Wednesday, February 17, 2016

क्या मानवीय मूल्यों के पैमाने बदल गएँ हैं ?

एक भारतीय होने के नाते, भारतीय समाज मे व्याप्त भ्रष्टाचार हमारी चिंता का विषय हो सकता हैं, लेकिन सच तो यह हैं कि, आज भ्रष्टाचार सम्पूर्ण वैश्विक समाज कि सबसे बड़ी विकृति के रूप मे चुनौती बनता जा रहा हैं! ऐसे मे कहीँ न कहीँ एक अहसास होता हैं कि, जिस तेजी से सम्पूर्ण विश्व कि दौड़ लगा रहा हैं, दुष्प्रभाव के रूप मे जन्म लें रही ख़ुदगर्जी और पाने के लिये किसी भी हद तक जाने कि सोच हीं भ्रष्टाचार कि बड़ी वजह हैं! लोगों को आगे बढ़ना हैं, ऐसे मे ईमान और उसूलों कि बेडीयां खटकती हैं! वह दौर बीत गये, जब व्यवहारिकता और मानवीय मूल्यों के पैमानों पर सफल इंसानका परिक्षण होता था! आज सफल इंसान कि परिभाषा आर्थिक सम्पन्नता मे अंतर्निहित हो चुकी हैं! अब मानवीय मूल्यों के पैमाने बदल गएँ हैं!





जैसा की हम सभी जानते हैं, भ्रष्टाचार आज हमारे देश का भी सबसे मुद्दा ज्वलंत बन गया हैं! एक ऐसी बीमारी, जो लगातार हमें वैश्विक परिदृश्य में कमजोर कर रही हैंबावजूद इसके हम इलाज नहीं ढूंढ पायें हैं! हाँ, इलाज कि अनेकों कोशिशे हुई हैं, लेकिन हम रोग कि जड़ में नहीं पहुंच पायें हैं! देश में बड़े-बड़े आंदोलन, जुलुस प्रदर्शन हो रहे हैंहर देशवासी भ्रष्टाचार पर चिंतिंत हैं, बावजूद इसके आज भी हमारा चिंतन भ्रष्टाचार की जड़ों में नहीं पहुंच सका हैं! वास्तव में हमारा भ्रष्टाचार कि जड़ों में न जाना, कमजोरी से ज्यादामज़बूरी भी बन चुका है..क्योंकि अंगुली खुद पर भी उठ जाने का डर बना हुआ है ! हकीकत यह हैं कि आज भ्रष्टाचार हमारी जीवनशैली का हिस्सा बन चुका हैं, और चाहें-अनचाहें हम सभी इस में लिप्त हो रहे हैं! बातें होती हैं भ्रष्टाचार पर,… दूसरों को भला-बुरा सुनाते हैं, लेकिन बड़ा प्रश्न यह हैं कि, कब तक हम उस भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करेंगे जो हमारी जीवनशैली का हिस्सा हैं, एक आम आदमी के जीवनशैली का हिस्सा हैं?.. ‘जीवन के किसी मोड़ पर अगर हम भ्रष्टाचार से पीड़ित होते हैं, तो मौके मिलते ही कई बार हम फायदे भी उठाते हैं! समस्या यह रहीं हैं कि, जब दूसरों को मौका मिल जाता हैं तो भ्रष्टाचार लगता हैं, जब खुद का मौका लग जाता हैं, तो हमें शिष्टाचार लगने लगता हैं! भ्रष्टाचार के प्रति यह दोहरा नजरिया हि, अब तक के असफल संघर्षों की बड़ी वजह रहा हैं!




कहते हैं सच कड़वा होता हैं, लेकिन कड़वी तो दवा भी होती हैं! रोगों से मुक्ति एवं स्वस्थ शरीर के लिये हमें कड़वी दवाओं का घूंट पीना हि पड़ता हैं! हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी भी यही बात कहते हैं. कारण-अकारण, परिस्थितिजन्य मजबूरीवश हम सभी के जीवन मे भ्रष्टता अपनी जड़ जमा चुकी हैं”! अगर हम इस सत्य को स्वीकार नही कर सकते, हमें भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कुछ बोलने का हक नही हैं! अगर हम अपनी कमियों/खामियों को स्वीकार करने का माद्दा नही रखते, हमें दूसरों कि कमियों पर हो-हल्ला मचाना बंद करना चाहिए ! सामाजिक बुराइयों मे सुधार के लिये, नेता नही जिम्मेदार नागरिक बनने कि आवश्यकता हैं ! मुझे बेहद दुर्भाग्य के साथ कहना पड़ रहा हैं कि, अब तक भ्रष्टाचार के प्रति हमारा चिंतन सिर्फ और सिर्फ पीड़ित का प्रलाप रहा हैं! एक समग्र और गंभीर चिंतन कि जगह हम सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप में उलझ कर रह गए हैं !


अगर हम आधुनिक जीवनशैली को एक निस्पक्ष दृष्टिकोण से समझ सकें,…ये सही हैं की आज हम सभी के जीवन में भ्रष्टाचार प्रभावी हैं लेकिन इस हालात के लिए खुद को या किसी व्यक्ति विशेष को आरोपित करना भी पूर्ण विराम नहीं हैं ! वास्तव में आज हमारे परिवार और समाज में ऐसे हालात बनते जा रहे हैं, जहाँ ईमानदारी और शिष्टता के साथ जीवन लगभग असंभव होता चला जा रहा है ! एक ऐसा दमघोंटू वातावरण तैयार हो चूका हैं,… जहाँ पग-पग पर भ्रष्टाचार से सामना करना पड़ता हैं..ऐसे में जीवन पथ पर अपना औचित्य और रफ़्तार बनाये रखने के लिए व्याप्त माहौल से समझौता मज़बूरी बन जाता हैं! कई बार ऐसे हालात बनतें हैं, जब जीवन संघर्ष मे खुद या परिवार को बचाने कि जद्दोजेहद मे विकल्पहीनता का अहसास होता हैं, तब हम मजबूरन ही सही जीवन संघर्ष मे खुद को बचाये रखने कि गरज से भ्रष्टाचार का दामन थाम हि लेते हैं! जब जीवन कि नाव बिच समुन्द्र मे फँस जाती हैं, स्थापित उसूल और मर्यादायें भी बोझ लगती हैं! व्यवस्था में व्याप्त खाओं और खाने दोके माहौल से बचना मुश्किल हो चुका हैं!



वास्तव में अगर हम सही मायनों में देश और समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार के प्रति चिंतित हैं, और हालात में सुधार की कामना रखते हैं, मुझे लगता हैं हम सभी को थोड़ी ईमानदारी दिखानी होगी और उस सत्य को स्वीकार करने होगा….जिससे हम सभी चेहरा छुपाते रहे हैं! किसी भी रोग का कारण ढूंढने से पूर्व रोगी को ढूंढा जाता हैं. ठीक इसी तरह भ्रष्टाचार जैसी अब तक लाइलाज बीमारी का कारण ढूंढने से पूर्व हमें यह स्वीकार करना होगा की, हम सभी इस रोग से ग्रस्त हो चुके हैं! भ्रष्टाचार का वायरस हमारी व्यवस्था में लगातार जड़ जमाता चला जा रहा हैं और दुर्भाग्य से हम राजनैतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के कुछेक आर्थिक भ्रष्टाचार के मामलों में ही चिंतित हैं! यहाँ भी पैसा महत्पूर्ण हो जाता हैं, क्योंकि हमारे देश और समाज में सिर्फ और सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार को ही भ्रष्टाचारमाना जाता हैं. जबकि भ्रष्टाचार की परिभाषा हर इंसानी भ्रष्ट आचरणको अपने अंदर समेटे हुए हैं! 




वास्तव में हमें बेहद जिमेदारी और गंभीरता के साथ व्यक्ति,परिवार और समाज में व्याप्त भ्रष्ट आचरण को स्वीकार करते हुए समग्र और निष्पक्ष चिंतन करना होगा! व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के माहौल से बाहर निकलसामूहिक जिमेदारी को स्वीकार करते हुए माहौल के प्रति चिंतनशील होना होगा! कौन भ्रष्ट हैं? और कौन शिष्ट हैं ? ऐसे प्रश्नों से जितनी जल्दी हम बाहर निकल सकें बेहतर होगा और तभी हम अपने निजी जीवन,परिवार, समाज और राष्ट्र में फैली भ्रष्टता के विरुद्ध एक निर्णायक और परिणामी संघर्ष की पृष्टभूमि रख सकते हैं, अन्यथा समय व्यतीत करने के लिए, जो होता आया हैं, वह सही हैं! तो ऐसे में सवाल खड़ा होता है की क्या मानवीय मूल्यों के पैमाने बदल गएँ हैं ?

Monday, January 25, 2016

दिल्ली में प्रदूषण !

देश की राजधानी दिल्ली में प्रदूषण व्यापक रूप से फैला हुआ है। अब ये भौगोलिक स्तर पर पूरी दुनिया को अपने आगोश में ले चुका। इसका सबसे बड़ा कारण लगातार बढ़ते कल-कारखाना और डीजल-पेट्रोल से चलने वाली गाड़ीयां हैं। इसकी बुनियाद मानव जीवन की षुरूआत से लेकर वर्तमान में बढ़ते अत्याधुनिक जीवन शैली से पड़ा है। सफेद और काले धुंध पट्टी ने वायुमंडल में जहर घोल दिया है। सूर्य की रोशनी को जमीन पर आने में भी ये बाधक बन रहा है। इसकी वजह से ग्लेशियर पिघल रहा है। आने चाले समय में पूरी दुनिया जलमग्न हो सकती है। साथ हीं धरती पर प्राकृतिक विभिषिका से प्रलय भी हो सकती है। अगर बात सिर्फ  भारत देश की हो तो जितनी तेज़ी से भारत अपनी अर्थववस्था को मजबूत बनाने में लगा है, कही न कहीं उतनी ही तेज़ी से प्रदुषण को बढ़ाने में भी। एक वेबसाइट के मुताबिक भारत दुनिया का तीसरा सबसे ज्यादा प्रदूषित देश है। चीन पहले और यूनाइटेड स्टेट दूसरे पायदान पर आते हैं। प्रदूषण का मुख्य घटक कार्बन डाई ऑक्साइड की अकेले भारत में 596  मिलियन टेन्स मात्रा है जो पिछले 5 सालो में 43 फीसदी की दर से बढ़ी है। इतनी मात्रा पृथ्वी की सुरक्षा कवच ओजोन के एक तिहाही हिस्से को छतिग्रस्त कर सकने में काफी है। डब्ल्यू एच के मुताबिक भारत को तीसरा सबसे बड़ा प्रदूषित देश बनाने में दिल्ली, लुधियाना और कानपुर की अहम भूमिका है।






केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा ने संसद में एक के जवाब में बताया कि देश में पिछले तीन वर्षों में सांस की बीमारी के कारण 10 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। सरकार के मुताबिक 2012 में 3.17 करोड़ लोगों में सांस संबंधी गंभीर बीमारियों के केस सामने आए जिनमें से 4,155 लोगों की मौत हो गई। 2013 में भी सांस की बीमारी से जुड़े 3.17 करोड़ मामले सामने आए थे जिनमें से 3,278 लोगों ने अपनी जान गंवाई। जबकि 2014 में 3.48 करोड़ केस सामने आए जिनमें से 2,932 लोगों की मौत हो गई थी। इस तरह तीन वर्षों में प्रदूषण ने देश में 10 हजार जिंदगी निगल लीं। इतना ही नहीं सेंट्रल पॉलूशन कंट्रोल बोर्ड द्वारा जारी नेशनल एयर क्वॉलिटी इंडेक्स के मुताबिक देश के 17 में से 15 शहरों की हवा तय गुणवत्ता के मानक से काफी कम थी।


बीजिंग पर प्रदूषण की धुंध छाई तो कनाडा की एक कंपनी झट से चीन में  शुद्ध पहाड़ी हवा भरकर बोतल में बेचने पहुंच गई। कीमत सुनकर तो आपके होश उड़ जाएंगे। कनाडा की कंपनी वाइटिलिटी एयर चीन में एक बोतल शुद्ध हवा को 28 डॉलर यानी कि करीब 2000 रुपये में बेच रही। इन बोतलों को दो कैटेगरी में उतारा गया है, जिसमें प्रीमियम ऑक्सीजन की कीमत 27.99 डॉलर (करीब 1850 रुपये) और बैंफ एयर की कीमत 23.99 डॉलर (1570 रुपये) है। 

कंपनी ने चीन में दो महीने पहले ही इस प्रॉडक्ट की मार्केटिंग शुरू की थी और अब आलम ये है कि चीन की ऑनलाइन शॉपिंग कंपनी ताओबाओ पर बिक्री के लिए उपलब्ध कराते ही ये बोतलें कुछ ही मिनटों में बिक गईं। 500 बोलतों की पहली खेप बिक चुकी है और 700 बोतलें और भेजी जा रही हैं। कंपनी के चीन के प्रतिनिधि हैरिसन वॉन्ग ने कहा, कंपनी को प्रदूषण चीन की प्रमुख समस्या नजर आती है इसलिए हम चाहते हैं कि लोगों को रोजमर्रा की जिंदगी में थोड़ी ताजी हवा मिल सके। बीजिंग में सबसे खतरनाक पीएम 2.5 प्रदूषण का स्तर प्रति घन मीटर 237 माइक्रोग्राम था। अमरीकी दूतावास एयर पॉल्युशन मॉनिटर के मुताबिक बीजिंग में इसका सर्वाधिक स्तर 317 था।




प्रदूषण का यह बहुत अधिक स्तर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे कैंसर पैदा करने वाले तत्वों के ग्रुप एक में रखा है। यह कैंसर के अलावा दिल की बीमारियां और अन्य घातक बीमारियां पैदा करता है। अधिकारिक सलाह है कि इतने उच्च स्तरीय प्रदूषण में कोई भी शारीरिक गतिविधि नहीं करनी चाहिए। जब मैंने यह सुना तो मैंने पिछले हफ्ते खरीदे छोटे प्रदूषण डिटेक्टर को ऑन किया। दिल्ली के मेरे घर में इसके स्क्रीन की रीडिंग 378 थी। इसके बाद मैने अपने घर के करीब मौजूद अमरीकी दूतावास की वेबसाइट पर वायु प्रदूषण का स्तर देखा। वहां भी रीडिंग यही थी।

बाकी दिल्ली का तो और बुरा हाल है। भारी यातायात, गंदगी से भरे स्थानीय उद्योग और पूर्वी दिल्ली के इलाके में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों ने प्रदूषण को और बदतर कर दिया है। एक समय तो एयर पॉल्यूशन डिटेक्टर की रीडिंग 500 तक पहुंच गई।

आंकड़ों पर एक नजर:

डब्ल्यूएचओ और यूरोपीय संघ द्वारा पीएम 2.5 प्रदूषण का स्तर प्रति घन मीटर 25 माइक्रोग्राम रखा गया है।

अमरीका में यह मानक और कड़ा है। यहां यह सीमा 12 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। मतलब यह कि दिल्ली में यह प्रदूषण अमरीकी मानकों से 30 गुना और डब्ल्यूएचओ मानकों से 15 गुना ज्यादा है।

अगर तुलना करें तो किंग्स कॉलेज के एनवायर्नमेंटल रिसर्च ग्रुप के मुताबिक छह दिसंबर को लंदन में पीएम 2.5 प्रदूषण का स्तर 8 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।


इसके अनुसार, लंदन में सर्वाधिक प्रदूषण 2006 में दर्ज किया गया था, जो 112 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।

बीजिंग पीएम 2.5 प्रदूषण डब्ल्यूएचओ मानकों से 10 गुना ज्यादा था लेकिन मैं यह नहीं कह रहा कि बीजिंग ने इमर्जेंसी घोषित कर कोई गलती की है, बल्कि प्रशासन के कदम सराहनीय हैं। दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर दिल्ली में जो बात मुझे सबसे अजीब लगी वह यह कि यहां ऐसे कदम नहीं उठाए गए।

प्रशासन ने प्रदूषण कम करने के लिए कुछ उपायों की घोषणा की है लेकिन बहुतों को लगता है कि ये बेहद मामूली हैं। हालांकि दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यह नहीं मानता।

बोर्ड के अध्यक्ष अश्विनी कुमार ने बताया, कि प्रदूषण स्तर कम करने के लिए जो किया जा सकता है, हम वो कर रहे हैं। हालांकि प्रदूषण स्तर बहुत अधिक है लेकिन यह अपवाद नहीं है क्योंकि पहले यह इससे भी अधिक था।

क्या है पीएम ?

हवा में पर्टिकुलेट मैटर (पीएम) पाए जाते हैं, जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर से कम होता है, उन्हें पीएम 2.5 कहा जाता है। जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर से कम होता है, उन्हें पीएम 10 कहा जाता है। पीएम 2.5 का स्तर 60 से अधिक होने और पीएम 10 का स्तर 100 से अधिक होने पर स्वास्थ्य को नुकसान होता है।

क्या कहते हैं जानकार:

नीरज कुमार, पूर्व पुलिस कमिश्नर, दिल्ली: प्रदूषण जैसी बढ़ती विषम परस्थिति में दिल्ली सरकार की सम और विषम संख्या वाली गाड़ी को इस योजना को समय के साथ लागू करना मुश्किल है। हमे देखना होगा की इसके लिए कौन से नीति अपनाई जाएगी।

महेंद्र पाण्डेय, पूर्व सेंट्रल पोललुशन कंट्रोल बोर्ड वैज्ञानिक: दिल्ली को स्वच्छ रखने के लिए, प्रदूषण कम करने के लिए एक सम और विशम नंबर वाली गाड़ी सम और विषम दिन चलाने के सिवाए भी कई चीजो को रोकना की जरूरत है। जिसमे सरकारी विभाग और सरकार महकमा षामिल है। धारा 31 (हवा और जल को प्रदुषित होने से रोक) के तहत कार्रवाई जरूरी है।

भारत में 17 शहरों की डेटा में से 15 शहर से ज्यादा प्रदूषण है। जिसमे दिल्ली अव्वल हैं। 8 महीने में 12 बार डब्ल्यूएचओ के वार्षिक समय सीमा और 3 बार राष्ट्रीय स्तर से प्रदुषण ज्यादा रहा है। अगर चीन और भारत की तुलना में देखे तो 2.5 पीएम से 10 पीएम तक तीन बार ज्यादा रहा है।
दिल्ली आईआईटी सोधकर्ता के अनुसार भी दिल्ली में 60- 90:10 पीएम दूसरे शहरो की वजह से होती है।

प्रदुषण  का स्तर धूल और शूट की उत्सर्जन के वजह से एसओटू  और एनओटू जो वातावरण को ज्यादा प्रदूषित करती है।

रामदेव सिंह, ट्रैफिक पुलिस, दिल्ली: जितना मुश्किल शायद इस नियम को लागू करने में नहीं हो रहा है उससे कही ज्यादा गाड़ियों का नंबर प्लेट डेली चेक करने में होगा। लेकिन प्रदूषण तो कम थोड़ा हीं सही पर कम जरूर होगा।

आम लोगों की प्रतिक्रिया

केदार कुशवाहा, मजदूर, लक्ष्मी नगरअब जिसके पास दो गाड़ी होगा वो जाएगा नहीं होगा तो रोड पर भीड़ में कैसे भी अपना काम तो करेगा हीं। सरकार को क्या है वो तो अपना हर काम करने के लिए एक नया नियम लगा देती है।

शोभा सिंह, इंजीनियर, नोएडाएक तरफ रेप और अत्याचार से महिलाओं को रोकने का मुहीम चल रहा है तो दूसरी तरफ अपने हीं गाड़ी से कोई बाहर नहीं चल सकता। ये तो वही बात हुई की आ बैल मुझे मार। खुद खतरा ले रहे हैं।

रीना राय, डॉक्टर, इफको चैकअगर इस नियम से सरकार को और आम जनता को फायदा है तो चलनी चाहिए। वैसे अब तो दिल्ली में बच्चों को रखने में भी डर लगता है इतनी न्यूज़ में आती है की हवा प्रदूषण हो रही है।

महेश शर्मा, व्यापारी, करोल बाग: पैसो वाली की दुनिया है बाकी लोग तो पहले भी कष्ट में रह रहे थे अब भी रहेंगे । जो किसी तरह चार चक्के की गाड़ी खरीदी होगी अब तो वो फिर बिना गाड़ी के ही चलेंगे। पैसा जिनके पास होगा वो एक दो और गाड़ी खरीद लेगा। सरकार क्या करेगी और भी उपाय थी प्रदुशण कम करने के लिए पर  ये गाड़ी वाला नियम ही क्यों लगा रही है सरकार।

Wednesday, December 30, 2015

अलविदा 2015 ! साल के पूरे घटनाक्रम पर एक नज़र ।

 साल 2015 अलविदा होने वाला है और नए साल यानी 2016 के आगाज की तैयारियां जोरों पर हैं ऐसे में आईये एक नज़र डालते हैं साल के पूरे घटनाक्रम पर एक नज़र ।

राजनीति
नीतीश ने टूटे मनोबल को फिर से संजोया और ऐसी राजनीतिक बिसात  बिछाई कि एनडीए चारों खाने चित हो गया। नीतीश ने पुराने साथी लालू यादव और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाकर एक बार फिर सीएम की बागडोर संभाली। महागठबंधन को 170 से अधिक सीटें मिली। 

भ्रष्टाचार
काली कमाई के धन कुबेर नोएडा के यादव सिंह पूरे साल छाये रहे। सीबीआई जांच शुरू होने के बाद इंजीनियर-इन-चीफ यादव सिंह को सस्पेंड किया गया।

आतंकवाद
अबू बक्र अल-बगदादी दुनिया में दरिंदगी और दहशत का दूसरा नाम बन बन गया। फ्रांस की राजधानी पेरिस में इस्लामिक स्टेट आतंकियों ने नवंबर में सीरियल हमला किया। इसमें करीब डेढ़ सौ लोग मारे गए थे। 

आर्थिक
भारी उतार-चढ़ाव के बीच 2015 दलाल पथ चार साल का सबसे बुरा दौर रहा। विदेशी निवेशकों ने स्थानीय बाजार से अरबों डॉलर की पूंजी की निकासी कर हवा निकाल दी। केन्द्र सरकार ने जहां सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें सौपी गईं, वहीं आरबीआई ने भी ग्राहकों को फायदा पहुंचाने के लिए कई बार नीतिगत दरों में कटौती की।

प्रबंधन 
चुनाव प्रबंधन में यह शख्स बेजोड़ है। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और एनडीए के रणनीतिकार बिहार में नीतीश के तारणहार बने। लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी को चाय पर चर्चा का मंत्र देने वाले प्रशांत ने नीतीश को परचे पर चर्चा का सुझाव दिया। 

अपराध
क्या कोई मां अपनी बेटी की हत्या करवा सकती है, क्या कोई औरत अपनी बेटी की बहन भी हो सकती है, कोई मां अपनी बेटी से रिश्ते को भला दुनिया से क्यों छुपाएगी, क्या किसी महिला के अपने सौतेले बेटे से रिश्ते हो सकते हैं, क्या संपत्ति के लिए कोई अपनी औलाद की हत्या करवा सकता है? जब से शीना हत्याकांड सामने आया है। लेकिन शीना की मौत का राज खुलते ही ये साफ होने लगा कि इंद्राणी तो शीना की मां थी यानी इंद्राणी पर अपनी बेटी के कत्ल का आरोप लगा! इस मर्डर मिस्ट्री में हमेशा  सस्पेंश बना रहा। 

कानून
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को लोकायुक्त नियुक्ति में हो रही देरी के लिए जमकर फटकार लगाई। दो दिन का अल्टीमेटम के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने विशेषाधिकार की धारा 142 का प्रयोग करते हुए लोकायुक्त की नियुक्ति कर दी।

वहीं भारतीय संसद ने जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्श ऑफ चिल्ड्रेन) बिल 2014 पास कर दिया। नए विधेयक के तहत 16 वर्ष से अधिक उम्र के किशोर अपराधियों को व्यस्क मानने का प्रावधान है। किशोर अपराधी पर सामान्य कोर्ट में मुकदमा चलाए जाने के बारे में निर्णय लेने का अधिकार जुवेलाइल जस्टिस बोर्ड के पास होगा। सात साल के कठिन परिश्रम और विचार विमर्श के बाद नेपाल की संविधान सभा ने 16 सितंबर 2015 को नए संविधान को मंजूरी दे दी।

मैगी
मैगी के दीवाने इस साल को भूल नहीं पाएंगे। बाराबंकी में एक फूड सिक्युरिटी ऑफिसर ने जांच कराई तो मैगी के टेस्ट मेकर में लेड की मात्रा मानक से अधिक मिली। इसके बाद देश के कई राज्यों ने इसपर प्रतिबंध लगा दिए। मगर अब मैगी एक बार फिर से बाजार में उपलब्ध है।

खेल
ऑस्ट्रेलियाई खिलाडि़यों ने आईसीसी वर्ल्ड कप 2015 के फाइनल मुकाबले में न्यूजीलैंड को सात विकेट से मात देकर रिकॉर्ड पांचवीं बार विश्व कप अपने नाम कर लिया। ऑस्ट्रेलिया ने न्यूजीलैंड से मिले 184 रनों के आसान लक्ष्य को 101 गेंद शेष रहते तीन विकेट खोकर हासिल कर लिया। वहीं टेनिस स्टार सानिया मिर्जा साल 2015 में कई बार विवादों में रहीं। राजीव गांधी खेल रत्न और प्राइवेट जेट मेकअप इसमे शामिल रहा। 

हादसे
नेपाल के लिए यह साल भूकम्प के हमले का साल रहा। 25 अप्रैल के दिन भूकम्प ने नेपाल को हिला कर रख दिया। इस भूकम्प में कई महत्वपूर्ण प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर और अन्य इमारतें बर्बाद हो गईं थी। 1934 के बाद पहली बार नेपाल में इतना प्रचंड तीव्रता वाला भूकम्प आया था। इस भूकम्प में 8000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। जबकि 2000 हजार से ज्यादा लोग घायल हो गए थे।

अफवाह
देश में असहिष्णुता फैलने और केंद्र सरकार को जनता विरोधी ठहराते हुए जैसे मुद्दे खबरों में छाए रहे। बड़ी संख्या में साहित्यरकारों और फिल्मकारों ने अवॉर्ड लौटाए। दादरी में गौ मांस खाने की अफवाह से देष शर्मसार हुआ। उग्र भीड़ ने द्वारा अखलाक नाकम युवक को गौ मांस खाने और रखने की अफवाह के बाद पीट-पीटकर मार डाला। 

फिल्म
निर्देशक ए.आर. मुरुगदास और आमिर खान की फिल्म गजनी देश में 100 करोड़ की कमाई करने वाली पहली फिल्म बनी। महज 18 दिनों के अंदर गजनी ने बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ की कमाई की। वहीं सलमान खान की फिल्म बजरंगी भाईजान 25 करोड़ की लागत से बनी मगर इस फिल्म ने भारत में 318.14 करोड़ रुपये बटोरे।

मौत 
भारत की अग्नि मिसाइल को उड़ान देने वाले मशहूर वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दुनिया को साल 2015 में अलविदा कहा। कलाम न सिर्फ एक महान वैज्ञानिक, प्रेरणादायक नेता थे बल्कि अद्भुत इंसान भी थे। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम 30 जुलाई 2015 को रामेश्वरम में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। वहीं वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अशोक सिंघल ने अंतिम सांस ली। उन्होंने अयोध्या में राममंदिर बनाने के लिए अभियान का न केवल नेतृत्व किया। 

भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष जगमोहन डालमिया का दिल का दौरा पड़ने से निधन हुआ।मशहूर अभिनेत्री साधना का मुंबई के हिंदुजा हॉस्पिटल में निधन हुआ। 74 साल की साधना कैंसर से पीडि़त थीं। आरजू, मेरे मेहबूब, लव इन शिमला, मेरा साया, वक्त, आप आए बहार आई, जैसी कई मशहूर हिंदी फिल्मों में उन्होंने काम किया था। साधना का साधना कट हेयरस्टाइल बेहद मशहूर हुआ था।

मौसम
चेन्नई में नवंबर-दिसंबर में हुई बारिश के चलते हालात बिगड़ गए। सड़कें दरिया बन गईं। आशियाने छिन गए। सेना और एनडीआरएफ की टीमों ने दिन-रात एक कर लोगों को बाहर निकाला। 

इस हमाम में सभी नंगे हैं !

कानूनी समानता का मतलब है कानून के सामने समानता और सबके लिए कानून की समान सुरक्षा। अवधारणा यह है कि सभी मनुष्य जन्म से समान होते हैं, इसलिए कानून के सामने समान हैसियत के पात्र हैं। कानून अंधा होता है और इसलिए वह जिस व्यक्ति से निबट रहा है उसके साथ कोई मुरौवत नहीं करेगा। वह बुद्धिमान हो या मूर्ख, तेजस्वी को या बुद्धू, नाटा हो या कद्दावर, गरीब हो या अमीर, उसके साथ कानून वैसा ही व्यवहार करेगा जैसा औरों के साथ करेगा। लेकिन उपवाद भी हैं। किसी बालक या बालिका के साथ किसी वयस्क पुरुष या स्त्री जैसा व्यवहार नहीं किया जाएगा और बालक या बालिका के साथ मुरौवत किया जाएगा। तो फिर ये कानून यहाँ आकर अँधा हो जाता है।




 ऐसे में ये जुमला एक बार फिर सच साबित हुआ। निर्भया अपराध पूरी तरह से सिद्ध था मरने वाली मासूम लड़की ने मरने से पहले अपनी पूरी वेदना को व्यक्त करते हुए कहा था कि जिन्दा जला दो उसे! लेकिन राजनीति की शौक़ीन (गैर)कानूनी व्यवस्था और स्वयं को सबसे लाचार जताने वाली (अ)न्याय व्यवस्था ने जिस तरह एक मुर्दा तंत्र के सामने घुटने टेक दिए उसे महसूस करके स्वयं के भारतीय होने पर शर्मिंदगी का अहसास होता है।








कितनी बड़ी विडंबना है कि विद्वानों और न्यायी राजाओं की एक धरती पर एक भी जज एक भी वकील ऐसा नहीं निकला जो किशोर कानून की व्याख्या कर पाता। एक भी ऐसा राजनीतिक दल इस देश में नहीं दिखा जो ये कह सके की बदल डालो इस बाल अपराध अधिनियम को जो समाज में हैवानियत करने का छूट प्रदान करता है। देश में पहली बार रायसीना हिल्स पर हजारों की संख्या में लोग न्याय मांगने के लिए पहुंचे थे। मगर सत्ता की सिखर से भी लोगों को पानी की बौछारें और लाठियां हीं मिली।




नियमों की लाचारी का रोना रो रही पूरी व्यवस्था ने भारत की बेटी के साथ अन्याय किया है। निर्भया के गुनाहगार सिर्फ वो लोग नहीं हैं जिन्होंने उसे दरिंदगी कर के मार डाला बल्कि इस देश का हर वह जिम्मेदार और अधिकार संपन्न व्यक्ति है जिसे इस देश के लोगों को न्याय देने के लिए पद, पैसा, रुतबा और अधिकार दिए गए हैं। जाहिर है कि दरिन्दे को नाबालिग कहकर छोड़ देने के लिए इस देश का राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, पूरी संसद, दिल्ली की विधानसभा, सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, फैसला देने वाला न्यायाधीश, उभयपक्ष के अधिवक्ता, गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी, संरक्षण में रखने वाले केयरटेकर, इत्यादि सारे के सारे लोग बराबर के जिम्मेदार हैं।



इनमे से किसी एक की यदि मंशा सही और न्यायोचित होती तो न्याय मिलता। तो सवाल ये भी खड़ा होता है की क्या इस हमाम में सभी नंगे हैं! अभी भी समय नहीं गया है न्याय मिल सकता है लेकिन इस देश में हर बात को मुद्दा बनाने और हर पीड़ा की मार्केटिंग करने का चलन आम है। मीडिया से ले कर इस देश का विपक्ष मार्केटिंग कर रहा है और बिक रहे हैं इस देश की बेटियों के कफ़न जिनपर बलात्कार के दाग हैं। जिस देश में अधिवक्ता से ले कर महान्यायवादी तक ये समझने में विफल हैं कि कोई कानून किस मंशा के साथ बनाया गया था उस देश में न्याय की कल्पना भी असंभव है।



न्याय की सबसे बड़ी सच्चाई और सबसे बड़ी विडंबना यही है कि न्याय इच्छा शक्ति से होता है अच्छी मंशा और निर्विकार भाव से होता है न कि कानून की किताबों से। किताबे सिर्फ मार्गदर्शक होती हैं उनमे स्वयं को सम्पादित करने की क्षमता नहीं होती। नियम सिर्फ किसी भाषा में लिखी पंक्तियाँ होती हैं जिनका अर्थ न्याय करने वाला उचित तरीके से करेगा ये उसकी शुचिता और मंशा पर निर्भर है।



दुनिया का कोई कानून ऐसा नहीं है जिसकी व्याख्या न्याय को होने से रोके बशर्ते न्याय करने वाला व्यक्ति न्याय देते समय निर्विकार और दृढ-प्रतिज्ञ हो कि वह सिर्फ न्याय करेगा और कानून के अनुसार करेगा| तरस आता है मुझे उन अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों पर जिनके पास कानून के अपर्याप्त होने का रोना तो है लेकिन उपलब्ध कानून की व्याख्या करने की या तो मंशा नहीं या फिर अक्ल या फिर दोनों ही नहीं है बस कुर्सी मिल गई है तो नौकरी बजा रहे हैं।

Monday, November 30, 2015

तीसरी शक्ति की परिभाषा !

देश में एक बार फिर से तीसरी शक्ति पारिभाषिक शब्द बन गया है जिसका अर्थ जरूरी नहीं है कि वह तीसरे स्थान का ही कोई राजनितिक मोर्चा हो | यह ऐसे राजनीतिक प्रवृतियों वाले दलों के मोर्चे के रूप में रूढ शब्द हो गया है जो वैकल्पिक धारा का प्रतिनिधित्व करते है | वैकल्पिक से अर्थ है ऐसी राजनीति जिसमे सामाजिक सत्ता से छिटकी हुई जातियों के नेताओं का नेत्रत्व हो , जिसमे सफ़ेद पोश की वजाय मेहनतकश वर्ग से आये नेता अगुआकार हो , जो मजबूत संघ की वजाय राज्यों को अधिकतम स्वायतत्ता की पक्षधर हों | वी पी सिंह ने रामो वामो के रूप में सही मायने में तीसरी शक्ति का जो विम्ब प्रस्तुत किया था आज भी तीसरी शक्ति का नाम आता है तो लोग उसी विम्ब की कल्पना कर लेते है |

लेकिन वी पी सिंह के बाद कोई नेता ऐसा सामने नहीं आया जो तीसरी शक्ति का कुनबा जोड़ सके | जनतादल परिवार की एकता का तराना छेडकर मुलायम सिंह ने तीसरी शक्ति के नेता के नये अवतार को साकार करने की कोशिश की लेकिन अवसरवादी नीतियों की वजह से जनता दल के समय ही यह साबित हो चुका था कि मुलायम सिंह ऐसी किसी संरचना की सामर्थ्य नहीं रखते बल्कि अपने वर्ग द्रोही चरित्र के कारण वे तीसरी शक्ति को विखेर देने का काम करने लग जाते है | फिर भी तीसरी शक्ति इस देश की एक जरूरत है ताकि आधुनिक भारत के निर्माण के लिए देश में वांछित परिवर्तन लाया जा सके |

इस समय जबकि कोंग्रेस के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मडरा रहे है , नरेन्द्र मोदी के प्रति मोहभंग की बजह से भा ज पा के केंद्र में पैर डगमगाने लगे है राष्ट्रीय स्तर पर विकल्प के रूप में तीसरी शक्ति के सितारे बुलंद होने के आसार देखे जाने लगे है लेकिन बिहार के चुनाव परिणाम आने के पहले तक तीसरी शक्ति में किसी राष्ट्रीय स्तर के नेत्रत्व के अभाव की बजह से किसी संभावना को टटोलना मुश्किल लग रहा था लेकिन बिहार के चुनाव परिणाम ने रातों रात इस मामले में हालात बदल दिए है | तीसरी शक्ति को अब नीतीश कुमार के नेतृत्व के तले सजोए जाने की कल्पना दूर की कौड़ी लाना नहीं माना जा सकता | बिहार का चुनाव राष्ट्रीय स्तर का दंगल बन गया था इसलिए नीतीश कुमार इसे जीत कर एकाएक ऐसे महाबली बन गये है जिन्हें केंद्र बिंदु बनाकर राष्ट्रीय स्तर का धुर्वीकरण होने की पूरी पूरी संभावना है |

तीसरी शक्ति बदलाव की ऐसी ख्वाहिश का नाम है जिसकी तृप्ति न होने से बदलाव की भावना से ओत प्रोत भारतीय जन मानस प्रेत की तरह भटकने को अभिशप्त है | मोटे तौर पर भारतीय समाज को लेकर यह अनुमानित किया जाता है कि भेद भाव और अन्याय पर आधारित वर्ण व्यवस्था में बदलाव होने पर देश में एक साफ़ सुथरी व्यवस्था कायम हो सकेगी | लोहिया जी से लेकर वी पी सिंह तक सवर्ण नेताओं की एक जमात भी साफ़ सुथरी व्यवस्था की कायल होने की वजह से वंचित जातियों का सशक्तिकरण करके इसीलिए वर्ण व्यवस्था को कमजोर करने की रणनीति पर अमल करती रही लेकिन यह विडम्बना है कि इन रणनीतियों के परिणाम उलटे निकले है |

वंचित जातियों के सशक्तिकरण के दौरान जिन नेताओं के हांथो में राजनीतिक सत्ता पहुची उन्होंने जातिगत भावनाओं को चरम पर पहुचा कर वर्ण व्यवस्था को अलग ढंग से पहले से ज्यादा मजबूती तो दी ही उन्होंने अन्याय की पराकाष्ठा भी वंशवाद व् स्वेच्छा चारी शासन के रूप में फलित की | बिहार के चुनाव में लालू को मतदाताओं ने सबसे बड़ा इनाम दिया क्योकि उन्होंने बदलाव की राजनीति में सदैव अपने को पटरी पर रखा लेकिन उक्त बुराइयों और अदालत के निर्णय के कारण सत्ता के गलियारे से बाहर रहने की अपनी मजबूरी के चलते वे खुद किंग नहीं बन सकते | उनकी भूमिका फिलहाल किंग मेकर तक की रह गयी है | अगर वे आगे चलकर अदालत से क्लीन चिट भी पा लेते है तब भी बिवादित हो चुके अपने व्यक्तित्व के कारण वे राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नहीं हो सकते |

ऐसे में इस पूरे घमासान की सफलता का सारा इनाम नीतीश कुमार की झोली में जा गिरा है हालाकि वे एक बार लालू की ही हठधर्मिता की वजह से जार्ज और शरद यादव के बहकावे में भा ज पा नीति गठबंधन में शामिल होकर फिसलन के शिकार बन चुके है लेकिन समय रहते उन्होंने इस कलंक का प्रक्षालन कर लिया है|

तीसरी शक्ति की गुणात्मक विशेषता के अनुरूप झा उनका नेतृत्व सामाजिक बदलाव की कसौटी को पूरा करता है वही वे मूल्यों की राजनीति में भी खरे है और तीसरी शक्ति के संघर्ष को तार्किक परिणति तक पहुचाने के लिए इसकी जरूरत सर्वोपरि है |

Tuesday, November 17, 2015

सेवा निवृति और समय ?

देश में सेवा निवृति को लेकर एक नयी बहस छिड़ी हुयी है. सेवा निवृत्ति  अर्थात जब व्यक्ति अपनी आयु के साठ वर्ष पार करता है तो जिस संस्थान में अपनी सेवा देता है. उसे उस की सेवा से मुक्त कर दिया जाता है. वह स्वयं मुक्त नही होता और न ही होना चाहता है. यह मुक्त होने की प्रणाली कोई नई प्रणाली नही है. पुरातन काल से चली आ रही आश्रम अवस्था का एक विकृत रूप है. आश्र्मावस्था में इसे वानप्रस्थ आश्रम की संज्ञा दी जाती है. इस व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति पारिवारिक जिम्मेवारियों को निभाने के बाद अथवा बेटे का बेटा होने के बाद बेटे को पारिवारिक सामाजिक अधिकार सौप कर स्वेच्छा से वानप्रस्थी बन वानप्रस्थ आश्रम को प्रस्थान कर जाता था. परिवार के संकुचित क्षेत्र से निकल कर समाज के विस्तृत क्षेत्र में सेवा कर समय का सदोपयोग करता था. एक छोटे परिवार से निवृत हो जाता और समाज के बड़े परिवार में प्रवृत हो जाता था धीर-धीरे परिस्थितियों बदल रही हैं. सेवा निवृति के बाद समय का कैसे उपयोग हो एक बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न बनता जा रहा है.

न सेवा निवृति से पूर्व अधिकांश लोग कोई भी योजना नहीं बना पाते हैं. आर्थिक रूप से सम्पन्न क्लबों में व किटटी पार्टियों में ताश व पीने -पिलाने में मस्त रहने का प्रयास करते हैं, जो आर्थिक रूप से सम्पन्न नही हैं वे पार्कों में अथवा चौपालों में या फिर जहाँ भी बैठने को स्थान मिल गया बैठ कर ताश खेल लेते है. कई वरिष्ठ नागरिक पार्कों में अलग-अलग समूह बना कर बैठे मिलते हैं. उन की चर्चा के विषय भी अलग -अलग ही होते हैं -राजनीति से लेकर पारिवारिक उलझनों में उलझे रहते हैं. कई सेवा निवृत जिन की बहुएँ नौकरी करती हैं वे उनके बच्चो की बेबी -सिटिंग करते है. एक वर्ग अपनी संतान से उपेक्षित होकर वृद -आश्रम में शरण लेने को विवश हो कर जीवन की संध्या को वहाँ गुजार लेते हैं, खैर यह तो मेरा विषय नही है, मेरा विषय है कि जब हम सेवा निवृत हों तो ऐसी प्रवृति अपनाएं जिस से  समय का सदोपयोग हो.

सेवा निवृति के पश्चात हम ने समय का सदोपयोग हो, इसी भावना के साथ कुछ बच्चों को पढ़ाना शुरू किया है. ये बच्चे व इन के माता-पिता झुग्गी-झोपडी में रहते हैं. पिता दिहाड़ी करता है. माँ कोठियों में काम करती है और कोठियों में रहने वाले बच्चों के पुराने कपड़े जो मिलते हैं, उन्हें ये बच्चे पहनते हैं. सरकारी स्कूलों में इन बच्चों को प्रवेश करा दिया है. ये बच्चे हैं वहां क्या पढ़ते हैं व क्या इन्हें पढ़ाया जाता है, इन बच्चों को मालूम नहीं है, न ही अनपढ़ माता -पिता जानते हैं. जिस प्रकार के वातावरण में रहते हैं वह शिक्षा का वातावरण नहीं है. बच्चों का बुद्धि-स्तर भी विकसित नहीं है. एक-दो बच्चों को छोड़ बाकी बच्चों को पढाई का भी कोई विशेष शौक नहीं है.

स्कूल का पाठ्यक्रम देख कर मै घबरा गई. प्रथम कक्षा में हिन्दी, गणित व्  इंग्लिश पढाई जाती है. हिंदी तो ठीक ढंग से बोल नहीं पाते तो इंग्लिश कैसे समझेगे व बोलेगे. चलना तो  पाठ्यक्रम के अनुसार है ताकि अपनी परीक्षा पास कर सकें और अपने दैनिक जीवन की आवश्कतायों को सहजता से पूरा कर सकें, स्वयं को सामाजिक एवं राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़ सकें, साक्षरता तथा संस्कारों का आपस में  अभिन्न संबंध है. हम इन्हें अक्षर ज्ञान के साथ -साथ नैतिक शिक्षा की बातें बताते हैं. शिष्टाचार सम्बन्धी जैसे सब को नमस्ते से अभिवादन करना व  माता -पिता व बड़ो का आदर करना तथा उनका कहना मानना साथ ही ईश्वर संबंधी चर्चा करते हैं कि ईश्वर सर्व व्यापक, सब जगह पर है. वह हमे देख, सुन और जान रहा है. ईश्वर क्या -क्या करता है? उस के साथ हमारे क्या-क्या संबंध हैं और गलत काम करते हैं तो ईश्वर हमें  सजा भी देता है और. अच्छे काम करने पर इनाम भी देता है. बड़ा अच्छा लगता है जब बच्चे ध्यान से सुनते हैं व सुनाते हैं.

यह क्रियात्मक प्रयोग जो हम कर रहे हैं, इस की उपलबिध केवल बच्चों को ही नहीं हो रही है. अब तक तो स्वाध्याय करते व प्रवचन सुन लेते थे परन्तु अब जीवन में व्यवहार में लाने का अवसर मिला है. इस वर्ग के बच्चों के साथ जो स्वयं सफाई से वंचित रहते हैं, जहाँ रहते हैं वहाँ पानी का अभाव है और जब इन बच्चो के शरीर से विशेष करके ग्रीष्म ऋतु में पसीने की दुर्गन्ध आ रही होती है तो सहजता व धैर्य से लेने का अभ्यास बना रहे हैं. जब कभी इन पर गुस्सा भी आता तो स्वयं पर नियन्त्रण करने का अभ्यास करते हैं. यह सोच कर कि सब पवित्र आत्माएं हैं, इन्हें हमारी सहानुभूति की आवश्यकता है. इन्हें भरपूर प्यार दें जिस से इन की रूचि बनी रहे. हमें इस बात का भी संतोष होता है कि ये बच्चे हमारे पास स्वस्थ वातावरण में अपना समय गुज़ार जाते हैं. ऋषि दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य समाज के नौवें नियम –”-सब को अपनी उन्नति में ही संतुष्ट नहीं रहना चाहिए सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए” .इस नियम का रहस्य व तथ्य भी समझ में आ रहा है. बच्चे उन्नत हो रहे हैं तो उन के साथ हम भी उन्नत हो रहे हैं.