Sunday, October 28, 2012

क्या चेहरे बदल देने से सरकार का चरित्र बदल जायेगा ?

घपले घोटाले से घिरे यूपीए-2 की सियासी सूरत बदलने के लिए   केंद्रीय कैबिनेट में सबसे बड़ा बदलाव हुआ है। इस बदलाव को 2012 में अंजाम दिया जा रहा है लेकिन नजर 2014 की चुनौती पर है। इस कवायद की कोशिश क्या रंग लाती है इसका पता तो दो राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनाव के बाद ही चल जाएगा। सूरत आज भले ही बदली गई है, लेकिन इसका साइड इफेक्ट अभी से ही सुरू हो गया है। कई सारे सवाल भी खड़े होने लगे है। मनमोहन के इस दांव में जिन चेहरों को षामिल किया गया है उनमे कई मंत्री ऐसे है जिनके उपर पहले से ही कई सारे आपरोप लगा हुआ है। मनमोहन सिंह ने युवा और अनुभव इन्हीं दो मुद्दे पर इस बार का फेर बदल किया है जिसमे कई नए चेहरों को मौका दिया गया है। मतलब साफ है अनुभवी चेहरे घोटाले करते रहेंगे तो वही दुसरी ओर युवा चेहरे के नाम पर राहुल की राजनीति भी चलती रहेगी। विपक्ष फेरबदल को बेकार की कवायद करार दिया है। इस फेरबदल पर बीजेपी ने कहा कि केंद्र सरकार को इसकी बजाए नया जनादेश प्राप्त करना चाहिए। अगर इन नये चेहरो की बात करे तो षषी थरूर पर राश्ट्रमंडल खेल के दौरान अवैध तरिके से धन लेने के साथ- साथ आईपीएल घोटाले में तथाकथित आरोप लग चुका है। वही दुसरी ओर अगर चीरंजिवीं की बात करे तो उनके उपर नलिनी नामक महिला का अपहरण करने के साथ- साथ चुनाव अचार संहिता का उलंघन करने के अलावे चुनाव में टिकट बेचने जैसे गंभिर आरोप लगा हुआ है। साथ ही इनके पास राजनीतिक अनुभव कम है ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या ये सिर्फ सरकार की नये चेहरे को मंत्रीमंडल में परेड कराने के लिए बनाय गया है या फिर इनका आम आदमी से भी कोई सरोकार है।  राहुल ब्रिगेड में शामिल नेताओं को बड़ी जिम्मेदारी भले ही मिल गई हो मगर राहुल गांधी इस बार भी मंत्रिमंडल में षामिल नही हुए राहुल अपने युवा मंत्रिमंडल के आसरे ही 2014 के चुनावी नैया को पार लगाना चाहते है क्योकी उनका मिषन पीएम की कुर्सी है। इस फेरबदल से तो यही लगता है। तो ऐसे में आप खुद ही अनुमान लगा सकते है की यूपीए सरकार का मिषन आखिर है क्या। क्योकी सलमान खुर्षीद जैसे मंत्री जिन्होने बिकलांगो के फंड तक को डकार गये उसको भी कांग्रेस सरकार इस घोटाले की सौगात में विदेष मंत्री बना दिया। यानी की अब देष के लुटने के बाद बारी विदेष की है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या महज चेहरे बदल देने से या कुछ चेहरों का महत्व बढ़ जाने से सरकार का चरित्र भी बदल जाएगा। 

Saturday, October 27, 2012

इफ्तार पार्टी देने वाले नवरात्र से बेरुखी क्यों ?

आज देश में राजनीतिक स्वरूप इस कदर बदल चुकी है की जहा पर राजनेताओं को हर ओर सिर्फ वोट बैक की तुच्छ राजनीति ही दिखाई दे रही है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है रोजा इफ्तार पार्टी में राजनेताओं की मौका परास्ती की राजनीति। जब देश में होली दशहरा और दिवाली का समय होता है तो कोई भी नेता दुर- दुर तक दिखाई नही देता है मगर जब रोजा और इफ्तार पार्टी की बारी आती है तो हर हिंन्दु नेता अपने आप को मुस्लिमों के सबसे बड़े हितैसी साबित करने से नही चुकते है। ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या ये नेता सिर्फ दिखावे की राजनीति करते है, जो सिर्फ टोपी लगा कर उनके दिल को जितना चाहते  है। ऐसी राजनीति करने वाले राजनेताओं को कभी उस तबके के विकास नजर क्यो नही आती। उनके सिक्षा और स्वास्थ्य के बारे आखिर ये नेता क्यो में सोचते है।

रोजा इफ्तार के मौके पर सबसे पहली नजर नेताओं की रहती है। दूसरी बड़ी वजह वह राजनीतिक परिस्थितियां हैं, जो सत्ताधारियों के लिये मुनाफे की चाशनी बन चुकी है। जिसे बिना किसी लाग-लपेट के हर तरह राजनीतिक दल चाटना चाहता है। मामला सिर्फ वोट बैंक का नहीं है। जहां कांग्रेस को पुचकारना है और बीजेपी को मुस्लिम के नाम पर हिन्दुओं को डराना है। बल्कि विकास की लकीर का अधूरापन और पूरा करने की सोच भी मुस्लिम समुदाय से जोड़ी जा सकती है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी ऐसी राजनीति में खुब दिलचस्पी लेते है अगर इनकी उदारता पर नजर डाले तो इन्होने 2010 के इफ्तार पार्टी में मात्र 5 हजार मुस्लमानों के लिए 60 लाख रूपये सरकारी खजाने से लुटा दिए। सरकारी खजाने से इफ्तार पार्टी की शुरुआत इस देश मे सबसे पहले इंदिरा गाँधी ने की थी।

अपने वोट बैंक के लिए और मुसलमानों को खुश करने के लिए उन्होंने सरकारी खजाने से पहली बार अपने निवास तीन मूर्ति भवन मे भव्य इफ्तार पार्टी दिया था। रामविलास पासवान, लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार, आजम खान, जैसे हजारों लोगो ने सरकारी पैसे से भव्य इफ्तार पार्टी का आयोजन करने में नही हिचकते। मगर यहा सवाल हिंन्दुओं के हक को लेकर भी उठता है की क्या कभी कोई होली दशहरा दिवाली पर फलाहार पार्टी या भोज का अयोजन क्यो नही किया जाता है। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी हर साल सरकारी पैसे से अपने सरकारी निवास मे भव्य इफ्तार पार्टी करते है।

 लेकिन क्या इस देश मे जहां 80 प्रतिषत हिंदू है उनके लिए सरकारी पैसे से होली या दिवाली की पार्टी हिन्दुओ के लिए हो सकती है? ऐसा बिलकुल नही लगता क्योकी अगर कोई ऐसा करेगा तो वह साम्प्रदायिक पार्टी कहलाऐगा। यही कारण है की हर नेता अपने सर नमाजी टोपी डाल कर अपने आप को धर्मनिरपेक्ष साबित करने की जुगत में मौका परास्ती की राजनीति करने से बाज नही आता हैं। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की आखिर इफ्तार पार्टी देनेवाले नवरात्रों में उदासिन क्यों रहते है। क्या हिन्दु हित की रक्षा करना इनके लिए कोई मायने नही रखती। 

शहीदों को छोड़ आतंकवादियों को पुनर्वास देना कितना सही ?

आज हमारा देष एक ओर जहा अतंकवाद से जुझ रहा है वही दुसरी ओर जम्मू कश्मीर सरकार आतंकवादियों को पूर्नवास की नीति लाकर देष के दुष्मनों को अपने ही घर में पालने पर उमाद़ा है। कुछ दिन पहले काष्मीर के कुछ उग्रवादी पाकिस्तान में जाकर अपने ही देष के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए प्रषिक्षण लिया जो कभी भी हमारे देष के निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार सकते है। मगर अब इन्ही आतंकियो को जम्मू कश्मीर सरकार अपने राज्य में पालना चाहती है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या राजनीतिक सत्ता के लिए देष के दुष्मनो को भी गले लगाने से, ये सरकार परहेज नही कर सकती। पुनर्वास नीति के अनुसार, अगर कोई भी आतंकवादी लौटने के इच्छुक है, तो वह अपने परिवार या रिश्तेदारों को सूचित कर सकता है। इस नीति को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा घोषणा की गई और केंन्द्र सरकार इसे समर्थन किया। इसके तहत पाकिस्तान में रह रहे 3,000 कश्मीरी आतंकवादियों की वापसी और पुनर्वास संभव है। प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा पहले ही सरकार के इस कदम को खतरनाक करार दे चुकी है। साथ ही बीजेपी इसे एक बड़ा सुरक्षा जोखिम भरा कदम मान रही है। तो ऐसे में सवाल उठना लाजमी है की क्या सरकार यहा भी वोट बैक की नीति के तहद ही काम कर रही है। क्या उसके लिए राश्ट्रीय सुरक्षा भी कोई मायने रखती। देष के सहिदों के विधवाओं के आखो के आंसु पोछने के लिए आज इस सरकार के पास वक्त नही है जिसने हमारे षरहदो की रक्षा के लिए अपनी भरी जवानी कुर्बान कर दी। 

देष के खातिर सेना के जाबांज सिपाही मरते हैं। 
नेताओं की पाक परस्ती से लेकिन सब डरते हैं। 

आज हजारो सैनिक देष के अंदर खुंखार आतंकवादीयों के गोली के षिकार हो रहे है, तो ऐसे में जम्मु काष्मीर सरकार द्वारा आतंकवादीयों को पानाहगार बनाना क्या अपने ही पैर में कुल्लहाणी मारने जैसा नही है। जम्मु काष्मीर सरकार जिस संविधान की दुहाई दे रही है क्या ये कदम संविधान के खिलाफ नही है। जहा पर कोई देष का दुष्मन हमारे घरो में राज करने की बात करे। क्या जम्मु काष्मीर सरकार भारतीय डंड संहिता की धारा 122 और 123 से अनभिज्ञ है जिसमें साफ तौर पर कहा गया है की देष के खिलाफ युध्द छेड़ने या किसी प्रकार के अस्त्र सस्त्र जुटाने वाले के लिए सजा मौत है। सरकार की ये कौन सी नीति है जहा पर मौत के हकदार को पुर्नवास देने की ये घिनौनी खेल खेली जा रहा है। आज हमारे देष के विर जवानों को एक छोटी सी सरकारी सुविधा के लिए नाको चना चबाना पड़ता है। मगर आज देष के दुष्मन मलाई खा रहे है। आज ये सरकार किस नकषे कदम पर चल रही है इसका अंदाजा आप सुद लगा सकते है। तो ऐसे में हमारे पास सिर्फ एक ही विक्ल बचता है।

आतंकी षिविरों में घुस कर वार किया जाए।
काष्मीर का काबुल जैसा ही उपचार किया जाए।।

Tuesday, October 23, 2012

क्या आज पैसा ही सब कुछ है ?

पैसा-पैसा करते हैं, सब पैसे पर ही मरते हैं। आज के दौर में ये हकीकत साबित हो रहा है। तो सवाल भी उठने लगा है की क्या जीवन जीने के लिये पैसा ही सब कुछ है ? शास्त्रों में बताया गया है कि हमारा पहला कर्तव्य है कर्म। कर्म से ही सब कुछ बदला जा सकता है। श्रीकृष्ण ने भी कर्म को ही प्रधान बताया है। मगर आज के चकाचैध भरी जिंदगी में पैसे की अहमीयत इस कदर लोगो के सर चढ़ कर बोल रहा है की आज इसके लिए लोग कायरता की सारी हदें पार कर रहें है। आज के आधुनिक समाज में जिनके पास ज्यादा पैसा है उनका लोग इज्जत करते है मगर सच्चाई ये भी है की पैसे वाले अधर्मी ,दुराचारी व भ्रस्टाचारी को समाज में लोग अलग नजरो से देखतें है। इस महंगाई वाले जमाने में हर इंसान को पैसे की जरूरत होती है ये बात एक दम सच है परन्तु ये भी सच है की पैसे की खातिर हम अपना ईमान भी नहीं बेच सकते है। डाक्टर को भी लोग भगवान् का रूप मानते है क्योकि वो इंसानों को दूसरा जीवन जो देता है, मगर सवाल यहा भी उठता है की क्या ऐसे पेषा में भी पैसा ही सब कुछ है। जहा एक गरिब व्यक्ति का जीवन पैसे से कही ज्यादा अहम है, मगर इस पेषे में भी पैसा ही आज सब कुछ है। हर व्यक्ति केवल पैसा ही पैसा मांग रहा है, जिसमें पारिवारिक रिश्ते, सगे-संबंधी व दोस्ती-यारी सभी रिश्तों पर पैसा शुरू से ही भारी रहा है। परंतु, अब रिश्ते खासतौर पर पैसे के तराजू से ही तोले जाने लगा हैं। आज के इस अर्थयुग व गलाकाट प्रतियोगी माहौल में पैसा कमाना आसान नहीं रहा। पैसा कमाने में आज तमाम जोखिम हैं। परंतु फिर भी ज्यादातर लोग अधिक से अधिक पैसा इकट्ठा करना चाहते हैं। यही कारण है की लोग मनुश्य की जिंदगी से कही जयादा पैसे को अहमीयत दे रहे है। पैसे को कैसे भी हथियाना आज लोगों का परम लक्ष्य बन चुका है। वहीं कुछ लोग जल्दी से जल्दी अमीर व पैसा बनाने के लिए गलत काम करने में भी नहीं हिचकिचाते हैं। किसी को नुकसान पहुंचा कर भी अपना काम बनाना या पैसा ऐंठना ही एक मात्र मकसद होता है। लोग एक दूसरे को मरने-मारने पर भी मजबूर होते जा रहे हैं। पैसे की मोह माया लोगों पर इस कदर हावी है कि अच्छा-बुरा कुछ दिखाई नहीं देता है। शेक्सपियर नें भी लिखा है पैसा और दोस्ती दोनों एक साथ खत्म हो जाती है फिर भी पैसे को अधिक महत्व दिया जाता है। किसी को जरूरत के समय पर आर्थिक मदद करना मानव स्वभाव व नैतिकता बताई गई है। परंतु ऐसा देखने में कम ही दिखाई पड़ती है। आज भी हमारे देश में कई लोग ऐसे हैं जो खाने के लिए अपने परिवारों से दूर रह रहे हैं, दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं या भीख मांग रहे हैं। अगर एक दिन भी उन्हें काम न मिले तो उस दिन उनके घर चूल्हा नहीं जलता। मगर देष में धनकुबेरो की बात करे तो उनके पास इतना पैसा है की पुरे देष का पेट भरा जा सकता है। यही से सुरू होती है अमीरी और गरिबी की खाई जो इंसान को इंषानियत से दुर कर देता है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या पैसा ही सब कुछ है। 

क्या देश के अगले जमींदार कारर्पोरेट घराने है ?

भारत की प्राचीन विचारधारा के अनुसार भूमि सार्वजनिक संपत्ति थी, इसलिये यह व्यक्ति की संपत्ति नहीं हो सकती थी। मगर आज देष के अंदर हालात इसके बिलकुल विपरित है। भूमि का संपत्ति के रूप में क्रय विक्रय प्राचीन भारत में संभव नहीं था। अब देष में जिस प्रकार से जमीन की लुट मची हुई है उसको लेकर किसानो में देष के औधोगिक घरारानो के प्रति एक रोष उत्पन्न हो गई है। जमींदारी प्रथा भारत में मुगल काल एवं ब्रिटिश काल में प्रचलित एक राजनैतिक-सामाजिक कुरीति थी जिसमें भूमि का स्वामित्व उस पर काम करने वालों का न होकर जमींदार का होता था जो खेती करने वालों से कर वसूलते थे। स्वतंत्रता के बाद जब ये प्रथा बदली तो कानुन भी बना। लेकिन अब स्थिति यहा तक पहुंच गई है की औधोगिक घराने ही सबसे बड़े जमींदार बन गये है। क्योकी सत्ता की ताकत और पैसों की कुबेर उन्ही लोगो के हाथो में है जो औधोगिक घरानो से संबंध रखते है। तो सवाल भी उठना लाजमी है की क्या देष के अगले जमींदार कार्पोरेट घराने ही होंगे। असल सवाल यहीं से शुरु होता है कि क्या संसद के भीतर जमीन को लेकर अगर राजनीतिक दलों से यह पूछा जाये कि कौन पाक साफ है तो बचेगा कौन। क्योंकि देश के 22 राज्य ऐसे हैं, जहां जमीन को लेकर सत्ताधारियों पर विपक्ष ने यह कहकर अंगुली उठायी है कि जमीन की लूट सत्ता ने की है। यानी आर्थिक सुधार के जरीये विकास की थ्योरी ने मुनाफा के खेल में जमीन को लेकर झटके में जितनी कीमत बाजार के जरीये बढ़ायी, वह अपने आप आजादी के बाद देश बेचने सरीखा ही है। भले ही आधुनीकिकरण ने सरहद तोड़ी लेकिन उसमें बोली देश के जमीन की लगी। इस दायरे में सबसे पहले सत्ता की ही कुहुक सुनायी दी। औघोगिक विकास की लकीर खिंचने के नाम पर ये कारर्पोरेट घराने जमींदार बनते जा रहे है तो वही दुसरी ओर देष के सबसे गरिब तबका किसान इस चकाचैध की आपाधापी में हासिये पर ढकेल दिया गया है। बीते तीस साल में राजनीति का पहिया कैसे घूम गया, इसका अंदाज अब लगाया जा सकता है। क्योकी जिस संसद के अंदर किसान और मजदूर वर्ग की बात होती थी आज वहा पर इन्ही कारपोरेट घरानो की कुहूक सुनाई दे रही है। औधोगिक विकास के नाम पर केवल पंष्चिम बंगाल में 40 हजार एकड़ जमीन इन ठप पड़े उघोगों की है जिसे कुछ दिन पहले कारपोरेट घरानो को दी गई थी। यह जमीन दुबारा उघोगों को देने के बदले व्यवसायिक बाजार और रिहायशी इलाको में तब्दील हो रही है। चूंकि बीते दो दशकों में बंगाल के शहर भी फैले हैं तो भू-माफियो की नजर इस जमीन पर पड़ी है। बात सिर्फ पंष्चिम बंगाल की ही नही है ऐसे तमाम राज्य है जहा पर ये लुटतंत्र का समराज्य फल फुल रहा है। नयी जमीन जो उघोगों को दी जा रही है, उसके लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर भी खड़ा किया जा रहा है, जो लोगो के रहते और खेती करते वक्त कभी नही किया गया । आज महंगाई को लेकर जिस प्रकार से देष के अंदर हाहाकार मची हुई है उसका भी एक कारण ये जमीन का लुटतंत्र ही है। प्रेमचंद ने सन 1936 में अपने लेख महाजनी सभ्यता में लिखा है कि मनुष्य समाज दो भागों में बँट गया है । एक बड़ा हिस्सा तो मरने और खपने वालों का है, और छोटा हिस्सा उन लोगों का जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को बस में किए हुए हैं। यही कारण है की ये कारपोरेट घराने देष के जमींदार बनते जा रहे है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या देष के ये कारपोरेट घराने ही नए जमाने के जमींदार है। 

क्या चीन युद्ध से हमने कुछ सबक सिखा ?

भारत चीन युद्ध के 50 वर्श पूरे हो चुके है, इतने सालों में देष ने तरक्की की हजारों गाथाए अपने नाम किए, मगर एक सवाल उस हर हिंदुस्तानी के दिलो दिमाग में कौध रहा है की क्या आज भी हम चीन से मुकाबला कर सकते है। क्या हमारी सेना और सरकार आज भी कुछ सिख ले पायी है। हिंदी चीनी भाई भाई के नारा उस वक्त गुम हो गया जब चीन ने हिंदुस्तान के पीठ में खंजर घोप कर अपने कुरूरता का परिचय दिया, जिनसे हम मिठास घोलने की उमीद पर आगे बढ़ रहे थे। 20 अक्टूबर 1962 को चीन ने भारतीय सीमा पर विभिन्न मोर्र्चो से जिस तरह आक्रमण किया वह भारत के लिए सर्वथा अप्रत्याशित था। भारत न तो इस युद्ध के लिए तैयार था और न ही उसे इस हमले की आशंका थी, फिर भी भारतीय सेना का यह सकारात्मक पक्ष था जो 32 दिनों तक चले इस युद्ध में चीन को कड़ा जवाब देते रहे। इस युध्द में 21 नवंबर को चीन ने भारत को पराजित कर दिया। इसके बाद उजागर हुआ चीन का छिपा हुआ काला चेहरा। लेकिन हमारा देष आज भी चाईना के बढ़ते सैन्य षक्तियों से बिलकुल बेफिक्र है। ये वही चीन है जिसने शक्ति संपन्न रूस की जमीन हड़पने में नहीं हिचका, तो क्या चीन हमसे कभी उदारता पूर्वक व्यवहार कर सकता है? उसकी नजर आज हर वक्त अरूणाचल प्रदेष और तवांग की ओर घुमती रहती है। चीन की बढ़ती विस्तारवादी नीति का ही परिणाम था कि उसने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश का लगभग 38 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र अपने हिस्से में मिला लिया था। मोतियों की माला की चुनौती चीन की रणनीति रही है कि वह भारत को चारों ओर से घेरकर उस पर दवाब बनाए। इसी का नतीजा है कि वह भारत के पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंध निरंतर बढाता जा रहा है। इस क्रम में वह भारत के चारों ओर एक घेरा बना चुका है, जिसे सामरिक विशेषज्ञों ने मोतियों की माला नाम दिया है। आज भारत के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती यह है कि वह अपनी सामरिक हितों की रक्षा कैसे करे। कहीं हमारे सामने 62 के युद्ध जैसी एक और चुनौती तो नहीं है। क्या हमने कोई सबक अब तक ले पाया है। वर्तमान में चीन की नीति आर्थिक हितों को प्रमुखता देने की है और वह इसी के लिए भारत को किसी भी कीमत पर आगे बढ़ने नहीं देना चाह रहा है। दक्षिण एशिया में चीन हमेशा से शक्ति संपन्न रहना चाहता है। चीन के साथ एशियाई देशों खास तौर पर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका के संबंधों ने नए समीकरणों को जन्म दिया है। भारत के साथ चीनी समीकरण को लेकर इस क्षेत्र में चीन की भूमिका हमारा ध्यान आकर्षित करती है। पिछले वर्ष तत्कालीन भारतीय सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह ने चीन की ओर से भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की बात भी स्वीकार की थी। उन्होंने यह माना कि वर्तमान में करीब 4000 चीनी सैनिक पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) में मौजूद हैं। इस स्वीकृति ने भारत की चिंता बढ़ाई दी है। चीन इस क्षेत्र में व्यापक निर्माण कार्य करा रहा है। ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने को लेकर भी इनके बीच विवाद चर्चा में है। तिब्बत के प्रति भारतीय नीति को भी चीनी संदेह की नजर से देखा जा रहा है।  तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या हमने चीन युध्द से कोई सबक सीखा है। अब जरूरत इस बात को लेकर है की भारत को 1962 के युद्ध से सबक सीखते हुए आगे की रणनीति बनानी चाहिए। 

Thursday, October 18, 2012

क्या मनुष्य का जीवन सस्ता हो गया है ?

मानव जीवन प्राप्त करना सबसे दुर्लभ है,ऐसा हम आज तक सुनते पढ़ते आये हैं परन्तु परिस्तिथियों और प्रमाणों पर विचार किया जाये तो यह धारणा सत्य प्रतीत नहीं होती। लोगों को यदि मांस आदि का सेवन करना हो तो बाजार से खरीद कर लाना होता है, उसका मूल्य चुकाना पड़ता है, शिकार करने के भी नियम हैं और पकडे जाने पर कठोर दंड का प्रावधान है, परन्तु मानव जीवन को खत्म करने का कोई आधार नही है। आज लोग इंसान को इंसान नही समझ रहे हैं। थोड़ा सा लालच इंसान के कत्लेआम की वजह बन रहा है। दबंग और गुण्डे अपने छोटे से मतलब के लिए पता नही रोज कितने लोगों की जान लेते है। कुछ ऐसे मामलो का तो पता चल जाता हैं जो बड़े होते हैं और मीडिया की नजर में आ जाते है। लेकिन बाकी का क्या। अगर आप 50-100 किलोमीटर की यात्रा भी करते हैं तो आपको सड़क के किनारे एक दो डैड बाडी देखने को मिल जायेंगी। ऐसे में सवाल उठता है कि हम कब तक इंसानी जिंदगी को कीड़ों मकोड़ों की तरह खत्म होते देखेंगे। कब तक मनुश्य को मनुश्य के जीवन का अंत करत देखेंगे। कहा जाता है कि मानव में दैवी व दानवी दोनों ही गुण विद्यमान रहते हैं। यदि व्यक्ति के दैवी गुण अधिक प्रबल हैं तो वह सज्जन के रूप में समाज में अपनी भूमिका का निर्वाह करता है और यदि पाशविक प्रवृत्ति प्रबल हो तो वह दानव का रूप धारण कर लेता है। व्यवहार में भी इन गुणों का अनुपात कम अधिक चलता रहता है। परन्तु कुछ लोग शायद आसुरी प्रवृत्ति के साथ ही जन्म लेते हैं। आसुरी प्रवृत्ति प्रधान लोग वही हैं जिनके लिए मानव जीवन एक गुब्बारे से भी सस्ता है जब चाहा, जिसका चाहा, उसका अंत कर दिया। पांच रुपए के लिए चाकू मार दिया, अबोध बालक को मौत के घाट उतार दिया। मिटटी का तेल छिड़क कर आग लगा दी। तेजाब डाल दिया। परिवार क्या पूरी की पूरी बस्ती को जला कर राख कर दिया। चलती ट्रेन से धक्का दे दिया आदिण् ऐसे समाचार प्राय समाचारों की सुर्खियाँ बनते हैं। परन्तु बहुत से अनाम लोग तो अनाम रहते हुए ही ऐसे ही किसी के कोप का भाजन बन जाते हैं। कब काल का ग्रास बन जाते हैं। और अनाम रहते हुए ही उनके जीवन का दुखद अंत हो जाता है,। ऐसे दुखद समाचारों में बच्चों के आपसी झगडे या खेल खेल में पत्थर या बैट से पीट कर मार डालने की घटनाएँ भी प्रकाश में आती हैं।यदि विचार किया जाये तो ऐसा नहीं कि दानवी प्रकृति के लोग इसी युग में हैं। ये तो सनातन प्रकृति रही है बस घटनाओं का स्वरूप व अनुपात बदल गया है। पहले ये काम दुराचारी राजाओं तथा निरंकुश सामंतों अथवा अन्य प्रभावशाली कुत्सित बुद्धि युक्त लोगों द्वारा किया जाता था और आज तो अंदाजा लगाना ही कठिन है कि कब किसके जीवन का अंत कर दिया जाये। क्योंकि मानव जीवन मूल्य हीन होता जा रहा है।

Saturday, October 13, 2012

क्या सरकार सुचना का अधिकार कानून से डर गई है ?

आरटीआई से आये दिन सत्ता और सत्तासीनों के कारनामें का खुलासा हो रहा हैं। जनता अपने हक के लिए खड़ी हो गई है। लेकिन कुछ ताजा मामलों ने सत्तासीनों में खलबली पैदा कर दी है। सोनिया गांधी की विदेष यात्राओं का खर्च मांगना इसका ताजा उदाहरण है। इन सूचनाओं से घबराई सरकार के प्रधानमंत्री आरटीआई पर ही नकेल कसना चाहते हैं। कह रहे हैं आरटीआई से लोगों की निजता का उलंघन हो रहा है। सूचना अधिकार कानून यानी आरटीआइ को लेकर प्रधानमंत्री की यह चिंता समझ आती है कि इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए, लेकिन इसके आधार पर इस कानून में काट-छाट की आवश्यकता जताने का कोई मतलब नहीं। यदि किसी कानून के दुरुपयोग के आधार पर उसमें हेर-फेर किया जाएगा तो फिर किसी भी कानून को सही.सलामत रख पाना मुश्किल होगा। आखिर ऐसा कौन सा कानून है, जिसका दुरुपयोग न होता हो। हमारे देश में तो शायद ही कोई कानून हो जिसका गलत इस्तेमाल न हुआ हो। अब क्या उन सभी में बदलाव किया जाएगा। निसंदेह इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि सूचना अधिकार कानून के तहत कुछ लोगों की ओर से ऐसी जानकारी पाने की भी कोशिश की जाती है जो किसी की निजी जिंदगी से जुड़ी होती है और उसके सार्वजनिक होने से संबंधित व्यक्ति की निजता का उल्लंघन होता है, लेकिन ऐसे लोगों को तो हतोत्साहित करने के प्रावधान सूचना अधिकार कानून में हैं। फिलहाल ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचना मुश्किल है कि सूचना अधिकार कानून के तहत दी जा रही जानकारियों से बड़े पैमाने पर निजता का उल्लंघन हो रहा है। निजता का अधिकार संविधान प्रदत्त है और उसकी हर हाल में रक्षा होनी चाहिए, लेकिन इस अधिकार की आड़ में सार्वजनिक महत्व की सूचनाएं गोपनीय रखने की भी कोशिश नहीं होनी चाहिए। फिलहाल ऐसा हो रहा है। कई मामलों में सार्वजनिक महत्व की सूचनाएं देने से यह कहकर इन्कार कर दिया जाता है कि यह निजी जानकारिया हैं। बेहतर हो कि सूचना अधिकार को सीमित करने पर विचार करने से पहले निजता के अधिकार को सही तरीके से परिभाषित किया जाए। कम से कम सार्वजनिक जीवन में शामिल लोगों के मामले में तो ऐसा किया ही जाना चाहिए कि क्या निजता के दायरे में आता है और क्या सार्वजनिक महत्व के दायरे में। यह अच्छी बात है कि निजता की रक्षा के लिए अलग से कानून बनाने पर विचार हो रहा है, लेकिन यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि यह सूचना अधिकार कानून में किसी किस्म की कटौती का कारण न बने। प्रधानमंत्री ने सूचना अधिकार कानून के बेतुके इस्तेमाल पर भी चिंता जताई। चूंकि यह एक नया कानून है इसलिए यह संभव है कि कुछ लोग इसका बेतुका इस्तेमाल कर रहे हों, लेकिन इस तरह के इस्तेमाल को भी रोका जाना संभव है। प्रधानमंत्री ने सूचना अधिकार कानून के संदर्भ में रचनात्मक माहौल बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। निसंदेह इस दिशा में काम करने की जरूरत है, लेकिन चिंताजनक यह है कि ऐसी कोई कोशिश होती हुई नहीं दिख रही है। यह ठीक नहीं कि सूचना आयुक्तों के पद पर बड़ी संख्या में पूर्व नौकरशाह तैनात हो रहे हैं। आखिर जो नौकरशाह अपने सेवाकाल में पारदर्शिता और जवाबदेही से बचते रहे हों वे सूचना अधिकार कानून को लेकर कोई रचनात्मक माहौल कैसे बना सकते हैं। यह पहली बार नहीं है जब सूचना अधिकार कानून में किसी किस्म की कटौती का कोई विचार सामने आया हो। इसके पहले भी इस तरह के विचार होते रहे हैं। इससे यही लगता है कि सत्ता में बैठे लोगों को सूचना अधिकार कानून रास नहीं आ रहा है। वस्तुस्थिति जो भी हो, इस कानून के संदर्भ में प्रधानमंत्री ने जिस तरह यह कहा कि इससे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप का मसला भी उलझेगा उस पर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है।

Friday, October 12, 2012

क्या आज हम लोग जे पी को भूल गए है ?

दोस्तो हम आपके सामने एक ऐसा मुददा लेकर आये हैं जो हमारे मीडिया और हमारी सोच को दर्षाता है। आप सभी जानते होगें कल मनोरंजन सदी के इतिहास के महानायक अमिताभ बच्चन का जन्म दिन था। लगभग हर मीडिया चैनल पर ये खबर प्रमुखता से छायी रही। छानी भी चाहिए, क्योंकि अमिताभ बच्चन वाकई सदी के महानायक हैं। इसके लिए कुछ भी साबित करने की जरूरत नही है। मगर क्या आपको पता है इसी दिन आजाद भारत की महाक्रांति के नायक जयप्रकाष का भी जन्म दिन था। क्या किसी मीडिया संस्थान ने ये खबर चलाई। क्या किसी ने इस महानायक को याद करने की जहमत उठाई। जी नहीं कहीं से भी इस महानायक के अदर्षो की खबर कहीं तक नही आई। क्या उन नेताओं ने भी जेपी को याद करने की जहमत उठाई जो उस आंदोलन की पौध हैं। आज ये नेता कई जगह अपनी सरकार चला रहे है। मगर कहीं से भी जेपी के जन्मदिन की खबर सामने नही आयी। ये सब आपको बताने का हमारा मकसद अमिताभ बच्चन के जन्म दिन की अहमियत को कम नही करना है। हम तो सिर्फ ये बताना चाहते हैं कि क्या है हमारी सोच और हमारे मीडिया की सोच। जो राजनीति आज हमारे देष को फिर से गुलामी की और ले जाने वाली दिख रही हैं। क्या उसके बारे में आप बिल्कुल भी नही सोचते। क्या आज फिर से हमारी चरमराती राजनीति को जेपी जैसे लोगों की जरूरत नही है। जब आज हर ओर मंहगाई भ्रश्टाचार और लूट मची है। क्या ऐसे में जेपी जैसे महानायक की जरूरत नही है हमें। लेकिन आज जनता को जगाने वाला मीडिया मनोरंजन की दुनिया में खोया हुआ है। क्या आज देष के राजनैतिक हालातों से ज्यादा मनोरंजन हमारे लिए महत्वपूर्ण हो गया है। लगता तो ऐसा ही है। आज हमारा समाज उस महानायक को भूल गया है। जिसने कभी देष में बढ़ती तानाषाही को खत्म करने का बिगुल उठाया था। जिससे घबराई सरकार ने देष को इमर्जेसी की आंधी में झोक दिया था। उस वक्त के कुछ लोगों का मानना है कि अगर जेपी आंदोलन नही होता तो देष में आज लोकतंत्र की जगह राजषाही तानाषही होती। वैसे हालात तो आज भी राजषाही जैसे है। आप देख ही रहे हैं कैसे परिवार के नाम पर लोग कानून से खेल रहे है। और कैसे सत्तसीन उनका बचाव कर रहे हैं। दोस्तो ऐसे में आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि क्यूं है हमारे लिए जेपी जैसे लोगों की जरूरत। लेकिन इस ओर कोई ध्यान नही दे रहा है। कैसे जेपी के आंदोलन से उपजी नेताओं की पौध वोट बैंक की रजनीति में लग गई है। लालू, मुलायम और षरद पवार का उदाहरण आप सबके सामने है। क्या कल इन नेताओं की ओर से जेपी आंदोलन पर कोई बयान आया। जी नही क्योंकि इन्हें अपनी जातिवादी राजनीति जो करनी है। इनका मकसद भी जनता को पागल बनाकर उस पर राज करना ही है। तो फिर कैसे महानायकों की है आपको जरूरत। 

लोहियावादी सोच को भूलते आज के समाजवादी नेता

प्रखर चिंतक और समाजवादी नेता डा राममनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जनपद में अकबरपुर नामक गांव में हुआ था। उनके पिताजी श्री हीरालाल पेशे से अध्यापक और हृदय से सच्चे राष्ट्रभक्त थे। लोहिया जी केवल चिन्तक ही नही बल्कि एक कर्मवीर भी थे। उन्होंने अनेक सामाजिक ए सांसकृतिक और राजनैतिक आंदोलनों का नेतृत्व किया। राम मनोहर लोहिया को भारत एक अजेय योद्धा और महान विचारक के रूप में देखता है। देश की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता के बाद ऐसे कई नेता हुए जिन्होंने अपने दम पर शासन का रुख बदल दिया जिनमें से एक थे राममनोहर लोहिया। अपनी देशभक्ति और तेजस्वी समाजवादी विचारों के कारण अपने समर्थकों के साथ ही डॉ लोहिया ने अपने विरोधियों के मध्य भी अपार सम्मान हासिल किया।  डॉ लोहिया सहज लेकिन निडर राजनीतिज्ञ थे। 
डॉ लोहिया मानव की स्थापना के पक्षधर समाजवादी थे। वे समाजवादी भी इस अर्थ में थे किए समाज ही उनका कार्यक्षेत्र था और वे अपने कार्यक्षेत्र को जनमंगल की अनुभूतियों से महकाना चाहते थे। वे चाहते थे किए व्यक्ति.व्यक्ति के बीच कोई भेदए कोई दुराव और कोई दीवार न रहे। सब जन समान हों। सब जन सबका मंगल चाहते हों। सबमें वे हों और उनमें सब हों। 30 सितंबर 1967 को लोहिया को नई दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल जिसे लोहिया अस्पताल कहा जाता है में पौरुष ग्रंथि के आपरेशन के लिए भर्ती किया गया। जहाँ 12 अक्टूबर 1967 को उनका देहांत 57 वर्ष की आयु में हो गया। कश्मीर समस्या होए गरीबीए असमानता और आर्थिक मंदी इन तमाम मुद्दों पर राम मनोहर लोहिया का चिंतन और सोच स्पष्ट थी। लोग आज भी राम मनोहर लोहिया को राजनीतिज्ञए धर्मगुरुए दार्शनिक और राजनीतिक छमता को अपने जिंन्दगी के मोड़ पर याद करते है।