल्ली से जयपुर का रास्ता भी तय कर लिया। हमारी विदेश नीति कि दुर्बलता हमारे सामने समस्याओं का पहाड़ खडा कर रही है, मगर सरकार पाक प्रेम के नाम पर देष के अस्मीता के साथ खिलवाड़ कर रही है। कांग्रेस पार्टी हमेषा से ही पण्डित नेहरू को भारत की विदेश नीति के अनुकरणीय कर्णधार के रूप में प्रस्तुत करती रही है। जिस नेहरू के विदेष नीति के चलते भारत ने चीन के साथ युद्ध हार गया। पाकिस्तान से निपटने में उनकी गलत नीति ने आतंकवाद और कश्मीर जैसे दो घाव बना दिए जो आज तक देष के लिए दुरूखदायी बने हुए हैं। 1947 से 1964 तक पंडित नेहरू खुद विदेश मंत्री भी थे। सवाल यहा ये भी है कि अगर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री का भारत में निजी दौरा था तो किसी भी भारतीय मंत्री को वहाँ जाने कि क्या आवश्यकता थी, वो भी उस हालत में जब हर भारतवासीओं के सीने में पाकिस्तानी सेना द्वारा दिए गए घाव नासूर कि तरह चुभ रहें है। आज देष में न जाने कितने बम धमाके हुए, कश्मीर खून से लाल हो गया और देश का सीना जख्म से कराह रहा है, पर पाकिस्तान को लेकर भारत की नीति क्या है ये अब भी स्पश्ट नहीं है। आज एक अदने से पाकिस्तान भारत को धमका रहा है एैसे में सवाल खड़ा होता है कि क्या हमारी विदेष नीति विफल हो गई है।

Friday, March 15, 2013

16 की उम्र में सेक्स ! क्या सरकार अनैतिकता को बढ़ावा दे रही है ?

केंद्रीय कैबिनेट द्वारा सहमति से सेक्स की उम्र 18 से घटाकर 16 करने पर देष भर में एक नई बहस खड़ी हो गई है। हर गली नुक्कड़ और सरकारी दफ्तरों से लेकर चैनलों के न्यूजरूम तक ये चर्चा का विशय बना हुआ है। चर्चा इसलिए भी जयादा रोचक और चिंताजनक है क्योंकि सरकार के इस फैसले से भारतीय संस्कृति और सभ्यता मिटने कि भय लोगों को अभी से सता रही है, और आधुनिका अपनी पैर पसार रही है। सवाल यहा ये भी है कि अगर 16 की उम्र में युवाओं को सेक्स करने की कानूनी इजाजत मिल जाएगी तो संदेश ये जाएगा कि इस देश में शादी से पहले सेक्स की खुली छूट है। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि जो 16 साल की लड़की के पुलिस थाने में आकर रजामंदी से लड़के के साथ सेक्स करने की बात कबूल करने के बावजूद, उसके साथी लड़के के खिलाफ बलात्कार का केस दर्ज करने की इजाजत देता है। एैसे में कुछ राहत लड़का को यहा जरूर मिलेगी। रजामंदी से सेक्स की उम्र को 18 से घटाकर 16 वर्ष करने के प्रस्ताव के खिलाफ बाबा रामदेव ने भी मोर्चा खोल दिया है। रामदेव का मानना है कि इस प्रस्ताव को अमली जामा पहनाने से न केवल नादानी को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि बलात्कार की घटनाएं भी बढेंगी। साथ ही कई एैसे समाजिक संगठन भी योग गुरू के विचारों से सहतम नजर आ रहे है। 
 
सवाल यहा कई है जो इस बहस को भारतीय जिवनषैली के अनुसार चलने पर मजबुर करता है। क्या यह मांग समाज कि तरफ से है या फिर यह सरकार द्वारा सामाजिक मान्यताओं में जबरदस्ती की दखलंदाजी है? क्या इस विषय के बारे में समाज की असहमति होना कानून व्यवस्था, स्वास्थ्य या नैतिकता के बिरुद्ध है नहीं है? क्या यह निर्णय खाप पंचायतो के दबाव में लिया गया है? दूसरी बात यहा ये भी कि जिस उम्र में हमें शादी करने के लिए परिपक्व नहीं माना जाता उस उम्र में सम्भोग को मान्यता देना कहाँ तक उचित है। अगर प्रेम वश ये होता भी है और गर्भ ठहर जाता है और बच्चे शादी करना चाहते हैं तो उनको इसकी भी अनुमति नहीं होगी। फिर रास्ता क्या होगा गर्भपात या फिर अवैद्य संतान। ये एक बड़ा सवाल है। अच्छे मानव जीवन जीने के लिए संयम की जरुरत होती है। क्या इससे भोग के प्रति प्रतिद्वंदता नहीं बढ़ेगी। क्या त्याग का महत्व कम नहीं होगा। एक तरफ बाल विवाह जुर्म है, वहीं दुसरी ओर उम्र कम करने की बात हो रही है इसका क्या मतलब है। क्या इससे देश में टीनेज प्रेगनेंसी की समस्या नहीं बढ़ेगी? क्या यौन रोगों की बाढ़ से सरकार नीपट पाएगी। अनुमान ये भी लगाया जा रहा है कि इस छुट से विदेशी गर्भनिरोधक दवा कम्पनियाँ और झोलाछाप डाक्टर्स और डाइयग्नॉस्टिक सेंटर्स जमकर देष और समाज को लुटेंगे। एैसे में बहस का असत मुद्दा यही है कि क्या सरकार अनैतिकता को बढ़ावा दे रही है।

विभिन्न देशों में सहमति से सैक्स की उम्र सिमा

अमरीका में सहमति से सेक्स की उम्र सभी राज्यों में अलग-अलग है। यह 16 से 18 के बीच है। - स्विट्जरलैंड में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ सेक्स गैरकानूनी है। - तुर्की सिविल कोड के अनुसार सहमति से सेक्स की सही उम्र 18 साल है। - सर्बिया में 14 साल की उम्र पार करने के बाद सैक्स की कानूनन इजाजत है। - रूस में सहमति की उम्र 16 साल है। वैसे रूस में बहुत बार बदलाव हो चुके हैं। - पुर्तगाल में सहमति से सेक्स की उम्र 14 साल है। - नॉर्वे में 16 साल से कम उम्र के बच्चे से सेक्स करना अपराध है। - इटली में सहमति से संबंध बनाने की उम्र 14 साल है लेकिन अगर दोनों के बीच का अंतर 3 साल से कम है तो 13 की उम्र में सेक्स बनाने को भी अपराध नहीं माना जाएगा। - जर्मनी में सहमति से सेक्स की उम्र तो 14 है लेकिन यह शर्त कि उस रिश्ते में 21 साल से बड़ा इनसान 14.15 साल के व्यक्ति का शारीरिक शोषण न कर रहा है। - इंग्लैंड और वेल्स में रहने वाले लोग 16 साल की उम्र पार करने के बाद सेक्स कर सकते हैं। लेकिन कोई व्यक्ति अगर 18 साल से ज्यादा की उम्र का है और साथी को प्रभावित करने की स्थिति में है तो वह 16 साल के बच्चे से सेक्स नहीं कर सकता। - कनाडा में 16 साल के बाद सेक्स कर सकते हैं। - ऑस्ट्रिया में सामान्य हालात सहमति से सेक्स की उम्र 14 साल है !

Monday, March 11, 2013

कामसूत्र के दृश्यों का प्रदर्शन क्या सही है ?

कला विषय के एक छात्र ने अपनी परीक्षा के अंतर्गत बतौर असाइनमेंट कामसूत्र से संबंधित दृश्यों की पेंटिंग बनाकर पेश किया तो उसे फाइनल परीक्षा में फेल कर दिया गया। यह घटना है पटना आर्ट्स कॉलेज की, जहां के शिक्षक कामसूत्र से जुड़ी पेंटिंग को कला से जोड़कर नहीं देखना चाहते। खरी-खोटी सुनाकर और दृश्यों में अश्लीलता होने का आधार देकर छात्र को फेल कर उसका पूरा साल बर्बाद कर दिया गया और महिला शिक्षिका के सामने इस पेंटिंग को पेश करने पर इस घटना को यौन प्रताड़ना का मामला भी ठहराया गया।हाल ही में हुई इस घटना ने फिर से एक बार उसी पुरानी बहस को जन्म दे दिया है और वो भी नए तरीके के साथ कि क्या कला के जरिए सेक्स जैसे विषय और इस मुद्दे पर अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध होना चाहिए या नहीं? तथाकथित उदारवादी और आधुनिक लोगों का कहना है कि हम आज भी उसी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। सेक्स जैसा विषय आज भी हमारे लिए सामाजिक रूप से निषेध बना हुआ है। जबकि यह तो कला का मामला है और कला अभिव्यक्ति की आजादी से संबंधित है। हम अगर कला को दरकिनार करते हैं, उसके विरोध में खड़े होते हैं तो जाहिर है हम अभिव्यक्ति की आजादी को भी बाधित कर रहे हैं। उदारवाद की पैरोकारी करने वाले लोगों का यह भी कहना है कि कामसूत्र कोई अश्लील और काल्पनिक साहित्य नहीं है बल्कि वह पूरी तरह तार्किक, वैज्ञानिक है। इस साहित्य से जुड़ी पेंटिंग्स में केवल अश्लीलता को ही देखना वैश्विक स्तर पर स्वीकृत इस साहित्य का अपमान होगा।

इस वर्ग में शामिल लोगों का कहना है कि अगर हमारे परंपरावादी और रूढि़वादी समाज को कला से आपत्ति है तो उसे अपनी मानसिकता बदलनी होगी अन्यथा कभी किसी बहाने से तो कभी किसी तरीके से हमेशा ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन किया जाता रहेगा। हमारे ऐतिहासिक धरोहर खजुराहो की गुफाओं में इन कृतियों को उकेरा गया है तो एक कलाकार द्वारा इसे बनाना गलत कैसे ठहराया जा सकता है? वहीं दूसरी ओर इस घटना का विरोध कर रहे तथाकथित परंपरावादी लोगों का यह स्पष्ट कहना है कि भले ही कामसूत्र भारतीय संस्कृति का हिस्सा हो लेकिन सामाजिक रूप से इसका प्रदर्शन गलत है। अगर कामसूत्र हमारी संस्कृति का हिस्सा है तो गुरू-शिष्य परंपरा भी भारतीय संस्कृति के मूल में व्याप्त एक सम्मानजनक आपसी संबंध है। जाहिर है कामसूत्र की पेंटिंग्स अपनी शिक्षिका के सामने प्रस्तुत करना एक निकृष्ट हिमाकत है, जिसका जितना भी विरोध किया जाए उतना कम है। कामसूत्र एक कला साहित्य भले ही है लेकिन इसका सार्वजनिक बखान निंदनीय कृत्य है। इस वर्ग में शामिल बुद्धिजीवियों का कहना है कि यह यौन प्रताड़ना का मामला है और छात्र के खिलाफ जाहिर तौर पर कार्यवाही होनी चाहिए।

Sunday, March 10, 2013

सामाज रूपी महादेव की तीसरी आँख कब खुलेगी ?

आज पूरा देष पावन पर्व महाशिवरात्रि के हर्शो उल्लास डुबा हुआ है। हिन्दु धर्म में एैसी मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शंकर का ब्रह्मा से रौद्र रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव ने तांडव करते हुए ब्रह्मांड को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे दिन को महाशिवरात्रि कहा जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने गीता में बताया है कि जब- जब इस भूमंडल पर  पाप अपनी चरम सीमा को पार करेगा और धर्म का विनाश होगा तब- तब मैं इस धरती में धर्म कि पुनः स्थापना के लिए अवतार धारण करने आऊंगा। एैसे में एक सवाल हम सब के मन में जरूर उठता है कि आखिर समाजरूपी महादेव कि तीसरी आँख कब खुलेगी। जिस समाज में आज हर ओर भ्रश्टाचार ब्यापत है, धर्म का विनाष आज वोट और नीजी स्वार्थ के लिए किया जा रहा है। मदिरों को तोड़ा जा रहा है। समाज पाप की घड़ा से दबा हुआ है और राक्षस रूपी मानव हर ओर अपना तांडव मचाया हुआ है। आखिर समाजरूपी महादेव कि इस भारत भुमी पर तीसरी आँख कब खुलेगी? इस मरण चक्र संसार में लगता है आज मनुश्य से मनुश्य कि सरोकार खत्म हो गई है, उसे कंट्रोल रूम से संचालित किया जा रहा है। 

यही कारण है कि तीसती आँख कि षक्ति अपनी चमत्कार नहीं दिखा पा रही, क्योंकि हर कोई उद्धारक कि बाट जोह रहा है। एैसे में क्या इस समाज से समस्या के दूर होने कि आशा कि जा सकती है। हर कोई इस पृथ्वी पर आशा और निराशा के झूले में हिचकोले खाते हुए झूल रहा है, और समाजरूपी महादेव अपनी तीसरी आँख मूंद कर बैठे हुए है। यह समाज आज के दौर में पंष्चिमी दुनिया कि आगोष में झुलसल रहा है, संस्कृति नश्ट हो रही है, कुरीतियों का बोलबाला हर ओर गूंज रहा है। संत समाज से लेकर निर्मल ह्रदय वाले लोग सक्ते में है, उनके लाख कोषिषों के बावजूद राक्षसरूपी सामाजिक कुरीतीयां मिटने को नाम नहीं ले रही है। देष आज जात- पात, क्षेत्रवाद के जाल में बंध कर रह गया है। रिस्ते कि जंजीर टुट चुकी है और लोभ का रावण अपना राज कर रहा है, एैसे में उस निर्मल काया कि आवाज हवा कि तरह झकझोर कर बार- बार पुछती है कि समाजरूपी महादेव कि तीसरी आँख आखिर कब खुलेगी ?

Friday, March 8, 2013

क्या महिला भोग की बस्तु बन गई है ?

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस हर वर्ष 8 मार्च को विश्वभर में मनाया जाता है। इस दिन सम्पूर्ण विश्व की महिलाएँ देश, जात-पात, भाषा, राजनीतिक, सांस्कृतिक भेदभाव से परे एकजुट होकर इस दिन को मनाती हैं। मगर आज के दौर में विष्व भर की नारी समाज की अस्तित्व खतरे में है। हम एैसा इसलिए कह रहे है क्योंकि भले ही समाज बदल रहा है मगर लोग आज भी महिलाओं को भोग की बस्तु के रूप में देखते है। महिलाएं उनके लिए इच्छापूर्ति का एक साधन मात्र हैं। हिन्दी फिल्मों में भी आज महिलाओं को भोग की बस्तु के रूप में ही युवा आकर्शण के लिए पेष किया जा रहा है। महिलाओं को भोग की वस्तु समझने वाला पुरुष समाज शारीरिक संबंधों के प्रति इतना आसक्त हो रहा है कि वे इसके लिए भारी-भरकम कीमत चुकाने को तैयार है। एैसे फिल्मों में पेड-सेक्स जैसे अष्लीलता को बढ़ावा दिया जा रहा है। आज समाज के रक्षक पुलिस ही सरेआम औरत की लूटती इज्जत को बचाने के जगह खुद हर रात महिलाओं के साथ थाने में रंगीन करते हैं। जब नाबालिक लड़की मां बन जाति है तो उसे समाज से दुत्कार कर निकाल दिया जाता है। वही लड़की एक बार फिर से खुले सड़क पर गैगरेप करके मरने की हालत में छोड़ दी जाती है। सवाल यहा ये है कि आखिर महिलाओं का औचित्य आज समाज में क्या है? पल-पल कुंठित होने के बावजूद भी लोगों को उसके समर्पण का अहसास तक नहीं होता। आप खुद सोच सकते है कि क्या महिलाओं के नाम दिवस करने से उसकी समस्याओं का समाधान हो जाएगा? 

जो महिला रोज अपने शराबी पति से पीटकर उसके शराब के पैसे के लिए न चाहते हुए अपना शरीर तक बेचने पर मजबूर होती है, उसके लिए महिला दिवस का क्या अर्थ है? महिलाओं कि हक महिला एवं बाल विकास मंत्रालय जैसे राष्ट्रीय महिला आयोग के दफ्तरों के कागजों तक सीमित है? आज के विज्ञापन में शेविंग क्रीम, साबुन, कार यहां तक की पुरूषों के इस्तेमाल करने वाले कंडोम के प्रचार तक में महिलाओं की जगह सिर्फ भोग बिलासिता के तौर पर ही परोसा जा रहा है। एक ओर तो देश आधुनिकता की ओर अपना परचम फैला रहा है, कोई क्षेत्र ऐसा नहीं, जहां महिला ने अपनी छाप न छोड़ी हो। राजनीति, सेना, विज्ञान एवं तकनीकि, फैशन जगत, आईटी क्षेत्र यहां तक की चांद पर महिलाएं अपनी अनूठी पहचान बना चुकी हैं। आज वह पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं। पर फिर भी जरूरत है तो लोगों की मानसिकता बदलने की, जो उंचे पदों पर बैठी महिलाओं से लेकर आम महिलाओं के प्रति संकीर्ण सोच रखते हैं। और नारी को अबला मान कर उसे मात्र भोग की वस्तु समझते हैं। सच तो यह है कि देवी सिर्फ मंदिरों में नहीं हमारे घरों में, हमारे समाज में बसती है आज जरूरत इस बात कि है की हमसब इसे सही तरिके से सम्मान दे और उसके सच्चे रूप को पहचाने न की उसे भोग की बस्तु माने।

Tuesday, March 5, 2013

भ्रूण हत्या सदी की सबसे बड़ी सामाजिक त्रासदी

भारत की संस्कृति विश्व की सर्वोच संस्कृति है संस्कृति हमारी धरोहर हैए विरासत हैए अंहिसा की प्रतिध्वनी में फलने वाली इस देश की धरती पर आज चारो तरफ हिंसा का नाद है कहते है यह इक्कस्वी सदी महिलाओं की है, प्रश्न उठाता है फैशन ए नशाए भ्रूण हत्याए अनुशासनहीनता जीवनए अनावश्यक संग्रह की मनोवृति जैसी प्रवृतियो में तेजी से बढ़ती हुई महिलाये क्या अपनी  संस्कृति  का सम्यक निर्वाह कर रही है, भ्रूण हत्या  इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है, इस परंपरा के वाहक अशिक्षित व निम्न व मध्यम वर्ग ही नहीं है बल्कि उच्च व शिक्षित समाज भी है। भारत के सबसे समृध्द राज्यों पंजाबए हरियाणाए दिल्ली और गुजरात में लिंगानुपात सबसे कम है। 2001 की जनगणना के अनुसार एक हजार बालकों पर बालिकाओं की संख्या पंजाब में 798ए हरियाणा में 819 और गुजरात में 883 है। कुछ अन्य राज्यों ने इस प्रवृत्ति को गंभीरता से लिया और इसे रोकने के लिए अनेक कदम उठाए जैसे गुजरात में श्डीकरी बचाओ अभियानश् चलाया जा रहा है। इसी प्रकार से अन्य राज्यों में भी योजनाएँ चलाई जा रही हैं। भारत में पिछले चार दशकों से सात साल से कम आयु के बच्चों के लिंग अनुपात में लगातार गिरावट आ रही है। वर्ष 1981 में एक हजार बालकों पर 962 बालिकाएँ थी। वर्ष 2001 में यह अनुपात घटकर 926 हो गया। यह इस बात का संकेत है कि हमारी आर्थिक समृध्दि और शिक्षा के बढते स्तर का इस समस्या पर कोई प्रभाव नहीं पड रहा है। वर्तमान समय में इस समस्या को दूर करने के लिए सामाजिक जागरूकता बढाने के लिए साथ.साथ प्रसव से पूर्व तकनीकी जांच अधिनियम को सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। जीवन बचाने वाली आधुनिक प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग रोकने का हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए। देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने पिछले वर्ष महात्मा गांधी की 138वीं जयंती के मौके पर केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की बालिका बचाओ योजना ;सेव द गर्ल चाइल्डद्ध को लांच किया था। राष्ट्रपति ने इस बात पर अफसोस जताया था कि लडक़िया को लडक़ा के समान महत्व नहीं मिलता। लडक़ा.लडक़ी में भेदभाव हमारे जीवनमूल्या में आई खामिया को दर्शाता है। उन्नत कहलाने वाले राज्या में ही नहीं बल्कि प्रगतिशील समाजा में भी लिंगानुपात की स्थिति चिंताजनक है। 

हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य में सैक्स रैशो में सुधार और कन्या भ्रूण रोकने के लिए प्रदेश सरकार ने एक अनूठी स्कीम तैयार की है। इसके तहत कोख में पल रहे बच्चे का लिंग जांच करवा उसकी हत्या करने वाले लोग के बारे में जानकारी देने वाले को 10 हजार रुपए की नकद इनाम देने की घोषणा की गई है। प्रत्येक प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को ऐसा सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। प्रसूति पूर्व जांच तकनीक अधिनियम 1994 को सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। भ्रूण हत्या को रोकने के लिए राज्य सरकारों को निजी क्लीनिक्स का औचक निरीक्षण व उन पर अगर नजर रखने की जरूरत है। भ्रूण हत्या या परीक्षण करने वालों के क्लीनिक सील किए जाने या जुर्माना किए जाने का प्रावधान की जरूरत है। फिलहाल इंदिरा गांधी बालिका सुरक्षा योजना के तहत पहली कन्या के जन्म के बाद स्थाई परिवार नियोजन अपनाने वाले माता.पिता को 25 हजार रुपए तथा दूसरी कन्या के बाद स्थाई परिवार नियोजन अपनाने माता.पिता को 20 हजार रुपए प्रोत्साहन राशि के रूप में प्रदान किए जा रहे हैं। बालिकों पर हो रहे अत्याचार के विरुध्द देश के प्रत्येक नागरिक को आगे आने की जरूरत है। बालिकाओं के सशक्तिकरण में हर प्रकार का सहयोग देने की जरूरत है। इस काम की शुरूआत घर से होनी चाहिए। ने ऊपर होने वाले अत्याचार को भी वे परिवार के लिए हंस कर सहन करती हैं। यह वास्तव में विडंबना है कि हमारे देश के सबसे समृध्द राज्य पंजाबए हरियाणाए दिल्ली और गुजरात में लिंगानुपात सबसे कम है। बालिका भूण हत्या  सबसे अधिक अमानवीय असख्य और घृणित कार्य है। 

पितृ सत्तात्मक मानसिकता और बालका को वरीयता दिया जाना ऐसी मूल्यहीनता है जिसे कुछ चिकित्सक लिंग निर्धारण परीक्षण जैसी सेवा देकर बढावा दे रहे हैं। यह एक चिंताजनक विषय है  देश के कुछ समृध्द राज्य में बालिका भ्रूण हत्या की प्रवृत्ति अधिक पाई जा रही है। देश की जनगणना.2001 के अनुसार एक हजार बालक में बालिकाओं की संख्या पंजाब में 798 हरियाणा में 819 और गुजरात में 883 हैए जो एक चिंता का विषय है। इसे गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है। कुछ अन्य राज्य ने अपने यहां इस घृणित प्रवृत्ति को गंभीरता से लिया और इसे रोकने के लिए अनेक प्रभावकारी कदम उठाए जैसे गुजरात में श्डीकरी बचाओ अभियानश् चलाया जा रहा है। इसी प्रकार से अन्य राज्य में भी योजनाएं चलाई जा रही हैं। यह कार्य केवल सरकार नहीं कर सकती है। बालिका बचाओ अभियान को सएउर्फत्लएरुइएत् बनाने के लिए समाज की सक्रिय भागीदारी बहुत ही जरूरी है। देश में पिछले चार दशक से सात साल से कम आयु के बच्चों के लिंग अनुपात में लगातार गिरावट आ रही है।

 वर्ष 1981 में एक हजार बालक के पीछे 962 बालिकाएं थीं। वर्ष 2001 में यह अनुपात घटकर 927 हो गयाए जो एक चिंता का विषय है। यह इस बात का संकेत है कि हमारी आर्थिक समृध्दि और शिक्षा के बढते स्तर का इस समस्या पर कोई प्रभाव नहीं पड रहा है। वर्तमान समय में इस समस्या को दूर करने के लिए सामाजिक जागरूकता बढाने के लिए साथ.साथ प्रसव से पूर्व तकनीकी जांच अधिनियम को सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। जीवन बचाने वाली आधुनिक प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग रोकने का हरसंभव प्रयास किया जाना चाहिए। देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने पिछले वर्ष महात्मा गांधी की 138वीं जयंती के मौके पर केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की बालिका बचाओ योजना ;सेव द गर्ल चाइल्डद्ध को लांच किया था। राष्ट्रपति ने इस बात पर अफसोस जताया था कि लडक़िया को लडक़ा के समान महत्व नहीं मिलता। लडक़ा.लडक़ी में भेदभाव हमारे जीवनमूल्य में आई खामिया को दर्शाता है। उन्नत कहलाने वाले राज्य में ही नहीं बल्कि प्रगतिशील समाज में भी लिंगानुपात की स्थिति चिंताजनक है। हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य में सैक्स रैशो में सुधार और कन्या भ्रूण रोकने के लिए प्रदेश सरकार ने एक अनूठी स्कीम तैयार की है। इसके तहत कोख में पल रहे बच्चे का लिंग जांच करवा उसकी हत्या करने वाले लोग के बारे में जानकारी देने वाले को 10 हजार रुपए की नकद इनाम देने की घोषणा की गई है। 

प्रत्येक प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को ऐसा सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। प्रसूति पूर्व जांच तकनीक अधिनियम 1994 को सख्ती से लागू किए जाने की जरूरत है। भ्रूण हत्या को रोकने के लिए राज्य सरकारों को निजी क्लीनिक्स का औचक निरीक्षण व उन पर अगर नजर रखने की जरूरत है। भ्रूण हत्या या परीक्षण करने वालों के क्लीनिक सील किए जाने या जुर्माना किए जाने का प्रावधान की जरूरत है। फिलहाल इंदिरा गांधी बालिका सुरक्षा योजना के तहत पहली कन्या के जन्म के बाद स्थाई परिवार नियोजन अपनाने वाले माता.पिता को 25 हजार रुपए तथा दूसरी कन्या के बाद स्थाई परिवार नियोजन अपनाने माता.पिता को 20 हजार रुपए प्रोत्साहन राशि के रूप में प्रदान किए जा रहे हैं। बालिकों पर हो रहे अत्याचार के विरुध्द देश के प्रत्येक नागरिक को आगे आने की जरूरत है। बालिकाओं के सशक्तिकरण में हर प्रकार का सहयोग देने की जरूरत है। इस काम की शुरूआत घर से होनी चाहिए।

Monday, March 4, 2013

सरकारी स्कूलों को गरियाइए नहीं

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की संवैधानिक वैधता पर 12 अप्रैल, 2012 को सर्वोच्च न्यायालय ने मुहर लगाकर यह बात तो साफ कर दी कि अब सरकार शिक्षा के अधिकार को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी से नहीं बच सकती. सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया है, उसके अनुसार निजी संभ्रांत स्कूलों में भी आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों के छह से चौदह वर्ष तक के बच्चों को भी पच्चीस फीसदी सीटें देनी होंगी. इस निर्णय से मालदार-मलाईदार निजी स्कूलों के पैसा-कमाऊ प्रबंधन-तंत्रों में एक साम्राज्यवादी रोष और विरोध पैदा हो गया है. उन्हें ऐसा लग रहा है कि उनके मुनाफे में इस फैसले ने नाजायज बट्टा लगा दिया है. उन्हें अब यह भी लगने लगा है कि उनके एलिट होने-कहलाने पर भी बट्टा लग जाएगा! लेकिन वे अपने विरोध को थोड़ा पेशेवर अंदाज में जता रहे हैं कि वे चैरिटी के लिए स्कूल नहीं चलाते. कोई उनसे कहे कि जो विद्या-दान करे, वही चैरिटी कर सकता है. आप तो बिजनेस करते हैं. आप भला चैरिटी कैसे कर सकते हैं? गौर करें तो चैरिटी का शोर मचाकर ये बड़े-बड़े, भारी-भरकम निजी स्कूल जनता को भरमा ही रहे हैं क्योंकि आरक्षित 25 फीसदी सीटों पर पढ़ने वाले बच्चों का 65 प्रतिशत खर्च केंद्रीय सरकार वहन करेगी और 35 प्रतिशत खर्च राज्य सरकार वहन करेगी. फिर निजी स्कूलों को किस लिहाज से चैरिटी करना पड़ रहा है? दरअसल वे अपनी लाभ-हानि के हिसाब से अपनी छवि के बारे में ज्यादा चिंतित हो गए हैं. उन्हें लग रहा है, अब भोज में ब्राह्मणों के साथ पंगत में दलित भी बैठने लगेंगे. कुल मिलाकर, वे अमीरी-गरीबी, ऊँच-नीच, बड़े-छोटे और योग्य-अयोग्य की हिंसक दरार को पाटने के पक्ष में हैं ही नहीं. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के पीछे मंशा यही है कि शिक्षा के क्षेत्र में यह जो समर्थ-असमर्थ का विभाजन है, उसे धीरे-धीरे मिटाया जाये. अन्यथा सर्वोच्च न्यायालय को भी इसका बिल्कुल साफ-साफ अंदाजा जरूर होगा कि देश के सभी निजी स्कूलों में गरीब बच्चों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण कर देने से पूरे देश के गरीब बच्चों को शिक्षा हासिल नहीं होने वाली. सर्वोच्च न्यायालय के संकेत साफ हैं. 

भारत के असली गाँवों में तो सरकारी स्कूलों का ही चाह-अनचाहा आसरा है. इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का असर देश की राजधानी और कुछेक शहरों तक ही सीमित रहने वाला है. अर्थात शहरी गरीब बच्चों को इस निर्णय का फायदा मिल सकता है. लेकिन इस निर्णय का फायदा उठाने के लिए गरीब माँ-बापों और उनके बच्चों को कितने पापड़ बेलने पड़ेंगे, यह तो वक्त ही बताएगा. यह एक स्वतंत्र बहस की माँग करता है. तो कुल मिलाकर, देश के बाकी बच्चे सरकारी स्कूलों में ही जाएँगे. लेकिन सरकारें गाँव-गाँव में चल रहे सरकारी स्कूलों के खस्ता हाल पर एकदम चुप्पी साधी हुई हैं और उनकी जिम्मेदारी चमकीले विज्ञापनों के नियमित प्रसारण और प्रकाशन तक सीमित है! पहला, निजी स्कूलों को शिक्षा के नाम पर अनाप-शनाप और मनमानी कमाई और कारगुजारी करने से रोका जाये तथा इनपर संवैधानिक लगाम लगाई जाये. दूसरा, सरकार शिक्षा-व्यवस्था के मौजूदा तंत्र को दुरूस्त करे और सरकारी स्कूलों को बच्चों के लिए पढ़ने लायक बनाये. लेकिन मीडिया और अखबारों में सर्वोच्च न्यायालय के इस इस ऐतिहासिक निर्णय को लेकर जिस तरह और जिन बिंदुओं पर गरमागरम चर्चाएँ चल रही हैं, उनसे मुझे ऐसा लग रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के पीछे के संकेतों को न तो सरकार ठीक से समझ पा रही है और न ही मीडिया इन संकेतों पर ध्यान केंद्रित कर रही है. सरकार को ऐसा लगता है कि निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित हो जाने से गरीब बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के उनके अनिवार्य दायित्व की इतिश्री हो गई. मीडिया को भी लगता है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के एलिट निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटों पर गरीब बच्चे पढ़ने लगेंगे तो देश की शिक्षा-व्यवस्था की तसवीर बदल जाएगी. अगर मान भी लिया जाए कि देश के सभी निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटों पर गरीब बच्चों का पढ़ना अमली तौर पर संभव हो भी जाए तो बाकी बचे बच्चों को कहाँ और कैसे पढाया जाएगा?  मेरा सवाल यह है कि शेष बच्चों के लिए सरकार कौन-सी पक्की व्यवस्था करेगी? एक सामान्य अनुमान से स्कूल जाने योग्य अठारह करोड़ बच्चों के लिए क्या पर्याप्त स्कूल और पर्याप्त शिक्षक हैं? सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय पर सरकारी वाहवाही का और निजी स्कूलों के हायतौबा का इतना ज्यादा शोर मच रहा है कि बच्चों की शिक्षा से जुड़ी असली समस्याओं और मुद्दों पर कोई ऊंगली ही नहीं रख रहा है! 

निजी स्कूलों के बारे में दो बातों पर गौर करने पर समस्याओं की तसवीर बिल्कुल साफ हो जाएगी. पहली बात तो यह कि देश में सरकारी स्कूलों की तुलना में निजी स्कूलों की सँख्या और पहुँच क्या इतनी पर्याप्त और सुलभ है कि गाँव-गाँव के सभी गरीब बच्चों की आबादी में से एक छोटा-सा हिस्सा भी इन निजी स्कूलों में अपनी सीट पा सकेगा? यह तो कहने की जरूरत नहीं कि नामी-गिरामी, बड़े-बड़े निजी स्कूलों का तामझाम केवल शहरों और महानगरों में ही मौजूद है. छोटे-छोटे शहरों में भी जो निजी स्कूल चल रहे हैं, उनकी संख्या बहुत कम है और उसमें से भी अधिकांश स्कूल ढाँचे के लिहाज से स्कूल कम, दड़बे ज्यादा हैं. दूसरी बात यह कि छोटे-छोटे शहरों तक में प्राइवेट पब्लिक इंगलिश मीडियम स्कूलों के जगजाहिर कुकुरमुत्ता प्रसार के पीछे असली कारण क्या है और इसका जिम्मेदार आखिर कौन है? कुकुरमुत्ते की तरह हर गली- मोहल्ले में खुल रहे इन पब्लिक इंगलिश मीडियम स्कूलों के विस्तार के पीछे सरकारी स्कूलों का लचर और नकाम होना ही एकमात्र कारण है. हर माँ-बाप अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की कोशिश करता है. जो लोग सक्षम नहीं भी हैं, वे भी अपना पेट काटकर प्राइवेट स्कूलों की फीस भरने को तैयार हैं. उन्हें लगता है, इन प्राइवेट स्कूलों में पढाई तो होती है. पढ़ाई होने के अनुमान के पीछे उनकी यही भोली धारणा रहती है कि इन प्राइवेट स्कूलों में टीचर समय पर आते हैं, बच्चों को ढेर-सारा होमवर्क देते हैं, उन्हें डिसिप्लीन में रखते हैं. और सबसे बड़ी धारणा तो यह होती है कि इन स्कूलों में पढ़ने से उनके बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने लगेंगे.  
जो जरा-सा भी अर्थ-सक्षम है, वह अपने बच्चों को ब्रेड-बटर-जैम से लैस करके भारी-भरकम स्कूल-बैग के साथ प्राइवेट स्कूलों में भेजने को लालायित है. ऐसे में कुकुरमुत्ते की तरह फैल रहे ये प्राइवेट स्कूल सीना तानकर शिक्षा का परचम लहराने का स्वांग किए जा रहे हैं. और इसके उलट, सरकारी स्कूलों को उनकी बदहाली के लिए कोई टोकने-टाकने वाला तक नहीं. भला कौन टोका-टाकी करे? जो समर्थ है, वह उसका तलबगार नहीं और जो उसके आसरे है, वह खेती-मजूरी करे कि यही सब देखे कि स्कूल में मास्टर-मास्टरनी आये या नहीं? उसे तो बस इतनी तसल्ली है कि सरकारी स्कूल में उसके बच्चे को एक वक्त का भोजन मिल जाता है. उसे पढ़ाई की गुणवत्ता देखने-परखने का वक्त कहाँ?

ऐसी हालत में सरकारी स्कूलों को दुरूस्त और भरोसेमंद बनाने का एक ही कारगर उपाय नजर आता है कि इन प्राइवेट स्कूलों के कुकुरमुत्तेनुमा प्रसार को सख्ती से रोका जाये. प्रशासन और सरकार यह सुनिश्चित करे कि जिनके पास पर्याप्त जगह, पर्याप्त सुविधाएँ और पर्याप्त एवं सक्षम स्टाफ नहीं हैं, उन्हें मनमर्जी से स्कूल खोलने की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जाये. साथ ही, जो स्कूल पर्याप्त जगह और पर्याप्त एवं सक्षम स्टाफ के बिना ही चल रहे हैं, उन्हें नोटिस देकर सख्ती बरतते हुए तत्काल बंद किया जाए. यहाँ यह तर्क देना एकदम असंगत होगा कि सरकारी स्कूलों में तो पर्याप्त संख्या में शिक्षक ही नहीं हैं. इन प्राइवेट स्कूलों में भी पर्याप्त संख्या में शिक्षक नहीं होते और एक ही शिक्षक आठ-आठ कक्षाएँ लेने को विवश होते हैं. अगर प्राइवेट स्कूलों पर सरकार और प्रशासन द्वारा नकेल कसा जाएगा तो लोगों का ध्यान खुद-ब-खुद सरकारी स्कूलों पर जाएगा. लोग सरकारी स्कूलों पर बेहतर व्यवस्था, नियमित पढाई और उम्दा परिणाम देने के लिए दबाव बनाएँगे. यहाँ बिल्कुल माँग और आपूर्ति का सिद्धांत काम करेगा. सरकारी स्कूलों पर हर तबके के माँ-बाप जोर डालेंगे तो वे जरूर सुधरेंगे. सरकारी स्कूलों के शिक्षक चौकन्ने और तत्पर रहेंगे और जितनी सुविधाएँ हैं, उतने में ही सर्वोत्तम देने को बाध्य होंगे. इसी तरह, प्राइवेट स्कूलों पर नकेल कसा जाएगा तो वे भी मनमर्जी से जरूरत से ज्यादा संख्या में बच्चों को दाखिला देने में हिचकेंगे. इसी के समानांतर, सरकारी स्कूल बेहतर होंगे तो उनकी माँग बढ़ेगी और प्राइवेट स्कूलों पर विवशतापूर्ण निर्भरता घटेगी. इसके साथ-साथ, सरकार और जिला प्रशासन को हर जिले के शिक्षा-विभाग में मनचाहे ट्रांसफर-पोस्टिंग से जुड़े भ्रष्टाचार को भी सख्ती से मिटाना होगा. नेता और दलाल बने शिक्षकों को सख्ती से दंडित करना होगा. 

टीचर-युनियनों को यह बात साफ-साफ कहनी होगी कि सरकारी शिक्षकों को मोटी-मोटी तनख्वाहें स्कूलों में पढ़ाने के लिए दी जाती हैं, नारेबाजी और निठल्लेपन के लिए नहीं. सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को अक्सर शिकायत रहती है कि उन्हें पशु-गणना से लेकर जनगणना और पल्स-पोलियो अभियान तक में जोत दिया जाता है. तो जनाब, आप स्कूलों में पढ़ायेंगे नहीं तो आपकी ऐसी दुर्दशा तो होनी ही है! और अब तो मल्टी-टास्किंग का जमाना है. मोटी पगार मुफ्त में अब और नहीं मिलने वाली. सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को शायद अनुमान भी नहीं होगा कि उनकी तुलना में आधे से भी कम वेतन और सुविधा पर प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों को स्कूल-प्रबंधन के इशारों पर कितने-कितने और कैसे-कैसे काम करने पड़ते हैं! हुक्म न मानी तो नौकरी से निकाल दिये जाने का डर बेताल की तरह कंधे पर बैठा रहता है, सो अलग! कुल मिलाकर, देश में शिक्षा की सरकारी व्यवस्था को ही दुरूस्त करना होगा, तभी देश की इतनी विशाल आबादी को शिक्षा मिल पाएगी. देश की बहुत बड़ी आबादी गाँवों में रहती है. वहाँ ग्राम-पंचायतों को इस दिशा में क्रांतिकारी स्तर पर सक्रिय करना होगा. कुछ हद तक ग्राम-पंचायतों में सरकारी स्कूलों को दुरूस्त करने की दिशा में सक्रियता आयी भी है. अगर देश में सभी बच्चों को शिक्षित करना है तो शिक्षा की आऊटसोर्सिंग बंद करनी होगी. प्राइवेट स्कूलों को रत्ती-भर उपकार का जिम्मा देने से देश का उद्धार नहीं होने वाला. स्कूलों की तुलना मल्टीप्लेक्सों और मेगामॉलों से करना बेवकूफी होगी. जैसे छोटे-छोटे किराना दुकानों के बगैर देश के अधिकांश परिवारों का गुजारा नहीं होने वाला, वैसे ही सरकारी स्कूलों के बिना देश की आबादी शिक्षित नहीं होने वाली. इंजीनियरों, डॉक्टरों, अफसरों, पूँजीपतियों आदि के बच्चों के लिए एयर-कंडीशन्ड, फाइव-स्टार प्राइवेट स्कूलों को रहने दीजिए. करोड़ों-करोड़ किसानों, मजूरों, दलितों के लिए तो सरकारी स्कूल ही सबसे समर्थ, सबसे सक्षम, सबसे सही विकल्प है. इसलिए हम सरकारी स्कूलों को गरियायें नहीं, उनका सम्मान करें और उन्हें दुरूस्त करें.

कैसे निर्मित हो बच्चियों की महफूज दुनिया

इलाहाबाद राजकीय अनाथालय में बच्चियों के साथ यौनहिंसा के मामले की चर्चा अभी जारी ही थी कि गुडगांव अनाथालय का मामला प्रकाश में आ गया है। और हम इस कड़वी हकीकत से रूबरू हैं कि समाज में छिपे ऐसे दरिन्दों को पहचानने और उनपर पहले ही काबू पा लेने में लगातार असफलता हाथ लग रही है। गुडगांव के वजीराबाद गांव में एक स्वयंसेवी संस्था 'सुपर्णा का आंगन' द्वारा संचालित एक अनाथाश्रम में 20 बे-सहारा बच्चियां रहती थीं। इनमें से 5लडकियों को यहीं के चौकीदार ने अपने हवस का शिकार बनाया। 8से 12साल के बीच की 5लडकियों का मेडिकल परीक्षण हुआ जिसमें बलात्कार की पुष्टि हो गयी है। ताजा समाचार के मुताबिक संस्था की संचालिका एवं अपराधी चौकीदार को पुलिस ने गिरफ्तार किया है। पुलिस की प्रारम्भिक जांच में यहभी पता चला है कि यह अनाथाश्रम बिना अनुमति के चलाया जा रहा था।

 गांव के सरकारी कन्या विद्यालय में सभी बच्चियां पढ़ती थीं। मालूम हो कि अनाथाश्रम में जारी इस अत्याचार से परेशान इन लडकियों ने अपनी आपबीती अपने टीचर को बतायी। अध्यापिका निशा की प्रशंसा जरूर की जानी चाहिए जो अपने साथ इन बच्चियों को लेकर थाने चली गयी। अपने इस टीचर को बच्चियों ने बताया कि रचित ( 22 वर्षीय केयरटेकर ) की शिकायत उन्होने संचालिका मैडम से की थी तो उन्होनं डाँटकर भगा दिया था। दो बच्चियों ने बताया कि रचित ने एक साल पहले भी उनके साथ ऐसा ही किया था तो मैडम ने उसे नौकरी से निकाल दिया था। पर 15 दिन पहले वह फिर आ गया। इन 15 दिनों के बीच में दो बार कमरा बन्द करके बलात्कार किया और किसी को बताने पर जानसे मारने की धमकी दी थी। सहज अन्दाजा लगा सकते हैं कि 8 से 12 साल के भीतर की ये लडकियाँ कितनी हिम्मत जुटाकर अपनी टीचर को बता पायी होंगी। मॅडम निशा ने डीसीपी को बताया कि उन्होंने एक बच्ची के गाल पर निशान देखा और उससे पूछा तब जाकर चौकीदार की हरकत का पता चला।

 इलाहाबाद के राजकीय अनाथालय की घटना इसी किस्म की है। पिछले माह ही इलाहाबाद के शिवकुटी थाना क्षेत्र के तीन बच्चियों को चौकीदार विद्याभूषण औझा ने अपनी हवस का शिकार बनाया। फरक यही है कि यहां की अधीक्षिका उर्मिला गुप्ता ने ही इसकी शिकायत पुलिस में दर्ज करायी। लेकिन उनकी डयूटी के दौरान दिन में ही चौकीदार अपना कारनामा करता रहा और उन्हें पता नहीं चला। जब एक लडकी उनके पास शिकायत लेकर आयी तब उन्होंने मेडिकल के लिए भेजा। ज्ञात हो कि इस मामले का तो खुलासा होता ही नही यदि यहां से एक बच्ची को गोद लेनेवाले दम्पति ने यह पहल न की होती। बच्ची को गोद लेने के बाद बच्ची ने अपने अभिभावक से बालगृह के चौकीदार के बारे में बताया तब उस दम्पति ने इसकी शिकायत बालगृह की अधीक्षिका से की थी। अधीक्षिका उर्मिला ने कहा कि बच्चियों ने उनसे इसकी शिकायत नहीं की थी। दस वर्ष से कम उम्र की बच्चियों को क्या वह चौकीदार नही धमकाया होगा? किसका सहारा पाकर किससे शिकायत करती? 42 बच्चों में 17 बालिकाएं थी। दिनभर की डयूटी अधीक्षिका की थी यहां। यदि वे बच्चियों के साथ घुलीमिली होतीं और बच्चियों का उनपर भरोंसा बना होता तो वे क्यों नहीं घटना की जानकारी उन्हें देती ?

 अभी कुछ माह पहले ही दिल्ली का आर्य अनाथालय इसी किस्म की घटनाओं से सूर्खियों में था। दरअसल यहां रहनेवाले एक छात्रा की अचानक मौत होने के बाद पता चला कि उसके साथ यौन अत्याचार का सिलसिला चला था, फिर अख़बारों में हंगामा होने के बाद सरकार की तरफ से जांच की गयी थी।  इलाहबाद, गुडगांव या दिल्ली की ये घटनायें इसी साल पहली बार सिर्फ इन्हीं राज्यों से नही आयी है। कुछ साल पहले तमिलनाडु से संचालित एक आश्रम की खबर थी कि वहां से बच्चियों को आश्रम से बाहर देहव्यापार के लिए मांग की आधार पर भेजा जाता था। दरअसल देशभर में सरकारी,गैरसरकारी सभी अनाथाश्रमों की ठीक से तहकीकात किए जाने की जरूरत है। जांच तो होती है लेकिन वह महज खानापूर्ति होती है। ऐसी यौनिक हिंसाओं के अलावा भी यहां के बच्चों का भविष्य ठीक से संवर नहीं पाता है यदि किसी सही व्यक्ति /दम्पति ने उन्हें गोद लिया तब तो ठीक है वरना शायद ही स्नेह/प्यार की भाषा भी वे सुन पाते होंगे।

  वैसे देखा तो यह भी जाना चाहिए कि नि:सन्तान दम्पतियों को गोद लेने के लिए सालों का इन्तजार क्यों करना पडता है। गोद लेने की इच्छा रखने वालों की सूचि लम्बी बतायी जाती है फिर क्या वजह है कि बच्चों का बचपन अनाथआश्रम में ही बीत जाता है। यह सही है कि गोद लेनेवाले भी सही है या नहीं इसका कोई ठिकाना नहीं है लेकिन उसकी जांच पड़ताल ही तो उपाय है और पडताल में इतना समय क्यों लग जाता है ? दरअसल इस पूरे मामले में जितनी संवेदनशीनलता और सरोकार की जरूरत है उसकी कमी पड गयी है औरमामला शासकीय फाइलों में उलझा पडा रहता है। किसके पास समय है उसे जल्दी संज्ञान में लेने के लिए?  इन अनाथाश्रमों की दुर्दशा के साथ ही देशभर में चलनेवाले नारीनिकेतनों का हाल भी कम बुरा नही है। यहां से बलात्कार जैसी घटना की खबर भले नहीं आती होगी लेकिन यहाँ ऐसी घटनाओं के शिकार तथा दूसरे अन्य प्रकार के पीडिताओं भी भेजा जाता है। यहाँ का वातावरण भी एक जेल है। नारीनिकेतन या महिलाओं के लिए चलने वाले शेल्टर होम्स में सुरक्षा के नाम पर कैदी की तरह रखे जाते है। ऐसे कितने ही दुराचार जो रोज-रोज होते है लेकिन खबर नही बनते उसकी मुक्ति का क्या उपाय है,कौन लोग उसकी चिन्ता करेंगे और वे अपनी मुहीम को सफल, सशक्त कैसे बनायेंगे यह विचार करने की जरूरत है।

 एक तीसरा महत्वपूर्ण पहलू यह सोचने का बनता है कि किसी भी तरह से ऐसे काम कल्याण या सेवा की मानसिकता से नहीं चलना चाहिये। जो कोई व्यक्ति या संस्था दया करना चाहे तो उसके परमार्थ के रूप में जरूरतमन्दों की जरूरतें पूरी नहीं हो बल्कि सभी आश्रयगृह जिसमें किसी भी असहाय या वृध्द को जाना हो तो वह उसके नागरिक अधिकार के तौर पर मिले न कि दानखातें के रूप मे। यद्यपि कई संस्थाओं को सरकार स्वयम् ही अनुदान देती है जो लोगों को बतौर सेवा उपलब्ध कराया जाता है लेकिन सरकार को इस बहुत बड़े अन्तर को समझना होगा कि सरकारी राशि का खर्च लोगों के उपर कृतज्ञता के रूप में खर्च होता है जबकि सरकार को लोग चुन कर बनाते हैं जिसकी जिम्मेदारी है कि वह उन सारे कामों को स्वयम् करें जो नागरिक और व्यक्तिगत अधिकार की श्रेणी में आता है।

इस पर भी सोचने की जरूरत है कि विकसित से विकसित समाज में आश्रयस्थलों का निर्माण एक मजबूरी नहीं आवश्यकता होगी। सवाल यही तय करने का है कि उसका संचालन कौन करे ?क्या उसे कारोबार के अन्य हिस्सों की तरह देखा जाए या सरकार खुद अपनी जिम्मेदारी समझ कर इनका संचालन करे। कोई भी आश्रयस्थल चाहे वृध्दों का हो,अनाथों का हों,मानसिक या शारीरिक रूप मे चुनौतीपूर्ण अवस्थावालों के लिये हो या मुसीबत की मारी महिलाओं के लिये हो यह जो कमजोर हालात के होते है या जिनका कोई आधार न हो, निश्चित ही यह काम किसी कारोबार का हिस्सा नहीं हो सकता तथा सरकार के लिये यह जरूरी जिम्मेदारी बनती है कि वह किसी निजी या स्वयंसेवी संगठन के कंधों पर डाल कर मुक्त नहीं हो सकती है।

कानून और समाज क्या सलूक करें किशोरों के साथ ?

किशोरावस्था की उम्र को लेकर आज कल चर्चा जोरों पर है। दिल्ली सामूहिक बलात्कार के 6 आरोपियों में से एक की उम्र 18 साल से कम है। जुवेनाइल एक्ट के तहत वह अधिकतम तीन साल बालसुधारगृह में रहने के बाद छूट जाएगा और उसके साथ केस की सुनवाई जुवेनाइल अदालत में होगी। इस बीच सुझाव आ रहे हैं कि किशोरों में बढ़ते अपराध दर को देखते हुए यह उम्रसीमा घटा कर 16कर दी जाए। निश्चितही ऐसा निर्णय किसी खास केस से उभरी उत्तेजना के तहत नहीं किया जा सकता। कानूनी दृष्टि से किशोरावस्था की क्या उम्र होनी चाहिए इस पर आम सहमति बना कर तथा दुनिया भर में किशोरावस्था किसे माना जाता है इन सब आधारों पर छानबीन करके ही यह तय होना चाहिए।
                
वैसे ज्यादा महत्वपूर्ण मसला यह है कि युवा होते बच्चे अपराध की तरफ क्यों बढ़ रहे हैं? यह चिन्ता का विषय इसलिए है क्योंकि गृहमंत्रालय ने 2011 के आंकड़े पेश किए हैं जिसके अनुसार 33,387 किशोर अपराधी इस साल पकड़े गए। अन्य अपराधों की तुलना में बलात्कार के मामले में इनकी सहभागिता अधिक बढ़ी है। 2001से 2011 यानि एक दशक में किशोर बलात्कारियों की संख्या में चौगुना वृध्दि पायी गयी है। 2001 में किशोरों के खिलाफ बलात्कार के 399 मामले दर्ज हुए वहीं 2011 में 1,419 मामले दर्ज हुए। यहभी गौर करनेलायक है कि जो 33,387 किशोर गिरतार हुए उनमें दो तिहाई यानि 21,657 की उम्र 16 से 18 साल के बीच की थी। 12 से 16 वर्ष के बीच की उम्र वाले 11,019 पकड़े गए और 7 से 12 वर्ष के बीच के भी 1,211 पकड़े गए। इन किशोरों की आर्थिक सामाजिक पृष्ठभूमि पर भी विचार हुआ है,जिनमें अनपढ़ के साथ प्राइमरी तथा हाइस्कूल तक के शिक्षाप्राप्त भी शामिल हैं। कमजोर शैक्षिक पृष्ठभूमि वाले इनमें शामिल हैं।
                
 सवाल यह है कि 12 साल के उम्र के ये बच्चे कानून के खौफ से कितना डरेंगे? क्या वे अपराध करते समय सज़ा पर विचार करते होंगे? यूं तो कोई अपराधी चाहे बड़ी उम्र का भी हो तो वह अपराध करते समय यह नहीं सोचता कि कितनी सज़ा उसे भुगतनी होगी बल्कि इस बात का भय जरूर होता होगा कि वह पकड़ा जरूर जाएगा। नहीं पकड़े जाने या बच निकलने की सम्भावना ही अपराध कर लेने की छूट देती है। दूसरी अहम बात है कि कौनसी परिस्थितियां हैं जो अच्छी पढ़ाई लिखाई कर मेहनत की कमाई कर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित नहीं कर रही हैं। इन सभी मसलों पर सर्वांगीण तरीके से बात करने की जरूरत है।
                 
अगर हम अपना समूचा ध्यान किशोरों में अपराधों की बढ़ती संख्या की तरफ रखेंगे और अपराधों के नियंत्रण के लिए समाज द्वारा वयस्कों के सन्दर्भ में अपनाये जानेवाले तरीकों पर जोर देंगे, तो हम किशोरों की बड़ी आबादी को जेल या हिरासत में ढकेलेंगे और फिर यह सोचने की जरूरत भी महसूस नहीं करेंगे कि किसी के अपराधी बनने/ न बनने में समाज या राज्य की कोई भूमिका होती है या नहीं।
               
उदाहरण के तौर पर, बाल या किशोर अपराध में बढ़ोत्तरी का एक कारण समाज या राज्य द्वारा प्रस्तावित ऐसी प्रणालियों की असफलता में भी क्या देखा नहीं जाना चाहिए जो नाजुक परिस्थितियों में रहनेवाले बच्चों को नशीली दवाओं के प्रभाव में या वयस्कों की गलत संगत में पड़ने से बचाए। बाल अधिकारों की हिफाजत के लिए सक्रिय एक कार्यकर्ता के मुताबिक जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत एक ऐसी प्रणाली की कल्पना की गयी है जिसमें विशेष जुवेनाइल पुलिस युनिट का निर्माण हर जिले में होगा। इन इकाइयों का काम यह भी होगा कि वे ऐसे बच्चों को चिन्हित करें जो आपराधिक व्यवहार में जुड़ सकते हैं और उन्हें सहायता प्रदान करें। जब हम ऐसे बच्चे जो सड़कों पर रह रहे हैं या अन्य कठिन परिस्थितियों में रह रहे होते हैं,उनका ध्यान नहीं रखते हैं तब हम उन्हें अपराध में लिप्त वयस्कों के प्रभाव में आने से कैसे बचा सकते हैं।
                
बाल अधिकारों के लिए लम्बे समय से कार्यरत एक वकील (अनन्त अस्थाना) ने पत्रकार से बात करते हुए इसी बात को रेखांकित किया कि समर्थन प्रणालियों के अभाव में बच्चे अपराध की दिशा में मुड़ते हैं। उनके मुताबिक कानून कहता है कि हमारे पास बेहद सक्षम प्रोबेशन सेवा होनी चाहिए जो जुवेनाइल जस्टिस एडमिनिस्टे्रशन प्रणाली की रीढ़ होगी। मगर हकीकत यही है कि खुद राजधानी दिल्ली में भी यह प्रणाली जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की भाषा में 'मर चुकी है।' बच्चों की आवासीय देखरेख करनेवाली संस्थाओं मे उपेक्षा, हिंसा, दुराचार, मारपीट का आलम व्याप्त है और यह समूचे देश की स्थिति है। अकेली दिल्ली में 80 हजार बच्चे सड़कों पर रह रहे हैं। क्या यह पूछा नहीं जाना चाहिए कि ये बच्चे सड़कों पर क्यों हैं ? इनके बड़े होकर क्या बनने की हम अपेक्षा करते हैं ?
इस मसले के कई अन्य पहलू भी हैं। अपराध करते पाए जानेवाले किशोरों की सामाजिक, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि। बाल अपराधों पर रोकथाम के लिए बालसुधार गृहों के अलावा बने अन्य प्रावधानों पर अमल की स्थिति।
                
 उदाहरण के लिए बलात्कार की संख्या में बढ़ोत्तरी के आरोपों को देखें। इण्डियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट (8 जनवरी 2013) के मुताबिक जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, दिल्ली के साथ कार्यरत लोगों के मुताबिक ऐसे दर्ज मामलों के 70 फीसदी केसेस दो अल्पवयस्कों के ''आपसी सहमतिपूर्ण यौनसम्बन्ध'' के होते है, जो कानून की निगाह में 'अपराध' माना जाता है। एक दूसरी महत्वपूर्ण बात यह नोट की गयी कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के सामने आनेवाले मामलों में,कम से कम 75फीसदी बच्चे अपने आपराधिक व्यवहार को दोहराते नहीं है और कौन्सलिंग से ठीक होते हैं। बाकियों के लिए कौन्सलिंग या शिक्षा या किसी पेशे में संलिप्तता की जरूरत होती है।
                 
अगर हम गरीब बस्तियों या सड़केों पर रहनेवाले बच्चों में अपराध की प्रवृत्ति का विश्लेषण करें तो कई बातें दिखती हैं। परिवार के बिखराव पैदा बदहाली;बहुत कम उम्र में शराबखोरी एवं नशीली दवाओं का आदी होना और इसके चलते आपराधिक चंगुल में फंसना ;प्राकृतिक एवं मनुष्यनिर्मित आपदाओं के चलते लोगों का बढ़ता विस्थापन और फिर उनकी सन्तानों का गिरोहों में जुड़ना ; बालश्रम के खिलाफ कानून की मौजूदगी मगर हर उपेक्षित बच्चे के लिए सामाजिक देखभाल का अभाव, नतीजा विपन्न बच्चे बहुत पहले से शोषण एवं अत्याचार के शिकार जो अपराध की तरफ उन्हें ले जाता है ; यौन व्यापार में छोटे बच्चों का ढकेला जाना, जिसमें लड़के एवं लड़कियां दोनों शामिल रहते हैं।
                
बाल अथवा किशोर अपराधियों की संख्या के मामले में हम पश्चिमी देशों में भी नस्लीय अन्तर देखते हैं। उदाहरण के लिए नेशनल सेन्टर फार जुवेनाइल जस्टिस की 2008 की रिपोर्ट के मुताबिक 10 से 17 साल की उम्र के अश्वेत बच्चे के गिरफ्तार होने की सम्भावना श्वेत बच्चे की तुलना में दोगुनी रहती है। क्या इसका मतलब यह निकाला जाए कि अश्वेत बच्चों में अपराधीपन अधिक होता है। कत्तई नहीं! यह धयान में रखने की जरूरत है कि गरीबी या निम्न सामाजिक-आर्थिक स्थिति के चलते माता पिता की तरफ से कम देखभाल, आवारा दोस्तों के साथ अधिक जुड़ाव जैसी चीजें दिखती हैं, जो रास्ता किशोर अपराध की तरफ ले जा सकता है। दूसरा अहम पहलू यह भी होता है कि पुलिस प्रशासन में भी जो नस्लीय भेद मौजूद होता है, उसके चलते भी वह जहां श्वेत बच्चे के साथ अधिक नरमी से पेश आ सकते हैं, उसी अपराध के लिए अश्वेत बच्चे को गिरतार कर सकते हैं।
                
अपनी एक चर्चित किताब में लैरी ग्रोसबर्ग (2005) लिखते हैं कि दरअसल युवा लोग आधुनिकता के बहुविधा संकटों के साथ एक अलग किस्म के रिश्ते में रहते हैं, इसे समझने की जरूरत है। उनके मुताबिक अमेरिका ने अपने युवाओं के खिलाफ एक तरह से युध्द छेड़ा है - यह युध्द इस बात से जुड़ा है कि समाज युवाओं के बारे में कैसे सोचता है और बोलता है ; कैसे वह इलाज, अनुशासन और नियमन के मुद्दे को देखता है और अन्तत: आर्थिक बदहाली के मसले को। उनके मुताबिक ''विगत पचीस सालों में हम बच्चों के बारे में क्या बोलते हैं और सोचते हैं इसमें जबरदस्त रूपान्तरण हुआ है और अन्तत: उनके साथ हम कैसा व्यवहार करते हैं इसमें। हम लोग, वक्त के एक हिस्से में, एक ऐसी गढ़ी दुनिया में रहते हैं जहां बच्चे नियंत्रण के बाहर हैं गोया वह हमारे आत्मीय दायरों में छिपे दुश्मन हों। इसकी प्रतिक्रिया भी दिखती है - आपराधीकरण और कारावास, मनोवैज्ञानिक बन्दिशें और दवाएं आदि - जो इसी बात को उजागर करता है कि न केवल हमने बच्चों की वर्तमान पीढ़ी का परित्याग किया है बल्कि हम उन्हें एक ऐसे खतरे के तौर पर देखते हैं जिस पर काबू किया जाना है, दण्डित किया जाना है और कुछ मामलों में अपनी तरफ करना है। चिल्डे्रन्स डिफेन्स फण्ड के मुताबिक, हर सेकन्द में हाईस्कूल के एक बच्चे को निलम्बित किया जाता है ; हर दस सेकन्ड पर उसे शारीरिक तौर पर दण्डित किया जाता है; हर बीस सेकन्द पर एक बच्चे को गिरतार किया जाता है। हमारे डरों एवं निराशाओं से निपटने के लिए दरअसल आपराधीकरण एवं मेडिकलीकरण अधिक सस्ते एवं आसान उपाय दिखते है।
               
जान क्लार्क, इस सम्बन्ध में एक अलग नज़रिया पेश करते हैं। (वाटस द प्राब्लेम ?, द ओपन युनिवर्सिटी, यूके) उनके मुताबिक लम्बे समय से यह स्पष्ट है कि 'प्राइवेट दायरों' तक अधिकतर युवाओं की पहुंच बहुत सीमित है - यह एक ऐसी स्थिति है जो सार्वजनिक दायरों पर उनकी निर्भरता को बढ़ाती है। वर्तमान समय में, वह उन्हें निगरानी, नियमन एवं पुलिसिंग के अधिक रूपों का शिकार बनाती है.. हमारे सभी समकालीन संकटों का एक पहलू ऐसा होता है जो भौतिक रूपों में युवाओं को अधिक नाजुक स्थिति में डालता है और साथ ही साथ उन्हें संकट के प्रतिरूप के तौर पर पेश करता है।
 

जानिए कानून ताकि बच्चों पर नहीं हो जुल्म

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड की हालिया रिपोर्ट में देशभर के बच्चों के खिलाफ होने वाले गंभीर अपराधों  के आंकड़े चिंताजनक हैं।  भारत में बीते साल 5,484 बच्चों के साथ यौन दुर्व्यवहार हुआ। देश भर में 1,408 बच्चों की हत्या हुई। बच्चों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार में मध्य प्रदेश पहलेराजधानी दिल्ली दूसरे और महाराष्ट्र तीसरे स्थान पर है। इसी तरह अन्य अपराध के भी आंकड़े हैं। हालांकि इन अपराधों के अलावा बच्चों के साथ कई तरह से बदसलूकी की बातें भी सामने आती रही हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि बच्चों के प्रोटेक्शन के लिए कानून में क्या-क्या प्रावधान किए गए हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े देश में बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के चौंकाने वाले तथ्य पेश कर रहे हैं। 2010 में मध्यप्रदेश में बच्चों के खिलाफ हुए अपराध के 4,912 मामले दर्ज किए गए। दिल्ली में 3,640, महाराष्ट्र में 3,264 और उत्तर प्रदेश में 2332 मामले दर्ज किए गए। यूपी में 315 बच्चों को जान से मार दिया गया और 451 बच्चों से बलात्कार हुआ। महाराष्ट्र में 1,182 यौन दुर्व्यवहार के मामले सामने आए। देश की राजधानी दिल्ली में 304 बच्चों से बलात्कार हुआ और 29 हत्याएं हुईं। आंकड़ों के मुताबिक हत्या के मामलों में सिर्फ 2.3 फीसदी की कमी देखी गई।
सरकारी रिपोर्ट के कहती है कि बीते साल भारत भर में 10,670 बच्चों का अपहरण हुआ। यानी औसतन हर दिन 29 बच्चे अगवा किए गए। अपहरण के मामले में दिल्ली सबसे ऊपर है। दिल्ली से बीते साल 2,982 बच्चे अगवा किए गए। बिहार में बच्चों के अपहरण के 1,359, यूपी में 1,225, महाराष्ट्र में 749 और राजस्थान में 706 मामले दर्ज किए गए। आंध्र प्रदेशपश्चिम बंगालतमिलनाडुछत्तीसगढ़ और गुजरात की हालत भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। जम्मू कश्मीरउत्तराखंडसिक्किमअरुणाचल प्रदेशनगालैंड और झारखंड में बच्चों के साथ अपराध के कम मामले सामने आए हैं। 2009 में बच्चों के खिलाफ अपराध के 24,201 मामले दर्ज हुए थे। 2010 में इनकी संख्या 10.3 फीसदी बढ़कर 26,694 हो गई। नाबालिग बच्चियों के साथ होने वाले अपराधों में 186.5 फीसदी वृद्धि हुई। वेश्यावृत्ति के लिए बच्चियों की खरीद फरोख्त और बलात्कार के मामले बढ़े।
2010 
में पुलिस ने बच्चों के साथ हुए अपराध के मुकदमों में 34,461 लोगों गिरफ्तार किया। लेकिन लचर जांच के चलते पुलिस सिर्फ 6,256 लोगों को ही दोषी साबित करा सकी। यानि बच्चों के साथ अपराध करने वाले 34.3 फीसदी मुजरिमों को सजा दिलाई जा सकीबाकी 65.7 फीसदी कानून को ठेंगा दिखाकर बच निकले।

यौन शोषण
बच्चों  नाबालिगों के साथ होने वाले यौन शोषण या सेक्शुअल हरासमेंट और अन्य तरह की प्रताड़नाओं से जुड़ी खबरें आए दिन देखने को मिलती हैं। इनमें बलात्कारअप्राकृतिक दुराचारछेड़छाड़  अन्य तरह की अश्लील हरकतें शामिल हैं। जानकार बताते हैं कि कई बार बच्चे संकोच के कारण अपने साथ होने वाले इस तरह की प्रताड़नाओं का जिक्र तक नहीं करते। कई मामले ऐसे भी देखने को मिलते हैं कि आरोपी सगा-संबंधी होता है। 

कानूनी जानकारों के मुताबिक 18 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ अगर उसकी सहमति से भी कोई संबंध बनाता है तो भी वह अपराध है क्योंकि नाबालिग की सहमति का कानूनी तौर पर कोई मतलब नहीं होता। अगर ऐसे बच्चों के माता-पिता को किसी भी समय पता चले कि उनके बच्चे के साथ गलत हुआ है तो उन्हें इस बारे में पुलिस को सूचना देनी चाहिए। ऐसे आरोपी के खिलाफ बच्चे का बयान अहम होता है। बच्चों के साथ इस तरह की प्रताड़ना को रोकने के लिए जागरूकता भी जरूरी है। 
अध्यापक प्रताड़ित करें तो क्या करें?  
शिक्षा का अधिकार (राइट टू एजुकेशन एक्टमें इसके बारे में जिक्र किया गया है। हालांकि इसके लिए किसी विशेष पैनल का प्रावधान नहीं है। आरटीईएक्ट की धारा  17 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि अगर कोई भी शिक्षक किसी छात्र को मानसिक अथवा शारीरिक तौर पर प्रताड़ित करता है तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। सविर्स रूल के हिसाब से ऐसे दोषी शिक्षक के खिलाफ दुर्व्यवहार के लिए कार्रवाई की जा सकती है। 
चाइल्ड लेबर 
बाल श्रम या चाइल्ड लेबर रोकने को लेकर अदालत कई बार निर्देश जारी कर चुकी है। चाइल्ड लेबर करवाने वालों को सख्त सजा दिए जाने का प्रावधान भी है। चाइल्ड लेबर इसके बावजूद थम नहीं रहा है। 18 साल से कम उम्र के बच्चों से खतरनाक उद्योगों में काम कराया जाना अपराध है। ऐसी स्थिति में 3 साल तक कैद की सजा का प्रावधान किया गया है। वहीं कानून में कई दूसरी तरह की बातों का जिक्र किया गया है। मसलनअगर 14 साल से कम उम्र के बच्चों से ये काम लिए जाते हैं तो वह चाइल्ड लेबर एक्ट के तहत जुर्म है। 14 साल के कम उम्र के बच्चों से अन्य कामों के अलावा घरेलू काम करवाना भी कानूनी जुर्म है और इसके लिए दोषी पाए जाने पर 1 साल तक कैद और 10 हजार से 20 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 
कानूनी जानकार एमएसखान के मुताबिक आपराधिक मामला बनने पर अगर किसी की उम्र 18 साल से कम पाई जाती है तो उसे बच्चा ही माना जाएगा। आरोपी 18 साल से कम है तो उसकी पहचान गुप्त भी रखी जाती है। साथ ही उसका मामला जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को भेज दिया जाता है। इसके पीछे मकसद यह है कि जुवेनाइल को सुधारा जाए। यही कारण है कि उसे सुधार गृह में भेजा जाता हैजहां सजा देने की बजाए जुवेनाइल को सुधारने पर जोर दिया जाता है। जुवेनाइल को आमतौर पर जमानत दिए जाने का प्रावधान है। जुवेनाइल के खिलाफ हत्या या ऐसे किसी भी संगीन आरोप ही क्यों  साबित हो जाएंउसे 18 साल तक की उम्र तक ही सुधार गृह में रखा जाता है। सरकारी वकील नवीन शर्मा के मुताबिक जुवेनाइल जस्टिस एक्ट इसलिए बनाया गया है ताकि बच्चों को सही राह दिखाई जा सके। जूवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा  23 में यह प्रावधान किया गया है कि अगर बच्चा हिरासत में है और उस हिरासत में बच्चे को मानसिक अथवा शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता है तो इसके लिए दोषी पाए जाने पर ऐसे लोगों के खिलाफ 6 महीने तक कैद अथवा जुर्माने की सजा दी जाएगी।