Sunday, September 30, 2012

आर एस एस के शिबिरो पर प्रतिबन्ध कितना सही ?

देष के स्वयंसेवक लोगों को देष की संस्कृति के बारे में बता रहे हैं। लोगों को अनुषासन और सदाचार की षिक्षा दी जाती है। देष में राश्ट्रीय एकता की भावना जागृत कर रहे हैं। लोगों को प्राचीन भारतीय सस्कृति के अनुसार स्वस्थ्य रहने का मंत्र बताते हैं। लोगों को भ्रश्ट सरकारों के खिलाफ जागरूक करते हैं। जहां देष के स्वयंसेवक निस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं। ऐसी जगह जनसैलाव उमड़ना लाजमी हैं। लेकिन कुछ भ्रश्ट और देषद्रोही सरकारों को ये बात हजम नही हो रही है। जी हां ऐसा ही देखने को मिला राजस्थान में। राजस्थान की गहलोत सरकार ने लोगों को आरएसएस के षिविरों में जाने पर रोक लगा दी। सरकार ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करके सभी सरकारी कर्मचारियों को आरएसएस के षिविरों में जाने से मना कर दिया है। अगर कोई सरकारी कर्मचारी आरएसएस के षिविरों में पाया जाता है तो सरकार उस पर कार्यवाही करेगी। लोगों में इसके खिलाफ हर ओर गुस्सा है। ऐसे में आखिर क्यों कर रही है सरकार ऐसा। क्यों उठाया है सरकार ने ऐसा देषद्रोही कदम। क्या है सरकार की नियत। क्या सरकार केंद्र सरकार के कहने पर ये कदम उठा रही है। क्या सरकार विदेषी षक्तियों के दवाब में ऐसा कदम उठा रही है। या फिर सरकार को आरएसएस के षिविरों में कुछ गलत लग रहा है। लोग कह रहे हैं कांग्रेस सरकार स्वयंसेवकों से डर गई है। कांग्रेस सरकार एक बार फिर आत्मघाती कदम उठा रही है। जिस तरह इंदिरा गांधी ने सभी स्वयंसेवकों को जेल में डलवा दिया था। इसके बाद इंदिरा गांधी को देष में मुंह की खानी पड़ी थी। पूरे देष में इस कदम से लोगों में आक्रोष की लहर दौड़ गई थी। आज फिर देष में ऐसा ही होने जा रहा है। लोग सवाल पूछ रहे हैं आखिर क्यों राजस्थान सरकार लोगों को षिविरों में जाने से रोक रही है। क्यों लोगों को देष की संस्कृति से दूर किया जा रहा है। क्यों लोगों को देष की हकीकत जानने से रोका जा रहा है। क्या चाहतीं है आज की ये भ्रश्ट सरकारें। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि ये सरकारें आधुनिकता के नाम पर विदेषी हाथों में खेल रही हैं। वोट बैक के लिए देष की संस्कृति को ताक पर रखा जा रहा है। वोट बैंक की वजह से ही लोगों को आरएसएस के षिविरों में जाने से रोका जा रहा है। सरकार डर गई है कहीं लोगों में राश्ट्रीय एकता ना जाग जाये। कहीं लोग भ्रश्ट और देषद्रोही सरकारों की हकीकत ना जान जायें। क्योंकि सरकार की हकीकत जानने के बाद आम आदमी सरकार से कट सकता है। दो समुदायों में भाईचारा बढ़ सकता है। क्योंकि कांग्रेस सरकार लोंगों को हिंदूत्व और हिंदुओं से डर दिखाकर ही लोगों का वोट एंठती है। लोगों को कांग्रेस सरकार हिंदुत्व की सही हकीकत नही जानने देती। क्योंकि हिंदुत्व का डर दिखाकर ही सरकार लोगों का वोट हांसिल करती हैं। लेकिन आज लोग हकीकत जान गये हैं। जाने भी कैसे नही। जिन स्वयंसेवकों को सरकार बदनाम करती है उन्होने तो अपनी सारी जिंदगी सामाजिक सदभाव बनाने में बिता दी। ऐसी सरकारें यही सदभाव समाज में नही बनने देना चाहतीं। आज केसी सुदर्षन का उदाहरण सबके सामने हैं। कैसे सुदर्षन जी ने अपनी सारी जिंदगी देष की सेवा और देष में सामाजिक सौहादर्य बनाने में बिता दी। आज उन्ही कदमों पर चलने से रोका जा रहा है आम आदमी को भ्रश्ट सरकारों द्वारा। अब समय आ गया है ऐसी सरकारों की हकीकत बताने का। 

Saturday, September 29, 2012

7,721 रुपये की थाली गरीबो का मजाक नहीं है ?

हम आपको बता रहे हैं उस सरकार की हकीकत। जिसने देष में गरीबी की परिभाशा दी है। जिसके मंत्री हमेषा आम आदमी की बात करने का दिखावा करते है। सभी मंत्रालयों को खर्च कटौती के फरमान का दिखावा होता है। लेकिन गरीबों को उनकी औकात बताने वाली सरकार, गरीबों के पैसे से ऐष करती है। जी हां ऐसी ही हकीकत सामने आयी है सरकार की हाईप्रोफाइल पार्टी की। यूपीए2 की तीसरी साल ग्रह पर प्रधानमंत्री आवास पर भोज दिया गया। उसमें सरकार के सभी मंत्री, सांसद, विधायक और समर्थक दलों के सभी षुभचिंतक षामिल हुए। जिसमें मेहमानों की संख्या 375 रही। पूरी पार्टी में सिर्फ भोज पर 2895503 रू खर्च हुए। ये बात हम नही कह रहे हैं, खुद पीएमओ ने ही ऐसी जानकरी दी है। दरअसल एक आरटीआई रिपोर्ट में ये बात सामने आयी है। हरियाणा के आरटीआई कार्यकर्ता रमेष वर्मा को ये जानकारी दी गई है। ये वही पीएमओ आफिस है जिसने 28 रू. रोज खर्च करने वालों को गरीब मानने से इंकार कर दिया था। मोंटेक सिंह आहलुवालिया षहरो में 32रू और गांवों में 28 रू. खर्च करने वालों को गरीब नही मानते। लेकिन उसी पीएमओं के फिजूल खर्चे आपके सामने हैं। सरकार कहती है गरीब एक दिन में 16 रू खाने पर खर्च कर सकता है। अगर इससे ज्यादा कोई खर्च करता है तो उसे गरीब नही माना जायेगा। उसे कोई भी सरकारी लाभ नही दिया जायेगा। अब ऐसे में आप, ये तो खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे कोई परिवार 16 रू. में खाना खा पायेगा। ऐसे में लोग सवाल कर रहे हैं। ये सरकार गरीबों का मजाक उड़ा रही है। खुद हजारों की थाली खाती है और गरीबों को गरीब ही मानने से इंकार करती है। ऐसी सरकार से आम आदमी क्या उम्मीद लगा सकता है। क्या ऐसी सरकार के नेतृत्व में देष तरक्की कर सकता है। क्या ऐसी सरकार देष से वाकई गरीबी खत्म कर सकती है। जी नही। आज आम में आदमी हर ओर गुस्सा है। जैसे जैसे सरकार के कारनामें खुलकर बाहर आ रहे है। वैसे वैसे लोगों का गुस्सा अपने चर्म पर पहुंच रहा है। लोग कह रहे है आम आदमी की बात करने वाली सरकार के नेतृत्व में आम आदमी और गरीब हो गया है। हर और लूट मची है। लेकिन सरकार आम आदमी को नसीहत दे रही है। प्रधानमंत्री कहते हैं पैसे पेड़ से नही झड़ते। पैसे के लिए प्राकृतिक सांसाधनों को बेचना पड़ता है। लेकिन आज लोगों को पैसे की हकीकत पता चल गई। जिन संसाधनों पर आम आदमी का हक है वो भ्रश्ट मंत्रियो की जेब में जा रहे हैं। सरकारी पार्टियों पर उड़ाये जा रहे हैं। देष के गरीबों को एक वक्त की रोटी नसीब नही होती। मगर सरकारी पार्टियों में एक थाली की किमत इतनी होती है, जिससे आम आदमी महिनों अपना पेट भर सकता है। जी हां यही है हकीकत आज हमारी सरकार की। ऐसे ही उड़ाया जा रहा है आम आदमी का पैसा। यूं ही भूंखा मरने को मजबूर हो रहा है देष का आम आदमी। 


                               सरकार की थाली

नान वेज झींगा कसूंदी गोष्त बुर्रा कबाब  फिष मालाबारी चिकन चेट्टिनाड।

वेजिटेरियन बधारी बैंगन दम आलू कष्मीरी बींस गाजर मटर केवटी दाल तेह बिरयानी बेबी नान मटर परांठा मिस्सी रोटी लच्छा परांठा ताजा हरा सलाद, मूंग दाल स्प्राउट।

चाट काउंटर गोलगप्पा आलू की टिक्की दही पापड़ी की चाट पाव भाजी धनिया आलू चाट टमाटर सलाद फ्रूट चाट बींस और मसरूम सलाद दही भल्ला सादा दही आचार पापड़ और चटनी।

खाने से पहले वाटर मेलन जूस कोकोनट वाटर आम पना जलजीरा फ्रूट पंच रोस्टेड बादाम,काजू।

                                                                              कुल मुल्य- 7721

                                    गरीब की थाली

अनाज दाल दुध खाद तेल अंडा मछली मीट सब्जियां ताजे फल ड्राईफ्रूट चीनी नमक एंव मसाले।

                                                                           कुल मुल्य- 16 रूपये

Friday, September 28, 2012

क्या जाकिर नाईक को जेल में डाल देना चाहिए ?

इस्लाम के तथाकथित विद्वान् डा. जाकिर नाईक के खिलाफ देश भर के गणेश भक्त लामबंद हुये। जाकिर ने अपने फेसबुक पे लिखा है की गणेश जी भगवान है ऐसा सिद्ध कर दीजिये, मै प्रसाद लेने को तैयार हुं। मालूम हो, जाकिर नाइक हमेशा इस्लाम और हिन्दू धर्म की तुलना करते है और हमेशा ही इस्लाम छोड़के सारे धर्मो का अपमान करते है। पीस चैनल से धार्मिक प्रचार करने वाले कटटरपंथी इस्लामिक विद्वान डा जाकिर हुसैन ने एक बार फिर हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ किया है। एक बार फिर हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। जी हां अबकी बार जाकिर नाईक ने गणेषोत्सव के मौके पर हिंदुओं के पूज्य गणेष जी का अपमान किया है। मुसलमान हज जाते हैं, दरगाह जाते है। इसके अलावा भी अपनी श्रद्धा के अनुसार कहां कहां जाते हैं क्या कभी मुसलमानों से पूछा है वो क्यों दरगाह जाते हैं। क्यों पत्थर मारने की रस्म अदा करते हैं। क्यों वो अल्लाह को अपना परवरदिगार मानते हैं। क्या कभी जाकिर हुसैन ने मुसलमानों से पूछा है। क्यों पत्थर की रस्म अदा करते हो। क्यों अल्लाह में इतनी श्रद्धा दिखाते हो। जी नही। क्योंकि उनके अनुसार इस्लाम के अलावा सभी धर्म तुच्छ हैं। जाकिर हुसैन ओसामा बिन लादेन को अतंकी मानते हैं। सभी मुसलमानों को ओसामा की तरह आतंक फैलाने की बात कहते हैं। हर मुसलमान को ओसामा की तरह जीने का हुक्म देते हैं। तो क्या कहेंगे ऐसे इंसान को आप। क्या कहेंगे ऐसे इंसान की विचार धारा को आप। ये गणेष जी का ही अपमान नही है। पूरी हिंदू संस्कृतिका अपमान है पूरे हिंदु धर्म का अपमान र्है। आज हर ओर जाकिर हुसैन के खिलाफ गणेष भक्तों में गुस्सा भर गया है। मुम्बई हाई कोर्ट के वकील सुभाश नलावड़े ने कुर्ला थाने में जाकिर हुसैन के खिलाफ लोगों में धार्मिक भावना भड़काने के लिए एफआइआर दर्ज करने की माग की है। नाईक के इस बयान से करोड़ों लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची है। इसके खिलाफ लोग षांतिपूर्वक अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं। हिंदुजनजागृति संस्कृति के लोगों ने भी पुलिस स्टेषन जाकर जाकिर हुसैन के खिलाफ विरोध दर्ज कराया है। क्या कहेंगे ऐसे लोगों का मानसिकता को आप। जो गणेषोत्सव हमारी एकता और देषप्रेम का प्रतीक है। जिसकी षुरूआत ही बालगंगाधर तिलक ने देषवासियों में एकता और अखण्डता की भावना पैदा करने के लिए की थी। सावरकर ने गणेषोत्सव पर छुआछूत दूर करने की भावना के साथ की थी। मगर जाकिर नाईक जैसे कटटरपंथी, लोगों की भावनाएं भड़काने के लिए गणेष जी का ही अपमान कर रहे हैं। क्यों ऐसे लोगों को खुली छूट दे रखी है सरकार ने। क्यों प्रषासन ऐसे लोगों पर कार्यवाही नही कर रहा है। क्यों ऐसे लोग खुले में समप्रदायिक भावना भड़का रहे है। आज लोग आवाज उठा रहे हैं। कि जाकिर जैसे लोगों की वजह से ही दुनिया में धार्मिक भावनाएं भड़क रही हैं। लोग कह रहे हैं ऐसे लोगों की वजह से ही दो संप्रदायों में दरार पैदा हो रही है। इसी वजह से लोग एक दूसरे की जान के दुष्मन बन गये हैं। भगवान श्री गणेष के भक्त कह रहे हैं ऐसे लोगों को तुरंत जेल में डाला जाये। क्योंकि ऐसे लोग जानबूझकर लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं। क्या इस्लाम दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक भावना को ठेस पहुचाने में विष्वास रखता है। जी नही। लोग कह रहे हैं। ऐसे लोग दूसरे धर्मों को तुच्छ बताकर मुसलमानों को भड़काने का काम करते हैं। लेगों में रोश है अगर ऐसे कटटरपंथी लोगों के खिलाफ कार्यवाही नही की गई तो गणेष भक्त इसके लिए एक साथ खड़े हो जायेंगे।  
                                                       
                                                  जाकिर नाईक की बेतुके बयान

1 जाकिर नाईक पूरे भारत भर में घूम-घूम कर विभिन्न मंचों से इस्लाम का दुश्प्रचार करता हैं।

2 नाईक से कोई भी सवाल किया जाये तो वह “कुर-आन” के सन्दर्भ में बात करता है।

3 जाकिर नाईक “धर्म परिवर्तन” और “अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार” के सवाल पर इस्लाम की व्याख्या गलत ढंग से करता है।

4 नाईक के अनुसार कोई व्यक्ति मुस्लिम से गैर-मुस्लिम बन जाता है तो उसकी सज़ा मौत है।

5 नाईक के अनुसार इस्लाम में आने के बाद वापस जाने की सजा भी मौत है।

6 नाईक कहता है शरीयत के लिए नाबालिग हिन्दू लड़की भी भगाई जा सकती है।

7 नाईक कहता है- पढ़ी-लिखी वयस्क मुस्लिम लड़की किसी हिन्दू से शादी नहीं कर सकती।

8 नाईक कहता है- इस्लाम ही एकमात्र धर्म है, बाकी सब बेकार हैं।

9 नाईक के अनुसार मुस्लिम लोग तो किसी भी देश में मस्जिदें बना सकते हैं लेकिन इस्लामिक देश में चर्च या मन्दिर नहीं चलेगा।                    

Thursday, September 27, 2012

शहीदे आजम भगत सिंह के जज्बे को सलाम

जिंदगी तो अपने ही दम पर जी जाती है,,,,दूसरो के कंधे पर तो जनाजे उठा करते है,,,,ये नारा तो आपने सुना ही होगा। भगत सिंह को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे प्रसिद्ध षहीदों में से एक माना जाता है।इसलिए उनका नाम षहीद भगत सिंह के रूप में जाना जाता है। भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का जीवन  हमारे लिए एक मिसाल है। भगत सिंह जैसे देशभक्त क्रान्तिकारीयों ने कुरबानी सिर्फ भारत कि आजादी के लिए ही नहीं दी बलकि भारत को विश्व के शिखर तक ले जाने के लिए भी दी है। क्रान्तिकारीयों को कभी गुलामी पसंद नहीं थी उन का संघर्ष उन शक्तियों के विरोध में था जो मनुश्यों को गुलाम बना कर उन पर जुल्म करती है। भगत सिंह जैसे महान क्रान्तिकारीयों कि वजह से आज हम आजादी कि सांस ले रहे है वरना आज भी हम एक गुलाम का जीवन बिता रहे होते। इस लिए सभी क्रान्तिकारीयों का हम पर एक एहसान है जो तभी उतर सकता है जब हम उनके बताए कदमों पर चलेंगे। देश को आजादी दिलाने में सरदार भगत सिंह का बहुत ही अहम योगदान है । भगत सिंह में जो देश प्रेम का जज्बा था वो बहुत कम देखने को मिलता है। 

भगत सिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आजादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ी मिसाल है। इन्होंने सेण्ट्रल असेम्बली में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसका परिणाम ये रहा कि 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह को इनके दो साथियों, राजगुरु और सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया। पूरे  देश ने उनके बलिदान को बड़ी गम्भीरता से याद किया। भगत सिंह के जीवन ने कई हिन्दी फिल्मों के चरित्रों को प्रेरित किया है। कुछ फिल्में तो उनके नाम से बनाई गई जैसे - द लीजेंड ऑफ भगत सिंह। मनोज कुमार की सन् 1965 में बनी फिल्म शहीद भगत सिंह के जीवन पर बनायीं गयी है। और यह अब तक की सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक फिल्म मानी जाती है। भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। भगत सिंह एक ऐसे सिख परिवार के बेटे थे, जिन्होंने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। अमृतसर में 13 अप्रैल, 1818 को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आजादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी।

 भगत सिंह जलियाबाग हत्या कांड से प्रेरित होकर क्रांतिकारी बने। महज 24 साल की आयु में भगत सिंह ने हसंते - हसंते फांसी के फंदे को चूम लिया था। 23 मार्च 1931 भगत सिंह की शहादत का दिन कोई कैसे भूल सकता है। भगत सिंह ने राजगुरू के साथ मिलकर 17 दिसंबर 1926 लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज अधिकारी जेपी सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में भगत सिंह का साथ महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद ने दिया था। आज भगत सिंह नहीं है लेकिन वो हर भारतीय के जेहन में अभी भी जिंदा है क्योंकि आज हम भारतीय भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों की वजह से आजाद हैं। देश की विडंबना ये है कि हम इन सच्चे देश भक्तों को कभी-कभार ही याद करते हैं। हम ये भूल जाते है कि आज हम इन्ही महान क्रांतिकारियों की बदौलत ही आजाद हैं । देश के इन सपूतों के योगदान को कभी भी भुलाया नहीं जा सकता । आजादी को 60 साल और भगत सिंह की षहादत को लगभग 76 साल होने को आए लेकिन आज भी अगर हम उनके विचारों को सुने तो वो हमें ताजगी से भर देते हैं। 

Sunday, September 23, 2012

क्या गणेश उत्सव के मायने बदल गए है ?

गणेषो उत्सव का त्यौहार पूरे देष में हर्शो उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। लेकिन कहीं ना कहीं ऐसा लग रहा है कि राश्ट्रीय एकता का प्रतीक गणेषो उत्सव सिर्फ एक त्यौहार बनकर रह गया है। जी हां गणेसोउत्सव पूरे देष में धूमधाम से तो मनाया जा रहा है लेकिन देषभक्ति की भावना कहीं दिखाई नही दे रही है। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के वो बोल सब भूल गये हैं जिन्होने अंग्रेजों की नींव हिला दी थी। जी हां 1893 में बालगंगाधर तिलक ने देषवासियों को अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने का बीड़ा उठाया था। तब गंगाधर तिलक ने देषवासियों से अंगेजों के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंका था। तिलक साहब ने गणेसोउत्सव को पूजा और धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नही रखा, उन्होने गणेसोउत्सव के सहारे देषवासियों में आजादी की लड़ाई, छूआछत करने और समाज को संगठित करने का काम किया था। गणेसोत्सव को अंग्रेजों के खिलाफ एक आंदोलन का रूप दिया। तब गणेसोउत्सव से जन-जन में देषभक्ति की भावना जागृत को चुकी थी। इस आंदोलन ने ब्रिटिस साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी थी। गणेसोउत्सव के महत्व आजादी की लड़ाई की बात सारे महाराश्ट्र में आग की तरह फैल गई थी। अंग्रेज भी इससे घबराने लगे। रोलेट समिति की रिर्पोट में भी चिंता जताई गई। रिर्पोट में कहा गया कि गणेसोउत्सव के मौके पर युवकों की टोलियां सड़कों पर ब्रिटिस हुकुमत के खिलाफ आग उगलतीं हैं। स्कूली बच्चे आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे बांटते हैं। मराठों से अंग्रेजों के खिलाफ षिवाजी की तरह विद्रोह करने का आवहाना होता है। गणेसोत्सव के मौके पर वीर सावरकार, लोकमान्य तिलक और सुभाशचंद्र जैसे नेता अपने ओजस्वा भाशणों से लोगों में देषभक्ति की भावना जगाते हैं। लेकिन आज कहीं भी ऐसा दिखाई नही दे रहा है। आज गणेसोत्सव पूजा और धार्मिक उल्लास भर रह गया है। अब मानों वो अपनी उपयोगिता से भटक गया है। उसके मायने बदल गये हैं। अब केवल गणेसोत्सव एक त्यौहार तक सीमित होकर रह गया है। आखिर ऐसा क्यों हुआ। समाज को एकजुट करने और संगठित करने का वो उददेष्य आखिर कहां खो गया। क्यों पीछे छूट गया। क्या आधुनिक जीवन षैली के गुलाम भागते दौड़ते लोगों को इसका उददेष्य और महत्व नहीं पता या फिर उनके पास समय ही नही है। या फिर वो भूल गये हैं कि गणेसोत्सव केवल पूजा और धर्म का ही नही बल्कि देषभक्ति और एकता का प्रयाय भी है। अब हमें ही इसका उददेष्य जानकर आगे आना होगा और इसके मूल उददेष्य जनजागृति का बीड़ा उठाना होगा। और अपनी आने वाली पीढि़ को इसका महत्व बताना होगा।

Saturday, September 22, 2012

सड़क पर विरोध और संसद में ड्रामा कितना सही ?

एक बार फिर आंकड़ों के सियासी खेल में राजनीतिक दलों की साख दांव पर है। संसदीय लोकतंत्र में राजनीति का सरोकार आम आदमी से होता है। लेकिन आज के इस दौर में भारतीय राजनीति की जो नई नई परिभाशा गढ़ी जा रही है, उसको लेकर आम आदमी के मन में कई सारे सवाल उभरने लगा है। दिल्ली में दोस्ती और राज्यों में नुराकुस्ती का खेल अब हद से ज्यादा आगे निकल चुकी है, जहा न तो आम आदमी की कोई नुमाइंदगी का सवाल है, और ना ही उससे जुड़े मुलभुत कोई आवष्यकताओ का मुद्दा। बात चाहे माया या मुलायम के बैषाखी के सहारे केन्द्र में सत्ता चालाने की हो या, फिर संसद के अंदर न्यूक्लियर डील पर अविष्वास प्रस्ताव के दौरान सरकार को बचाने की, ये दोनो दल हर बार सरकार की संजीवनी बन कर साथ देते है। तो ऐसे में सवाल फिर उसी मोड़ पर आकर खड़ा हो जाता है की क्या माया मुलायम की ये दोगली नीति उस मतदाताओं के विष्वास के साथ खिलवाड़ नही है जिसने एक उमिद के साथ अपने जनप्रतीनिधियों को जिता कर संसद के अंदर भेजता है। इस बात से स्पश्ट है की आज पार्टियों की अपनी कोई विचारधारा नहीं रह गई है। हर दल सिर्फ अपने स्वार्थों को पूर्ण करने में लगी हैं। यही कारण है की राश्ट्रीय दल केंन्द्रीय सत्ता में काबिच है। लेकिन डीएमके, एआईडीएमके, जद यू या शिवसेना सहित सभी क्षेत्रीय राजनीतिक दल और क्षत्रप सिर्फ अवसर की ताक में दिखाई दे रहे हैं, कि कब बड़ा मौका हाथ लगे और वे अपने आप को ब्लैकमेल करने की स्थिति में पहुंचा सकें। कोई भी ऐसा गठबंधन नहीं है जिसे लेकर यह कहा जा सके कि उनका गठबंधन किसी विचारधारा पर आधारित है। गठबंधन की राजनीति में हर दल इसलिए शामिल होना चाहता ताकी विभिन्न प्रकार के हितों की पूर्ति हो सके। और जिस दिन उन हितों की पूर्ति में अड़चन आने लगती है उस दिन समर्थन वापसी की राजनीति खेली दि जाती है। जाहिर है राजनीति का यह रंग यहीं नहीं रुकता बल्कि नवीन पटनायक, बालासाहेब ठाकरे और राजठाकरे ने भी रंग बदला और नीतीश कुमार भी बिहार के विशेष पैकेज के लिये पटरी से उतरते दिखे। सभी अपने अपने प्रभावित इलाकों की दुहाई देते हुये विपक्ष की भूमिका से इतर बिसात बिछाने लगे है। तो कांग्रेस अब यह दिखाना और बताना चाहती है कि सरकार चलाना भी महत्वपूर्ण है चाहे नीतियों को लेकर विरोध हो मगर आंकड़े साथ रहे। कहा जा सकता है कि हर दल एक दूसरे के खिलाफ है लेकिन चेक एंड बैलेंस ऐसा है कि कांग्रेस की नीतियों को जनविरोधी मानकर भी एक साथ खड़े होकर राजनीतिक सत्ता की सहमति बनाकर, मलाई बटोरने में लगे हुए है। हालात ये है की ममता बनर्जी की साख भी मायने नहीं रखती है और मनमोहन सरकार के दौर के घोटाले भी। यानी राजनीति में जब मलाई खाने की बात हो तो सब कुछ जायज है। यही कारण है की तमाम पार्टियां सरकार की बिरोध करने के बावजूद भी वह जनता के साथ खडे होकर अपने आप को आम आदमी की हितैसी बताने से परहेज नही कर रही हैं। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या इन दलो की दोगली नीति देष हीत में सही है ।

पत्नियों को पति के वेतन में हिसेदारी क्या उचित है ?

आज हम आपके सामने ऐसा मुददा लेकर आये हैं, जो आज हमारे देष की संस्कृति, समाज और परिवार पर सीधा सीधा असर डालेगा। समाज में उथल पुथल मचा देगा है। पति पत्नी के पाक रिष्ते को चोट पहुंचायेगा। हमारी आने वाली पीढि़ पारिवारिक रिष्तों को भूल जायेगी। उसे मां बाप, पति पत्नी के रिष्ते के बारे में पता नही चलेगा। बस कानून और पैसा ही रिष्तों के मायने रह जायेगे। जी हां आज ऐसा ही होने जा रहा है देष में। देष का महिला और बाल कल्याण मंत्रालय कुछ ऐसा ही कानून बनाने जा रहा है देष में। इस कानून के मुताबिक अब पति पत्नी का रिष्ता केवल पैसे के लिए, बाकी रह जायेगा। पति हर महिने पत्नी को अपनी पगार का करीब 20 फीसदी पैसा देगा। ये कुछ ही दिन में देष में कानून का रूप लेने जा रहा है। महिला और बाल कल्याण मंत्री कृश्णा तीरथ ग्रहणियों के सस्कतिकरण के नाम पर कुछ ऐसा ही कदम उठाने जा रहीं हैं। उनका मानना है, महिलाएं घर परिवार संभालने के साथ ही बाहर का काम भी देख रही हैं। ऐसे में महिलाओं का पति के वेतन में हक बनता ही है। मंत्रालय का मानना है इससे महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा हो सकेगी। इससे महिलाएं और ज्यादा स्वतंत्र होगी। महिलाओं को उनके काम का हक मिलेगा। लेकिन मंत्रालय इसके नकारात्मक प्रभावों के बारे में ध्यान नही दे रहा है। हमारे देष और संस्कृति में पति पत्नी के रिष्ते को सात जन्मों का बंधन माना जाता है। इतिहास गवाह है, पतिव्रता पत्नी के सामने भगवान को भी झुकना पड़ा। सावित्री के लिए भगवान को भी अपना कमेंट वापस लेना पड़ा था। सावित्री के पतिधर्म के सामने यमराज ने भी उसके पति को वापस दे दिया। आज भी हर पत्नी करवा चैथ पर पूरे दिन बिना अन्न पानी किये पति की लंबी उम्र की कामना करती है। पति के चेहरे को देखकर पत्नी उसके हाथों जलपान ग्रहण करती है। लेकिन अब ये सारे रिष्ते पैसे के लिए रह जायेगे। ऐसे में आप खुद ही अंदाजा लगा सकते है, क्या होगा हमारे अमूल्य रिष्तों को। जिनकी मिषाल दुनिया दिया करती है। आज भी पति अपनी सारी कमाई पत्नी के हाथ में लाकर देता है। पत्नी ही घर के सारे खर्चों को मैनेज करती है। ज्यादातर बच्चे भी मां से ही पैसे मांगते हैं। ऐसे में आप खुद ही अंदाजा लगा सकते है कि पत्नी 10-20 फीसदी पति के वेतन से घर का खर्चा चला पायेगी। क्या ऐसे में घर की सुख षाति भंग नही होगी। क्या इससे पत्नियों के प्रति हीन भावना नही आयेगी। क्या ऐसे में हमारा सामाजिक ढ़ांचा सुरक्षित रह पायेगा। क्या इससे महिलाएं वाकई आर्थिक रूप से मजबूत हो पायेंगी। ये सारे सवाल भविश्य के गर्त में हैं। लेकिन इससे हमारे समाज का सामाजिक ताना बाना जरूर बिगड़ जायेगा। क्या पति पत्नी को हर महिने ये पगार देगा। क्या पति इसके लिए कोई ना कोई बहाना नही ढूंढेंगे। क्या पैसे के लालच में रिष्ते नाते नही टूटेंगे। क्या षादी की जगह वेतन समझौता एग्रीमेंट नही होगा। क्या ग्रहस्वामिनी वेतन भोगी कर्मचारी नही बन जायेगी। अगर ग्रहणी को घर के काम के पैसे दिये जाने लगे, तो इसका मतलब अगर कल वो काम करने लायक नही रही, तो क्या उसे घर से बाहर निकाल दिया जायेगा। क्या मां, बच्चे के पालन पोशण के लिए पैसे लेना पसंद करेगी। क्या ग्रहस्वामिनी नौकरानी बनकर नही रह जायेगी। क्या परिवार चलाने की जिम्मेदारी पति पत्नी के वजाय पत्नी पर ही नही आ जायेगी। क्या अकेली पत्नी परिवार और बच्चो की परवरिष कर पायेगी। ऐसे में लोग सवाल उठा रहे हैं कि सरकार में विदेसी मानसिकता और विदेसी संस्कृति को मानने वाले लोग है। इन्हें ना तो भारतीय संस्कृति के बारे में ज्यादा पता है और ना भारतीय परिवारों और परवरिष के बारे में। लोग कह रहे है कि मंत्रालय 10 फीसदी महिलाओं के लिए 90 फीसदी परिवारों को तोड़ना चाहता है।

Thursday, September 20, 2012

बॉलीवुड में आने वाली फिल्मो की भरमार !

अक्टूबर महीने में रिलीज होने वाली अपकमिंग फाइव फिल्मस और फाइव सान्गस की आज कल धूम मची हुई है। ’आइया’ एक आने वाली राम-काम फिल्म है और इसके डायरेक्टर सचिन कुंदलकर है। फिल्म स्टार्स रानी मुखर्जी और पृथ्वी कुंदलकर लीड रोल में है। फिल्म की कहानी एक मराठी लड़की के बारे में है जो एक तमिल कलाकार से इष्क कर बैठती हैं। फिल्म की रिलीज़ डेट 12 अक्टूबर रखी गई है। 19 अक्टूबर को रिलीज होने वाली ’स्टूडेंट आफ द ईयर’ एक भारतीय रोमांटिक कामेडी मूवी है इस फिल्म के डायरेक्टर करण जौहर है। इस फिल्म में आपको कुछ नए चेहरे वरूण ध्वन, सिद्धार्थ चैहान और आलिया भट्ट नज़र आएंगे। इसके बाद अगली जो फिल्म रिलीज होने वाली उसका नाम है दिल्ली सफारी एक द्विभाशी 3डी एनिमेषन फिल्म हैं। इसके निर्देषक निखिल आडवाणी है। फिल्म में अक्षय कुमार, गोविंदा, सुनील षेट्टी, बोमन ईरानी और उर्मिला मातोंडकर ने अपनी मधुर आवाज़ दी है। इस फिल्म की रिलीज़ डेट भी 19 अक्टूबर को तय की गई है। ’अज़ब गज़ब लव’ एक बालीवुड रोमांटिक कामेडी है। इस फिल्म के डायरेक्टर संजय गाध्वी और प्रोडूसर वषु भगनानी है। 24 अक्टूबर को यह फिल्म बड़े पर्दे पर रिलीज़ होने वाली है। फिल्म स्टार्स जैकी भगनानी और उनके अपोसिट निधि सुबैह लीड रोल में है। फिल्म में अर्जुन रामपाल एक मुख्य रोल में है। बड़े पर्दे पर अगली जो फिल्म रिलीज होने वाली उसका नाम है चक्रव्यूह। यह एक राजनीतिक थ्रिलर पर आधारित है। फिल्म 24 अक्टूबर को रिलीज़ होने वाली है।

Wednesday, September 19, 2012

क्या वाकई माँ के मायने बदल गयी है ?

कहते है कि ईष्वर हर जगह साकार नहीं हो सकता इसलिए उसने मां बनाई। विष्व में कई ऐसी महान षख्सियत पैदा हुई जिन्होंने समय समय पर अपनी प्रतिभा का लोहा पूरे विष्व में मनवाया कहीं न कही उनके कारनामों के पीछे और उन्हें इस लायक बनाने के पीछे उनकी मां का ही हाथ होता है भारतीय संस्कृति में हमेषा से ही मां का दर्जा सबसे उपर रख गया है यही एक बडा कारण है की वीरों को जन्म देने वाली भारतीय भूमि वीरों की भुमि कही जाती है। चाहे वो कोई वीरांगना ही क्यों न हो मां हमेषा से ही प्रेरणादायक और मार्गदर्षक रही है। रानी लक्ष्मी बाई ने तो अपने मातृत्व के लिए ब्रिटीष हुकुमत से लोहा लिया ये एक ऐसी भारतीय मां की कहानी है। जो हमेषा हमें और भारतीय नारीयों को गर्व का अहसास कराती रहेगी। लेकिन परिदृष्य बदला आज हम मदर्स डे मानाते है। मां को याद करने के लिए केवल एक दिन देते है।

मदर्स डे यानी आधुनिक मातृ दिवस,आधुनिक इसलिए क्योंकि पहले तो हर दिन मां के लिए ही होता था मां के प्रेम से भरा होता था। पर बदलते वक्त के साथ मातृत्व की परिभाशा भी बदल गई। ऐसा नहीं है की आज की मां अपने बच्चों को प्यार नहीं करती पर फिर भी आज वक्त के साथ मां बदल रही है पहले बच्चे मां के आंचल में पलते बढते थे पर आज की मां के पास इतना वक्त नहीं है, वो तो बच्चो के साथ क्वालिटी टाइम बिताती है। क्योकि हर दिन तो टाईम रहता नहीं। आज के इस भौतिकतावादी युग का असर मां के प्रेम पर भी हो गया तभी तो समय और प्रेम की कमी को पुरा करने के लिए मां बच्चो को उनकी पंसद की चीजें दिलवा कर खानापूर्ति कर लेती है। लेकीन ये भूल जाती है की मां के प्रेम का कोई मोल नहीं वो सिर्फ और सिर्फ मां ही दे सकती है कोई खिलौना या बेबी सिटर नहीं। आज बच्चा जब रोता है उसके आंसू पोछने के लिए मां वहां नहीं होती बल्कि आया होती है।

बढते आधुनिकरण में दुनिया विकास के चरम पर तो पंहुच रही है पर मानवता कहीं खो रही है और इस सो काल्ड मार्डनाजेष्न ने मां का भी आधुनीकरण कर दिया है तभी तो वो इतनी महत्वाकांक्षी हो गई है की मां के कतव्र्य भी उसे बोझ सरीखे लगते है तभी तो डबल मनी नो किड जैसे चलन का विकास आज के दौर में हो गया है जहां पति पत्नी को पैसे चाहिए पर बच्चे नहीं। आज भारत में परिवार छोटे होते जा रहे है बच्चे को दादा दादी मां बाप का प्यार नहीं मिलता बल्कि आया के भरोसे रहना पडता है। आज बच्चा पूछता है मां कहा है तुम्हारा आंचल जिसे पकड़ कर मैं चलना सिखता कहां है तुम्हारी गोद जिसमें मैं आराम से सोता मां कहा है तुम्हारी मीठी लोरी कहां है तुम्हारा प्यार,क्या मां वाकई तुम बदल गई है।

Sunday, September 16, 2012

प्रफुल पटेल के घोटाले की काले कारनामे !

१ संजीव अरोड़ा ने तत्कालीन कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी से चिटठी में प्रफुल्ल पटेल की षिकायत।
२ प्रफुल्ल पटेल ने एआइ को वित्तिय नुकसान पहुंचाने के लिए एआइ बोर्ड को मजबूर किया
३ चिटठी आने के बाद लोक सभा में विपक्ष के दो सांसदों ने घोटाले की सीवीसी से जांच की मांग की।
४ प्रफुल्ल पटेल ने फायदे वाले रूटों पर एयर इंडिया को जाने से रोका जिससे प्राइवेट कंपनियों को फायदा हुआ।
५ प्रफुल्ल पटेल के कार्यकाल में जरूरत से ज्यादा जेट विमान खरिदे गये।
६ प्रफुल पटेल पर जेट निर्माता कंपनियों को फायदा पहुंचाने का आरोप है।
७ बिना बोर्ड मीटिंग के प्रफुल पटेल पर फैसला लेने की मनमानी करने का आरोप लग रहा है।
८ टी3 टर्मिनल निर्माण में डायल नामक कंपनी को अंधाधुंध रियायतें।
९ डायल को करोड़ो की जमीन कौड़ी के भाव में दी।
१० कैग ने अपनी जांच में पाया कि इससे डायल को 1.63 लाख करोड़ का फायदा हुआ।
११ नियमो में हेरफेर कर के डायल को 30 के बजाय 60 साल मक का ठेका दिया।
१२ डायल को गैरकानूनी तरिके से एयरपोर्ट विकास षुल्क वसूलने का अधिकार दिया।
१३ सुल्क से डायल ने 3415.35 करोड़ की कमाई की।
१४ एयरपोर्ट का क्षेत्रफल 5106 एकड़ जिसमें से 4608.9 एकड़ जमीन डायल को 100 रूपये के लीज पर दी गई।
१५ अगर सही रेट लगता तो डायल को 1461 करोड़ देने पड़ते।
१६ केवल 2 हजार करोड़ से भी कम लगातार डायल ने 60 साल तक एयरपोर्ट को खरीदा।
१७ 60 सालो में डायल ने 24 हजार करोड़ की जमीन और 1.8 लाख करोड़ की कमाई के अधिकार हासिल किये।
१८ 2010 में प्रफुल पटेल की बेटी और दामाद के लिए एयर इंडिया के विषेश विमान का इंतजाम।

क्या प्रफुल पटेल को बचाया जा रहा है ?

आज हम आपके सामने एक ऐसा मुददा लेकर आये हैं, जिस पर ना तो मीडिया में ही ज्यादा बात हुईं और ना आम लोगों को ही इसका पता चल पाया। क्योंकि जहां सरकार भी इसे छूपाने में लगी रही, वहीं मीडिया भी कोयला घोटालों और एफडीआई में खोई रही। ऐसे में सरकार भी अपने चहेते मंत्री को बचाने कामयाब रही। जी हां लगता तो ऐसा ही है, एयर इंडिया घोटाले की ओर किसी का भी ज्यादा ध्यान नही गया। आज एयर इंडिया महाराजा से भिखारी बन गई। मंत्रियों के चहेते और रिष्तेदार मलाई लूटते रहे। पूर्व उडडयन मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने एयर इंडिया का भटटा बैठा दिया। मंत्री के परिवार और रिष्तेदारों को लाने ले जाने के लिए एयर इंडिया के स्पेषल विमान लगाये गये। आम यात्री या तो एयरपोर्ट पर पड़े रहे, या फिर प्राईवेट और महंगी एयरलाइन्सों में जाने को मजबूर हुए। क्योंकि उडडयन मंत्रालय ने, प्राईवेट कंपनियों को फायदा पहुचाने के लिए, मुख्य एयर रास्तों पर एयर इंडिया की उड़ानें रदद करवा दीं। ये बात हम नही कह रहे, ये बात कही है एक पत्र के जरिए पूर्व एआई प्रमुख संजीव अरोड़ा ने। जी हां पूर्व एआइ प्रमुख ने 2005 में तत्कालीन कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी को चिटठी लिखकर प्रफुल्ल पटेल के कारनामों का खुलासा किया था। अरोड़ा ने कहा, कि पटेल ने एआइ की वित्तिय हालत खाराब करने के लिए उन्हें, और एआई बोर्ड को मजबूर किया। ये चिटठी सामने आने के बाद लोक सभा में विपक्ष के दो सांसदों ने सीवीसी से आरोपों की जांच करने की सिफारिष भी की थी। मगर सरकार ने इन सांसदों की सिफारिष पर ध्यान तक नही दिया। इस चिटठी में प्रमुख आरोप हैं, कि इंडियन एयर लाइंस को फायदे वाले रूटों पर जाने से रोका गया। जरूरत से ज्यादा जेट विमान खरीदे गये। और साथ ही जेट निर्मात कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया। ये सब बोर्ड मीटिंग के बहाने किया गया। एआइ की बोर्ड मीटिंग से पहले ही फैसला कर लिया जाता था। इसके बाद फोन पर मौखिक रूप से प्रबंधन को आदेष दिया जाता था। जब एयर इंडिया प्रमुख लिखित में मंत्री के काले कारनामों का चिटठा सौपता है, तो फिर क्यों नही इनकी जांच की जाती। क्यों नही भ्रश्ट मंत्री को हटाया जाता। क्या सरकार ईमानदार अधिकारियों को ऐसे ही ठेंगा दिखाती रहेगी। जी हां लगता तो ऐसा ही है। बात यही तक नही रूकती। कैग भी एयर इंडिया के घोटाले का खुलासा करता है। सरकार उस पर भी कोई ध्यान नही देती। कैग की रिर्पोट से पता चलता है कि, अगर सरकार और उसके मंत्री चाहें तो किसी भी हद तक जाकर नियम कायदों का मखौल बना सकते हैं। जी हां दिल्ली के इंटरनेषनल एयरपोर्ट का निर्माण इसकी एक बानगी है। 2010 में कमनवेल्थ खेलों से पहले दिल्ली में टी3 टर्मिनल का निर्माण कराया। टर्मिनल की आड़ में सरकार ने जीएमआर ग्रुप की कंपनी डायल को अंधाधुंध सौगातें बांटी, उसकी मिषाल मिलना मुष्किल है। डायल को ना केवल कौडि़यों के भाव जमीन दी, बल्कि नियमों का हेर फेर करके 30 के बजाय 60 साल तक एयरपोर्ट चलाने का ठेका भी दे दिया। डायल को 4608.9 एकड़ जमीन केवल 100 रूपये के लीज रेट पर दे दी गई। इतना ही नही उसे नाजायज तरीके से एयरपोर्ट विकास षुल्क वसूलने का अधिकार भी दे दिया। इससे कंपनी ने करोड़ों की गाड़ी कमाई की। इतना बड़ा घोटाला सामने आ गया मगर सरकार चुप्पी साधे रही। ना कोई जांच ना कोई बयान। यहीं है आज सरकारी भ्रश्टाचारों की हकीकत। तो फिर आईए, उठ खड़े होइए हमारे साथ। और कीजिए भ्रश्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद।

रिटेल में एफडीआई और वाल मार्ट की हकीकत !

1. एक औसत अमेरिकी परिवार 4 हजार अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष खर्च करता है।
2010 में वाल मार्ट ने 42 अरब डॉलर के राजस्व की कमाई की थी।
2. यह राशि 170 देशों के सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में सबसे अधिक था।
3. वाल मार्ट एक राष्ट्र के तरह है, यह दुनिया में 23 सबसे बड़ा सकल घरेलू उत्पाद करने वाला संस्था है।
4. संयुक्त राज्य अमेरिका में आज, हर चार किराना स्टोर के साथ एक वाल मार्ट का रिटेल स्टोर है।
5. वाल मार्ट में 100 मिलियन ग्राहक हर हफ्ते खरीदारी करते है।
6. 2005 के बाद से वाल मार्ट 1 हजार एक सौ से अधिक सुपरसेंटर खोला है।
7. आज वाल मार्ट के पास 2 लाख से अधिक कर्मचारियों है।
8. अगर वाल मार्ट को एक सेना की तरह देखे तो यह चीन को भी पीछे छोड़, दूसरा सबसे बड़ा सैन्य होगा।
9. वाल मार्ट अमेरिकी के 25 राज्यों में सबसे बड़ा नियोक्ता है।
10. वाल मार्ट 2001 से 2006 के बीच 1 लाख 33 हजार, अमेरिका में विनिर्माण क्षेत्र के नौकरियों को नुकसान पहुंचाया है।
11. वाल मार्ट के कर्मचारियों और उनके हजारों बच्चें स्वास्थ्य सेवाओ के लिए सरकार पर निर्भर हैं।
12. 2001 से 2007 के बीच वाल मार्ट चीन से आयातित उत्पादों के मूल्य में नौ अरब डॉलर से 27 अरब डॉलर की वृद्धि हुई है।
13. वाल मार्ट में बेचे जाने वाले उत्पादों के 85 प्रतिशत उत्पाद संयुक्त राज्य अमेरिका के बाहर बनता हैं।
14. 60 हजार से अधिक अमेरिका में स्वतंत्र खुदरा विक्रेताओं ने इसे अपनाने से इनकार कर दिया।
15. वाल मार्ट 2011 के दौरान राजनीतिक पैरवी के लिए 7 लाख 8 हजार डॉलर खर्च किए।

Saturday, September 15, 2012

रिटेल में एफडीआइ को अनुमति देना कितना सही ?

भश्टाचार और नाकामियों से घिरी सरकार ने लोगों को भटकाने के लिए फिर एक दाव चल दिया है। सरकार ने बिना आम सहमति के रिटेल में एफडीआइ को अनुमति दे दी है। दिसंबर 2011 में सरकार ने भारी दवाब की वजह से इसे टाल दिया था। लेकिन बिना आम सहमति के सरकार ने विदेषी कंपनियों को देष में अपना माल बेचने की अनुमति दे दी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि सरकार इन विदेषी कंपनियों को देष में लाकर क्या दिखाना चाहती है। जब इसकी तह तक जाते हैं तो कई सवाल सामने आते है। क्या सरकार मंहगाई और भ्रश्टाचार से जनता का ध्यान भटकाने के लिए ऐसा कर रही है। या फिर विदेषी मीडिया में प्रधानमंत्री की आलोचना की वजह से ऐसा कर रही है। या फिर अमरिका जैसे देषों के दवाब में सरकार ऐसा कदम उठाने पर मजबूर हुई है। ऐसे और भी कई सवाल हमारे सामने हैं जो सरकार की मजबूरी और घमंड को दर्षाते है। ऐसे में लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सरकार को देष के किसानों और छोटे किराना व्यापारियों की बिल्कुल भी परवाह नही है। क्या सरकार किसानों को विदेषी हाथों में बेचना चाहती है। क्या सरकार 5 करोड़ किराना व्यापारियों को बेरोजगार करना चाहती है। क्या सरकार किसानों के माल को ओने-पोने दामों में विदेषी कंपनियों के हाथों में देना चाहती है। जी हां लगता तो ऐसा ही है। सरकार का ये कदम देष में बेरोजगारों की फौज खड़ा करने के लिए उठाया गया लगता है। आज हर ओर सरकार के इस कदम की आलोचना हो रही है। क्या विपक्ष और क्या सहयोगी दल सभी सरकार के इस कदम का विरोध कर रहे हैं। मगर सरकार और प्रधानमंत्री बिना किसी परवाह के भारतीय बाजार को विदेषी हाथों को सौंपना चाहते है्र। अपने इस कदम को जायज ठहराने के लिए सरकार नये-नये तर्क दे रही हैं। सरकार कह रही है कि इससे बेरोजगारी घटेगी। मंहगाई पर अंकुष लगेगा। लेकिन लोग कह रहे है कि जब देष के व्यापारी बेरोजगार हो जायेंगे तो रोजगार कहां मिलेगा। इन बेरोजगारों की फौज कहां जायेगी। क्या किसानों को उनके उत्पादों का वाजिव दाम मिल पायेगा। लोग कह रहे हैं जब सरकार अभी किसानों को वाजिब दाम नही दिलवा पा रही तो विदेषी कैसे दे देंगे किसानों के उत्पादों का वाजिव दाम। ऐसे में सवाल उठ रहा है जब देष में विदेषी कंपनियों के आने से देष को इतना बड़ा नुकसान होगा तो फिर क्यों हमारें मौन अर्थषास्त्री प्रधानमंत्री एफडीआई को अनुमति दे रहे हैं। अब ये तो हमारे अर्थषास्त्री प्रधानमंत्री ही जाने या उनका अर्थषास्त्र लेकिन देष में हर ओर विरोध की लहर उमड़ रही है। जनता एफडीआई के विरोध में घरों से निकल आयी है। ऐसे में सरकार को फिर से अपने इस कदम के बारे में सोचना चाहिए। नही तो विरोध की लहर और बढ़ जायेगी।

Friday, September 14, 2012

पी एम का मीडिया को नसीहत देना कितना सही ?

महंगाई, भ्रष्टाचार और अमन-चैन कायम रखने में नाकाम सरकार के प्रधानमंत्री ने एक बार फिर मीडिया को संयमित रहने की नसीहत दी है। चैतरफा आलोचनाओं में घिरे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मीडिया से सनसनीखेज रिपोर्टिग से बचने को कहा है। मनमोहन की ये नसीहत ऐसे समय आई है जब देश ही नहीं विदेशी मीडिया तक ने उन्हें निशाने पर ले रखा है। जी हां आज हर ओर सरकारी हुक्मरान मीडिया रिर्पोर्टिग से बौखलाये हुए हैं। क्या प्रधानमंत्री और क्या मानव संसाधन विकास मंत्री सभी, मीडिया को अपने दायरे में रहने की नसीहत देते हैं। आखिर क्या वजह हो गईं हैं जो सरकार मीडिया पर आक्रामक हो गई हैं। क्या सरकार मीडिया की आलोचनाओं से घबरा गई है। क्या मीडिया की आलोचनाओं से सरकार को अपना वोट बैंक दरकता दिख रहा है। या फिर सोषल नेंटवर्किग साइटों पर आम लोगों की कड़ी प्रतिक्रिया सरकार को नागवार गुजर रही हैं । या फिर वाकई मीडिया सनसनीखेज हो गया है। क्या मीडिया देषहित की बात नही करता। क्या मीडिया सामप्रदायिक सौहादर्य बिगाड़ता है। क्या मीडिया का भ्रश्टाचार के खिलाफ बोलना गलत है। क्या मीडिया का सरकारी भ्रश्टाचार को बेपर्दा करना देषद्रोह है। क्या मीडिया का सरकारी लूट और नेताओं की बख्ख्यिया उधेड़ना सामप्रदायिक सौहादर्य बिगाड़ना है। क्या मीडिया का आम आदमी की आवाज उठाना गुनाह है। जी हां आज ऐसे ही सवाल उठ रहे है सरकार और मीडिया पर। अब देखना ये है कि कौन अपनी जगह पर सही है। लोग कह रहे हैं, कि सरकार तो वाकई अपनी आलोचनाओं से घबराकर ऐसी तानाषाही बातें कर रही है। मगर कभी-कभी कुछ मीडिया वाले भी अपनी भूमिका सही से नही निभाते। तो ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चंद लोगों की वजह से मीडिया को निषाना बनाना सही है। क्या सरकार इन चंद लोगों के बहाने मीडिया की स्वतंत्रता को खत्म करना चाहती है। जी हां लगता तो ऐसा ही है। जब सरकार का मुखिया ही हाथ धोकर मीडिया के पीछे पड़ जाये तो ऐसे में सवाल उठना वाजिव है। और वो भी ऐसा प्रधानमंत्री जो हमेषा सरकारी लूट पर चुप रहा हो। भ्रश्टाचारियों का हमेषा बचाव करता दीखे और जिसकी नाक के नीचे देष के सबसे बड़े भ्रश्टाचार सामने आये हों। तो ऐसे में सवाल वाकई वाजिव बनता है। क्या सरकार को देष और जनता की परवाह नही है। वो तो बस अपनी आलोचनाओं को दबाना चाहती है। वैसे लोग कह रहे है कि ये कांग्रेसी सरकारों की पुरानी फितरत रही है। जो भी इन भ्रश्ट सरकारों के खिलाफ बोले उसे दबाया जाये। कौन भूल सकता है इमर्जेंसी के वक्त को। कैसे मीडिया और देषभक्तों को जेल में डाल दिया गया था। उस वक्त भी देष की जनता और मीडिया ऐसे ही सरकारी कारनामों के खिलाफ उठ खड़ी हुई थी। आज भी देष में चारों ओर ऐसा ही दिख रहा है। ऐसे में सरकार के पास ही एक रास्ता दिखता है और वो है मीडिया पर आक्रामक होना। जब कोर्ट भी मीडिया पर षर्तें लगाने से मना करता है तो ऐसे में सरकार क्यों मीडिया पर षर्तें थोपने की बातें करती है। ऐसे में खुद ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि क्यों सरकार मीडिया को नसीहत देती रहती है।

Sunday, September 9, 2012

क्या गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना चाहिए ?

भारतीय हिंन्दू समाज में गाय को मां कहा गया हैं। जिस गाय को हम देवी मानकर पूजा करते है, जिसके पुजा-पाठ करने से हमारा जिवन धन्य हो जाता है। इसके पुजा एवं सेवा करने मात्र सें मोक्ष की प्राप्ती हो जाती है। गाय में 33 करोड़ देवी देवता का वास होता है। मगर भारत जहाँ 80 करोड़ से ज्यादा हिन्दू रहतें है। वहा गौ हत्या लगातार जारी है। कहा जाता है कि गौमाता समस्त तीर्थो के समान होती है गाय, गोपाल, गीता और गंगा धर्मप्राण भारत के प्राण है। भारत को पूरी दुनिया में उसके धर्म और संस्कार के लिए जाना जाता है, लेकिन केन्द्र सरकार हो या राज्य सरकार हर कोई गाय को लेकर सिर्फ राजनीति करता है। समाज कें कुछ वर्गो ने गौ हत्या को अपना व्यापार बना लिया है। आलम ये है कि आज भारत विष्व का सबसे बड़ा मांस निर्यातक बन बैठा है, और सरकार चुपचाप हाथ पर हाथ धरें बैठी है। आखिर कौन है इसका जिम्मेंवार और क्यों है सरकार चुप। क्यो नही गाय को राष्ट्रीय पशु घोशित किया जा रहा है।

जहा पशुपक्षी भारत देश की अर्थव्यवस्था की रीड़ हैं मगर इसे लेकर हर कोई उदासिन है। खाद्यान्न उत्पादन आज भी गो वंश पर आधारित है। आजादी तक देश में गो वंश की 80 नस्ल थी, जो घटकर आज महज 32 रह गई है। गाय से ग्राम और ग्राम से ही भारत है। 1947 में एक हजार भारतीयों पर 430 गोवंश उपलब्ध थे। 2001 में यह आँकड़ा घटकर 110 हो गयी और 2011 में यह आँकड़ा घटकर लगभग 20 गोवंश प्रति एक हजार व्यक्ति हो गया। देष में बाघ को बचाने के लिए करोड़ो रूपए खर्च किए जा रहे है मगर गाय को लेकर हर कोई उदासिन है। यहा तक की पषुओं की हत्या करने के लिए बहुत से कत्लखाने देष मे गैर कानुनी तरीके से संविधान का उलंद्यन करके चलाऐ जा रहे है। मगर अब तक सरकार की ओर से कोइ ठोस कदम नही उठाए जा सका है। सरकार को इस बात से कोइ अफसोस नही है की कृशि योग पशुओं की खुलेआम हत्या की जा रही हैं।

तो ऐसे में विक्लप सिर्फ गाय को राष्ट्रीय पशु घोसित करना ही बचता है। आपको बता दे कि गौ हत्या से बड़े पैमाने पर गौ तस्करों के साथ-साथ सरकार को भी फायदा होता है। गुजरात, मध्यप्रदेष, उत्तराखंड और राजस्थान जैसे राज्यो में भी गौ हत्या पर 10 साल के सजा का प्रवधान है। गुजरात में गौ हत्या की सजा 6 महीने से बढ़ाकर 7 साल कर दी गई है साथ ही जुर्माने के तौर पर 1000 के बजाय 50,000रू देने होंगे। तो ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि केन्द्र सरकार गौहत्या पर चुप क्यों है। तो आईए और गाय को राष्ट्रीय पशु घोशित करने के लिए कदम आगे बढ़ाए।

Saturday, September 8, 2012

कोयले की कालिख से सबके मुह काले

देष में आज कोल आवंटन को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। इंदिरा गांधी ने 1973 में कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण किया तो मनमोहन सिंह ने 1995 में ही बतौर वित्त मंत्री। इसके चलते कोयला खादान एक बार फिर निजी हाथों में जाने लगा। असल में कैग की रिपोर्ट इन्ही निजी हाथों में खदान देने के लिये अगर बोली ना लगाये जाने पर अंगुली उठाकर, 1.86 लाख करोड़ के राजस्व के चूने की बात कर रही है। वही कोयले से करोड़ों का वारा-न्यारा कर मुनाफा बनाने में चालिस से ज्यादा कंपनिया सिर्फ इसीलिये बन गयी जिससे उन्हें कोयला खादान का लाइसेंस मिल जाये। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद बीते 2004 से 2009 तक में 342 खदानों के लाइसेंस बांटे गये। जिसमें 101 लाइसेंसधारकों ने कोयले का उपयोग पावर प्लांट लगाने के लिये लिया। लेकिन इन पांच सालों में इन्हीं कोयला खादानो के जरीये कोई पावर प्लांट नया नही आ पाया। एक सवाल खड़ा हो सकता है कि क्या कोयला खदान के लाइसेंस उन कंपनियों को दे दिये गये, जिन्होने लाईसेंस इसी लिये लिये कि वक्त आने पर खादान बेचकर वह ज्यादा मुनाफा कमा लें। म्यूजिक कंपनी से लेकर गुटका, गंजी और अखबार निकालने से लेकर मिनरल वाटर का धंधा करने वाली कंपनी तक को लाइसेंस दे दिया गया। इतना ही नही, दो दर्जन से ज्यादा ऐसी कंपनियां हैं, जिन्हे ना तो पावर सेक्टर का कोई अनुभव है और ना ही कभी खादान से कोयला निकालवाने का कोई अनुभव। कुछ लाइसेंस धारकों ने तो कोयले के दम पर पावर प्लांट का भी लाइसेंस ले लिया और अब वह उन्हें भी बेच रहे हैं। लेकिन यहा काबिले गौर वाली बात ये है की देष की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई जब भी किसी बड़े घोटाले की जांच करने निकलती है तो, पहले खबर अखबार में छपती है फिर सीबीआई छापेमारी करती है। इस बार भी ऐसा ही हुआ, तो ऐसे में एक बार फिर से सीबीआई को लेकर सवाल खड़ा हाने लगा है की क्या इन कोल भ्रश्टाचारियों को बचाया जा रहा है। कोयला खादान को औने पौने दाम में बांटकर राजस्व को चूना लगाने वालो पर आखिर कार्रवाई सरकार सिधे तौर पर क्यो नही करती है। असल सवाल यहीं से शुरु होता है कि क्या संसद के भीतर खादानों को लेकर अगर राजनीतिक दलों से यह पूछा जाये कि कौन पाक साफ है तो बचेगा कौन। क्योंकि देश के 18 राज्य ऐसे हैं, जहां खादानों को लेकर सत्ताधारियों पर विपक्ष ने यह कहकर अंगुली उठायी है कि खादानो की लूट सत्ता ने की है। तो ऐसे में ये सवाल अपने आप खड़ा होता है की आजादी के बाद देश बेचने सरीखा ही क्या ये मामला नही है। क्योंकि बाजार ने सरहद तोड़ी लेकिन उसमें बोली देश के जमीन और खनिज-संसाधन की लगी। यानी सरकार का यह तर्क कितना खोखला है कि खादानों से जब कोयला निकाला ही नहीं गया तो घाटा और मुनाफे का सवाल ही कहां से आता है। असल में झारखंड के 22 खादान, उडीसा के 9 खादान, मध्यप्रदेश के 11 और बंगाल के 9 कोयला खादानो में से बाकायदा कोयला निकाला जा रहा है। और सिगरैली के साशन में रिलायंस की खादान मोहरे एंड अमलोरी एक्सटेंसन ओपन कास्ट में भी 1 सिंतबर 2012 से कोयला निकलना शुरु हो गया। यानी कोयला खादान घोटाले ने अब झारखंड, छत्तीसगढ,मध्यप्रदेश और उडीसा,बंगाल में काम तो शुरु करवाया है। लेकिन खास बात यह भी है कि करीब 60 से ज्यादा कोयला खादानें ऐसी भी हैं, जिनका एंड यूज होगा क्या यह किसी को नहीं पता। इसलिये ये भी एक सवाल है कि दिल्ली में, जो कई मंत्रालयों से मिलकर बनी कमेटी जांच कर रही है वह महज खाना-पूर्ती कर कुछ पर तलवार लटकायेगी या फिर इनके उपर कार्रवाई भी होगी। क्योकी सीबीआई ने जो जाचं का तरीका अपनाया है उससे सवाल उठना लाजमी है की क्या सीबीआई इन भ्रश्टाचारीयो को बचा रही है।

भ्रष्ट से त्रस्त एक सेना के जवान का दर्द

कुछ जंबाजो के दिल में देष बसता है ना कि केवल सेना ऐसी ही कुछ कहानी कष्मीर सिंह की है। जब ये देष भक्त हमसे अपना दर्द सुनाया तो हम ठान लिए की इसे न्याय दिलाना चाहिए। और एक पत्रकार होने के नाते हमने इसे उन लोगो तक पहुंचाया जहा से इस जवान को न्याय मिल सके। नाम कष्मीर सिंह जिला हमीरपुर हिमाचल प्रदेष जिसने सेना को चुना ताकि वो देष की रक्षा कर सके उसने आप काम बखूबी निभाया भी पर कुछ लोगों को उसके काम करने का तरीका पसंद नही आया। और ये उनके लिए नासूर बन गये। उनका मकसत ही सेना को धोखा देना है। वाक्या है 2005 का जब वायु सेना केंद्र पर कष्मीर सिंह की पोस्टींग थी। तब सेना में हो रहें भ्रश्टाचार कों इनहोनें उजागर किया। सेना के राषन और गैस की भी कालाबाजारी भी चरम सीमा पर है। सेना कें अधिकारी गैस और को कौडी़ कें दामों पर कालाबाजा़रियो को बेच देते है और उसके बदले लकडि़ पर खना बनाने का काम किया जाता है। जिन सेंना कें जवानो को देष की सुरक्षा में तैनात होना चाहिए उन जवानों से हरे पेंड कटावाये जाते जो कि पुरीतरह से गैरकानूनी है। जिनका सबूत है ये तस्वीरे जो सारा वाक्या बयां कर रही है। जब भ्रश्टाचार के खि़लाफ कष्मीर सिंह ने आवाज़ उठाया, तो जिसकी सजा़ उनको पांच बार जे़ल जाकर चुकाना पडा़। और उनको नौकरी से भी से बर्खास्त कर दिया गया। इस दौरान कष्मीर सिंह को मानसीक और षारीरीक तौर पर बहुत प्रताडि़त किया गया। इतना ही नही सेना के अधिकारीयों ने कष्मीर सिंह कें खि़लाफ फ़र्जी थ्प्त् दर्ज किया और देष दो्रही बताया। इसके बावजूद सेना का ये जाबांज सिपाही कष्मीर सिंह ने हार नही मानी और अपनी आवाज़ बुलंद रखी और उच्च न्यायलय तक गया पर किसी नें भी उसकी फ़रियाद नही सुनी। अततः कष्मीर सिंह की पत्नी ने प्रधानमंत्री का दरवाजा खटखटाया जहां से उनको अगर कुछ मिला तो केवल अष्वासन की जांच की जायेगी मामला रक्षा मंत्रालय गया पर वहां भी कुछ नही हुआ । आखिरकार उन नापाक अधिकारियो को इस जाबांज सिपाही कें सामने झुकना ही पडां पर इस बार फिर उनके इरादे नेक नही थे । कष्मीर सिंह की जज्बे की बोली लगी ताकि उसके इमान को खरीदा जा सकें। बोली की कीमत थी चार लाख रूपए लेकिन भी कष्मीर सिह का इमान नही डगमगाया और वह जवान अभी भी अपने इमानदारी पर कयम है। क्योकी उनके दिल में देष बसता है।

भारतीय कृषि में कानपूर गौशाला का योगदान

कानपुर गौषाला भौंती इलाके में मौजूद हैं। यहा विभिन्न प्रकार के अत्याधुनिक तरीके से निर्मित मषीनों का संचालन बैल उर्जा से किया जाता हैं। इस तकनीक की खास बात ये है की बैलो की अल्प उर्जा से ही इन मषीनो का बड़ी असानी से संचालन हो जाता है। इस गौषाला में चारे को काटने के लिए उर्जा लेने की आवष्कता नही होती। और ये पूरी तरह आत्म निर्भर है। साथ ही साथ इससे समय की बचत भी होती हैं। इन सब के अलावा इस गौषाला में देवी देवताओं के मंदिर की स्थापना इस तरीके से की गई है कि इस गौषाला का प्राकृतिक सौंदर्य मन को मोह लेता है। यहा हरे भरे पेड़ पौधे और यहां का मनमोहक दृष्य मिलकर गौषाला को एक षान्ति के प्रदेष जैसा रूप देते । इस गौषाला में बैल उर्जा के इस्तेमाल से संचालित होने वाले यंत्रो में सबसे महत्वपूर्ण बिजली उत्पादक यन्त्र की उपयोगिता आज के दौर में काफी उपयोगी साबित हो रही है। गौषाला के महामंत्री पुरूशोतमलाल तोषनीवाल बताते हैं कि इस विधि से 5 हास पावर की कोई भी मषीन संचालित की जा सकती हैं। आधुनिकता के इस दौर में बढ़ते डीजल के मूल्यों और सूखे से किसान देष में आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे में बैल उर्जा द्वारा संचालित जल निकासी का ये यंत्र काफी कारगर साबित हो रहा हैं। इसी को वृहत रूप देने के लिए ये गौषाला समाज को प्रोत्साहित करने का काम कर रही है। और समाज में ये संदेष छोड़ रही है की गौवंष कितना कारगर है। ये विधि आधुनिक कृशि और गा्रमीण भारत के लिए वरदान साबित हो रही हैं। जो किसान जयादा संख्या में पषुपालन करते है उनके लिए यह यंत्र और अधिक अहम हो जाता है। इतना ही नहीं यहा इस तरह की विधि से कई अन्य कार्य भी किए जाते है जैसे कृशि में उपयोग होने वाले औजारों में धार लगाने से लेकर, आटा चक्की या फिर चावल निकालने की मषीन असानी से विना किसी इंधन के चलाई जा सकती है। आप को बता दे की इस विधि में बैलों को जयादा उर्जा नहीं लगानी होती है। यहा तक की इस मषीन को अकेला इंसान भी बड़ी असानी से घुमा सकता है। इस विधि की खास बात यही है की कम उर्जा से बड़े से बड़ा काम बड़ी असानी से किया जा सकता है। आज के वैज्ञानिक युग में जहा कृशी पुरी तरह से नई- नई तकनीको की मोहताज हो गई है। वही कृशी के लिए बैल और गांयों का उपयोग कम हुआ है। कहा जाता है की जब किसी चिज की उपयोगिता खत्म हो जाती है तो समाज उससे कन्नी काटना सुरू कर देता है। यही आज गांयों और बैलों के साथ हुआ है। कानपुर गौषला सोसाईटी समाज में गांयो और बैलो के उपयोगिता दुबारा बढ़ाने के लिए प्रतिबध्द है। और इसके कठिन प्रयासों से ऐसा संभव प्रतीत हो रहा है। एक ओर जहा देष विजली संकट से जूझ रहा है। यहा तक की भारत के ऐसे कई गांव है जहा विजली की पहुंच ही नही है और लोग अपनी जिंदगी अंधेरे मे विताने को मजबुर है, तो वही दुसरी ओर कानपुर गौषाला सोसाईटी के अथक प्रयासो के चलते बैलों से उर्जा का उत्पादन किया जा रहा है। ये उत्पादन बड़ी मात्रा में तो नही लेकिन अंधेरे में टिम- टिम करते चिराग की पनाहों में किताब खोले बैठे बच्चों के जिवन में एक चकाचैध बल्ब कि रोषनी तो फैला ही सकता है। इस विधि से होने वाले विजली उत्पादन से अंधकार में डुबे कम से कम बीस घरों में छः घंटो तक असानी से दुधिया बल्ब की रोषनी फैलाई जा सकती है। विज्ञान के विकास के बाद खेतो को जोतने के लिए बाजार में तरह- तरह के यंत्र आ चुके हैं। हैरो और टिलर जैसे कृशि यंत्र जो की बिना ट्रैक्टर के नही चलाये जा सकते, इन सब को चलाने के लिए जयादा डीजल खर्च होता है। जिससे खेती में लागत जयादा आती है ऐसे में कानपुर गौषाला सोसाईटी ने षेखर ट्रैक्टर जैसे यंत्रो का आविश्कार कर बैलों द्वारा खेतो की जुताई बिना इंधन को करना मुमकिन किया। इस षेखर ट्रैक्टर को इस तरह से तैयार किया गया है की बैल की कम उर्जा और किसानों के कम समय और कम लागत से आसानी से खेतो की जुताई की जा सके। कानपुर गौषाला सोसाईटी के भागीरथ प्रयासो से सकरातमक परिणाम अब प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकते है। इन सब के अलावा इस गौषाला में एक गोबर गैस पलांट की स्थापना भी की गई है। इस पलांट की स्थापना उत्तरप्रदेष के पूर्वमुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने करवाई । भारतीय तकनीक द्वारा इजाद की गई इस विधि के अंतर्गत एक 85 घन मिटर का टैक बनाया गया है। जिसमें गोबर एकत्रित कर के सीएनजी गैस का उतपादन किया जाता है। जिसका उपयोग जनरेटर और कई प्रकार की अन्य मषीनों और वाहनों को संचालित करने में किया जाता है। अगर बिजली उत्पादन करने वाले जनरेटर का संचालन इस गैस द्वारा किया जाता है, तो 75 प्रतिषत गैस और केवल 25 प्रतिषत डीजल के इस्तेमाल से जनरेटर द्वारा बड़ी असानी से उर्जा उत्पादित की जा सकती है। आज के इस दौर में बढ़ती डीजल की क़ीमत आसमान छू रही है ऐसे में ये तकनीक और जयादा अहम हो जाती है। इस तकनीक को अगर बड़े स्तर पर काम लिया जाय तो ये गा्रमीण भारत के लिए ये एक वरदान साबित होगी। जहा पर इस तरह के छोटे मोटे यंत्रो का संचालन किया जाता है। आधुनिकता के इस दौर में आज हर कोई जयादा उपज पाने के लिए रसायनीक खाद का जयादा से जयादा उपयोग कर रहा है, ऐसे में खेतो की उर्वरा षक्ति भी घटती जा रही है, साथ ही ऐसे में रसायनीक खाद द्वारा उपजाई जाने वाली फसलो और साक सबजियों में कीटनाषको की मात्रा बढ़ जाने से कई तरह की घातक बिमारीयों का खतरा बढता ही जा रहा है। जो समाज को अस्वस्थ बना रहा है भारत के भविश्य को अंध्कार के गर्त में धकेल रहा है। ऐसे में कानपुर गौषाला सोसाइटी के पुनीत प्रयासो से जैविक खाद का उत्पादन आने वाली पीढ़ी की जरूरत को दर्षा रहा है। और समाज को रसायनीक खाद के उपयोग से होने वाले नुकसान के बारे में जागरूक कर के कृशी में जैविक खाद की उपयोगीता बढ़ाने के लिए प्ररित का रहा है। समाज में कानपुर सोसाइटी जैसी पुनित संस्थाओ को सरकार को भी आगे बढ़ कर प्रोत्साहित करना चाहिए।

Friday, September 7, 2012

क्या जुआ, सट्टा, लौट्री को मान्यता देना सही है ?

आज हम आपके सामने लाये हैं एक ऐसा मुददा, जो आज भी हमारे समाज के लिए अभिशाप बना हुआ है और सदियों पहले भी अभिशाप था। आज भी ये घरों को उजाड़ रहा है और इंसानों की जिंदगी को लील रहा है, तो वहीं इतिहास में भी ये सर्वनाष का कारण बना है। जी हां आज हम बात कर रहे हैं, जुआ, सटटा, लाट्री, जो आज माडर्न तरीके से लेकर पुराने तरीकों से खेले जा रहे हैं। इतिहास गवाह है, कौरवों पांडवों के पाषें महाभारत जैसे बड़े युद्ध की वजह बने। आज भी रायल जगह जैसे बड़े होटल्स से लेकर फार्म हाउस तक, जुआ, सटटों और लाट्री की एषगाह बने हुए हैं। यहीं नही आम आदमी भी इसके मोहपास में फंसकर, अपना घर परिवार बर्बाद कर रहा हैं। आम आदमी की गाढ़ी कमाई, लालच देकर जुआ सटटों के बहाने छीनी जा रही है। करोड़पति बनने का लालच लोगों को खोखला कर रहा है। ऐसे में लोग अपना घर बार बेचकर लाट्री जुए में फंस गये हैं। जैसे पांडवों ने द्रोपदी को दाव पर लगाया था वैसे ही उदाहरण आज भी देखने को मिल जाते हैं। लोग जुआ, लाट्री के लालच में फंसकर अपनों को और खुद को भी भूल रहे हैं। आज लाट्री और जुआ के मारे हजारों लाखों परिवार मिल जायेंगे देष में, जिन्हाने अपना सब कुछ जुआ के लालच में गंवा दिया। आज वो दर-बदर की ठोकरें खा रहे हैं। इनमें बहुत से ऐसे भी मिल जायेगे आपको, जो बहुत बड़े करोडपति और अरबपति रहे हों। राजमहलों और राजघरानों में रहने वाले जुआ की लत में फंसकर भीख मागने को मजबूर हो गये। आज जुआ और लाट्री को लूटेरों ने आम आदमी को लूटने का जरिया बना लिया है। षराबखानों के साथ जुआ को परोसना सरकार की नाक के नीचे खुलेआम चल रहा है। यहां ये लूटेरे बड़े ही षातिराना अंदाज में लोगों की जेब को खाली कर रहे हैं। आज युवा भी आसानी से इन लोगों के बहकावे में आ रहे हैं। युवा आधुनिकता के बहाने खूब इन अययासखानों के षिकार हो रहे हैं। मगर सरकार है कि हाथ पर हाथ रखे बैठी है। अब सरकार बैठे भी क्यों नही, ऐसा माना जाता है कि ये जुआघर सरकारी लोगों की आमदनी का एक जरिया हैं। इसी वजह से न तो सरकार इन जुआघरों और लाट्री पर प्रतिबंध लगाती और ना ही कोई नियम कानून लाती। अगर किसी मुख्यमंत्री ने इसे बैन करने की कोषिष भी कि तो उसे जुआखोरों के सामने झूकना पड़ा। जिसकी वजह हुई कि आज तक जुआ और लाट्री का धंधा धड़ल्ले से फल-फूल रहा है। आपको पता होगा आइपीएल क्रिकेट टूर्नामेंट में कितने अरबों खराबों का सटटा लगता है। कितने ही आज ऐसे खिलाड़ी है, जो सटटेबाजी में देष की इज्जत को दाव पर लगाये बैठे हैं। लेकिन अब समय आ गया है के ऐसे लूटेरों और इस सामाजिक बुराई को दूर करने के लिए, हमें जागना होगा। सब कुछ सरकारों पर ही नही छोड़ना होगा। हमें और आपको आगे आना होगा, समाज को जगाने के लिए। इसके लिए सरकार पर भी दबाव बनाना होगा। क्योंकि जुआ सटटा इतिहास के पन्नों में भी बैन था तो अब भी होना चाहिए। क्योंकि इसने हमारे कई घरों को बर्बाद कर दिया। आज युवा जुआ के लिए जेब काटने से लेकर हत्याएं तक करने पर उतारू हैं। आपने खुद महसूस किया होगा, कि आपके बराबर वाले पार्क में युवा कैसे जुआ और षराब की लत में डूबे हुए है। ये युवा कैसे चमकते भारत की तस्वीर बनेंगे, आप खुद ही अंदाजा लगा सकते हैं। तो आइए हमारे साथ। खड़े होईए समाज और सरकार को जगाने के लिए। और रखिए अपने विचार समाज के इस राक्षस को खत्म करने के लिए।

Sunday, September 2, 2012

क्या अश्लील विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगना चाहिए ?

आज के बदलते दौर में सब कुछ बदल गया है। इस बदलाव के दौर में लोग पैसा कमाने के लिए जिन विज्ञापनो का सहारा ले रहे है, क्या ये विज्ञापन सचमुच अपने मकसद को पुरा कर है, या फिर इन विज्ञापनो के आड़ में देह व्यापार से लेकर कामुक्ता तक को बढ़ावा देने के लिए ये सब प्रयोग किये जा रहे है। ये अपने आप में वाकई एक बड़ा सवाल है। लेकिन आज जिसगती से ये सब कुछ हो रहा है इसका समाज के उपर कितना ज्यादा प्रभाव पड़ता है सायद इन विज्ञापन दाताओ को मालुम नही होगा। हमारा देष सदियों से ही विष्वगुरू रहा है। जो दुनिया को सही रास्ते पर चलना सिखाता है, मगर आज एक षिक्षित समाज के अंदर जब इस प्रकार के भ्रामक विज्ञापन अपना प्रभाव दिखाने लगे तो, सायद एक बार फिर हम सब को सोचना होगा की आखिर हम आज किस रास्ते पर जा रहे है। चाहे बात अखबार का हो या फिर टेलिविजन का हर जगर ऐसे अष्लील विज्ञापनो का चमक अपना दुषित प्रभाव छोड़ रहा है। लेकिन सबसे अहम बात ये है की ऐसे विज्ञपानो को रोकने के लिए देष में कानून होने के वावजुद इसके उपर रोक नही लग पा रहा है। हमारे देष में जिस पीछड़े वर्ग को समाज के मुख्य धारा में लाने की बात होती है, आज वही लोग इस तरह के विज्ञापनो से होने वाले दुस्प्रचार के षिकार हो रहे है। तो सवाल यहा भी खड़ा होता है की आखिर इसके लिए जिम्मदेर कौन है ? टीवी चैनल तो हद तक इस तरह के असलिल विज्ञापनो के लिए एक गाईडलाईन के तहद इसे रात में दिखाते है, मगर अखबारो में तो ऐसे विज्ञापन इस कदर छाए रहते है की जैसे ये विज्ञापन ही समाचार हो। मसाज कराने से लेकर जपानी तेल के नाम पर विज्ञाप हो, या फिर सैक्स समस्या को दुर करने वाली कोई उत्पाद कही न कही ये सब कुछ उस आम उपभोक्ता को प्रभावित कारता है जो इनके हकीकतो से कोसो दुर है। इन विज्ञापनो के आड़ में आज देह व्यापार का धंधा भी काफी ज्यादा फल-फुल रहा है। इसके फिछे भी देष विदेष के नेटर्वक काम कर रहे है। जो गलत विज्ञापन देकर पहले उन्हे फंसाते है और बाद में उस गिरोह का हिस्सा बनने को मजबुर करते है जहा कि दलदल से निकलना काफी मुष्किल होता है। ऐसे विज्ञापनो के जाल में सबसे ज्यादा स्कुल के वह गरिब बच्चें सिकार होते है जो कम समय में पैसा कमाना चाहते है। तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या ऐसे विज्ञापनो के उपर प्रतिबंध लगना चाहिए ?

Saturday, September 1, 2012

क्या "एक था टाईगर" फिल्म पर प्रतिबंध लगना चाहिए ?

फिल्में हमारे समाज का आइना होती हैं। जों लोगों में देषभक्ति का जज्बा जगाती हैं। हमारे देषभक्त षहीदों और वीरों की कहानियां समाज को बताती हैं। जिसे देखकर देषवासियों में देषभक्ति की भावना हिलोरें लेने लगती हैं। लेकिन अब ऐसी फिल्में बन रही है, और पैसे कमाने का रिकार्ड भी बना रही हैं, जिनका हीरो अपने छोटे से हित के लिए देष से गददारी करता है। और हम मजे से उसकी गददारी पर अपना पैसा लूटा रहे हैं। जी हां आज हम बात कर रहे है फिल्म एक था टाइगर की। जिसका हीरो एक लड़की के लिए देष से गददारी करता है। और वो भी उस भारतीय खूफिया ऐजेंसी का ऐजेंट, जिसकी नीतियों पर देष की सुरक्षा टीकी हुई है। ऐसे ही हीरो की फिल्म कमाई के रिकार्ड बना रही है। लेकिन सोचिए आज हमारा समाज कहां पहुंच गया है। पाकिस्तान ने इस फिल्म पर बैन लगा दिया। जबकि पाकिस्तानी ऐजेंट लड़की ने कोई भी गलत काम नही किया। लेकिन भारत के ऐजेंट जिसे भारत में टाइगर नाम से जाना जाता है। वो देष और अपने पेषे से गददारी करता है। लेकिन फिर भी भारत सरकार और हमारा समाज इस फिल्म की असलियत को नही पहचानते। आखिर क्यों पाकिस्तान और हम इसकी हकीकत को पहचानते हैं। आखिर क्यों आप फिल्म देखने के बाद देष हित को भूल जाते हैं। क्या हम अपने उन जाबांजों की कद्र नही करते जो अपना सब कुछ त्यागकर देष के लिए आज भी विदेसी जेलों में सड़ रहे हैं। मगर अपनी जबान के ताले आज तक नही खोले। देष के लिए दर-बदर की ठोकरें खा रहे है। देष हित के लिए कहां कहां भीख मांग रहे हैं। अपनी हर एषो-आराम की जिंदगी को खत्म कर दिख उन जाबांजों ने देषहित के लिए। मगर कभी उनके चेहरे पर उफ तक नहीं आती। लेकिन टाइगर एक छाटे से हित के लिए देष और देष की आवाम से गददारी करता है। और हमारी आवाम भी उसे बिना कुछ सोचे समझे अपनाती है। ऐसा लगता है आज देष के फिल्म निर्माताओं में तो देष भक्ति की भावना तो खत्म हो गई लगती ही है। मगर हमारा समाज और युवा वर्ग भी देषप्रेम की भावना से कोसो दूर निकल गया लगता है। क्या आज ऐसे फिल्म मेकर खत्म हो रहे है जो लोगों में फिल्म के जरिए देष प्रेम की भावाएं जगाते थे। क्या आज ऐसा समाज खत्म हो गया है जो देषभक्ति की फिल्मों के लिए उमड़ पड़ता था। क्या अब हम थियेटर में केवल इंटरटेनमेंट के लिए जाते हैं और उसमें ये भी भूल जाते हैं कि हमारा हीरो देषप्रेम से गददारी कर रहा है। और हम भी उसका मजा उठा रहे हैं। आखिर क्यों नही आतीं हमारे मन में ऐसी बातें। क्यों सरकार और समाज ऐसी फिल्मों को नही नकारते। क्यों दूसरे मीडिया संस्थान ऐसी फिल्मों पर बेदाग टिप्पणी नही करते। क्यों फिल्म मेकर ऐसी फिल्म बना रहे हैं। और क्यों हम उनका समर्थन कर रहे है। तो क्यों ना ऐसे फिल्म मेकर और फिल्म पर प्रतिबंध लगना चाहिए।

क्या हम नशामुक्ति के प्रति गंभीर है ?

आज हम आपके सामने एक ऐसा मुददा लेकर आ रहे हैं जो लगभग हर देष, दुनिया और हर समाज से जुड़ा है। ये एक ऐसा मुददा है जिसके लिए हमारे समाज में कोई जगह नही है फिर भी समाज इसे षानओषौकत का एक बड़ा जुमला मानता है। समाज का हर वर्ग इसमें खोया हुआ है। जबकि उसे पता है कि ये उसके लिए प्राणघातक है। जी हां आज हम बात कर रहे हैं समाज में फैली नषे की लत को। ऐसा नही है कि हमारे समाज में नषे के प्रति जागरूकता नही है। लेकिन सब कुछ जानते हुए और समझते हुए भी हमारे समाज का हर वर्ग नषे की लत में डूबा हुआ है। क्या रिक्षे वाला और क्या अपने आप को हाईप्रोफाइल कहने वाला, हर षख्स नषे में डूबा हुआ लगता है। अब डूबें भी क्यों नही इस नषे में डूबना आज के युवा वर्ग का ट्रेंड जो बन गया है। सबको पता है कि नषा हमारे षरीर के लिए नुकसानदायक है। लेकिन दोस्ती की पींगे मारना और पार्टी में दिखावा जो करना है। बस यही दिखावा तो कर देता है जिंदगी बर्बाद। लेकिन क्यों हो रहा है ये सब, क्या वजह है इस सब की। जब हम इसकी तह तक जाते है तो कई वजह दिखाई देती है इन सब की। सबसे बड़ी वजह है, आज ऐसा कोई सख्त कानून का ना होना जो नषा मुक्ति पर कड़ाई से रोक लगा सके। सरकारें और राजनैतिक दल हमेषा से नषा मुक्ति को पैसे और राजनीति के खेल में तोलते हैं। समाज का आइना दिखाने वाली फिल्में धड़ल्ले से युवाओं को नषे की ओर ढ़केल रही हैं। जब अपने आप को दिखाने वाले खुलेआम फिल्म में कहते है ए गनपत चल दारू ला.... तो आप खुद ही सोच सकते हैं क्या प्रभाव पड़ेगा इसका हमारे युवाओं पर। जब चिकनी चमेली पव्वा लगाके आयेगी तो युवा पीढि के मन में नही आयेगा पव्वा लगाने का। जब पार्टी में गाना चलता है दो घूंट पिला दे षाकिया बाकी मेरे पे छोड़ दे..... तो फिर क्यों नही सोचेगा युवा क्यों ना ये भी करके देखा जाये। जब फिल्म का हीरो कहेगा दम मारो दम, मिट जाये गम..... तो फिर दुनियाभर की टेंषन लिए युवा क्यों नही सोचेगा कि में भी ये सब अपनी टेंषन कम कर सकता ! आज ये सारे सींन हमारे फिल्मी जगत में धड़ल्ले से चल रहे हैं। देष में सेंसर बोर्ड नाम का बना हुआ है। फिल्मों में सिगरेट सीन बैन हैं फिर भी मिलीभगत से सब कुछ चल रहा है। क्यों चल रहा है ये आप सब जानते हैं कि कैसे पैसे के लिए सब खेल खेल जा रहा है। हमारे युवा पहले तो षौकिया ये सब अपनाते हैं मगर फिर वो उसके लती हो जाते हैं। एक समय ऐसा आता है जब इंसान बिना स्मौकिंग और नषो के नही रह सकता। बस यही से षुरू हो जाता है इंसान का हर तरह से पतन। क्या षालीनता, और क्या गौरव, और क्या स्वास्थ्य हर तरह से इंसान खत्म होने लगता है। अब ऐसे में कोई व्यक्ति इससे निकलना चाहे, तो फिर भी नही होता आसान निकलना। इसके लिए देष में कई सामाजिक संगठन और सरकार भी कई तरह के कार्यक्रम चलाती है। मगर क्या हम होते है इन सब से जागरूक। क्या कभी सोचते है कि स्मौकिंग, टौबेको और दूसरे नषे कितना नुकसानदायक है हमारे षरीर को, नही ना। क्योंकि हम जानते हुए भी सभी चीजों को अनदेखा कर रहे हैं। हमें नषे के बारे में सब कुछ पता है मगर फिर भी हम इसमें डूबते जा रहे हैं। तो अखिार क्यों हो रहा है ये सब। क्या इस सब के लिए समाज में आज एक आंदोलन की जरूरत नही है।